Book Title: Sambodh Prakaranam
Author(s): Haribhadrasuri, 
Publisher: Jain Granth Prakashak Sabha

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Page 95
________________ घणसेही परिग्गहमी दिसिपरिमाणमि होइ महाणंदो । मंतिसुया उवभोगे मित्ततयं रपणिभोयणए ॥१५३॥ मियसुंदरी उ लोए अणदंडंमी वीरसेणनियो । सामाए धणमित्तो धणदो देसाबगासमी ॥१५४॥ पोसहवयंमि हु देवकुमरो तह पेयकुमरदिद्रुता । गुणधरगुणाकराणं दिटुंता अइहिसंभागे ॥१५५॥ ॥ इति श्रावकव्रताधिकारः॥ ॥ अथ संज्ञाधिकारः॥ आहारभयपरिग्गह मेहुणे तह कोह माण मायाए । लोभे लोगे ओघे सन्नदस भेया सव्वजीवाणं ॥१॥ रुरकाण जलाहारो समिच्च सत्थं भएण संकुचए । नियतंतेहिं वेढइ वल्ली रुरकं परिग्गहेइ ॥२॥ कुरुबयतरुणो फुल्लति जत्थ आलिंगण तरुणीणं । तरुणीपयोहरपुठ्ठा असोयतरुणो वि वियसंति ॥३॥ तरुणीमइरागंण तोसिया केसरा वि कुसुमति । चंपयतरुणो वरुणो फुल्लंति सुरहिजलसिच्चा ॥४॥ वियसंति तिलयतरुणो तरुणिकडरकेहि पडिहया जत्थ । फुल्लंति विरहरुरका सोऊणं पंचमुग्गारं ॥५॥ सिणगार चारुवेसो तरुणीतंबोलसंगओ तारो । पायं कोकणदस्स कंदो हुंकारो मुयइ कोहेण ॥६॥ माणे झरई रुयंती च्छायद वल्ली फलाण मायाए । लोहे बिल्लपलासा खवंति मूले निहाणुवरि ॥७॥ रयणीए संकोओ कमलाणं होइ लोगसण्णाओ। ओहे चइत्तु मग्गं चढंति रुस्केसु वल्लीओ ॥८॥ एगिदियजीवाण वि इय दस सन्ना जिणेहि पण्णत्ता। न ह हुंति मोहसुहदुह-वितिगिच्छासोगधम्मा य ॥९॥ ॥ इति संज्ञाधिकारः॥ Jain Education int o nal For Private & Personal use only www.trialibrary.org

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