Book Title: Sambodh Prakaranam
Author(s): Haribhadrasuri, 
Publisher: Jain Granth Prakashak Sabha
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥ श्रीजिनाय नमः ।। ॥ श्रीमद्धरिभद्रसूरिविरचितम् ॥ (तत्त्वप्रकाशकापरनामकम् ) ॥ संबोधप्रकरणम् ॥ राजनगर (अमदावाद )स्थ जेनग्रन्थमकाशकसभायाः कार्यवाहकः शा. वाडीलाल बापुलाल इत्यनेन पाकाश्यं नीतम् संवत १९७२, मूल्यम रु.१-८-० सार्धरूप्यकम, सने १९१६ ।। For Print & Personal use only Powunwjairainbrary.org, Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ COMPUmesnews आ पुस्तक “ अमदावादमा " घीकांटा शेठ जेशंगभाइनी बांडीमा आवेला श्रीजैनएडवोकेट पीन्टींग प्रेसमां शा. चीमनलाल गोकलदासे छाप्यु. प्रत. ५०० आवृत्ति १ ली. किमत रू. १-८-० Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥ॐ नमः ॥ ॥ श्रीमद्धरिभद्रसूरिविरचितम् ॥ ॥ संबोधप्रकरणम् ॥ Remonomy नमो विततेकान्तिकात्यन्तिकहितहेतुभ्यः सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रभृद्भयः श्रीमत्सद्गुरुभ्यः॥ नमिऊण वीयरायं सव्वन्न तियसनाहकयपूर्य । संबोहपयरणमिणं वुच्छं सुविहियहियठाए ॥१॥ जे केवि मग्गरत्ता चरिमावत्ते य चरिमकरणम्मि । तसि विबोहणठ्ठा भव्वाणं भवियदव्वाणं ॥२॥ सेयंबरो य आसं-बरो य बुद्धो य अहव अण्णो वा । समभावभाविअप्पा लहइ मुरकं न संदेहो ॥३॥ मग्गो मग्गो लोए भणंति सब्वेवि मग्गणारहिया । परमप्पमग्गणा जत्थ तम्मग्गो मुरकमग्गुत्ति ॥४॥ जत्थ य विसयकसाय-वाओ मग्गो हविज्जणो अपणो। नामाइ चउपमेओ भणिओ सो वीपरागेहिं ॥५॥ सववि मग्गासमा भव्वाण Jain Education ainelibrary.org Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध प्रकरणः तत्थप्पभावमग्गो साहिज्जइ पवरसुद्धकरणहिं । बझंतरप्पजोग-प्पओयणे परमपयडत्यं ॥ ६॥ तक्काइजोयकरणा खीरं पपडं घयं जहा हुज्जा । मंथणजोए अग्गी सदणुठाणे तहा अप्पा ॥७॥ सो भावमुरकमग्गो परमप्पा हेउविरहिओ जत्थ । सुद्धसभावगुणाई संमिलिओ पयडधयकप्पो ॥८॥ सो धम्मो तं तत्तं परमागमसारभायणं जाण । परमठ्ठनिठ्ठियठ्ठो उक्किठविसिगुणरूवो ॥ ९॥ चउकारणपरिजुत्तं सव्वं कन्जं समुप्पए पायं । तम्मि य पढमे सुद्धे सव्वाणि तयणुसाराणि ॥१०॥ भावगयं तं मग्गो तस्स विसुद्धीइ हेउणो भणिया । देवगुरुधम्मतत्त-प्पयार संबोहलोगवरा ॥११॥ तत्थय पढमं देवो अठ्ठारस दोसलेसनिम्मुक्को । लोउत्तरगुणगणणा-संकलिओ अप्परूवमओ ॥ १२ ॥ अन्नाण १ कोह २ मय ३ माण ४ लोह ५ माया ६ रई ७य अरई -८॥ निद्दा ९ सोय १० अलियबयणं ११ चोरिया १२ मच्छर १३ भया य १४ ॥ १३ ॥ पाणिवह १५ पेमकीला १६ पसंग १७ हासा य १८ जस्स ए दोसा। अठ्ठारस वि पणठ्ठा नमामि देवाहिदेवं तं ॥१४॥ जत्थ य जं जाणिज्जा निस्केवं निस्किवे तहिं तत्थ । जत्थ य नवि जाणेज्जा चउक्वयं निस्किवे तत्थ ॥१५॥ नामजिणा जिणनामा ठवणजिणा पुण जिणिदपडिमाओ। दव्वजिणा जिणजीवा भावजिणा समवसरणत्था ॥१६॥ जोर्स निरकेवो खलु सच्ची भावेण तेसि चउरो वि । दवाईया सुद्धा हुंति ण सुद्धा असुद्धस्स ।। १७ ॥ तमा जिणसारिच्छा जिणपडिमा सुद्धजोयकारणया। तभत्तीए लप्मइ जिर्णिदपूयाफलं भव्वो ।।१८।। सो देवो लखिज्जइ दव्वेहिं गुणेहिं पनवोहिं च । मुद्दाइविमेएहि भवियजणबोहणट्ठाए ।।१९।। For Private & Personal use only Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दब्वेण अमरमहिओ गुणेहिं गोखीरसरिसरुहिराई । पज्जव अरिहपयाई मुद्दा पउमासणाईया ॥ २० ॥ ककेल्लि १ कुसुमकुछी २ दिव्वज्झुणी ३ चामरा ४ सणाई च ५। भावलय ६ मेरि छत्तं सन्निहियपाडिहेराइं॥२१॥ रयरोयसेयरहिओ देही १ धवलाई मंसरुहिराइं २ । आहारानीहारा अद्दिस्सा ३ सुरहिणो सासा ४ ॥ २२ ॥ जम्माउ इमे घउरो इकारस घाइकम्मखयपभवा । खित्ते जोयणमित्ते तिजयजणो माइ बहुओ वि ॥ २३ ॥ नियमासाए नरतिरिन्सुराण धम्मावबोहया भासा ६ । पुव्वुप्भवरोगा उव-समंति ७ नूया नय ति वेराइं ८ ॥२४॥ दुप्भिरक ९ उमर १० दुम्मा-रि ११ ईइ १२ अतिवुठ्ठी १३ अणतिवुठीय १४ ॥ हुंति न बहुजियसुहकरो पसरइ भामंडलुज्जोओ १५॥ २५ ॥ सुररइया गुणवीसा मणिमयसिंहासणं सपायपीढं १६ । छत्तत्तय १७ इंदद्धय १८-सिय चामर १९ धम्मचक्काइ २०॥२६॥ सह जगगुरुणा गयणं ठियाई पंच वि इमाइं विचरंति । पाउप्भवइ असोओ २१ चिठ्ठइ जत्थ प्पहू तत्थ २२ ॥२॥ चउमुहमुत्तिचउक्कं २२ मणिकंचणरुप्परइयसालतिगं २३ । नवकणयपंकयाई २४ अहोमुहा कंटया हुंति ॥२८॥ निश्चमवठियमित्तो पहुणो चिठंति केसरोमनहा २६ । इंदियअत्था पंचवि मणोरमा हुंति तत्थ उऊ २८ ॥२९॥ गंधोदयस्स युट्ठी २९ वुडी कुसुमाण पंचवण्णाणं ३०। दिति प्पयाहिणाओ सउणा ३१ पवणो वि अणुकूलो ३२ ॥३०॥ पणमंति दुमा ३३ वज-ति बुंदुहीओ गुहिरघोसाओ ३४ । चउतीसमईसयाणं सब्बजिणिदाण होइ इमं ॥३१॥ पणतीस बुद्धवयणा अइसय सहिओय भवियजणमहिओ। देवाहिदेवनामहि पयडो भवसायरतरंडो. ॥३२॥ भावाइसपचनक्कग-संमेउ सम्बसममाहप्पो । बज्झम्भंतररिउगण नासापारावगमरूवो ॥३३॥. For Private & Personal use only Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सबोध प्रकरणम्: खाइयनाणातिसओ वयणाइसओ खउवसमे भावे । उवयारओं वि पूया-तिसयगुणों भावरूवमि ॥३४॥ मोहरूकएण पढमो नाणावरणरूकएण बीओबि । दसणखएण तइओ विग्घखए चउत्थओ होई ॥३५॥ संपुण्णसिद्धमुद्दा पडिमा दय्वगसरीरजिणकप्पा । तियसेहिं कयपूया संपइ सा दव्वओ पूया ॥३६॥ रूवाईयावत्था सभावउ दव्वभावपूयाभा । जा पिंडत्थपयत्था वत्थंतरभावणासम्मं ॥३७॥ सा नियनियभत्तिब्भर-निभरमाणसविणिम्मिया जाण । जिणकल्लाणगभत्ति-सुविभत्तिकओवयारगुणा ॥३८॥ तत्थपइठ्ठामेओन हवइ जम्हा दुरकाइओ भावो। सिद्धाण सणायणओ परिणामिओ दबओ वि गुणो॥३९॥ जम्हा जिणाण पडिमा अप्पपरिणामदंसणनिमित्तं । आयंसमंडलामा सुहासहज्झाणदिठ्ठीए ॥४०॥ सम्मत्तसुद्धकरणी जणणी सुहजोगसच्चपहवाणं । निद्दलणी दुरियाणं भववणदवदढभवियाणं ॥४१॥ दुविहा पूया दव्व-भावहिं अंगअग्गभावहिं। तिविहा विविहा सा य चउहा णासायणा सहिया ॥४२॥ भणवय कायविसुद्धी पूया तिविहा जिगेहिं णिद्दिष्ठा । पंचविहा वा अठो-चयारसव्वोवयारा वा ॥४३॥ भणिया पंचुवयारा कुसुमरकयगंधधूवदीवहिं । भत्ती बहुमाण वन्न-जणणाणासायणविहीहिं ॥४४॥ कुसुमख्कयगंधदीव-धूवनेविज्जजलफलेहिं पुणो। अविहकम्ममहणी अडवयारा हवइ पूया ॥४५॥ सत्तरसमेयमिण्णा न्हवणवणदेवदूसठवणं वा । तहवासचुण्णरोहण पुप्फारोहणसुमल्लाणं ॥४६॥ पणवण्णकुसुमवुठ्ठी वग्धारियमल्लदामपुप्फगिहं । कप्पूरपभिइगंध-वणमाहरणाविहियं जं ॥४७॥ इंदद्धयस्स सोहा करणं चउसु वि दिसासु जहसत्ती। अडमंगलाण भरणं जिणपुरओ दाहिणे वा वि ।।४८।। M॥२॥ For Private & Personal use only Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दावाइमाग्गिकम्म-करण मंगळपईवसंगुन । गीय मह व महाहियसयथुइकरणं ॥४९।। एए सत्तरमेया आगममणिया पदव्वपूयाए । जिणपडिमाण चउक्कंग दुगनिस्केवस्सावि भावजुया ॥५०॥ पिंडत्यपयत्थाण-मेषं स्वाइपस्स थुइकरणं । पढमा गिहिणो पयडा बीया उचिया जइजणाणं ॥५१॥ पठमा समंतभद्दा संपइभद्दागमेसिभदाय । बीया पुण सव्वमंगलनामा किरिया पहाणा सा ॥५२॥ पडमा पुण सुहजोगा वंचकवत्ता य परिभवावत्ता । चरिमा अज्झप्पधम्म फलमित्ता सव्वमित्तीणं ॥५३॥ सम्मदिठीण मिणमा चरिमावत्ताण मिच्छदिठीणं । अडगुणबीयमुहाणं सिवजणणी परेसिं भवजणणी ॥५४॥ पण कल्लाजसरूव-पयडत्थं जा करिज्जए पूपा । तत्थ सया कायव्वं धूबुग्गहदीवपमुहं जं ॥५५॥ अन्नत्यपयत्थाइ-वत्थंमि य जलणकिश्चमारभसं । सासयपडिमाणं पुण इमेव मियराण दोण्हंपि ॥५६॥ न्हवणवितवणमाहा-रणवत्थफलगंधवयुप्फेहिं । कीरइ जिणंगपूया तत्थ विही एस नायव्यो ॥५॥ वत्थेण बंधिऊणं आसं अहवा जहासमाहीए । वज्जेयव्वं तु तया देहमि वि कंडअणमाई ॥१८॥ काये कंपणं वज्जे तहा खेलविगंधणं । मोणं वा कइ भणणं कुज्जा पूअंतो जगबंधुणो॥५९।। उचियर्च पूपाए विसेसकरणं तु मूलबिंबस्स । जं पडइ तत्व पढमं जणस्स दीठी सह मणेणं ॥६॥ (नोदकः) पूआ वंदणमाइ काऊणेगस्स सेसकरणमि । नापगसेवगभावो होइ कओ लोगनाहाणं ॥६॥ एगस्सायरसारा कीरइ पूआवरेसि थोषयरी। एसावि महावण्णा लस्किजइ धूलबुद्धीहिं ॥२॥ (आधार आह) नागसेवगबुद्धी न होई पअस्स नायगजमस्त । पिच्छतस्स समाग परिवार पाडिहेराइं ॥३॥ For Private & Personal use only Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध मप्रकरण: ववहारे पुष पढवं पहडिओ मूलनायगो ऐसो । अवनिजइ सेसाब मारममावो न उण वसि ॥६॥ जम्हा सिद्धसहावो तुल्लो सव्वेसिमित्थ उषयारो। अत्तष्पभूतिमत्ती कियो मियो सरइ अहवा ॥६५॥ तम्हा बंदणपूयण बलिमुहेसु एगस्स कीरमाणेसु । आसायणा न दिठा उचियपवित्तस्स पुरिसस्स ॥६६॥ जह मिम्मयपडिमाणं पूया पुष्फाइएहि खल्लु उचिया । कणगाइनिम्मियाणं उचियतमा मज्जणाई वि ॥६॥ कल्याणगाइकज्जा एगस्स विसेसपूअकरणे वि । नावन्नापरिणामो जह धम्मिजणस्स सेसेसु ॥६८॥ उचियपवित्ती एवं जहा कुणतस्स होइ नायब्बा / तह.मूलबिंबपूषा-विसेसकरणेवि तं नत्थि ॥६९॥ बिणभवणबिंबपूया कीरंति जिणाण नो कए किंतु । सुहभावणानिमित्तं बुहाण इयराण बोहत्थं ॥७॥ चेहरेण केइ पसंतस्वेण केंद्र बिंबेण । पूयाईसया अन्ने अन्ने बुझेति उवएसा ॥१॥ जहमच्छाइण मझे दठूमागारमसरिसं केइ । जाइं सरांत मणुया बुझंता तो किमच्छरियं ॥७२॥ जह अद्दकुमरमिच्छो अपइट जिणस्स पडिबिंबं । दणं पडिबुद्धो किं भणइ इयरसन्नीणं ॥७३॥ मुच्चइ दुग्गइ नारी जंगगुरुणो सिंदुवारकुसुमेहिं । पूयापणिहाणेहिं उप्पन्ना तियसलोयंमि ॥४॥ उवसमइ दुरियवग्गं हरइ दुहं जणइ सयलर काई । चिंताईयंपि फलं साहइ पूया जिणिंदस्स ॥५॥ पुप्फेसु कीरजुयलं गंधाइंसु विमलसंखवरसेणा। सिववरुणसुजससुष्वय कमेण पूआइयाहरणा ॥६॥ अन्नो मुख्कंमि जओ नस्थि उवाओ जिणेहिं निद्दिडो । तसा दुहओ चुक्ता चुक्का सव्वाण वि गइणं ॥७॥ विहिपूया साहेइ सग्गफले सिवफळ परं पारं। अविहिंकया कुगइफळे साहइ निस्सूगचित्ताणं ॥८॥ For Private & Personal use only Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आसापणपरिहारो मत्ती सत्तीईपर्वेषणाणुसरी । विहिराओ अविहिचाओ तेहिं कया बहुफला होइ ॥७९॥ जिणभवणंमि अवण्णा १ पूयाइअणायरो २ तहाभोगो ३। दुप्पणिहाणं ४ अणुचिय-वित्ती ५ आसयणा पंच ॥८॥ तत्थ अवण्णासायण पल्हठ्ठियदेवपिठ्ठदाणं च । पुडपुडियपयपसारण दुठ्ठासणसेवणंजिणग्गे ॥१॥ जारिसतारिसवेसो जहा तहा जम्मि तम्मि कालम्मि । पूयाइ कुणइ सुण्णो अणायरासायणा एसा ॥२॥ भोगो तंबोलाइ कीरतो जिणगिहे कुणड वच्चं । नाणाइयाण आया-रस्सायाणतो तमिहवज्जे ॥८३॥ रागेणव दोसेणव मोहेणव दूसिया मणोवित्ती । दुप्पणिहाणं भण्णइ जिणविसए तं न कायव्वं ॥४॥ धरणरणरुयणविगहा तिरिबंधणरंधणाइगिहिकिरिया । गालीविज्जवणिज्जा-इ चेइए चयणुचिपविती ॥८५॥ संतताविरतदेवा अपि जिनांगसक्थिस्थानकदेवगृहादौ आशातना वर्जयंति किं पुनः साक्षाजिनसदृक्षाया जिनप्रतिमायाः स्थाने आशातनापरिहारे वक्तव्यम् ॥ देवयहरंमि देवा विसयविसविमोहिया वि न कयावि । अच्छरसाहिपि समं हास किडाइवि कुणंति ॥८६॥ तंबोलपाणभोयणु-पाहणमेहुणसूयणनिठिवणं । मुत्तूच्चार जूयं वज्जे जिणनाह चेइहरे ॥ ८७॥ दिठीए वि जिणिदाणं सव्वमसणाइभोगवत्थुणि । नो परिभुत्तं जुत्तं अद्धाणाई विणासकं ॥ ८८॥ मझिमदुगचालीसा चुलसी उक्किठओ मुणेयव्वा । सव्वा अणत्थियाणं सट्टाणं हेउओ भयणा ॥ ८९॥ नहु देवाण वि दव्वं संगविमुक्काण जुज्जए किमवि । नियसेवगबुद्धीए कप्पियं देवदव्वं तं ॥९॥ बहिरंतरपरमप्पा जहा तिहा तत्थ पटमदुय कज्जे । अधुवपरिणामजपणया तइयप्पाणं विसोहिकए ॥ ९१॥ For Private & Personal use only Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध प्रकरणमः विज्जइ पूया णिच्छ वुच्चिज्ज इमे कया जिणिंदाणं । पूया तहेव देवाणं दवमिइलोयजणभासा ॥ १२ ॥ अज्झप्पनाणदंसण-सासयसिरिपयडणत्थमेसविही । जनीइसमज्जियं सुद्धं दव्वं ठाविज्ज भत्तिकए ॥ ९३ ॥ नो अग्गपूयजणियं निम्मल्लं असइभोगनटुंज । नो लोए माणहरं चेइयदव्वंमि ठाविज्जा ॥ ९४ ॥ पवरगुणहरिसजणयं पहाणपुरिसेहिं जं तया इण्णं । एगाणेगेहिं कयं धीरा तं बिति जिणदव्वं ॥ ९५॥ मंगलदव्वं निहिदव्वं सासयदव्वं च सव्वमेगठा । आसायणपरिहारा जयणाए तं खु ठायव्वं ॥ ९६ ॥ जिणपवयणवुद्धिकरं पभावगं नाणदंसणगुणाणं । बुद्धंतो जिणदव्वं तित्थयरत्तं लहइ जीवो ॥ ९७ ॥ जिणपवयणबुद्धिकरं पभावगं नाणदंसणगुणाणं । रख्तो जिणदव्वं परित्तसंसारिओ भणिओ॥ ९८ ॥ जिणपवयणबुद्धिकरं पभावगं नाणदंसणगुणाणं । जिणधणमुविख्कमाणो दुल्लहबोहिं कुणइ जीवो ॥ ९९ ॥ जिणपवयणबुद्धिकरं पभावगं नाणदंसणगुणाणं । भरकंतो जिणदव्वं अणंतसंसारिओ भणिओ ॥ १० ॥ जिणपवयणवुद्धिकरं पभावगं नाणदंसणगुणाणं । दोहंतो जिणदव्वं दोहिच्चं दुग्गयं लहइ ॥१०१॥ जिणवर आगारहियं वद्धारंता वि केवि जिणदव्वं । बुडुति भवसमुद्दे मूढा मोहेण अन्नाणी ॥ १०२॥ चेइयदव्वं साहा-रणंच भरके विमूढमणसा वि । परिभमइ तिरियजोणीसु अण्णाणत्तं सया लहइ ॥१०३॥ भरूकेइ जो उविख्कइ जिणदव्वं तु सावओ। पण्णाहीको भवे जीवो लिप्पड़ पावकम्मुणा ॥१०४॥ चेइयदव्वविणासे रिसिधाए पवयणस्स उड्डाहे । संजइ चउत्थभंगे मूलग्गी बोहिलाभस्स ॥ १०५ ॥ चेइयदव्वविणासे तद्दव्वविणासणे दुविहमेए । साहू उविख्कमाणो अणंतसंसारिओ भणिओ॥ १०६ ॥ ॥४ ॥ For Private & Personal use only Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education international इयद साहा - रणं च जो दुहइ मोहियमईओ । धम्मं च सो न याणइ अहवा बढाउओ नरए ॥ १०७ ॥ जिणदव्वले सजणियं ठाणं जिणदव्वभोयणं सव्वं । साहूहिं चइयव्वं जइ तंमि वसिज्ज पच्छित्तं ॥ १०८ ॥ छलहुयं छग्गुरुयं भिन्नमासो य पइदिणं जाव । कप्पविहाराईयं भणियं निष्ठ्ठागयं कप्पे ॥ १०९ ॥ आयाणं जो भुंजइ पडिवण्णघणं न देइ देवस्स । नस्संत समुविख्कइ सो वि हु परिभमइ संसारे ॥ ११० ॥ उक्कोसं दव्वत्थयं आराहिये जाइ अच्चुयं जाव । भावत्थएण पावइ अंतमुहुत्तेण निव्वाणं ॥ १११ ॥ तम्हा सव्वपारा या पढमा गिट्टीणमाइष्ठा । बीया सव्वपयारा साहूणं पवयणविहिए हुं ॥ ११२ ॥ जिणमुद्दाण चउकंभि पवरापीइमणुद्धरा भत्ती । आसायणवज्जणया तस्साणाए परमजयणा ॥ ११३॥ तब्भत्तीए भासा पण्णवणी तेसिमविहिणिण्हवणी । संसयवुच्छेयकरणी भासिज्जइ पवयणाणुगओ ११४ ॥ egistrar तिवा हिंसा जिणेहिं निद्दिष्ठा । णिच्छयववहाराहिं भासिज्जइ पवयणाणुगओ ॥ ११५ ॥ गीत्थवणणाहा मग्गसणाहा सया जहि किरिया । णिश्च जिणझाणपरा तवसंजमजोगसंजुत्ता ॥ ११६ ॥ सिं सम्वयारा भावत्यवओ हविज्ज जिणपूया । जइकरणे सयरित्ता तग्गयसुहफलणुमोयणया ॥११७॥ अकसिणपवत्तगाणं विरयाविरयाण एस खलु जुत्तो । संसारपयणुकरणो दव्वत्थए कूवदितो ॥ ११८ ॥ भावत्थयस्स हेऊ दव्वं हेऊत्तिसहओ णेयं । थलगामंसिरा कूवा दिठ्ठेता तत्थिमे जाण ॥ ११९ ॥ कायसमुत्था पुवं पच्छाउविसुद्ध कम्मफला । इच्चाइमुसा भासा णेया भासाकुसीलाणं ॥ १२० ॥ ainelibrary.org Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध ॥५॥ जम्हा पुव्वं पच्छा सुहथिरजोगाणुकूलिणी भणिया । जह साहूणमहिंसा न जाइ आयारगोयरए ॥१२१॥ मिहवावारविवज्जण-गुणाओ सम्वत्थ मित्तिभावाओ । सम्मद्दिष्ठिाणे एसा वि'हु भावपूयत्ति ॥१२२॥ तम्हा न हिंसभावो कयावि हुज्जा जिणिदपूयम्मि । अज्झप्पजोगजुत्ता पूया सव्वत्थ जयकरणी ॥१२३॥ अविरयसम्मद्दिठ्ठीण पढम सम्मत्तमूलपढमपया । पुरओ सव्वगुणाण ठाणेसु जहारिहा किरिया ॥१२४॥ जत्थ य जा दवकिरिया अग्गग्गंमिहु तहा तहा दिठ्ठा । भावत्ययस्स सव्वत्थ परमपवित्ती तहा दिठ्ठा ॥१२५॥ सालंबणझाणाओ झाणमणालंबणं हविज्ज सया। किं बहुणा भणिएणं सासयसुहकारिणी पूया ॥१२६॥ तित्थयरो तिल्थयर-तणेण जो सद्दहिज्ज सद्धाए । निस्केवा खलु चउरो एगत्तेणेव विष्णेया ॥१२७॥ आसायणपरिहारो आणाराहणममूढभत्तीए। जिणदव्वपरिच्चाओ जेण कओ सो परमभव्बो ॥ १२८॥ झाणरस य मेयकए निस्केवा जत्थ जत्थ निदिठ्ठा । ते ते पसाहियव्वा विसुद्धसम्मत्तजुत्तेहि ॥१२९॥ पूयाए सत्तविहा सोही बोहिजणाण कायव्वा । धणवत्थखेत्तमणवय-कायापूओवगरणाणं ॥१३०॥ अण्णायदुगंछोछमूलहराणज्जवित्तिहरमलिणं । दवाइ विवज्जणेहिं सुद्धं सत्तीइ धणमिट्ठ ॥१३१॥ वत्थं चउहा तयफल-विगलपणिदिइलोमसंभूयं । अह तइयं च चउत्थं जिणभत्तीए न कायव्वं ॥१३२॥ मुहपुत्तियपडपुत्तिय कज्जे कइयावि तं न कायव्वं । बीयं सेयं मसिणं दुस्सं खोमाइ बहुमेयं ॥१३३॥ नण्णं कियभावाइसुद्ध मुद्धं सहावओ धवलं । जिणभत्तीइ निमित्तं कायव्वं सव्वहा नूणं ॥१३४॥ For Private & Personal use only Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विगलपणिदियदव्वाण संभवं कप्पए नु भत्तीए। पढमं बीयं वत्थं नो कप्पइ भत्ति (माइ) कज्जेसुत्ति ॥१३५॥(पाठान्तरम् )। सुयभावेज सिठं तं सव्वं किज्जए सुभत्तीए। कच्छुरिकाइगंध-दव्वं नेयं न मिगजायं ॥ ज लोमहत्थयाइ वुत्तं तं देवनिम्मियं तत्थ । इत्थ वि तयभावाओ ज कीरइ भत्तिसम्भावा ॥ जं वालवीजणाइ सव्वं रययप्पयारमासज्ज । संपइ तयभावाओ लोममयं किज्जइ विसिठं॥ णो थीपुरिसविवज्जास-वत्थं कुज्जा न थिबुगपरिमाणं । दंसणायारविसोहिए कायव्यो मुहपुडोठ्ठपुडो॥१३६॥ निम्मल्लविहिनिम्मिय-भूपीठमणज्जसंगमावज्जं । निस्संकियाइदोसेहिं रहियं खेत्तं पवित्तं च ॥१३७॥ अकुसलमणप्पवित्ती-वावारविवज्जणं खु मणसुद्धी । दूरीकयमिच्छत्त-लवाइदोसेहिं सा होई ॥१३८॥ पयड़ियगुणगेणो-चियवित्तिपसत्यचित्तसम्भावा । खेयाइदोसरहिया तदझवसिया य मणसुद्धी ॥१३९॥ गिहवावारविवज्जण-सन्नाईहिं वि पसत्यवयणगुणा । जिणगुणकीत्तणरूवा पूयावसरे हु वयसुद्धी ॥१४०॥ आसायणपरिहार-प्पयासपयडियपसत्थभत्तिभरा । हासाइमलिणवज्जण-लोयविरुद्धाइसव्वं ज॥१४१॥ विहिकयन्हाणुव्वहण-गत्तो लित्तो सुगंधमाईहिं । कयतिलओ वेगच्छिं आणाववहारपणरूवं ॥१४२॥ कंठहियउयरदेसंमि कयतिलओ अप्पणाअसंकप्पो । जिणगुणधुणणं सद्दहण-मणुवमसुहतित्तिसंकरणं ॥१४३॥ पुव्वासाभिमुहमुहो विहिकयन्हाणो अर्णिदियविसयगणो । उवसामियअप्पसत्य-जोयरयभावसन्हाणो ॥१४४॥ सिठ्ठीए समगपयं-गुठगयं जाणुहत्यअंसाणं । सिरमालकंठवच्छ-स्थलउयरंमि जिणिदाणं ॥१४५॥ कयचित्तो दढचित्तो अणुत्तरझाणभत्तिसंजुत्तो । पच्छाविविहपयारा पूया निम्माइ निम्ममओ ॥१४६॥ For Private & Personal use only Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध प्रकरणम् पुष्फाइ ण्हवणाइ निम्मल्लं जे हवे जिर्णिदार्थ । जंठावइ विहिपुर्व जत्यासायणपरं न हवे ॥१४॥ जइवि हु जिणंगसंगं निम्मल्लं नेव हुज कइयादि । निस्सीकं लोयगुणा-यवहारगुणेहिं निम्मल्लं ॥१४८॥ भरूकणपाउल्लंघण-नियंगपरिभोयमइकम्मपरं । अबिहिष्ठावणमेवं निम्मल्लं पंचहा वज्जं ॥१४९॥ तिरियभवहेउभख्कण-मणज्जजाइसु हविज्ज उल्लंघो । दोहग्गं परिभोगे मूइकम्मे आसुरी जाई ॥१५॥ अविहिवणमबोहि लाहो हुज्जा णिदंसणाणित्थ । देवपुरंदरकुमरा सामात्यी अमरसमरनिवा ॥१५१॥ तम्हा अविहिचाओ कापव्वो सवहा सुनिउणेहि । जम्हाऽणासायणा खल मुख्कंगं मुस्कमग्गस्स ॥१५२॥ विहिकरणमविहिचाओ गुरुगुणवुद्धाणसेवणं सवणं बाळजणाण विवज्जण-मगुणुझणमज्जगुणपख्को ॥१५३॥ अरिहपमुहाण तेरस-पयाण बहुमाणवण्णसंजलणा । कुसलाणुठाणकरण-मिच्चाइ गुणहिं मुख्कंग॥१५४॥ तत्तो निसीहियाए पविसित्ता मंडवंमि जिणपुरओ। महिनिहियजाणुपाणि-सिरेहि विहिणा पणामतियं ॥१५५॥ तयण हरिसुल्लसंतो कयमुहकोसो जिणिदपडिमाणं । अवणेइ रयणिवसिय निम्मल्लं लोमहत्थेण ॥१५६॥ जिणगिहपमज्जण तो करेंइ कारेइ वा वि अन्नणं । जिणाबंबाण पूर्य तो विहिणा कुणइ जहा जोगं ॥१५॥ अहपुव्वं चिय केणइ हविज्ज पूया कया सुविहवेण । तंपि सविसेससोहं जहहोइ तहा तहाकुज्जा ॥१५८॥ निम्मल्लंपि न एवं भणइ निम्मल्ललकणाभावा । भोगविणठं दव्वं निम्मल्लं ननहा वृत्तं ॥१५९॥ दव्वंतरसंपत्तं निम्मल्लस्सावि धाउमुहसस्सं । तं पुण जिणस्स जुग्गं जायइ बालाणमणुचिट्ठे ॥१६०॥ इत्तो चेव जिणाणं पुणरवि आरोवणं कुणंति तहा । वत्थाहरणाईणं जुगलियकुंडठियमाईणं ॥१६१॥ Jain Education international Mainelibrary.org Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जम्हा जं एगाए कासाईए जिणिदपरिमाणं । अठ्ठसय लूहित्ता विजयप्पमुहाहिं देवेहिं ॥ १६२॥ वेदव्वं तिविहं यानिम्मल्लकप्पियं तत्थ । आयाणमाईपूयादव्वं जिणदेहपरिभोगं ॥ १६३ ॥ अख्कयफलबलिवत्थाइ संतियं जं पुणो दविणजायं । तं निम्मल्लं वुञ्चइ जिणगिहकम्मंमि उवओगं ॥ १६४ ॥ दव्वंतरनिम्मवियं निम्मल्लं पि हुं विभूसणाईहिं । तं पुण जिणंगसंगि हविज्ज णण्णत्थ तं भयणा ॥ १६५ ॥ रिद्धिजयसंमएहिं सढेहिं अहव अप्पणा चेव । जिणभत्तिइ निमित्तं जं चरियं सव्वमुवओगि ॥ १६६ ॥ पवरेहिं साहणेहि पायं भावो वि जायए पवरो । न य अन्नो उवओगो एएसि सयाण लठ्ठयरो ॥ १६७॥ गंथिम १वे ढिम २ पूरिम ३ संघाइम ४ पुप्फमेयओ चउहा। माला १ मउडं२ सेहर ३ पुष्फगेहाइ ४ रयणाओ ॥ १६८ ॥ न्हवणविले वणआहरण- वत्थफलगंधधूवपुप्फेहि । कीरइ जिणंगपूया तत्थ विही एस नायव्व ॥ १६९ ॥ वत्थेण बंधिऊणं आसं अहवा जहा समाहीए। वज्जेयव्वं तु तया देहंमि वि कंडुयणमाई ॥ १७० ॥ कायकंयणं वज्जे तहा खेलविचिणं । मोणं वा कइ भणणं कुज्जा पूअंतो जगबंधुणो ॥ १७१ ॥ उचियपवित्ती एवं तहाकुणंतस्स होइ नावन्ना । तह मूलबिंबपूया विसेसकरणे वि तं नत्थि ॥ १७२ ॥ जिणभवणचि पूया कीरंति जिणाण नो कए किंतु । सहभावणानिमित्तं बुहाण अबुहाण बोहत्थं ॥ १७३॥ चेहरेण य केई पसंतरूपेण केइ बिंबेण । पूयाइसया अण्णे अण्णे बुझति उवएसा ॥ १७४॥ भिंगारलोमहत्यय-लू हणया धूवदहणमाइयं । पडिमाणं सकहाण व पूयाए इक्कयं भणियं ॥ १७५ ॥ निव्यजिदिसकहा सग्गसमुग्गेसु तिसु वि ठोएसु । अन्नोनं संलग्गा न्हवणजलाइहिं संपुठ्ठा ॥ १७६ ॥ +SEX Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध प्रकरणम् पुन्वधरकालविहिया पडिमाइ संति तिसु वि खित्तेसु । खेत्तरका वत्तस्का महस्कयागं च दिठ्ठाय ॥१७७॥ मालाधराइयाणं घुवणजलाइ फुसेण जिणबिंबं । पुत्थयपत्ताइण वि उवरुवार फुसणाईयं ॥१८॥ ता नज्जइ तो दोसो करणे चउवीसवयाएणं । आयरणाजुत्तीओ गंथेसु अदिस्सनाणत्ता ॥१७९॥ जिणरिद्धिदंसणत्थं एग कारेइ कोइ भत्तिजुओ। पायाडिय पाडिहेरे देवागमसोहियं चेयं ॥१८॥ दंसणनाणचरित्ता-राहणकज्जो जिणत्तियं कोइ । परमेछिनमुक्कारोज्जमियं अह केइ पंचजिणा ॥१८॥ कल्लाणगतवमहिमा-उज्जमियं भरहवासभावित्ति । बहुमाणविसेसाओ केइ कारंति चउवीसं ॥१८२॥ उक्कोसं सत्तरिसयं नरलोए विहरइत्ति भत्तीए । सत्तरिसयंपि केइ बिंबाण कारइ धणदो॥१८३॥ गंधव्वनहवाइय-लवणजलारत्तियाइ दीवाई। किच्चं तं सव्वं ओयरइ अग्गपूयाए ॥१८४॥ आरत्तियमवयारण मंगलदीवं च निम्मियं पच्छा । चउवारेहिं विनिम्मं छणं च विहिणाउ कायव्वं ॥१८५॥ पंचोवयारजुत्ता पूया अठ्ठोवयारकलियाए । रिद्धिविसेसेण पुणो मेया सव्वोवयारा वि ॥१८६॥ तहियं पंचुवयारा कुसुमख्कयगंधधूवदीवेहिं । नेविज्जजलफलेहि जुत्ता अट्ठोवयारा वि ॥१८॥ सब्बोवयारपूया न्हवणचणभूसणत्थवाईहिं । फलबलिदीवाइनह-गीयआरत्तियाईहिं ॥१८८॥ सयमाणेयण पढमा बीया आणावणेण अन्नेहिं । तईया मणसा संपा-डणेणणुमोयणाईहिं ॥१८९॥ पुप्फामिसथुइपडिवत्ति मेएहि भासिया चउहा। जहसत्तीए कुज्जा पूया पूयप्पसब्भावा ॥१९॥ दुविहा जिणिंदपूया दव्वे भावे य तत्थ दव्वंमी। दव्वे जिणोवयारा जिणआणापालणं भावे ॥१९१॥ For Private & Personal use only Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Educationational विहिसारं चिय सेवइ सद्धालू सत्तिमं अणुठ्ठाणं । दव्वाइ दोसनिहओ विपख्कवायं वहइ तम्मी ॥१९२॥ आसन्न सिद्धियाणं विहिपरिणामो हु होइ संया कालं । विहिञ्चाओ अविहिभत्ती अभव्वजियदूरभव्वाणं ॥ १९३॥ farala सामगेगा अब्भुदयपसाहिणी भवे बीया । निव्वुइकरणी तझ्या फलयाओ जहत्थनामेहिं ॥ १९४॥ जिणभवणबिंबठावण - जत्तापूबाइ सुत्तओ विहिणा । दव्वत्थउत्ति नेयं भावत्थयकारणत्तेण ॥ १९५ ॥ णिचं चियसंपूण्णा जइवि हु एसा न तीरए काउं । तहवि हु अणुचिट्ठियव्वा अख्कयदीवाइ दाणेण ॥ १९६ ॥ एगमवि उदगबिंदू जह पस्कित्तं महासमुद्दम्मी । जायइ अरकयमेवं पूया वि हू वीयरागेसु ॥ १९७ ॥ एए बीएणं दुकाई अपाविऊण भवगहणे । अञ्चतुदारभोए भोत्तुं सिझति स (भ) व्वजिया ॥ १९८ ॥ पूयाए मणसंती मणसंतीएहिं उत्तमं झाणं । सुहझाणेण य मोख्को मुख्के सुख्कं अणाबाहं ॥ १९९॥ पूयम्मि वीयरायं भावो विष्फुरइ विसयविच्चायां । आया अहिंसभावे वट्टइ इह तेण नो हिंसा ॥ २००॥ जत् य अहिंसभावो तत्थ य सहजोयकारणं भणियं । अणुबंधहेउरहिओ वट्टइ इह तेण नो हिंसा ॥ २०१ ॥ आभोगाणाभोग-मेओ दव्वत्यओ दुहा होइ । णिव्वित्तिपवित्तीहिं दुहा वि चउहा मुणेयव्वो ॥ २०२ ॥ देवगुणपरिन्नाणा तप्भावाणुगयमुत्तमं विहिणा । आयरसारं जिणपूयणेण आभोगदव्वत्थओ || २०३ ॥ पत्तो चरित्तलाभो होइ लहुं सयलकम्मनिद्दलणी । ता एत्थ सम्ममेव हि पर्याट्टियव्वं सुदिठ्ठीहिं ॥ २०४॥ पूयाविहिविरहाओ अपरिन्नाणाओ जिणगयगुणाणं । सुहपरिणामकयन्ना एसो णाभोगदव्वत्थओ ॥ २०५ ॥ गुणठाणगठाणत्ता एसो एवंपि गुणकरो चेव । गृहसुहयरभावविसुद्धी हेउओ बोहिलाभाओ ॥ २०६ ॥ nelibrary.org Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध ॥ ८ ॥ *** अकिरियभावगुणेहि बढइ जह जह हविज्ज ता तत्य। भावत्थवो वि जा जोगि-गुणमि सकिरियंमि दव्वत्थओ ॥२०७॥ असुहरूकएण धणियं धन्नाणं आगमेसिमद्दाणं । अमुणियगुणो वि नूणं विसए पीई समुच्छलइ ॥ २०८ ॥ होइ पउसो विसए गुरुकम्माणं भवाभिनंदीणं । पच्छंभि आउराणय उवठिएनिच्छिए मरणे ॥ २०९ ॥ तोचि तत्तन्नू जिणबिंबे जिणवरिंदधम्मे वा । असुहब्भंसभयाओ पओसळेसंपि वज्जति ॥ २९० ॥ दुविहा जिदिआणा आयरणपरिहारएण बोधव्वा । सुकडाणं आयरणं निसेहगाणं च परिहारो ॥ २११ ॥ जम्हा निसेकरणे अबोहिबोहिवि तं तया करणे । एवं जिणभत्तीए अविहिच्चाओ विसेसफलो ॥ २१२ ॥ आरंभपसत्ताणं गिहीण छज्जीववहअविरयाणं । भवअडवीनिवडियाणं दव्वत्थओ चेव आलंबो ॥२९३॥ जिrपूयणं तिसंझं कुणमाणो सोहएइ सम्मत्तं । तित्थयरनामगुत्तं पावइ सेणियनरिदुव्व ॥ २१४॥ जो पूएइ तिसंझं जिणंदरायं सया विगयदोसं । सो तइयभवे सिझइ अहवा सत्तद्रुमे जम्मे ॥ २१५ ॥ सव्वायरेण य एवं पूइज्जतो वि देवनाहेहिं । नो होइ पूइओ खलु जम्हाणंतगुणो भयवं ॥ २१६ ॥ विकरणसत्ती वाणं वज्जिणो हि जावइया । संकप्पाव कहाजाव भत्तीए तह वि नो सक्को ॥ २१७॥ गुणठाणगगुणजणणी अत्तसहावेण निम्मिया पूया । जं जं सहावधम्मे पविसइ सा अवितहा जाण ॥२१८॥ महजो गाणं सरणी निस्सेणी खओवसामगगुणाणं । अणुचियपवित्तिहरणी उचियपवित्तीण सा धरणी ॥ २१९ ॥ जो वीयरायभावो अत्तस्सवलोयणष्ठमुक्तिष्ठो । पडिमाणं पडिबिंबो णेओ आयंससारिच्छो ॥ २२० ॥ दावत्थामेण कीरs सुहकम्मकारिणी जम्हा । अत्तगवेसिजणाणं कायव्वा दव्वओ नियमा ॥ २२९ ॥ प्रकरणम्ः ॥८॥ Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Educatiomational भत्तिबहुमाणपव्वं अविहिविहिच्चायपख्कवाएहिं । चभंगीहिं विसुद्धा विसुद्धसम्मत्तथिरकरणी ॥२२२॥ पुणे विहिबहुमाणे पढमो बीओ य होइ बहुमाणे । पुण्णविहीहि तइओ उभयसुण्णे चउत्थो य ॥ २२३ ॥ इत्थं पुणपूयाए रूप्पसमो होइ चित्तबहुमाणो । मुद्दासमविण्णेया संपुण्णा बाहिरा किरिया || २२४ ॥ दोपि समाओगे सुपयणा च्छेयरूवगसारिच्छा । बीयगरूवयतुल्ला पमाइणो भत्तित्तस्स ॥ २२५ ॥ लाभाइनिमित्ताओ अखंड़किरियंपि कुव्वओ तइया । उभयविहूणा नेवा अपूयणा चेव तत्तेण ॥ २२६ ॥ एस इह भवत्थवो कायव्वो देसकालमासज्ज । अप्पो वा बहुगो वा विहिणा बहुमाणजुत्तेण ॥ २२७ ॥ सब्भूयजिणपडिमाणं भांति बाला य अंतरं गुरुयं । तं वयणं नो तच्चं अलख्कतत्ता पमत्तदिसा ॥ २२८ ॥ सव्वण्णू सव्वभासा - संगयभासा हि भासमाणो वि । जम्हाणुवसामगाणं गुणभावंमि उ न भव्वाणं ॥ २२९ ॥ उज्जूमूयाण दुवे जह बवसायमि लिविगुणं पत्तं । तहसख्कपरोस्काणं हे महेऊण जुग्गवसा ॥ २३० ॥ अइसयइद्विजुयाणं विसेसमासंकिऊण जं भणइ । ता नामस्सवि तम्मिव निरत्थयं जाणणुठाणं ।। २३१ ॥ अन्नं च जिणमयंमि चउव्विहं वण्णियं अणुठाणं । पीइजुयं १ भत्तिजयं २ वयणपहाणं ३ असंगं ४ च ॥ २३२ ॥ जं कुणइ पीइरसो वढइ जीवस्स उजुसहावस्स । बालाईण व रयणे पीइअणुठ्ठाणमाहंसु ॥ २३३ ॥ तुल्लं पि पालणाई जायाजणणीपणइभत्तिगयं । पीइभत्तिजुयाणं मेओ नेओ तहंपि ॥ २३४ ॥ जो पुण जिणमुणिचेइसु सुत्तविहाणेण वंदणं कुणइ । वयणाणुठ्ठाणमिणं चरित्तिणो होइ नियमेण ॥ २३५ ॥ जं पुण अभासरसा सुयं विणा कुणइ फलनिरासंसो । तमसंगाणुट्ठाणं विष्णेयं णिऊणदंसीहिं ॥ २३६ ॥ ainelibrary.org Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध प्रकरणम्: कुंभारचक्कभमणं पढमं दंडाओ तओ वि तयभावे । वयणासंगाणुठ्ठाणं मेयकहणे इमं णायं ॥२३७ ॥ पढमं भावलवाओ पायं बालाइयाण संभवइ । तत्तो वि उत्तरुत्तरसंपत्ती नियमओ होइ ॥२३८॥ तम्हा चउविहंपि हु नेयभिणं पढमरूवगसमाणं । जम्हा मुणीण सव्वं परमपयनिबंधणं भणियं ॥ २३९॥ बीयगरूवसमं पुण सम्माणुठ्ठाणकारणत्तेण । एगंतेण न दु पुव्वायरिया जओ बिति ॥ २४० ॥ असढस्स अपरिसुद्धा किरिया सुद्धाइकारण होइ । अंतोविमलं रयणं सुहेण बझं मलं चयइ ॥ २४१ ॥ तइयगरूवगतुल्ला मायामोसाइदोससंपत्ता । कारिसरूवयववहारि-णोव्व कुज्जा महाणत्थं ॥ २४२ ॥ होइ य पाएणेसा अन्नाणाओ असद्दहणयाओ। कम्मस्स गरुत्ताओ भवाभिणंदीण जीवाणं ॥२४३॥ उभयविहीणाओ पुणो नियमाराहणविराहणा भणिया । विसयब्भासगुणाओ कयाइ हुज्जा सुहनिमित्तं ॥२४४ ॥ जह सावगस्स पुत्तो बहुसो जिणबिंबदंसणगुणेणं । अकयसुकओ वि मरिउं मच्छभवे पाविओ सम्मं ॥ २४५ ॥ भव्वाणं पुण होइ चरिमावत्तंमि चरिमकरणमि । पायमनायासाणं सम्मत्तगुणोवओगाणं ॥ २४६ ॥ तम्हा जिणभत्तीसु वयणाणुठ्ठाणमेव गुणहेऊ । तमणासायणपहवं करिज्जमाणं फलोवेयं ॥ २४७ ॥ मुत्त १ पुरीसं २ पाणु ३ वाणह ४ असण ५ सयणि ६ त्थि ७ तंबोलं८। निठ्ठीवणं ९ च जूयं १० जूयाइपलोयणं ११ विगहा १२ ॥ २४८ ॥ पल्हत्यीकरणं १३ पि हु पायपसारण १४ परोप्परविवाओ १५ । परिहासो १६ मच्छरिया १७ सिंहासणमाइपरिभोगो १८ ॥ २४९ ।। Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ केससरीरविभूसण १९ छत्ता २० सि २१ किरीड २२ चमरधरणं २३ च । धरण २४ जुवइहिं हास-रस २५ खिडप्पसंगाय २६ ॥ २५० ॥ अकयमुहकोस २७ मलिणं-गवत्थ २८ जिणपूयणापवित्तीए। मणसो अणेगयत्तं २९ सचित्तदवियाण अविमुयणं ३०॥२५१॥ अच्चित्तदव्वअविउज्जणं च ३१ तहणेगसाडियत्त ३२ मवि। जिणदंसणे अणंजलि ३३ जिणमि दिलुमि य अपूया ३४॥२५२॥ अहवा अणिकुसुमेहि पूयणं ३५ तह अणायरपवित्ती ३६। जिणपडिणीय अणिवारण ३७ चेइयदव्वस्सुवेहणमो ३८॥२५३॥ सइसामथिओवाहणह ३९ पुवंचियवंदणाइपडणं च ४० । जिणभवणमि ठियाणं चालीसा सायणा एए ॥ २५४ ॥ तम्हा सबप्पयारेणा-सायणा वज्जणं जिणिदाणं । एसो परमो णेओ विहिपको सम्मदिठ्ठीणं ॥२५५।।। भत्ति १ बहुमाणो २ वण्ण-संजलण ३ आसायणाइ परिहारो ४। पडिणीयसंगवज्जण ५ सइ सामत्थे तयुज्झणणं६॥२५६॥ विहिजुंजण ७ सम्मठावण-मवहिच्चायण विहीण पडिसेवा ८ । सद्धाइयअडगुण-जुत्तो संपुण्णविहिजुत्तो ॥ २५७ ।। * थोवं कयं सुपत्थं नीरोगं कुणइ जह सुविसुद्धं । तह विहिणाणुठाणं विहियं भाविज्ज अमियफलं ।। २५८ ॥ जम्हाणुबंधहिंसा सम्मद्दिष्ठीण तो हविज्जत्थ । तह तह हेउवओगा अविहीए हुज्ज फलचित्ता ।। २५९ ॥ दुष्ठाणुओगहरणी करणी सम्मत्ततच्चफलजणणी । जा जा सरूवहिंसा गुणसेणीदलाणनिठ्ठावणी ॥२६० ॥ णिच्छयववहारगया भव्वजणाणं चरित्तजुत्ताणं । मणपल्हायणजणणी हिंसाऽहिंसा विणिद्दिठ्ठा ॥ २६१ ॥ . जोयकिरियाफलाणं वंचणया इत्थ होइ किरियाए। चउगइगमणपवट्टण-किरियाऽहिंसा वि सा हिंसा ॥ २६२ ॥ एवं सव्वष्ठाणे सदणुठ्ठाणे तहा विसेसेण । दव्वत्थयभावत्यय-करणं चरणाईयाणं च ॥ २६३ ॥ 6-- Jain Education national For Private & Personal use only walkinelibrary.org | Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध प्रकरणम्: ॥१०॥ जीयं धम्मो कप्पो भत्ती सव्वत्थ उचियपडिवत्ती। जिणपडिमाणं पूया विण्णेया परित्तभवजणणी ॥ २६४ ॥ चेइयपडिमाविबं आणा संसारपयणुकाऽऽरुग्गा । तह बोहिलाहजणणी अमियफला अमयकिरियाभा ॥२६५ ॥ दव्वत्थयभावत्थय-इन्चाइमेयओ मुणेयव्वा । पूयापयपज्जाया सुहजोयफलाण संपुन्ना ॥ २६६ ॥ चरिमावत्तपबत्ते जीवे मग्गाणुसारणी किरिया । हुज्जा जत्थ फलढ्ढा तत्थिमा पवरपुण्णफला ॥ २६७ ॥ संपत्ते सम्मत्ते तत्थेमा बोहिसाहिणी परमा । मणपल्हायणजणणी अगण्णकारुण्णणिहितुल्ला ॥ २६८ ॥ कल्लाणफलोवेया चरित्तभावमि अत्तभावपरा । पवयणसारा परमा भावत्थयनामनिम्माणा ॥ २६९ ॥ जत्थ गुणे जावईया जोया जुंजिज्जए गुणद्वेहिं । अब्भत्थजोगजुत्ता गुरुगुरुगुणगण(झ)भूया ॥ २७० ।। भावत्थओ मुणीणं जहुत्तआणापराण भावणया । दव्वत्थओवि पढमं गिहीण भावत्थओ देसा ॥२७१॥ भावच्चणमुग्गविहारया य दव्वच्चणं तु जिणपूया । भावच्चणाउ भठ्ठो हविज्ज दब्बच्चणुज्जुत्तो ॥२७२॥ जो पुण मुणिवेसधरो केवललिंगेण वित्तिकप्पपरो। दव्वत्थओ न तस्स य उचिओ खिसा पवयणस्स ॥२७३।। सामायारिं कप्पं मग्गं पवयणपभावणाइयं । तेहिं सव्वं धणियं लूसियं बोहिवररयणं ॥२७४॥ जइ चरित्रं नो सक्को सुद्धं जइलिंगमहवपूयट्ठी। तो गिहिलिंगं गिण्हे नो लिंगी पूयणारिहओ ॥२७५॥ लिंगीहिं परिग्गहीयं जइ जिणचेइयमवज्जमहसाहू । तस्सुद्धरणाइकए दाविज्जोणेवउवएसो ॥२७६॥ चेइयवासिविसिटुं जिणाउलं जइवि तहवि सावज्जं । कमलप्पहेण तम्हा आयरिणा इत्थ दिलुतं ॥२७७॥ जा जिणभत्ती किज्जइ अणज्जलिंगीण सावइज्जेहिं । पडिमा पासाइया बोहिमलयद्दमग्गिसमा ॥२८॥ १०॥ Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education national विivaarsa सयं गुणाण नासेइ बोहिमुवहणइ । तम्हा लिंगिहिं न कया कायव्वा दव्वओ पूया ॥ २७९ ॥ जइ दव्वत्थयरसिओ हविज्न लिंगी चयेइ गिहिलिंगं । जम्हा भणियं समए पूयपरो देवभोइति ॥ २८० ॥ तम्हा पवयण खिसा - निद्दलण त्थं जईहिं कायव्वा । जिणआणा परिपालण-रूवा भावञ्चणा सुद्धा ॥२८१ ॥ आसायणापवित्ती जिणआणाभंजणंमि पडिवत्ती । सा भत्तीवि अभत्ती संसारपवगुणा जाण ॥ २८२ ॥ विहिवारा पूया कथमंगला य बोहिफला । अन्नाणतमोहरणी धरणी गुणसयसहस्साणं ॥ २८३ ॥ तरूवनाणविन्नाण जोगाईयाण अइसयगुणाणं । तिहुयणजणेहिं अहिया वणिज्जई परक्कमबलेहिं ॥ २८४॥ तेसिंठवणा भव्वाण -मभियगुणकारिणी विणिद्दिष्ठा । सव्वत्थ सयलतियसाई - एहि खलु अच्चणिज्जगुणा ॥ २८५ ॥ जइ नाम गुणसमिद्धं करेइ लोयाण भवभयुच्छेयं । ता किं पडिमा नो की - रइ सव्वत्थझप्पमाहप्पं ॥ २८६ ॥ नागणेवि तहा रूवारूवावमाणया पडिमा । तद्दव्वपज्जवेहिं सरइ जिणिदाण तम्मुत्ती ॥२८७॥ गिउउममुणिजिणाण-मियराणमसेसइढिगुणक लिओ । अरिहजिण नामजुत्तो जिणवरो जत्थतप्पडिमा ॥ २८८ ॥ भवसंसरमाणो विहु न फासए बीयतईयगुणठाणं । खुड्डुभवसुडुमसाहा - रणाइसंदुद्रुभावं नो ॥ २८९ ॥ जह अभवियजीवेहिं न फासिया एवमाइया भावा । इंदत्तमनुत्तरसुर-सिलायपुरिसनरनारयत्तं च ॥ २९० ॥ htoगणरहत्थे पव्वज्जा तित्थवच्छरं दाणं । पवयणसुरीसुरत्तं लोगंतियदेवसामित्तं ॥ २९९ ॥ तायत्तीससुरतं परमाहम्मियजुयलमणुयत्तं । संभिन्नसोयतहपुब्व-धराहारयपुलायचं ॥ २९२ ॥ मइनाणाइसुद्धी सुपत्तदाणं समाहिमरणचं । चारणदुयमहुसप्पिय-खीरासवाखीणठाणंवा ॥२९३॥ www.helibrary.org Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध प्रकरणम्: तित्थयरतित्थपडिमा-तणुपरिभोगाइकारणे वि पुणो। पुढवाइयभावमवि अभव्वजीवहिं नो पत्तं ॥२९४॥ चउदसरयणत्तेणवि पत्तं न पुणो विमाणसामित्तं । सम्मत्तनाणसंजम-तवाइ भावा न भावदुगे ॥२९५॥ अणुभवजुत्ता भत्ती जिणाण साहम्मियाण वच्छल्लं । न य साहेइ अभब्वो संविग्गत्तं च तप्परकं ॥२९६॥ जिणजणयजणणी जाया जिणभिरूकादायगा जुगपहाणा। आयरियपयाइदसंग परमत्थगुणढमप्पत्तं ॥२९॥ अणुबंध १ हेउ २ सरूवा ३ तत्थ अहिंसा तिहा जिणुद्दिष्ठा । दवेण य भावेण य दुहावि तेसिं न संपत्ता ॥२९८॥ सम्मदिठीण जईण-मकसाईणं भवे अहिंसतियं । उज्जुत्ताणुज्जुत्ताण य दव्वभावेहिं होइ दुहा ॥२९९॥ पूयाए कायवहो पसंगजणिओ तहावि अणवज्जो । जम्हा मित्ती पयडा निसीहिकरणंमि सव्वत्थ ॥३०॥ समणोवासगभेया चउहा विरया य सव्वओ विरया । विरया विरया सव्वओ विरयाविरया इमे चउहा ॥