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________________ (८५) नवप्रकाशित साहित्यनो परिचय Indian Logic: A study of Jayanta Bhatta's Nyayamañjari : Part II-Nagin J. Shah. Sanskrit - Sanskriti Granthmala 3. 1995. 23 Valkeshvar Society, Ambawadi, Ahmedabad-380015. pp. 12+224. Rs. 225/ डॉ. नगीन शाह घणां वरसथी काश्मीरी मूर्धन्य पंडित जयंत भट्ट (ईसवी नवमी शताब्दीनो अंत, दसमीनो आरंभ)नी 'न्यायमञ्जरी 'नुं अध्ययन करता रह्या छे. 'न्यायमञ्जरी 'नां विविध आह्निकोनो तेमनो गुजराती अनुवाद प्रसिद्ध थतो रह्यो छे. प्रस्तुत पुस्तकमां तेमणे प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्दप्रमाण, स्वत:प्रामाण्य अने परत:प्रामाण्यनो ईश्वरनी सत्ता, शब्दनी नित्यता-अनित्यता-ए विषयोने लगता 'न्यायमञ्जरी'ना बीजा अने त्रीजा आह्निकनुं अध्ययन आप्युं छे. परिशिष्टमां धर्मकीर्तिनो प्रमेयविचार अने पूर्वकालीन न्यायवैशेषिक दर्शनमां थयेल ईश्वरविचारनुं तारण आप्यु छे. भारतीय दर्शनना अभ्यासीओने डो. शाहनुं आ गंभीर अने विशद अध्ययन अत्यंत उपयोगी नीवडशे. जैन दर्शन अने सांख्य-योगमां ज्ञान-दर्शन-विचारणा. जागृति दीलीप शेठ. संस्कृत-संस्कृति ग्रंथमाला २. १९४५, पृ १६+२०० रू.१५०. ज्ञान अने दर्शन- स्वरूप, तेमनी वच्चेनो संबंध, आध्यात्मिक विकासमां तेमनुं योगदान वगेरे विशे भारतीय दार्शनिको, चिंतन बहुमूल्य छे. आ पुस्तकमां लेखिकाए मुख्यत्वे जैनदर्शन अने सांख्ययोगमा ए विषयोनी जे विचारणा थई छे तेनो तुलनात्मक अभ्यास कर्यो छे. ते साथे बौद्ध दर्शन, उपनिषदो, गीता अने न्यायवैशेषिक दर्शनमां पण ए विषयोनी जे विचारणा थई छे ते पण निरूप्युं छे. आ अभ्यास मूळ संस्कृत, प्राकृत, पालि ग्रन्थोने आधारे करेलो छे. अर्थघटन करवामां ते ते दर्शननी विचारणा साथे संवादिता रखाई छे, अने आचार्योना मतविरोधनो परिहार करवानो पण प्रयास को छे. (नगीन शाहना प्रास्ताविकने आधारे) Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.520505
Book TitleAnusandhan 1995 00 SrNo 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year1995
Total Pages110
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size6 MB
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