Book Title: Sambodh Prakaranam
Author(s): Haribhadrasuri,
Publisher: Jain Granth Prakashak Sabha
View full book text
________________
कंदप्प १ देव २ किब्बिस ३ अभिओगा ३ आसुरी य४ संमोहा। एमा हु अपसत्या पंचविहा हुंतिपणवीसा २५॥२३९॥ तिविहेण करणजोएण संजओ सुसमाहिओ। पसत्था जुंजए सम्मं चयइ इमा अप्पसत्था य ॥२४०॥ पंच नियंठा भणिया पुलाय १ बउसा २ कुसील ३ निग्गंथा ४। होइ सिणाओ य५ तहा एक्केको सो भवे दुविहो ॥२४१॥ धन्नमसारं भन्नइ पुलायसदेण तेण जस्स समं । चरणं सो उ पुलाओ लद्धीसेवाहि सो य दुहा ॥२४२॥ संवाइयाण कज्जे चुणिज्जा चक्कवट्टिमवि जीए। तीर लद्धीइ जुओ लद्धिपुलाओ मुणेयव्वो ॥२४३॥ आसेवणापुलाओ पंचविहो नाणदंसणचरित्ते । लिंगंमि अहासुहुमो होइ आसेवणानिरओ ॥२४४॥ उवगरणसरीरेहि बउसो दुविहो य सोवि पंचविहो । आभोगाणाभोगसंवुडा संवुड सुहुमेहिं ॥२४५॥ पडिसेवणाकसाए दुहा कुसीलो दुहावि पंचविहो । नाणे दंसणचरणे तवे य अहसुहुमए चेव ॥२४६॥ गंथो मिच्छत्तधणाइओ मोहाओ निग्गओ जो सो । उवसामओ य खबगो दुहा नियंठो वि पंचविहो ॥२४॥ पढमापढमे चरिमाचरिमे य तहा अहासुहुमे य । मिच्छत्त १ वेय.३ हास-च्छय ६ कोहचउकं ४ हवइ गंथो ॥२४८॥ सुहझाणजलविसुद्धो कम्ममलाविरकया सिणाओत्ति । दुविहो य से सजोगी तहा अजोगी विणिदिठ्ठो ॥२४९॥ सो पुण पंचवियप्पो अच्छवी य असबलो अकम्मसो। अपरिस्सावी संसुद्धनाणदंसणधरो अरिहा ॥२५०॥ आइम संजमजुयले तिन्नि उ पढमा कसायवं चउसु । निग्गंथसिणाया पुण अहखाए संजमे हुंति ॥२५१॥ भूलुत्तरगुणविसया पडिसेवासेवए पुलाए य। उत्तरगणेसु बउसो सेसा पडिसेवणारहिया ॥२५२॥ सामाइव १ ओव-छावण २ च परिहारयविसुद्धं ३ । सुमुह ४ महकायरूवं ५ चय रित्तइ तेण चारित्तं ॥२५॥
Jain Edule
nterational
For Private & Personal use only
Prasaw.jainelibrary.org

Page Navigation
1 ... 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112 113 114 115 116 117 118 119 120 121 122 123 124 125 126 127 128 129 130