३०१॥ मिच्छा केवलसम्मा सम्माविरया य संजमाविरया । अकसिणसंजमविरया विरयाविरया तहा कसिणा ॥३०२॥ पुवाणं जा किरिया हिंसा अणुबंधभावसंजणिया । इयराणझवसाय विसेसओ अग्गिमा दुविहा ॥३०३॥ अभिगमणवंदणनमं-सणाणि पच्चख्कसाहुसोविकिच्चाणि । अणिसिद्धमणुमयाणि-त्ति निरवज्जरूवाणि ॥३०४॥ अरिहंतसिद्धचेइय-गुरुसुयसम्मे य साहुवग्गे य । आयरियउवझाए पवयणे सव्वसंघे य ॥३०५॥ एएसु भत्तिजुत्ता पूर्यता अहारिहं मणा अमणा । सामण्णमणुसरंता परित्तसंसारिया भणिया ॥३०६।। एवं पवयणवयणं धारंता नियमणे महासत्ता । अरिहपयठे अठसु निस्केवाईसु भत्तिपरा ॥३०७।। नाणावरणिज्जस्स उदंसणमोहस्स तह खओवसमे । जीवे अठसु भंगेसु होइ लाहो य सव्वत्थ ॥३०८॥ Jain Educatoamnational inelibrary.org Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तित्थयरगुणा पडिमासु नत्थित्ति न संसयं वियाणंतो। तित्थयरोत्ति ण मंतो सो पावइ निज्जरा विउला ॥३०९।। जह सिद्धा संपुण्णा गुणेहि सत्ताइ नोवियत्तीए। तह दव्वसिद्धरूवा पडिमा अझप्पजोगेण ॥३१०॥ जइ नो ता खलु एवं तब्भावणभावमाण भव्वाणं । कहमेयारूवं चिय पयडइ ता सिद्धरूवत्तं ॥३११॥ जइ अप्पभावपगुणं विसुद्धहेऊ जणेइ झाणाणं । ता अण्णा सव्वपडिमा त्थीपमुहा गुणकरी किं तो ॥३१२।। लिंगं जिणपन्नत्तं जइ वि नमंतस्स निज्जरा विउला । जइवि गुण विप्पहीणा वंदइ अझत्थसोहीए ॥३१३॥ संता तित्थयरगुणा तित्थयरे ते सिमंतु अन्नत्थ । नय सावज्जा किरिया इयरेसु धुवा समणुपन्ना ॥३१४॥ जत्थ सावज्जा किरिया नत्थि पडिमासु एवमियरावि । तयभावे णत्थि फलं अह होइ अहेउगं होऊ ॥३१५।। कामं उभयाभावो तह वि फलं अस्थि मणविसुद्धीए । तीए पुण मणसुद्धी कारणं हुंति पडिमाओ॥३१६।। जइ विय पडिमासु जहा मुणिगुणसंकप्पकारणं लिंगं । उभयमवि अत्थि लिंगे न य पडिमासूभयं अत्थि ॥३१॥ नियमा जिणेसु य गुण पडिमा उद्दिस्स जे मणे कुणइ । अगुणे उ वियाणंता कं नमओ मणा गुणं काउं ॥३१८॥ जह वेडंबगलिंगे जाणंतस्स नमओ हवइ दोसो। निबंधसमिय नाऊणं वंदमाणे धुवं दोसा ॥३१९॥ जिणपडिमा वि तयंग सकहाइ अत्थि जत्थ तट्टाणे । अच्छरसाहिं समं चिय कुणंति कीडुन सुरनिवहा ॥३२०॥ आसायणपरिहारो जिणप्पइकस्स किं पुण जिणाणं । तस्सासायणरूवं पावं पावा कुणंति नरा ॥३२१॥ लकणजुत्ता पडिमा पासाइया समत्तलंकारा । पल्हायइ जह व मणं तह णिज्जरिसो वियाणाहि ॥३२२॥ अजिणे जिणरूवत्तं मिच्छत्तं पालविऊण अवसाणं । कुव्वंति ते वि पवयण-वयणमसारं कयं तेहिं ॥३२३॥ For Private & Personal use only Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध: ॥ १२ ॥ जम्हा गणहरवणं जिगाण पडिमा जिणं जिर्णिदित्ति । सख्कं अरिहंतित्ति त-प्पुरओराहणा वृत्ता ॥ ३२४ ॥ सावज्जा निरवज्जा किरिया अझप्पजोगओ हुंति । भिच्छत्तपराण पढमा इयराणं होइ इयरा य ॥ ३२५ ॥ 'जलगलणदाणविणओ-वयारमेएहिं धम्मजुत्ताणं । आहारविवहारनई - संतरणाइ पवत्ताणं ॥ ३२६ ॥ आणाविणओ परमं मुख्कंगं पवयणे जओ भणिओ । सव्वत्थ विहियपरमत्थ-सारेहिं परमगुरुएहिं . ॥ ३२७॥ इयसो रूढो जिदिपडिमित्ति अत्थओ दिठ्ठो । नो कत्थवि नाणित्ति निरुत्तियं चेइसद्दस्स ॥ ३२८ ॥ चिइ संन्नाणं सन्नि सम्मं नाणं तु चेइयठस्स । चिणुइपुठिनीणेइ चिइत्ति अत्यस्स चिइसद्दे ॥ ३२९ ॥ तुम्हा चेइयविणओ सम्मं जो जुंजए पसत्थमणे । आसायणा तयंगस्स वज्जणा परमगुणहेऊ ॥ ३३० ॥ नामाइयनिख्वा सुद्धा सुद्धेहिं अट्ठहा चउहा । पढमपए दुह चउहा विणओ तस्सेव कायव्वा ॥३३१॥ तह्मा चेइयदव्वं बुट्टिगयं जिणपयं खु भत्तीए । विहिपुव्वं चिय वृत्तं पभावगं दंसणाईणं ॥ ३३२ ॥ तस्सासायणदोसा विसेसओ पवयणे जओ भणिया । तं नाऊण महप्पा संरख्कड़ तं जहासत्ती ॥ ३३३॥ संकासविजयतक्कर- धणसिरिधणदेवनामओ सढ्ढा । भख्कवख्कणदोहण - चढणपभिईहि संजाया ॥ ३३४ ॥ सव्वं सरीरकठ्ठे विहलं उच्छूफलं व जीवाणं । जिणपडिमा भत्तीए सुण्णं सहलं पुणो तीए ॥ ३३५ ॥ ॥ इति देवस्वरूपाधिकारः ॥ प्रकरणम्ः १२ । Sinelibrary.org Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥ अथ गुवंधिकारः॥ अह सुगुरुणुवएसो निस्केवाईहि चउप्पयारोबि । नामाइविभेएहिं दवाईहिं तहा जाण ॥१॥ केवलनामेण गुरू ठवणगुरू अख्कपडिमरूवेहिं । दव्वेण लिंगधारी भावे संजलकसाएहिं ॥२॥ तहियाण इसे तहिया वितहा वितहाण जोगजुत्ताणं । दव्वाइविभेएहिं वेसपमाणेहिं भइयव्वा ॥३॥ गुणओब्भितरभावे अणगारनियंठसाहुमुणिपमुहा । पज्जाया उवमा पुण पसन्नचित्ताइगुणविहाणा ॥४॥ ससरीरे वि निरीहा बज्झम्भंतरपरिग्गहविमुक्का। धम्मोवगरणमित्तं धरंति चारित्तरस्कठ्ठा ॥५॥ पंचेंदियदमणपरा जिणुत्तसिद्धतगहियपरमत्था । पंचसमिया तिगुसा सरणं मह एरिसा गुरुणो ॥६॥ लस्किज्जइ सो सुगुरू सद्धाकरणोबएसलिंगेहिं । अनिगृहंतो अप्प सव्वत्थ सुसीलसुचरित्तो ॥७॥ पासत्यो १ ओसन्नो २ होइ कुसीलो ३ तहेव संसत्तो ४ । अहच्छंदो वि ९ य एए अवंदणिज्जा जिणमयंमी ॥८॥ सो पासत्यो दुविहो सव्वे देसे य होइ नायवो। सव्वंमि नाणदंसणचरणाणं जो उ पासम्मी ॥९॥ देसम्मि य पासत्थो सिज्जाहरभिहडरायपिडं च । नीयं च अग्गपिंडं भुंजइ निक्कारणे चेव ॥१०॥ कुलनिस्साए विहरइ ठवणकुल्लाणि य अकारणे विसइ । संखडिफ्लोषणाए गच्छइ तह संथवं कुणइ ॥११॥ ओसन्नो विय दुविहो सव्वे देसे य तत्थ सव्वंमि । उउबद्धपीढफलगो ठबियगभोई व नायव्वो ॥१२॥ Jain Educatiemational braryong Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध प्रकरणम आवस्सयसझाए पडिलेहणझाणभिरकभत्तो । आगमणे निग्गमणे ठाणे निसीयणे तयट्रे॥१३॥ आवस्सयाई न करइ अहवा य करेइ हीणमहियाई । गुरुवयणबला वि य तहा भणिओ एसो य उस्सन्नो ॥१४॥ कालविणयाइरहिओ नाणकुसीले य सणो इणमो। निस्संकियाइरहिओ चरणकुसीलो इमो तिविहो ॥१५॥ कोउयभूईकम्मे पसिमापसिणे निमित्तमाजीवी । कक्ककरुयाइलरकण-मुवनीवइ विज्जमंताई ॥१६॥ पासत्थाईएसु संवि-ग्गेसुं च इत्थ मिलिओ वि । न हि तारिसओ होइ पियधम्मो अहव इयरो य ॥१७॥ सो संसत्तो दुविहो देसे सब्वे य इत्थ नायब्बो। अहच्छंदो वि पंचम अणेगविहो होइ नायवो ॥१८॥ उस्सुत्तमणुवइट्ठ सच्छंदविगप्पियं अणणुवाइ । परतत्ति पवत्तेत्ति तेण य इणमो अहाछंदो ॥१९॥ पासत्थाइवंदमाणस्स नेव कित्ती न निज्जरा होइ । जायइ कायकिलेसो बंधो कम्मस्स आणाए ॥२०॥ जह लोहसिला अप्पं पि बोलए तह विलम्गपुरिसंपि । इय सारंभो य गुरू परमप्पाणं च बोलेइ ॥२१॥ जह असुइठाणपडिया चंपकमाला न कीरते सीसे । पासत्थाइठ्ठाणे वट्टमाणा इह अपुज्जा ॥२२॥ पक्कणकुले वसंतो सओणीपारो वि गरहिओ सीसो । इह गरहिया सुविहिया मझि वसंता कुसीलाणं ॥२३॥ परिधारपूयहेऊ पासत्थाणं च आणुवित्तीए । जो न कहइ सुद्धचम्म तं दुल्लहबोहियं जाण ॥२४॥ जइ अप्पणा विसुद्धो कुसीलसंगं च पकवायं वा । न चयइ पूयाहेऊं तं दुल्लहबोहियं जाण ॥२५॥ केइ भणति उ भण्णइ सुहुमवियारो न सावगाण पुरो। तं न जओ अंगाइसु सुच्चइ तव्वन्नणा एवं ॥२६॥ लठ्ठा गहियठा पुच्छियट्ठा विणिच्छियठ्ठा य । अहिगयजीवाजीवा अचालणिज्जा पवयणाओ॥२७॥ For Private & Personal use only Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पुंच्छंताणं धम्मं तं पिअनपरिकिओ समत्थाणं । आहारतित्तिबुद्धा जे उम्मग्गं उवइति ॥ २८ ॥ सुगई हणंति तेसि धम्मियजणनिंदणं करेमाणा । आहारपसंसासु य निति जणं दुग्गई बहुअं ॥ २९ ॥ दगपाणं पुष्पफलं अणेसणिज्जं गिहत्यकिचाइं । अजया पडिसेवंति जइवेसविडंबगा नवरं ||३०|| जे वरसरणपसत्ता छक्कायरिऊ असंजया अजया । नवरं मुत्तूण घरं घरसंकमणं कयं तेहि ॥ ३१ ॥ बाया मेसणाओ न रख्कइ द्वाइसिज्जपिंडं च । आहारेइ अभिरकं विगईओ सनिंहिं खाइ ||३२|| सूरप्पमाणभोई आहारेई अभिस्कमाहारं । न य मंडलिए भुंजइ न य भिरकं हिंडए अलसो ॥३३॥ कीवो न कुणइ लोयं लज्जइ पडिमाइ जल्लभुवणेइ । सोवाहणो य हिडई बंधइ कडिपट्टयमकज्जे ॥ ३४॥ सोव य सव्वराई नसमचेयणो न वा झरइ । न पमज्जेतो पविसइ निसिही आवस्सियं न करे || ३५ ॥ सव्वं थोवं उवहिं न पेहए न य करेइ सझायं । निञ्चमवझाणरओ न य पेहपमज्जणासीलो ॥ ३६ ॥ एयारिसा कुसीला हिठ्ठा पंचावि मुणिवराणं च । न य संगो कायव्वो तेर्सि धम्मभिव्वेहि ॥ ३७ ॥ आयरिय १ उवझाया २ पवत्ति ३ थेरा वि साहुणो अहवा । जत्थ अणायारपरा सो गच्छो इत्थ मुत्तव्वो ॥ ३८ ॥ जत्थ य गुणिप्पओसं वहति उम्मग्गदेसणारत्ता । सो य अगच्छो गच्छो संजमकामीहिं मुत्तव्वो ॥३९॥ वयछकं कायछक्कमकप्पो गिहिभायणं । पलियंक निसिज्जा य सिणाणं सोभवज्जणं ॥ ४० ॥ अठ्ठारसदोसा जत्थ- निसेवंति साहुवेसधरा । धम्मधणहरणपरमं तं पल्लि जाण न हु गच्छं ॥ ४१ ॥ संखपिमुकिचे सरसाहारं खु जे पगिण्हंति । भत्तठ्ठे धुव्वंति वणीमगा ते वि न हु मुणिणो ॥ ४२ ॥ Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध प्रकरण जोइसनिमित्तअख्करमूइकम्माइं जे पउंअंति । अत्तठियमुहहेउं धम्मपिसाया न ते मुणिणो ॥४३॥ रणो आणाभंगे इक्कु चिय होइ निगाहो लोएं। सव्वष्णूआणभंगे अणेतसों निग्गहं लहइ ॥४४॥ जत्थ य मुणिणो कपवि-कपाई कुवंति निच्चमुझट्ट।। तं गच्छं गुणसायरविसं व दूरं परिहरिज्जा ॥४५।। वत्थाई विविहवण्णाई अइसियसद्दाइं धूववासाइ । पहिरिज्जइ जत्थ गणे तं गच्छ मूलगुणमुक्कं ॥४६॥ घट्टा मट्ठा पंडर-वसणा दबदवचरा पमत्तमणा । उहामा सूयलुव्व निरंकुसा दुष्ठनागुब्व ॥४७॥ जत्थ य विकहाइपरा कोउहला दवलिंगिणो कुरा । निम्मेरा निल्लज्जा तं गच्छं जाण गुणभट्ट ॥४८॥ अन्नत्थियवसहा इव पुरओ गायंति जत्थ महिलाणं । जत्थ जयारमयारं भणंति आलं सयं दित्ति ॥४९॥ जत्थ य अज्जालद्धं पडिग्गहमाई व विविहमुवगरणं । पडिभुजई साहहिं तं गोयम केरिसं गच्छं ॥५०॥ वजह अप्पमत्ता अज्जासंसग्गिअग्गिविससरिसा । अजाणुचरो साहू लहइ अकीर्ति खु अचिरेण ॥५१॥ जत्थ हिरण्णसुवणं हत्येण पराणगं पि नो छिप्पे । कारणसमल्लियं पि हु गोयम गच्छं तयं भणिमो ॥५२॥ जत्य य बाला लहुया गिण्हंति धणेहिं पंडगजणुव्व । भासइपवयणमग्गं कहमत्तहिओ पवत्तेइ ॥५३॥ अप्पमणालोइयवओ दिति परेसिं तवेण आलोयणा । मुसंतिइ मुद्धजणं गिण्हंति धणं अहम्मेण ॥५४॥ जे बंभचेरभठ्ठा पाए पार्डति बंभयारीणं । ते हुँति टुटमुंटा बोही वि सुदुल्लहा तेसि ॥५५॥ सीसोदराइफोडणभट्टितं लोहडेउगिहिणणं । जिणपडिमाकयविक्कय उच्चाडणखुद्दकरणं च ॥५६॥ संनिहिमाहाकम्मं जलफलकुसुमाइ सव्वसञ्चित्तं । निच्चं दुतिवारभोयण विगइलवंगाइतंबोलें ॥५॥ Jain Education national Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वत्थं दुप्पडिलेहियमपमाणसकन्नियं दुकूलाई । सिज्जोवाणहवाहणआउहतंबाइपत्ताई ॥५८॥ पडिमाररूकणपूया समहिमजिणथुणणसवणपमुहाइ । इहलोयतवकारावण लहुहत्थाइकरणमेवं ॥५९॥ सिरतुंडे खुरमुंडं रयहरमुहपत्तिधारणं कज्जे। एगागित्तब्भमणं सच्छंदं चिट्ठियं गीयं ॥६॥ चेइयमढाइवासं पूयारंभाइ निच्चवासित्तं । देवाइदव्वभोग जिणहरसालाइकरणं च॥६१॥ न्हाणुव्बट्टणमूसं ववहारं गंधसंगहं कालं । गामकुलाइममत्तं थीनटुं थीपसंगं च ॥६॥ नरयगइहेउजोइसनिमित्ततेगिच्छमंतजोगाई। मिच्छत्तरायसेवं नीयाण वि पावसाहिजं ॥६३॥ सुविहियसाहुपओसं तप्पासे धम्मकम्मपडिसेहं । सासणपभावणाए मच्छरलउडाइकलिकरणं ॥६४॥ कुलनीइठिइभंग-प्पमुहाणेगप्पओससंदिसणं । सावाइभयदंसणमिमाइकज्जाइबट्टणयं ॥६५॥ थीकरफासं बंमे संदेहकलंतरेण धणदाणं । वट्टणंयसीसगहणं नीयकुलस्सावि दव्वेणं ॥६६॥ अधिहि कयाणुठाणे पभावणं दंसणं पवाहकए । अपवयणुत्ततवंमि परूवणुज्जवणविहिकरणं ॥६॥ मयकिच्चे जिणपूयापरूवणं मयधणाण जिणदाणे । मिहिपुरओ अंगाइपवयणकहणं धणठाए ॥६८॥ सव्वावज्जपवत्तण मुहुत्तदाणाइ सव्वलोयाणं । सालाइ गिहिघरेवा खज्जगपागाइकरणाइ ॥६९॥ जरकाइगुत्तदेवयपूया पूयावणाइ मिच्छत्तं । सम्मत्ताइनिसेहे तेर्सि मुल्लेण वा दाणं ॥७॥ नंदिवलिपीढकरणं हीणायाराण मयनियगुरुणं । बरूकाणस्स य मझे महिला गायंति अप्पगुणा ॥१॥ केवळवीणं पुरओ वरूकाणं पुरिसअग्गओ अज्जा । कुवंति जत्य मेरा नडपेडकसंनिहा जाण ॥७२॥ in Education 10 ww b rary.org Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध ॥१५॥ कयसिगारा- अज्जा सभासु पुरओट्ठिया कयकहरूका | अहवा भोयणवेलासु इत्यीरज्जं न तं गच्छं ॥ ७३ ॥ इइ बहुहा सावज्जं जिणपडिकुटुं च गरहियं लोए । जे सेबंति कुमग्गं करंति कारंति निम्मा ॥ ७४ ॥ इहपरलोयहयाणं सासणजसघाईणं कुदिट्ठीगं । कह जिणदंसणमेसि को वेसो किं च नमणाइ ॥ ७५ ॥ बाला वयंति एवं वेसो तित्थंकराण पुसो वि । नमणिज्जो धिद्धी अहो सिरमूलं कस्स पुक्करिमो ॥ ७६ ॥ 'ते लोयाणं पुरओ वयंति एवं खु किं करिस्सामो | सामग्गीअभावाओ वक्कजडाणं पुणो कालो ॥७७॥ दूसमकाले दुलहो विहिमग्गो तंभि चेव कीरंते । जायइ तित्थुच्छेओ तम्हा समए पवत्तव्वं ॥ ७८ ॥ पुवं पवयण भणिया विहिपुण्णा साहुसावगा कत्थ । जम्हा ते सिवगमणा संपइ मुख्कस्स विच्छेए ॥ ७९ ॥ धिइसंवयणबलाइ हाणी इह जिणवरेहिं निद्दिठा । को मेओ सुहअसुहाण केसि चिय कुग्गहो एसो ॥ ८० ॥ बहुजणपवित्तिमित्तं लोयपवाहेण किज्जए धम्मो । जइ निम्मलं मणं चिय तो सव्वत्थावि पुण्यफलं ॥ ८१ ॥ एयारिस दुब्बयणं भासंता अप्पणो पमायंता । बुडुंति भवसमुद्दे बुड्डावंता परेसि पि ॥८२॥ पवयणनामग्गाहं वख्काणे जो करेइ विगहाइ । कामत्थहासविह्नियकारि किर मुद्धबालाणं ॥८३॥ बझभंतरगठि धरइ सया भासइ पुण जणाणं । दूसमदोसेण जओ समणाणं दुल्लहसामग्गी ॥८४॥ जइ कहमवि जत्थ गणे भिरूकुजणा संजमे कुसीला य । जइ सूरि सुद्धधम्म-डिओ हविज्ज त्थ सो गच्छो ॥ ८५ ॥ संजमहीणा मुणिणो जत्थ गणे हुंति सो वि मुत्तव्वो । जइ सूरि कुमग्गपरो सोवागकुलुव्व भव्वेहिं ॥ ८६ ॥ निम्मलजलसंपुण्णो सोवागंधुव्व गरहणिज्जो सो । तिविहेण तस्स संगो वज्जेयव्वो सुसाहूहि ॥ ८७ ॥ प्रकरणः ॥ १५ Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education national नियतणुसायनिमित्तं आहाकम्भं अणेसणिज्जं च । जो भुंजइ आयरिओ संजमकामीहिं मुत्तव्व ॥८८॥ जत्थय अज्जासंगी आयरिओ सव्वदव्वसंगहिओ । उम्मग्गपरुककरणो अणज्जमिच्छव्व मुत्तव्वो ॥८९॥ मूलगुणेहिं विमुक्कं विज्जाकलियं पि लद्धिसंलिद्धं । उत्तम कुले वि जायं निद्वाडिज्जइ तयं गच्छं ॥ ९० ॥ वत्थोवगरणपत्ताइ दव्वं नियनिस्सएण संगहियं । गिहिगेहंमि य जेसि ते किणिणो जाण न हु मुणिणो ॥ ९१ ॥ जे पवयां भणित्ता गिहिपुरओ कंखए धणं ताओ । ते णाणविक्किणो पुण मिच्छत्तपरा न ते मुणिणो ॥ ९२ ॥ अप्पावराहठ्ठाणे कुव्वंति सदप्पओ महादंडं । तं धूमधामगहियं सप्पुव्व सया विवज्जिज्जा ॥ ९३ ॥ धूमं पर्यडकोहणसीलं सुविहियपओससंजणियं । नियआणाभंगेण य करंति फग्गुप्पगिठ्ठगुणं ॥ ९४ ॥ धामंगारवर सियं नियपूयामाणसमुद्दउक्करिसं | लोगववहारदंसणगव्वेण गुणाण निक्करणं ॥ ९५ ॥ जह सीसाइनिकितइ कोइ सरणागयाण जीवाण । तह गच्छमसारंतो गुरू वि सुत्ते जओ भणिओ ॥ ९६ ॥ उम्मग्गमि पविट्टो उम्मग्गपरूवओ सहायकरो । सुविहियजणपडिकूलो आयरिओ वि तहा जाण ॥ ९७ ॥ जे लोइयकज्जरया धणठ्ठिणो भत्तलोयकयथुणणा । सुविहियजणाण अहिया ते पासंडा कुसीला य ॥ ९८ ॥ अगीयत्यकुसीलेहि संग तिविहेण वोसिरे । मुख्कमग्गम्मि मे विग्धं पहंमी तेणगं जहा ॥ ९९ ॥ आयरियप्पमुहा ये एयारिच्छाय हुंति जत्थ गणे । किंपामफलयसरिसो संजमकामीहिं मुत्तव्वो ॥१००॥ वरं वाही वरं मच्चू वरं दारिदसंगमो । वारं अरण्णे वासो य मा कुसीलाण संगमो ॥ १०१ ॥ या विवरं मां कुसीलाणसंगमों भद्दे । जम्हा हीणो अप्पं नासइ सव्यं ह सीलनिहि ॥ १०२ ॥ helibrary.org Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध ॥ १६ ॥ बस्स य निवरस य दोण्हं पि समागयाई मूलाई । संसग्गीए विणट्ठो अंबो निवत्तणं पत्तो ॥ १०३ ॥ जो जारिसेण मित्ति करेइ अचिरेण तारिसो होइ । कुसुमेहिं संवसंता तिला वि तग्गंधिया हुंति ॥ १०४ ॥ (अत्र नोदकः ) सुचिरं पि अच्छमाणो वेरुलिओ कायमणी अउम्मीसो। नहु धयइ कायभावं पाहन्नगुणेण नियपूण ॥ १०५ ॥ सुचिरं पि अच्छमाणो नलथंभो उच्छूवाडमझमि । कीस न जायइ महरो जइ संसग्गी पमाणं ते ॥ १०६॥ (tent or) भागअभावुगाणि अ लोए हुविहाइ हुंति दव्वाई । वेरुलिओ उत्थ मणी अभावणा अन्नदव्वेहि ॥ १०७ ॥ जीवो अनाइनिहणो तब्भावणभाविओ य संसारे । खिप्पं सो भाविज्जइ मेलणदोसाणुभावेण ॥ १०८ ॥ जह नाम महुरसलिलं सागरसलिलं कमेण संपत्तं । पावेइ लोणभावं मेलणदोसाणुभावेण ॥ १०९ ॥ एवं खु सीलवंतो असीलवंतेहि मीलिओ संतों । पावइ गुणपरिहाणि मेलणदोसाणुभावेण ॥ ११० ॥ आलावो सलावो वीसंभो संथवो पसंगो य । हीणायारेहिं समं सव्वजिणिदेहि पडिकुट्ठो ॥ १११ ॥ उत्तमायरंतो बंधइ कम्मं सुचिक्कणं जीवो । संसारं च पवइ मायामोसं च कुव्वइ य ॥ ११२ ॥ जो गिues वयलोवो अहव न गिण्हइ सरीरवुच्छेए । पासत्यसंगमो वि य वयलोवो तो वरमसंगो ॥ ११३ ॥ एयारिसाण दुस्सी - लयाण साहृपिसायाण भत्तिपुवं जे । वंदणनमंसणाड़ कुव्वंति न महापावा ॥ ११४ ॥ 'सि गुरुबुद्धीए पञ्चस्काणाइ धम्मणट्टाणं । धम्मुत्ति नाऊणं विहलं पच्छित्तजुग्गं च ॥ ११५ ॥ - छल्लयं गुरुकज्जे ममत्तबुद्धीए होइ मिच्छत्तं । लहुकिचे पणमासो सट्टाणं धम्मसङ्काणं ॥ ११६ ॥ "दस्सीलव्वलिंगिजणाण तप्पस्वकारओ ढोओ । उम्मग्गअविहिरायी विहिप के मच्छरधरो य ॥११७॥ प्रकरण ॥१६ Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सो संघो न पमाणं उम्मग्गपरूवयं च बहुलोयं । दट्टण भणंति संघ संघसरूवं अयाणंता ॥११८॥ सुहसीलाओ सच्छं-द चारिणो बेरिणो सिवपहस्स । आणाभठ्ठाओ बहु-जणाओ मा भणह संवृत्ति ।।११९॥ देवाइदव्वभरूकण-तप्परा तह उमग्गपख्ककरा । साहुजणाण पओस-कारिण मा भणह संघ ॥१२०॥ अहम्मअनीईअणायार सेविणो धम्मनीइपडिकूला। साहूपभिइचउरो वि बहुया अवि मा भणह संघं ॥१२१॥ अम्मापियसारिच्छो सिवघरथंभो य होइ जिणसंघो । जिणवरआणाबझो सप्पुच भयंकरो संघो ॥१२२॥ अस्संघ संघ जे भणंति रायेण अहव दोसेण । छेओ वामहत्तं पच्छित्तं जायए तेसि ॥१२३॥ काऊण संघसदं अव्ववहारं कुणंति जे केइ । पप्फोडिअसउणि-डग व ते डंति निस्सारा ॥१२४॥ तेसिं बहुमाणं पुण भत्तीए दिति असणवसणाइ । धम्मोति नाऊणं गाथाएतित्तिधरवाणं ॥१२५॥ संघसमागममिलिया जे समणा मारवेहिं कताई। साहिज्जेण करता सो संघाओ न सो संघो ॥१२६॥ जे साहज्जे वट्ट आणाभंगे पवट्टमाणाणं । मणवायाकाएहि समाणदोसं तयं बिंति ॥१२॥ आणाभंग दळू मझत्थाणु ट्वंति जे तुसिणा । अविहिअणुमोयणाए तेसि पि य होइ वयलोवो ॥१२८॥ तेसि पि य सामण्णं भट्ट भठ्ठलया य ते हंति । जे समणा कज्जाइ वित्तरख्काइ कुव्वंति ॥१२९॥ किंवा देइ वराओ मणुओ सुलू वि धणी विभत्तो वि । आणाइक्कमणं पुण तणूयं पि अणंतदुहहेऊ ॥१३०॥ तित्थयराराहणपरेण सुयसंघभतिजुत्तेण । आणाभजणंमी अपसठ्ठी सव्वहा देया ॥१३१॥ गम्भपवेसो वि वरं भद्दकरो नरयवासपासो वि । मा जिणआणालोव-करे वसणं नाम संघे वि ॥१३२॥ KTM Jain Education Intentional Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध १७ ॥ केइ भगति मूढा पासत्थाइजणस्स दंसणयं । जिणआसायणकरणं भमंति तेणंतससारं ॥ १३३॥ जम्हा नेव जिणिदो सावज्जरओ सर्गधिसविभूसो । लोयप्पयारपख्कं कुणमाणो छंदवयमाणो ॥ १३४ ॥ णो परवित्तीविवहारकारओ सो हविज्ज कइया वि । तया कुसीललिंग धम्मस्स विडंबनाऊ ॥ १३५ ॥ इय जाणिऊण दख्का कयावि न भणति एस जिणवेसो । तद्दध्वलिंगमित्तं इंसिज्झयमाई यवित्तिकए ॥ १३६ ॥ बालाण हरिसजणण के वि य धारति वेसमण्णयरं । उन्भडपंडरवसणाइरहियं चिय सुविहियाभासं ॥ १३७॥ रंगिज्जइ मइलिज्जइ उवगरणाणि बगुव्व गमणाणि । धारंति धम्ममाया - पडलाणि सुविहियभमत्थं ॥१३८॥ जणचित्तग्गहणत्थं वख्काणांइ करंति वेरग्गे । भासंति अत्तदोसा साहुत्ति जणावबोह ॥ १३९॥ आयरिओ उवझायाणं दोसा भासंति कृष्णजाहेण । गाहिज्जइ जत्थ सुयं पमाइ दोसी ति तं भणइ ॥ १४० ॥ गिति गहावेति य दवाई नाणकोसबुढिकए । दंसइ किरियाडोंवं बाहिरओ बहियलोयाणं ॥ १४१ ॥ अण्णोष्णविसंवाओ समुदायमि वि मिलति नो केसि । नियनियउक्करिसेणं सामायारि विरोहति ॥ १४२ ॥ सव्वे वख्काणपरा सव्वे थिजणुवएससीला य । अहच्छेदकप्पजप्पा वयंति किं धम्मपरसख्कं ॥१४३॥ मंडलिजेमणिमाइववहारपरंमुहा असंबद्धा । सदकरा झंझकरा तुमंतुमा पावतत्तिल्ला ॥ १४४ ॥ सिढिलालचणकारणठाणविहारेहि सव्वमायति । भत्तजणगुणलेसो वि भाति महमेरुसारिच्छो ॥ १४५ ॥ धम्मकहाओ अहिज्जइ घराघरं भमइ परिकहंतो य । कारणपरूवणाहिं अइरितं वहइ उवगरणं ॥ १४६ ॥ १ उत्तम इति प्रत्यन्तरे । २ जण इति मुत्यन्तरे । S प्रकरणम्ः ॥ १७ ॥ Page #37 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - 'एगागित्थम्भमणं सव्वत्थ वि अगणिऊण पज्जाओ। सवे अहमिदधम्मा नियमाणं परिभवो ण्णस्स ॥१४॥ नियकज्जे मिउवयणा कयकिच्चे फरुसवयणभासिल्ला । अइमूढगूढहियया चुण्णकणगुब्व रंगकरा ॥१४८॥ अप्पंमि चरणधम्मं ठावंता संपयंमि समयंमि । विसयकसायधणंजय-जालाजलिया वि ते जाण ॥१४९॥ संजलंमि कसाए चरणं कहियं जिणेहिं नन्नत्थ । पायं अभिण्णगंठि-प्पएसिणो ते मुणेयव्वा ॥१५०॥ वत्थिय वायपुण्णो अत्तकरिसेण जहा तहा लवइ । न वि सेवइ गीयत्थं वत्थिव्य अदंसणिज्जो सो॥१५॥ थद्धो निविण्णाणो परिभवइ जिणमयं अयाणतो । तिणमिव मन्नइ भुवणं न य पिच्छइ किंचि अप्पसमं ॥१५२॥ बहु मन्नइ गिहिलोयं गिहिणो संजमसहित्ति भणति । नय आणं मन्नंति गुरूण गुरुनाणजुत्ताणं ॥१५३॥ गाम देसं च कुलं सदासदी ममत्तए कुणइ । वसहिषरुल्लोयणाइ नंदिधणाई पवदंति ॥१५४॥ वंदणनमंसणाइ कारंति परेसि साहुबुद्धीए । नय अप्पणो करेंति सिढिलायारा तहा एए ॥१५५॥ लोए इइसाहुवाया धम्मपरा धम्मदंसिणो रम्मा । परमंता निधम्मा निम्मेरा नडयपेडनिहा ॥१५६॥ दसमगमच्छरमिणं असाहुणो साहुणुव्व पुज्जति । होहंति तप्पसाया दुभिख्कदरिद्दडमरगणा ॥१५७॥ जे संकिलिचित्ता माइठाणंमि निच्चतल्लिच्छा । आजीवगभयवस्था मूढा नो साहुणो हुंति ॥१५८॥ । मूलगुणविप्पमुक्का छक्कायरिऊ असंजया पायं । गुणिमुणिपओसजुत्ता विठ्ठाणायारमूरिमुहा ॥१५९॥ सुसमायारीब्भठ्ठा नियडिपरा भत्तलोयथुइदस्का । पच्छन्नसब्वसंगह-कारिणो सव्वभुज्जपरा ॥१६०॥ सुद्धं सुसाहुधम्म अंगे न धरेइ नो पसंसेइ । सद्धागुणेहि रहिया परमत्यनुया पमायपरी ॥१६॥ STRASSE SASS For Private & Personal use only Page #38 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध गिहिपुरेओ सझायं करंति अपणोण्णमेव झुझंति । सीसाइयाण कंजे कलहविवायं उईति ॥१२॥ कि बहुणा भणिएणं बालाणं ते हवंति रमणिज्जा । दस्काणं पुण एए विराहगा छन्नपावदहा ।।१६३॥ वंदणनमंसणाई जोगुवहाणाइ तप्युरो विहियं । गुरुबुद्धीए विहलं सवं पच्छित्तजुग्गं च ॥१६४॥ जम्हा भणियं छेए अत्थिक्वेण रहियतित्यिलिंगीण । पुरओ ज धम्मकिच्चं विहियं पच्छित्तचठगुरुयं ॥१६५॥ किइकम्मं च पसंसा सुहसीलजणमि कम्मबंधा य । जे जे पमायठाणा ते ते उवधूहिया हुंति ॥१६६॥ एवं नाऊण संसरिंग कुसीलाणं च संयवं । संवासं चे हियाकंखी सम्बोवाएहि वज्जए ॥१६॥ निन्नवअभव्वगाणं जा किरिया मुद्धमोहसंजणिया। तारिसिया खलु किरिया छउमत्थाणं नियडियाणं ॥१६८॥ निरवज्जो खलु धम्मो पन्नत्तो जिणवरेहि इव वयणं । भासंता गृहंता तित्थयराईण विहित्ति ॥१६९॥ अप्पमईइ पवयणं हीलंता तश्चमग्गमलहंता । अन्नाणकट्ठरूवं दंसइ मूहाण जीवाणं ॥१७०॥ ते विय अदंसणिज्जा जिणपवयणबाहिरा विणिदिठ्ठा । मिच्छत्तदरिद्दजुया पाविठ्ठा सवनिक्किठ्ठा ॥१७१॥ ॥ इति कुगुरुगुब्बांभासपार्श्वस्थादिस्वरूपाधिकारो द्वितीयः ॥२॥ अह सुगुरूंण सरूवं भणामि तग्गच्छसंघजुत्ताणं । अंतोमुत्तमित्तं पि तत्थ वसंते महालाभो ॥१॥ मच्छो महाणभावो तत्थ वसंताण निजरा विउला । सारणवारणचोयण-न दोसमाईहिं पडिवत्ती ॥२॥ Page #39 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education national नो अपणा पराया गुरुणो कइया वि हुंति सद्वाणं । जिणवयणरयणनिहिणो सव्ये ते वन्निया गुरुणो ॥ ३ ॥ संपइ दूसमकाले धम्मत्थी सुगुरुसावया दुलहा । नामगुरू नामसढ्ढा सरागदोसा बहू अत्थि || ४ || नामाइचउभेएहिं गुरुणो भणिया जिणिदमग्गंमी । तत्थ य नामठवणा-दव्वेहिं न को वि परमत्यो ॥ ५ ॥ भावेण सुद्धचरणो सुदंसणो तचमग्गकहणपरो । मूलत्तरगुणरयणेहिं भूमिओ संजओ साहू || ६ || व्वओ तिविहा वृत्तो मुदुवगरणोवएसपभिईहिं । सुद्धववहारजणओ लोयाणं पवयणमुहाणं ॥ ७ ॥ संतो पसंतचित्तो दंतो धीरो य परिसहाईहिं । कोहाईकारणे वि हु नो वयणसिरिं पलट्टेइ ॥ ८ ॥ इरिया १ भासा २ एसण ३ गहण ४ परिठ्ठवण ५ नामओ समिई। जयणाए चरणवित्ती असुभनिवित्ती तिहा गुत्ती ॥ ९ ॥ आलंबणकालमग्गण-जयणाचउमेयओ तहा इरिया । तत्थ तिहालंबणयं दंसणनाणे य चरणे य ॥ १० ॥ काण दिवसे वृत्ते मग्गे उप्पहवज्जिए । जयणा दव्वे खित्ते काले भावे तहा चउहा ॥ ११ ॥ कोहे १ माणे २ य माया ३ य लोहे ४ हासे ५ भए ६ तहा । मोहरिए ७ विगहास ८ सव्वहा उवउत्तया ॥ १२ ॥ एयाई अठ्ठठाणाई परिवज्जित संजए । असावज्जं मियं काले भासं भासिज्ज समिइओ ॥ १३ ॥ गासेसणा य गहणेस - णा परिभोगेसणा य जा । आहारोव हि सिज्जाए एए तिन्नि वि सोहए ॥ १४ ॥ ओहोहोपग्गहियं भंडगं दुर्विहं मुणी । गिण्हंतो निस्किवंतो य आयाणं निस्किवे विहिं ॥ १५ ॥ उच्चारं पासवणं खेलं सिघाणजल्लियं । आहारं उवहिं देहं अन्नं वा वि तहाविहं ॥ १६ ॥ सरंभसमारं मे आरभंमि तत्र य । मणं वयं तहा कार्य नियत्तिज्ज जयं जइ ॥ १७॥ helibrary.org Page #40 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध ॥१९॥ 66 पत्तं १ पत्ताबंधो २ पायठवणं ३ च पायकेंसरिया ४। पडलाई ५ रयत्ताणं ६ गुच्छओ ७ पायनिज्जोओ ॥१८॥ तिन्नेव य पंच्छागा १० रयहरणं ११ चेत्र मुहपत्ती १२ । तत्तो मत्तो य १३ खलु चउदसमो चोलपट्टो य १४॥१९॥ दव्वाइविभेएहिं जाणअजाणगदुब्बियहिं । पवयणमग्गं विसुद्धं तच्चं मग्गं परूवेइ ॥२०॥ इच्चाइगुणो साहू दबओ सो जणाण धम्मकरो । भावेण य मूलुत्तर-गुणसुतिमकसायाओ ॥२१॥ अप्पमत्तपमत्तगुण-ठाणठिओ पंचमहब्वयसमेओ। चरणकरणाइगुणगण-सयकलिओ नाणबलिओ य ॥२२॥ पाणिवह मुसावाए अदत्तमेहुणपरिग्गहे चैव । एयाई हुँति पंच उ महव्वयाई जईणं तु ॥२३॥ भू१ जल २ जलणा ३ निल ४ वण ५-बि ६ति ७ चउ८ पंचिदिएहिं ९ नव जीवा ॥ मणवयणकायगुणिया हवंति ते सत्तवीसंति ॥२४॥ एक्कासीइ य करण-कारणाणुमईहिं ताडिया होइ । सच्चिय तिकालगुणिया दुन्नि सया हुँति तेयाला ॥२५॥ जयणा य धम्मजणणी जयणा धम्मस्स पालणी चेव । तववृढिकरी जयणां एगंतसुहावहा जयणा ॥२६॥ कंचणमणिसोवाणं थंभसहस्सूसियं सुवण्णतलं । जो कारिज्जइ जिणहरं तओ वि तवसंजमो अहिओ ॥२७॥ जो य अहिंसाधम्मं नाऊण य जीवमेयसंगहणं । चेयणजुत्तो एगो १ दुविहा संसारे १ सिद्धा य २ ॥२८॥ तसथावरा वि दुविहा इत्थी १ पुं२ संढ ३ मेयओ तिविहा। भर १ तिरि २ नरय ३ सुरा ४ चउ अहवा वि अवेअगा चउरो ॥२९॥ इग १ बि २ ति ३ चउ ४ पंचिंदिय ५-रूवा पंचविह अणिदिएहि छहा ॥६। LA6A-966- For Private & Personal use only | Page #41 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अह भू. १ जल २ ग्गि ३ वा ४ निल ५-तस ६ सहिया हा ७ काय ते सत्त ॥ ३० ॥ अंडय १ रसय २ जराउय ३ - संसेइम ४ पोयया ५ समुच्छिमया ६ । उब्भिय ७ तहोववाइय ८-मेएणं अहा जीवा ॥ ३१ ॥ थावरपण ५ चउरतसा ४ नवविहा हुंति नारयनपुंसा १। सुरपुंथी २ तिरिमणुया तिवेय ६ सहियाहवा नवहा ॥ ३२ ॥ पुढवाइ अड ८ असण्णी १ सण्णी १ दस ते ससिद्ध इक्कारा ११ । अपज्जत्ता पज्जत्ता बारसहा भूतसंवाया ॥ ३३ ॥ वे अतत्त तेरस इगदुतिचउसुहुमियर अपज्जत्ता । सग्गी असण्णी पणिदि-पज्जता ते वि चउदसहा ॥ ३४ ॥ अतणुजुया ते पण्णरस अंडगपमुहा पंज्जत्तअपज्जत्ता । सोलस हवंति ते सिद्ध-संजुया सतरसपयारा ||३५|| पुव्युत्तनव दुगुणिया पज्जापज्जत्तमेष अठ्ठदस । सिद्धजुया गुणवीसं हवंति भेया हु जीवाणं ॥ ३६ ॥ पुढवाइदस अपज्जा पज्जत्ता हुंति वीससंखाए । असरीरजुया इगवीस भेया हु हवंति जीवाणं ॥ ३७॥ हुनियर भूजल ग्गीवा उवणाणंतदस सपत्तेया । वितिच असण्णिसण्णी अपज्जपज्जत्त बत्तीसं ॥ ३८ ॥ तह नरयभवणवण - जोइ कप्पगेविज्जणुत्तरुप्पणा । सत्तदसठ्ठयपणचारनवपण छप्पण्ण वेउव्वी ॥ ३९॥ ते नरतिरिसंगहिया हुंति हु अडवण्णसंखया सव्वे । पज्जत्तापज्जत्तेहि सोलसुत्तरसयं तेहि ॥ ४० ॥ सणिदुगहीणबत्तीससंगयं तं सयं तु छायालं । तं भव्वाभव्वगदूर- भव्वआसण्णभव्वं च ॥ ४१ ॥ संसारनिवासीणं जीवाण सयं इमं छचत्तालं । चउगुणियं पुणसययं चुलसीइजुयं हविज्ज सया ॥ ४२ ॥ अप्पाणं पिव सव्वं जीवयंवं च रस्कइ सया विं । सो साहू समयविऊ निद्दिट्ठो दव्वभावेहिं ॥ ४३ ॥ Page #42 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रकरण: संबोध ॥२०॥ सन्नीणं दसपाणा एगूणाऽसण्णिचउतिदु एगिदिए चउरो। चउपालीसं पाणा रस्कतो होइ चारित्ती ॥४४॥ भूजलजलणानिलवण घितिचउर पणिदि अजीवे य१०। . पेहु ११ प्पेह १२ पमज्जण १३-परिठ १४ मणतिय १७ असंजमं चयइ ॥४५॥ पंचमहव्वयधरणं ५ कसायचऊ ४ पंचइंदियनिरोहो५ । गुत्तितियं ३ इइ संजम सत्तरस भेया हवा बिति ॥४६॥ एवं पढममहव्वय-मणेगहा पालए जहा जीवं । मरणंते वि न पीडा करेइ मणसा तयं गच्छं ॥४७॥ संकप्पाइतिएणं मणमाईहिं तहेव करणेहिं । कोहाइचउक्केण परिणामढ़त्तरसयं च ॥४८॥ . भासइ न सयमसच्चं न य अण्णं भासवे समाजाणे । दव्वाइचउक्केण वि जावज्जीवं खु ते मुणिणो ॥४९॥ चउरो भासा सच्चा १ मुसा २ य सच्चामुसा ३ असचमुसा ४ । तत्थ न दो भासिज्जा पढमचउत्थी य भासिज्जा ॥५०॥ कारणजाए चउरो वि परं खु भूओवधायिणी नेव । सच्चा वि न वत्तव्वा घायकरी संजमप्पाणं ॥५१॥ जणवय १ सम्मय २ ठवणा ३ नामे ४ रूवे ५ पडच्च ६ ववहारे भावे ८ जोगे ९उवम्मसच्चे १० सच्चा भवे दसहा॥५२॥ कोह १ माण २ माया ३ लोह ४-पेज्ज ५ तह दोस ६ हास ७ भी ८ अभरूकाइ ९। उवघाइयाओ १० दसमा मोसा भासा न बत्तव्वा ॥५३॥ उम्पण्ण १ विगय २ मीसग ३-जीवा ४ जीवे ५ अ उभयभिस्सा य ६। मिस्साणंत ७ परित्ता ८-अद्धा ९ अद्धद्ध १० सञ्चमुसा ॥ ५४॥ आमंतणि १ आणवणी २ जायणी३ पुच्छणीय ४पन्नवणी ५। पञ्चलकाणी ६इच्छा-णुलोमभासा ७अणभिग्गहिया८॥५५॥ ॥२०॥ For Private & Personal use only Page #43 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अभिम्महणी ९ सय-करणी १० वोगडगा ११ अबोकडा १२ भासा। एया असच्चामोसा बारसभेया पवित्तिधरा॥५६॥ - कालतियं ३ वयणतिय ३ लिंगतिय ३ तह परोस्कपच्चरकं २ । उवणय १२ विवज्जय १३ अवभाव १४ अवणय १५ मझत्थसोलसमं १६ ॥५७॥ इइ सोलसवयणेहि जुग्गाजुग्गं च संपरिस्काए । गुरुनिद्देसगओ मुणि पवयणसारं परिकहेइ ॥५८॥ जो हेउवायनिच्छयवहारपभिइसत्तनमजुत्तं । जो देइ उवएस सिद्धतविराहओ अण्णो ॥५९॥ साभिय १ जीवादत्तं २ तित्थयर ३ गुरु ४ अदत्तमिह चउहा । मणसा वि न पत्येइ दव्वाइमेयओ चउहा ॥६॥ संरंभो संकप्पो परिताबकरो भवे समारंभो। आरंभो उद्दव्यओ सुद्धनयाण सयलवत्थु ॥६१॥ अहदसभेयचंभ मणवपकाएहिं करकारणअणुमईहिं । दिवोरालिय नवनव तिकालमज्जत्यि नो इच्छे ॥६२॥ कामो चउवीसविहो संपत्तो खलु तहा असंपत्तो । चउदसहा संपत्तो दसहा होज्जा असंपत्तो ॥६३॥ तत्थेह असंपत्तो इच्छा १ चिंता २ य सद्ध ३ संभरणं ४ । विक्कवय ५ लज्जनासो ६ पमाय ७ ओम्माय ८ तप्भावो ९॥६॥ मरणं च होइ दसमो १० संपत्तं पिय समासओ वोच्छं । दिठ्ठीए संपाओ१ दिठ्ठीसेवा य २ संभासो ३ ॥६५॥ हसिय ४ ललिय ५ उबगहिय ६ दंतनह ७ निवाय ८ चुंबणं ९ चेव। आलिंगण १० मादाणं ११ कर १२ सेवण १३ णंगकीडा य १४ ॥६६॥ इचाइमेयभिण्णं मेहुणकिच्चं न पत्थए कइया । नवहा य बंभगुत्तिसत्तीहिं सव्वसंगहि ॥६॥ बसहि १ कह २ निसिजि ३ दिय ४-कुटुंतर ५ पुयकीलिय ६ पणीये । For Private & Personal use only Page #44 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध प्रक० ॥२१॥ अइमायाहार ८ भूसण ९ नवगुत्ती बंभचेरस्स ॥ ६८। जो देइ कणयकोडर्डी अहवा कारेइ कणयजिणभवणं । तस्स न तत्तिय पुण्णं जत्तिय बंभवए धरिए ॥६९॥ सोलं कुलआहरणं सीलं रूवाण उत्तम रूवं । सीलं चिय पंडित्तं सीलं चि य निरूवम धम्मं ॥७॥ सीलं उत्तमवित्तं सील कल्लाणकारणं परमं । सीलं सुगइनिमित्तं सीलं आयारनिहिठाण ॥७१॥ जइ ठाणी जइ मोणी जइ मुंडी वक्कली तवस्सी वा । पत्थंतो वि अबंभं बंभा वि न रोयए मझं ॥७२॥ इत्थीण जोणिमझे गभगया चेव डंति नवलस्का । इक्को व दो व तिण्णि व गन्भपुहुत्तं च उक्कोसं ॥७३॥ इत्यीण जोणिमझे हवंति बेदिया असंखा य । उप्पज्जति चयंति य समुच्छिमा जे ते असंखा ॥४॥ उउकाले ते सव्वे पायं पावाण जीवभवणं च । तम्हा जे धीरनरा धरंति बंभव्वयं लट्ठ ॥७५॥ .. त्यीसंभोगे समग तेसि जीवाण हुँति उद्दवणं । रूयगनलियाजोगप्पओगदिळूतसम्भावा ॥७६॥ सव्ववयाण वि भूसाकरणं सीलं जिणेहिं निद्दिष्ठं । न चलंति विसयहालाहलेण जे ते महासत्ता ॥७॥ त्यीसंगरूबपासण-पभिइसम्वं मुणीण पडिसिद्ध । अत्तहियसुविहियाण बंभ तणुभूसणं परमं ॥८॥ जहा कुक्कुडपोयस्स निच्च कुललओ भयं । एवं खु बंभयारिस्स त्यीसंगाओ महाभयं॥७९॥ पुरिसासणमि इत्यी जामतिग जाव नोपवेसेइ । त्यीआसणमि पुरिसो अंतमुहुत्तं विवज्जिज्जा॥८॥ अबंभचरियं घोरं परिया चेव दारूणं । तम्हा मेहुणससग्गि निग्गंथा वज्जयंति णं ॥८१॥ भंडोवगरणदेह-प्पभिईसु गामदेससंघेसु । नो कुव्विज्ज ममत्तं कयावि सो समणगुणजुत्तो ॥२॥ Mu२१॥ Page #45 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दवाईचउविहेसु परिग्गहेसु न करेइ पडिबंधं । बंदणपूयणसक्कारे सरिसो माणावमाणेसु ॥८३।। दवाईचउविहेहिं असणाईसु चउबिहेसु सब्वेसु । नो संनिहिपबंधं कुव्वइ भिस्कू वि कारणओ ॥४॥ निच्च सझायरया सुहझाणा एवमाइगुणकलिया। विहरंति जत्थ निययं तं मुणिगच्छं सुविहियं च ॥८५॥ जत्थ गणे आयरिओ उवझाया थिरपवत्तया मुणिणो । रायणिया पंचावि हु गुणरयणविभूसिया गच्छे ॥८६॥ कत्थ अम्हारिसा जीवा दूसमादोसदूसिया । हा अणाहा कहं हुंता न हुँतो जइ जिणागमो ॥८॥ पवयणरयणनिहाणा सूरिणो जत्थ नायगा भणिया । संपइ सव्वं धम्मं तयहिठ्ठाणं जओ भणियं ॥४८॥ कइयावि जिणवरिंदा पत्ता अयरामरं पहं दाउं । आयरिएहि पवयणं धारिज्जइ संपयं सयलं ॥८९।। पडिरूवाई चउदस खंतिमाइयदसविहो धम्मो । बारस य भावणाओ सूरिगुणा हुंति छत्तीसं (१)॥९॥ पंचिंदियसंवरणो तह नवविहबंभचेरगुत्तिधरो । तह चत्तचउकसाओ अट्ठारसगुणेहिं संजुत्तो ॥११॥ पंचमहव्वयजुत्तो पंचविहायारपालणसमत्थो। पंचसमिइतिगुत्ति-गुत्तो छत्तीसगुणकलिओ (२) ॥१२॥ विहिपडिवण्णचरित्तो गीयत्थो वच्छलो सुसीलो य । सेवियगुरुकुलवासो अणुयत्तिपरो गुरू भणिओ ॥१३॥ देसकुलजाईस्वी संघयणी धिइजुओ अणासंसी । अविकंथणो अमाई थिरपरिवाडी गहियवक्को ॥१४॥ जियपरिसो जियनिहो मझत्थो देसकालभावन्नू । आसण्णलद्धपइभो नाणाविहदेसभासण्णू ॥९५॥ पंचविहे आयारे जुत्तो सुत्तत्य तदुभयविहिन्नू । आहरणहेउउवणयणयणिउणो गाहणाकुसलो ॥१६॥ ससमयपरसमयविऊ गंभीरो दित्तिभं सिवो सोमो । गुणसयकलिओ एसो पवयणउवएसओ सुगुरू ॥९॥ RRRRR२८९ Jain Education na Page #46 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध ॥२२॥ अकृविहा गणिसंपय आयाराई-चउविहि विकी। चउहा विणयपवित्ती छत्तीसगुणा इमे गुरुणो (३) ॥१८॥ सम्मत्तनाणचरणा पत्तेयं अअमेइल्ला । बारस भेओ य तवो सूरिगुणा हुंति छत्तीस (४) ॥९९॥ आयाराइ अकृओ तह चेव य दसविहो ठिइकप्पो । बारस तक छावस्सय सूरिगुणा हुँति छत्तीस (५) ॥१०॥ अठदसपावठाणेहि पडिचत्तो बारभिरूकुपडिमधरो । छव्वयरख्कणधीरो सूरिगुणा हुँति छत्तीस (६) ॥१०१॥ दुगवीसपरिसहसहो चऊदसभूयगामरख्कणपरो य । छत्तीसं सूरिगुणा एए भणिया जिणिदेहि (७) ॥१०२॥ चउक्कं सारणसिकाइ ४ दाणाइ धम्म ४ झाणमिक्किकं । चउमेयं १६ बारभावण १२ उवएस परो य छत्तीसे (८)॥१०॥ चरण ५ वय ५ समिइ ५ आयार ५ सम्मत्त ५ सझाय ५पंच ववहारा ५। संवेगिक १ अलंकिय-देहो छत्तीस गुणकलिओ (९)॥१०४॥ इंदिय ५ विसय ५पमाया ५-सव ५ निदा ५ दुठभावणा ५ चत्तो। छज्जीवकायजयणा-निरओ ६ छत्तीसगुणकलिओ (१०) ॥१०५॥ लेसा ६ वस्सय ६ दव्वाणि ६वयण ६ दोसा ६ तहा य छप्भासा ६ नागगुणेण सुगेड एवं छत्तीसगुणकलिओ (११)॥१०६ पिंडेसण ७ पाणेसण ७ भय ७ सुह ७ सत्ताइ अठ्ठमयठाणा ८ । एवं छत्तीसगुणा सूरीणं हुंति सव्वद्धा (१२) ॥१०॥ दंसणनाणचरित्ता-याराइयार अयं अठ्ठ । गुरुगुणजुत्ता चउसुद्धि-कलिओ ४ छत्तीसगुणजुत्तो(१३) ॥१०८॥ अटुंगजोग ८ अडसिद्धी ८ अडदिछी ८ अठ्ठकम्म८ विनाणो। दवाइचउअणुओग-धरो ४ गुणा हुंति छत्तीस (१४)॥१०९॥ नवपावनियाणाइ ९-वारओ नवविहा य बंभधरो ९ । कयनवकप्प विहारो ९ नवतत्त ९ छत्तीसगुओ (१५) ॥११॥ २२॥ Jain Education Welational Page #47 -------------------------------------------------------------------------- ________________ REC ACCOUSE SASRUSSEL वैवाय १० असंबर १० संकिलेस १०-दसगं हासाइ छक्क६ मुझित्ता । जिणसासणपवत्तो छत्तीसगुणो हवइ सूरी (१६) ॥ १११ ॥ सामायारी दसहा कहेइ १० दसगं समाहिठाणाणं १० । उझियकसापसालस १६ एवं छत्तीसगुणकलिओ (१७)॥११२॥ चउरो समाहिठाणा इकिको चउर १६ सोहिअसणस्स। दसगे १० दसपडिसेवा १०-वजिओ टुति छत्तीसं (१८)॥११३॥ मुणिधम्म १० विगय १० वेया-पच्चं १० दसगं सया परिवहइ। वज्जिय छअकप्पो ६ एवं छत्तीसगुणतो (१९)॥११४॥ रुइदसग १० च दुसिल्का २ सदिठिवायंग १२ तह उबंगाणि १२। । बारस बारस छत्तीस एवं सूरीण गुण संखा (२०) ॥ ११५ ॥ इक्कारस गिहिपडिमा११ बार व्यय १२ तेर किरियठाणाणि १३ जाणंतो बज्जतो छत्तीसगुणो य आपरिओ(२१)।।११६॥ दसविहपायच्छित्तं १० उपभोगा बार १२ चउदउवगरणा १४ विहिणा पडिवज्जमाणो छत्तीसगुणोहररी (२२)॥११७॥ भावण १२ तव १२ मुणिपडिमा १२ बारस मेया भवंति तिगुणिज्जा। एवं छत्तीसगुणो गुरुबुद्धीए पणमियबों(२३)॥११८॥ अंडाइअट्ठसुहमाणि ८ गुणटाणाणि तहेव चउदस य १४। पडिरूवाइ चऊदस १४ सूरिगुणा हुँति छत्तीसं (२४)॥११९॥ गारव ३ सल्लाण ३ तियं पन्नरस सन्ना य १५ जोय पन्नरस १५॥ एवं छत्तीसगुणा आयरियो जो सया मुणइ(२५)॥१२०॥5 सोलस उग्गमदोसा १६ सोलस उप्पायणाइ जे दोसा १६। दव्वाभिग्गह चउक्कं ४ एवं छत्तीस सूरिगुणा (२६)॥१२१॥ सोलस वयणा १६संजम-सत्तरस मेया १७विराहणा तिनि। एवं छत्तीस गुणा-लंकिअतणु होइ आयरिओ (२७)॥१२२॥ अठारस पुरिसंमि चरणअजुग्गाण १८ देइ नो चरणं । पावठाणाणि अहार १८ वज्जणो होइ उत्तीसं (२८)॥१२३॥ E CIES For Private & Personal use only Page #48 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध ॥ २३ ॥ अट्ठारसविह बंभ १८ घरेइ सीलंगरह सहस्साणं । अठ्ठारसगं वसग्गं १८ सूरिगुणा हुंति छत्तीस (२९) ॥ १२४ ॥ गुणवीसं दोसाणं काउस्सग्गस्स १९ सतर मरणाणि १७। भासइ चयइ जहाणं सूरिगुणा हुंति छत्तीस (३०) ॥१२५॥ मिच्छत्तं १ असमाहि-ठाणा वीसं २० च मंडलीदोसा | पण ५ दस एसणदोसा २० छत्तीस हुंति सूरिगुणा (३१) ॥ १२६॥ इगवी तह सबला २१ सिख्कासीलाण पंचदसठाणा १५ । एवं छत्तीसगुणा सूरीणं गुणगणढाणं (३२) ॥१२७॥ मिच्छत्तं वेयतियं छक्कं हासाइ कसायचउक्कं च । चोदसभिंतरगंठी १४ परीसहदुगवीस २२ छत्तीस (३३) ॥१२८॥ मुणगुणसत्तावीस २७ नवकोटिविसुद्धमसणमाईणं । एवं सूरिगुणाणं छत्तीसं होइ निश्चमिणं (३४) ॥ १२९॥ पडिलेहणपणवीसं २५ छक्कायविराहणाणमुझवणं ६ । वेईयाइपणगं ५ सुद्धं छत्तीसयं गुरुओ (३५) ॥१३०॥ बत्तीसजोगसंगहगुणकलिओ ३२चउप्पयारभावेहिं । आयरणा संभासणा वासणा पयट्टणाहिं ४ च ( ३६ ) ॥ १३१ ॥ लड़ीणं अडवीसं २८ अठ्ठेव पभावगाण पुरिसाणं ८। एवं छत्तीसगुणा गुरूण सययं मुणेयव्वा (३७) ॥ १३२ ॥ गुणतीसपावसुयस्स पसंगवज्जं २९ च सत्त सोहिगुणा ७ । एवं छत्तीसगुणा गुरूण सययं मुणेयव्वा (३८) ॥१३३॥ अभिंतरिओ छक्कं ६ तीसं ठाणाणि मोहणिज्जस्स ३० । छत्तीसं सूरिगुणा णायव्वा निउणबुद्धीहिं ( ३९ ) ॥ १३४ ॥ इगतीसं सिद्धगुणा ३१ पणगं नाणाण ५ मित्थ छत्तीसं । सूरिगुणाणं एवं धारेयव्वं सया हियए (४०) || १३५ ॥ दिव्वाइउवसग्गा चउरो ४ सहए सया विद्युद्धमणो । बत्तीसं ३२ जीवमेयाणं जाणइ एवं खु छत्तीसं (४१) ॥ १३६ ॥ तह विगहाण चक्कं ४ बत्तीसं वंदणस्स दोसाओ ३२ । निञ्चं चयइ सहावा सूरिगुणा इंति छत्तीस (४२) ॥ १३७॥ | प्रक ॥२३॥ Page #49 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आसायणतित्तीसं ३३ वीरियायारस्स तिगमगृहंतो३ । एवं सूरिगुणाणं छत्तीसं वणियं सच्च(४३ )॥१३८॥ पणवीसं भावणाई भाविल्लो २५ पंचमहब्वयाईणं । इक्कारसंगधारी ११ सूरिगुणा इंति छत्तीस (४४) ॥१३९॥ तह बारसंगधारी पइण्णदसय छछेय चउमूलं । नंदी अणुओगधरो अरागदोसेहिं छत्तीस (४५) ॥१४०॥ नाणमि य दंसण मि य चरणमि तवमि तहय वीरियं मि । करणकारणाणुमइमेएहि हुंति पण्णरसं १५ ॥१४१॥ द्रसविहसामायारीकुसलो १० पणसमिय ५ पंचसझाओ ५ । अपमत्तेग १ गुणेहि कुणइ सया सूरि छत्तीस (४६) ॥१४२॥ अठ्ठ य पवयणमायाओ८ सुहदुहसेज्जाण अठ्ठ ८ तिविहसच्च३। छप्भासा ६ झाण दुर्ग २ सत्तविभंग ७ दुधम्म २ छत्तीसं (४७)॥१४३॥ इच्वाइअणेगगुणगण-सयकलिओ सुविहियाण हियजणओ। आयरिओ सुपसत्थो गच्छे मेढीसमो भणिओ ॥१४४॥ मूलुत्तरगुणसुद्धो सदब्वभावहिं पवयणुक्वरिसो। होइ गुरुगीयत्यो उज्जुत्तो सारणाईसु ॥१४५॥ सो जिणसासणपासायपीढपायारसंनिहो भणिओ। तस्स कुतित्थिगयेहि हवइ न लहुयत्तणं किमवि ॥१४६॥ सो भावसूरि तित्थयर-तुल्लो जो जिणभयं पयासेइ । जिणमयमइक्कमंतो सो काउरिसो न सप्पुरिसो ॥१४७॥ हिंडइ नो भिस्काए तित्थयरो तित्थभावसंपत्तो। तहिं जाइन भिख्कठा सूरी वत्थासणाईणं ॥१४८॥ जं समए जावईयं पवयणसारं लहेइ तं सव्वं । अरिहमिव तहावाई सुद्धं निस्संसओ सध्वं ॥१४९॥ जह अरिहा ओसरणे परिसाइ मझटिओ पढमजामे । वस्काणइ सो अण्णं सूरी वि तहा न अन्नत्य ॥१५॥ जह तित्थगरस्साणा अलंधणिज्जा तहा य सूरीणं । न य मंडलिए भुंज तित्थयरो तहाय आयरिओ ॥१५॥ SECCCCCCCCk Jain Education rational For Private & Personal use only w el elibrary.org Page #50 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गोव २४ ॥ सवेसि णिज्जो तित्थरो जह तहा य आयरिओ । परिसहवग्गे अभीओ जिणुव्व सूरी वि धम्मक ॥ १५२ ॥ - fies न लोगकज्जं विकत्थणं कुणइ नेव संलावं । इक्को चिठ्ठइ धम्म-झाणे निस्संगयारत्तो ॥ १५३ ॥ एवं तित्थयरसमं नवहा सूरीण भासियं समए । तस्साणाए वट्टण-मुब्भावणमित्य धम्मस्स ॥ १५४ ॥ आगाए तो आणाए संयमो तह य दाणमाणाए । आणारहिओ धम्मो मुणीग भणिओ तहा असारो ॥ १५५ ॥ जहतुसखंडणमयगंडयाणि रुइयाणि सुण्णरणमी । विहलाइ तहा जाणसु आणारहियं अणुट्टाणं ॥ १५६ ॥ आणाखंडणकारी जइ वि विशुद्धं करेइ आहारं । धम्मोवएसकरणाइ-विहलं सव्वं अठ्ठाणं ॥ १५७॥ सोविअरिहदेव सुगुरु गुरू भणइ नामभित्तेण । तेसि सुद्धसरुवं पुण्णविहुणा न पार्वति ॥ १५८ ॥ वेसि सेवासंग दूरट्टियमेव कालदोसाओ । तेसिं सुद्धसरूवस्स जाएा मवि दुल्लह लोए ॥ १५९ ॥ ते घण्णा कयपुण्णा ताकपत्थं सुजीवियं जम्मं । जे सुगुरूण सरूवं लहति वंदंति झायति ॥ १६० ॥ जत्य यतित्ययराणं उसहाई सुरिंदमहियाणं । आण नाइक्कमइ त गच्छ भावसूरिपहुं ॥ १६९ ॥ जय अज्जाहिं समंधेरा वि न उल्लवंति गयदसणा । नय झायंती त्यीण - मंगोवंगाइ तं गच्छं ॥ १६२ पुढविदगअगणिमारुय (तह) वणप्पइतसाण विविहाणं । मरणंते वि न पीडा करेइ मणसा तयं गच्छं ॥ १६३ ॥ एवारिस आयरिओ जत्थ गणे एरिसो वि ओज्झाओ । पवयणमंदिरखंभु-ग्गयवेइयसंनिहो जाण ॥ १६४ ॥ पसमो पसन्नवणो विहिणा सव्वाण झावणाकुसलो | आयरियवयणपालण - तप्परो परमकज्जधरो ॥ १६५ ॥ पणवीस गुणसमेओ विसेसओ सञ्चकज्ज सबवओ । संघाइयाण कज्ने उज्जुत्तो दडपइन्नो य ॥ १६६ ॥ प्रक० ॥२४॥ Page #51 -------------------------------------------------------------------------- ________________ HEALYAN छक्कारस अंगाइ ११ चऊइस पुष्वाई १४ जो अहिजेइ । अझावेइ परेसिं पणवीसगुणो उवझाओ (१)॥१६॥ इक्कारसंगधारी ११ बारउवंगाणि १२ जो अहिज्जेइ । तह चरण १ करण १ सत्तरी धरावइ धरइ पणवीस (२)॥१८॥ नाणसासायण चउ-दसावि १४ न करेइ न कारवेइ परेसिं। इक्कारस सुवण्णगुणा ११ वस्काणइ एवं पणवीस(३)॥१६९॥ तेरस किरिया ठाणाणि १३ दवछक्कं ६च कायछक्कं ६च(४)। चऊदस गुणठाणाणि१४पडिमा सट्टाण इक्कार ११(५)॥१७०॥ पंचमहव्वयपणवीसभावणाओ धरिजइ सयावि (६)। तह असुहभावणाओ पणवीसं चयइ चाएइ (७) ॥११॥ अड ८ सतरमेयपूजा १७ परूवइ पण्णवीयभासाहि (८)। चउहा पडिवत्तीए ४ पूयामेयावि इगवीसं २१ (९)॥१७२॥ इंदियत्थाण वीसं तिगसहियं २३ सुह १ अशुह १ रागदोसेणं । नो गिण्हइ पणवीस गुणा इमे वायगाणं च(१०)॥१७३॥ इगवीसं खलु भेया भिच्छत्तस्स य परूवणा तेसिं । चउविह संघे कीरइ पणवीसं वायए निच्च (११) ॥१७॥ भूयग्गामा चऊदस १४ अडभंगीमुणणधरणपालणया ८। अंगग्गभावपूयामेयतियं ३ होइ पणवीस (१२)॥१७५॥ तहणंत ८ पुग्गलपरियट्टाणं८ अडअड नवनियाणाई ९(१३) तत्त नव ९खित्तनवगं ९नयसत्तगमेवपणवीसं(१४)॥१७६॥ निस्केवा ४ अणुओगा ४ धम्मकहा ४ विकह ४ दाणधम्माइ४। चउरो पण ५कारण-मेव गुणा हुंतिपणवीस (१५)॥१७७॥ नाण ५ ववहार ५ सम्म ५ पवयण अंगाणि ५ तह पमायाय ५। पणपणगं पणवीसं परूवई वायगस्स गुणा(१६)॥१८॥ बारसवय १२ रुइदसगं १० विहिवायतियं ३ च होइ पणवीसं (१७)। हिंसा ३ऽहिंसाणतियं ३ उस्सग्गदोसाण गुणवीसं १९ (१८)॥ १७९ ॥ आयापवयणमायामयहाणाणित्ति अडलिग २४. सद्धा? । एवं पणवीसगुणा. (१९) सढाण गुणा य इगवीसं २१ ॥१८॥ Page #52 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध चउरो वित्तिपवत्तण-मिइ पणवीस (२०) अतत्त ३ तत्ततिगं३। गारव ३ सल्ल ३ छलेसा ६ दंडतिगं ३ कारणचउक्कं ४ (२१)॥१८१॥ अरिहंतज्जणठाणा वीसं २० आयारपणग ५ पणवीसं (२२)। अरिहंतसिद्धगुणया बारस १२ अड ८ भत्तिएगत्तं (पणगत्तं ५) (२३) ॥१८२॥ सिद्धा पन्नरस भेया १५ दसतिग १० सहिया हवंति पणवीस (२४)। आगार सोलसत्ति १६ नवहा संसारिणो जीवा ९ (२५) ॥१८३॥ असणाईण दोसा दसग उप्पायणस्स सोलसगं (२६) । एवं पणवीसीओ हवंति तह वायगगुणाणं ॥ १८४॥ इच्चाईगुणकलिओ विसुद्धजिणमयपरूवणाकुसलो । नयनिउणोबझाओ परमप्पाणं वियावेइ ॥१८५॥ सम्मत्तनाणसंजम-जुत्तो सुत्तत्थतदुभयविहिण्णू । आयरियठाणजुग्गो सुत्तं वाए उवझाओ ॥ १८६ ॥ थिरसंघयणी जाइ-विसिठ्ठकुलवं जिइंदिओ भद्दो। नोहीणअंगुवंगो नीरोगी वायणादरको ॥१८॥ गुरुदत्तपरममतो दिरकोवठ्ठावणापइठ्ठासु । दरको लरकगुणेहिं संजुओ वायगो भणिओ ॥१८८॥ थिरकरणा पुण थेरो पवित्तिवावारिएसु कज्जेसु । जो जत्थ सीयइ जई संतबलो तं थिरं कुणइ ॥ १८९॥ सम्मत्तनाणचरणा-इसु वत्थाईसु तह विहारेसु । सब्वेसु सहायत्तं किच्चा संजमथिरो कुणइ ॥१९०॥ तवसंजमजोगेसु जो जोगो तत्थ तं पवत्तेइ । असुहं च निवत्तेइ गणतत्तिल्लो पवित्तीओ॥१९१॥ संघस्सावि पवत्तइ आयरियाईहि जुजिओ संतो। बच्छल्लपभावणाइसु महत्तकारी पवित्तीओ ॥ १९२॥. समय For Private & Personal use only Page #53 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संपुणगजोगवाही कालंग्गहणप्पभिइअणुटाणो । उज्जमइ उज्जमावइ जहजुग्गं सो गणी गच्छे ॥१९३॥ उठ्ठावणा पहावणा खित्तोव हिमग्गणेसु अविसाई। सुत्तत्थतदुभयविऊ गुणसिद्धो एरिसो अगणी ॥१९४|| ए पंचावि पयत्था लघुपज्जाया वि अवमरायगिया । पज्जायजिसामन्नसाहूणं वंदणिज्जा य ॥१९५॥ सामन्नत्तं गुरुकयपयमत्तमविरिकऊण विण्णेयं । सामन्ना अवि मुणिणो-गुणरयणकरंडगम्भूया ॥१९६॥ जत्थ य पंच इमे वि नत्थि गणे सो हु पल्लिसारिच्छो । सम्मत्तरयणहरणे भव्वाण भवन्भमणसीलो॥१९७॥ तत्थ न मुहुत्तमित्तं वसियव्वं सुविहिएहि साहूहि । जइ सामण्णा मुणिणो ना गुणिणो वओ वरं गेहं ॥१९८॥ छब्बय ६ छकायररका १२ पंचिंदिय १७ लोहनिरंगहो १८ खती १९ । भावविसुद्धी २० पडिलेहणाइकरणे विसुद्धी य २१ ॥ १९९ ॥ संयमजोए जुत्तो२२ अकुसलमणवयणकायसंरोहो २५। सीयाइपीडसहणं २६ मरणं उवसग्गसहणं च २७ (१) ॥२०॥ सत्तावीसगुणेहिं अन्नेहिं जो विभूसिओ साहू । जिणपासायपवेसे दुयारसमो रम्मगुणनिवहो ॥२०१॥ उरग १ गिरि ... ... ... ... ... ... ... ... ॥२०२॥ ... ... ... .. ... ... ... ... ... ... ...(२) ॥२०३॥ पंचमहव्ययभावण-भाविल्लो २५ दव्वभाव २ मेएहि २७ (३)। पणवीस मसुह भावण-मुझइ २५ तह रागदोसेहिं २२७ (४) ॥२०४॥ दस समणधम्म १० बंभ-अयगुत्ती ९ असमयमायाओ८धारेइ सगवीसं २७ निचमुज्जु य ववहारे (५) ॥२०॥ For Private & Personal use only Page #54 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबधि क. ॥२६॥ सुहझाणदुगचउक्कंगनाणाइतियं ३ च मित्तीचउक्कं च । इक्विकं चउमेयं १६ इय सँगवीसं सयां धरइ २५६)॥२०६॥ असुहझाणदुगस्स चउक्कगं ८ तह कसाय सोलसगं १६ । नाणाइविराहणतिगं ३ इई संगवीसं २७ सया चयइ(७)॥२०७॥ पिंडेसण ७ पाणेसण ७ सत्तिकासत्त ७ असुहछब्भासा ६। धारेई २१ चयइ निच्चं सगवीसगुणा२७ मुणीणं च (८)॥२०॥ सच्चवयणाण दसगं १० संजममेया हवंति सत्तरस १७ । एवं सगवीसगुणा ३.७ मुणीणं मुरकत्थिपवरीण (९)॥२०९॥ बझम्भितरमेएण बारसमेओ तवो १२ य कामो वि । चउदसविहो १४ असंजम-निग्गहो? होइ सगवीसं (१०)॥२१०॥ दसदोसा एसणस्स १० दोसा उप्पायणस्स सोलस वि १६।अगिद्धीभावजुत्तो १ सगवीस गुणा इमे मुणिणो २७(११)।।२११॥ उग्गमदोसा सोलस १६ पण आसव ५ मंडलीए ५ मणसहिया १ । एवं गुणसगवीसं साहूणं भावसाहूण २७ (१२)॥२१२॥ पन्नरस सिरकाठाणाणि १५ भिरकुपडिमाण बार १२ सगवीसं ३७ (१३)। वसहिदोसपमायमयअडतिय २४ गारवतियं ३ च.२७ (१४) ॥२१३॥ दस विणय पंचवरणाणि बारसमेया असच्चमोसाए २७ (१५) । अंगोवंगाभिग्गह एवं सगवीस २७ साहुगुणा (१६) ॥२१४॥ सामायारी दसहा १० इच्छाइ तहावस्सयाइदसगंच १०। सिरकादुगर सझाओ पणहा५ इय होइ सगवीसं२७(१७)॥२१५॥ सीलंगरहसहस्साणं अठारसगं १८ नियाणनवगं च ९। असुहाणमुझणयं सगवीसं २७ हुंति साहुगुणा (१८) ॥२१६॥ | अपसत्थलेसतियगं ३ अठ्ठारसभेयबंभचरियं च १८ । सल्लतियं ३ दंडतियं ३ सगवीसं २७ हुंति साहुगुणा (१९) ॥२१॥ पडिलेहण८ गोयरीओ८ दिछीओ८ अडतियेणचउवीसं२४।मुपसत्यलेंसतियग ३ सगवीसगुणा२७धरिज सया(२०)॥२१८॥ M२ For Private & Personal use only Page #55 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भावण १२ सिज्जचउक्कं सुहं ४धरेइ चइज्ज भयसत्त ७ दुहसेज्ज चउक्कं ४ पुणं सगवीसगुणा २७मुणिवराण(२१)॥२१९॥5 दस पच्चरकाण १० विगई-गारस ११ छावस्सया य ६ सगवीसं २७ (२२)। दिव्वाइ चउ ४ छुहाइ-बावीसं परिसहा २ धिइए १२७ (२३)॥ २२० ॥ जिण १ थेरकप्प २ दुविहा आचेलुकाइदस १० एण चरितं ५। पायच्छित्तं दसहा १० सगबीसगुणा २७ मुणीणं च (२४) ॥२२१॥ वीसमसमाहिठाणाणि चयइ तह सत्तगं बिभंगस्स । एवं सगवीसगुणा मुणिहि मणसा न झायव्वा (२५) ॥२२२॥ इगवीसं सबलाणं २१ करण मईहि २ असंवरचउक्कं ४। एवं सगवीसगुणा १७ मुणीहिं मणसा न झायव्वा (२६)॥२२३॥ भू१ जल २ जलणा ३ निल ४ वण ५-मिय साण ६ रासहे ७ कुकुडाचकरा ९। दीवग १० सुवण्ण ११ मुत्ता १२ हंस १३ बुय १४-पोय १५ सिरिफलया १६ ॥२२४॥ तह वंस १७ संख १८ तुंबय १९-चंदण २० गुरु २१ मेह २२ चंदसारिच्छा २३ । वसह २४ गयंद २५ मयंदा २६ दिणयरतेया २७ सया मुणिणो(२७) ॥२२५॥ इच्चाइणेगगुणगणनिवियठप्पयारकम्मगणा । तिक्कालं पणमिज्जा ते मुणिणो अत्तहरिसेण ॥२२६॥ गीयत्था संविग्गा निस्सल्ला चत्तगारवासंगा । जिणमयउज्जोयकरा सम्मत्तपभावगा मुणिणो ॥२२७॥ उस्सग्गमग्गनिरया बीयपयनिसेविणो वि कारणओ। तो पुण मूलगुणमि उत्तरगुणेसु विसइ कइया ॥२२८॥ पवज्ज संपत्तं सिरकं सुपरिस्किऊण कुलवंता । गिहिवासे वि असंगा ते साहु चरित्तभद्दकरा ॥२२९॥ 664CTOR SACROSC+CKASSI wwwwinebrary.org Page #56 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध प्रक ॥२७॥ वय ५ समणधम्म १० संजम १७ व्यावच्च च १० बंभगुत्तीओ ९। नाणाइतिय ३ तव १२ को-ह निग्गहाइ ४ चरणमेयं ७० ॥२३०॥ पिंडविसोही ४ समिई ५ भावण १२ पडिमा य १२ इंदियनिरोहो५। पडिलेहण २५ गुत्तीओ ३ अभिग्गहा ४ चेव करणं तु ७० ॥२३१॥ मसिाइसत्ता पढमाबियतइयसत्तराइदिणा १० । अहोराइ ११ एगराई १२ भिरकुपडिमाण बारसगं ॥२३२॥ पढमाए एगमासो पवढमाणीओ सत्तमीसत्त । सत्तदिणकृमिनवमीदसमी १० अहराइ ११ इगराइ १२ ॥२३३॥ इरियासमिए १ सया जए उवेह मुंजेह व पाणभोयण २। आयाणनिरकेवदुगच्छ-संजए ३ समाहिए ४ संजए मणोवई ५॥२३४॥ अहस्स सच्चे १ अणवीइभासए २ जो कोह ३ लोह ४ भयमेव ५ बज्जए । सदीहरायं समुपेहिया सया मुणी हु मोसं परिवज्जए सया ॥२३५॥ सयमेव उग्गह जायणे १ पुणो मइमं निसंम २ सइभिरकुउग्गहं ३।। अणुन्नवीय/जियपाणभोयणं ४ जाइत्ता साहम्मीयाण उग्गहं ५ ॥२३६।। आहारगुत्ते १ अविभूसियप्पा २ इत्थि न निझाइ ३ न संथवेज्जा ४ । बुद्धे मुणी खुडकहं न कुज्जा ५ धम्माणुपेही संधए बंभचेरं ॥२३७॥ जे सद्द १ रूब २ रस ३ गंध ४ मागए फासे ५ अ संपप्प मणुन्नपावं १५ । गिहिपओसं न करेय पंडिए से होइ दंते विरए अकिंचणे ॥२३८॥ USAGARMARA Page #57 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कंदप्प १ देव २ किब्बिस ३ अभिओगा ३ आसुरी य४ संमोहा। एमा हु अपसत्या पंचविहा हुंतिपणवीसा २५॥२३९॥ तिविहेण करणजोएण संजओ सुसमाहिओ। पसत्था जुंजए सम्मं चयइ इमा अप्पसत्था य ॥२४०॥ पंच नियंठा भणिया पुलाय १ बउसा २ कुसील ३ निग्गंथा ४। होइ सिणाओ य५ तहा एक्केको सो भवे दुविहो ॥२४१॥ धन्नमसारं भन्नइ पुलायसदेण तेण जस्स समं । चरणं सो उ पुलाओ लद्धीसेवाहि सो य दुहा ॥२४२॥ संवाइयाण कज्जे चुणिज्जा चक्कवट्टिमवि जीए। तीर लद्धीइ जुओ लद्धिपुलाओ मुणेयव्वो ॥२४३॥ आसेवणापुलाओ पंचविहो नाणदंसणचरित्ते । लिंगंमि अहासुहुमो होइ आसेवणानिरओ ॥२४४॥ उवगरणसरीरेहि बउसो दुविहो य सोवि पंचविहो । आभोगाणाभोगसंवुडा संवुड सुहुमेहिं ॥२४५॥ पडिसेवणाकसाए दुहा कुसीलो दुहावि पंचविहो । नाणे दंसणचरणे तवे य अहसुहुमए चेव ॥२४६॥ गंथो मिच्छत्तधणाइओ मोहाओ निग्गओ जो सो । उवसामओ य खबगो दुहा नियंठो वि पंचविहो ॥२४॥ पढमापढमे चरिमाचरिमे य तहा अहासुहुमे य । मिच्छत्त १ वेय.३ हास-च्छय ६ कोहचउकं ४ हवइ गंथो ॥२४८॥ सुहझाणजलविसुद्धो कम्ममलाविरकया सिणाओत्ति । दुविहो य से सजोगी तहा अजोगी विणिदिठ्ठो ॥२४९॥ सो पुण पंचवियप्पो अच्छवी य असबलो अकम्मसो। अपरिस्सावी संसुद्धनाणदंसणधरो अरिहा ॥२५०॥ आइम संजमजुयले तिन्नि उ पढमा कसायवं चउसु । निग्गंथसिणाया पुण अहखाए संजमे हुंति ॥२५१॥ भूलुत्तरगुणविसया पडिसेवासेवए पुलाए य। उत्तरगणेसु बउसो सेसा पडिसेवणारहिया ॥२५२॥ सामाइव १ ओव-छावण २ च परिहारयविसुद्धं ३ । सुमुह ४ महकायरूवं ५ चय रित्तइ तेण चारित्तं ॥२५॥ Jain Edule nterational For Private & Personal use only Prasaw.jainelibrary.org Page #58 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध २८ ॥ इत्तरिया कहिये दुविहं सामाइयं मुणेयव्वं । पढमतिमतित्थि पढमं मझ २२ विदेहमि अवकहियं ॥२५४॥ सामाइयंसि उ कए चाउजामं अणुत्तरं धम्मं । तिविहेण फासियते सामाइयसंजते य खलु ॥ २५५ ॥ सइयार १ निरइयारं २ छेओवठ्ठावणं भवे दुविहं । मझिमजिणाण समए विदेहखित्तंमि तं नत्थि ॥ २५६ ॥ छित्त् जियपरियागं पोराणं जो टवेति अप्पाणं । धम्मंमि पंचजामे छेओवठ्ठावणं स खलु ॥ २५७ ॥ परिहारविसुद्धितइयं दुविहं निव्विस्समाणयं पढमं । बीयं निव्विठ्ठकाइय- मिह नवमुणिगच्छ सेविययं ॥ २५८ ॥ परिहरइ जो विसृद्धं पंचजामं अणुत्तरं धम्मं । तिविहेण फासयंतो परिहारियसंजओ स खलु ॥ २५९ ॥ संकिठमाण १ सुविसु -झमाणर्य २ दुविहसंपरायं च । सेणिगयस्स उ मुणिणो हुज्जा हु कसायजुत्तस्स ॥ २६० ॥ लोभावेयंतो जो खलु उवसामओ य खवओ वा । सो सुहुमसंपराओ अहरकाओ णओ किंचि ॥२६१॥ तह अहखायचरितं छाउम्मत्थियकेवलित्तेय । चढणपडणस्स भयणा पढमे बीए वि नो पडणं ॥ २६२ ॥ वसंते १ खीणं वि जो खलु कम्मंमि गोहणिज्जंभी । छउम्मत्थो य जिणो वा अहरकायसंजओ स खलु ॥ २६३ ॥ पनवण १ वेय २ रागे ३ कप्प ४ चरित ५ पडिसेवणा ६ नाणे ७ । तित्ये ८ लिंग ९ सरीरे १० खित्त ११ काल १२ गइ ठिइ १४ संजम १५ निकासे १६ ॥ २६४ ॥ जोगु १७ ओग १८ कसार १९ लेसा २० परिणाम २१ बंधणे २२ वेए २३ । कम्मोदीरण २४ उवसं - पजहण २५ सण्णा य २६ आहारे २७ ॥ २६५ ॥ अव २८ आगरि २९ कालं ३० -तरेय ३१ समुघाय ३२ खित्तफुसणा य ३३ । * प्रक० ॥२८॥ Page #59 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भावे ३४ परिणाम ३५ खलु अप्पाबहुयं ३६ नियंठाण ॥ २६६ ॥ (पंचनिग्रंथसंयमानां द्वारगाथाः) सव्वे वि य अइयारा संजलणाणं तु उदयओ टुति । मूलच्छिज्जं उदये पुण बारसण्हं कसायाणं ॥२६७॥ सोलस उग्गमदोसा १६ सोलस उप्पायणाइ जे दोसा १६। दस एसणाइ दोसा १० गासेपण५ मिलिय सगयाला ४७॥२६८॥ आहाकम्मुद्देसियपूइयकम्मे य मीसज़ाए य । ठवणा पाहुडियाए पाउयरकीयपामिच्चे ॥२६९॥ परियट्टिय अभिहटु भिण्णे मालोहडे य अच्छिज्जे । अणिसिटिझोयरए सोलस पिंडग्गमे दोसा ॥२७॥ धाइदूई निभित्ते आजीजवणिमगे तिगिच्छा य । कोहे माणे माया लोहे य हवंति दस एए ॥२७॥ पुविपच्छासंथवविज्जामंते य चुण्णजोगो य । उप्पायणा य दोसा सोलसमे मूलकम्मे य ॥२७२॥ संकियमरिकयनिरिकत्त-पिहियसाहरियदायगुम्मोस्सं । अपरिणयलित्तछडिय एसणदोसा दस हवंति ॥२७३॥ संजोयणा पमाणे इंगालसधूमकारणे चेव । उवगरणभत्तपाणे सबाहिरभंतरा पढमा ॥२७४॥ वेयणवेयावच्चं इरियट्ठाणे य संजमाणे । तहपाणवत्तियाए छटुं पुण धम्मचिंताए ॥२७५॥ आयंके उवसग्गे तितिरकया बंभचेरगुत्तीसु । पाणिदया तवहेउ सरीरवुच्छेयणठाए ॥२७६॥ संसठ्ठमसंसठ्ठा उद्धड तह अप्पले विया चेव । उग्गहिया पग्गहिया उझियधम्मा य सत्तमिया ॥२७७॥ पिंडेसणो उ सत्त पाणेसणाओ वि सत्त एया वि । चउत्थीए नाणत्तं सोवीरमलेवडाइजलं ।।२७८॥ वाणउइसयं पिंडे-सणाइदोसाण वजिऊण सया । जो गिण्हइ अगेहीओ पिंडं परिभुंजए साहू ॥२७९।। इज्जूगंतु १ पञ्चागई अगोमुत्तिया ३ पयंगविही ४ । पेडा य ५ अद्धपेडा ६ अम्भितर ७ बाहिसंवृक्का ८ ॥२८०॥ Page #60 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध ॥२९॥ जह चिंतीय १ सपरग्गह २ सउग्गह ३ परुग्गहे ४ सइगुवगहे ५। लाप्रक सागारि संथारुग्गह ६ अह संखडि ७ ओग्गहा सत्त ।। २८१॥ ठाण १ निसीही २ उच्चारमाई ३ तह सद्द ४ रूव ५ परकिरिया ६ । अन्नुन्नकिरियविसया ७ आयारे सत्त सत्तिक्का ॥२८२ निव १ सिठि२ इत्थि३पुरिसे ४ परपवियारे य५ सपवियारे य ६। अप्परयसुरदरिद्दे८ सढे ९ हुज्जा नव नियाणा ॥२८३॥ उग्गम १ उप्पा २ एसण ३ परिहर ४ परिसाड ५ तह य नाणतिगे ।संररकणा ९ वियत्ते १० उवघाया दस इमे हुंति॥२८४॥ अठ्ठा १ णट्ठा २ हिंसा ३ कम्मा ४ दिठ्ठी अ५मोस ६ दत्ते य । ___ अझप्प ८ माण ९ मित्ते १० माया ११ लोमे १२ भिया १३ तेर ॥२८५।। इच्चाइअणेगगुणगण-कलिया ललिया य सारणाईसु । सामन्ना अवि मुणिणो जत्थ गणे एरिसा हुंति ।।२८६।। एरिसमुणिसमुदाओ जिणआणाकारओ यसो गच्छो। अण्णो सो कागणुव्व नडपेडनिहो य लोयाणं ।।२८७॥ एगो साहू एगा य साहूणी सावओ य सट्टी वा । आणाजुत्तो संघो सेसो पुण असिंघाओ ॥२८८॥ निम्मलनाणपहाणो दंसणजुत्तो चरित्तगुणवंतो। तित्थयराण य पुज्जो बुच्चइ एयारिसो संघो ॥२८९॥ सव्वो वि नाणदंसणचरणगुणविभूसियाण समणाणं । समुदाओ होइ संघो गुणसंघाउत्ति काऊणं ॥२९०॥ इक्को वि नीईवाई अवलंबतो विसुद्धववहारं । सो होड भावसंघो जिणाण आणं अलंघतो ॥२९१॥ तित्थं चाउव्वण्णो संघो संघो वि इक्कगो परको । चाउवण्णो वि संघो सायरिओ भण्णए तित्थं ॥२९२।। तित्थं तित्थे पवयणाणि संगोवंगे य गणहुरे पढ़ने । जो तं करेइ तित्थं-करो य अण्णे कृतित्थिया ।।२९३।। P॥२९॥ Page #61 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जो उत्तं भासइ सहइ कुणइ कारवे अण्णं । अणुमन्नइ कीरतं मणसा वाया वि काणं ।। २९४ ।। मिच्छठ्ठिी नियमा सावएहिं पि सो वि मुणिरूत्रो । परिहरियव्वो जं दंसणे वि पच्छित्तं तस्स चउगुरुयं ।। २९५ || कत्थ अह्मारिसा पाणी दूसमादोसदूसिया । हा आणाहा कहं हुंता न हुंतो जइ जिणागमो ।। २९६ ।। - णायारेर्हि तह वेसविडंबगेहिं मलिणीकयं तित्थं । नियअत्थविसयविसमयदेसणाकज्जनिएहिं ॥ २९७ ॥ उच्छेइयधम्मगंथा नत्थिक्कपयंडवायनठ्ठघणा । कलहाइदोससहिया संपइ कालाणुभावाओ ॥२९८॥ केवि मुणिरुवपासा पुरंति अतुक्क करिसमुद्दामा । असंजयेत्ति संजयमालप्पा बालरम्मा य ॥ २९९ ॥ कहमण्णहा मुणिज्जइ तेसि सरूवं न होइ जिणवयणं । सुद्धपरूवगमुणिणो गीयत्था जइ नहा हुज्जा ॥ ३००॥ आगम भणियं जो पण्णवेइ सद्दहइ कुणइ जहसति । तिल्लोक्कवंदणिज्जो दूसमकाले वि सो साहू || ३०१ || सम्मत्तरयणक लिया गीयत्था सव्वसत्थणयकुसला | धम्मत्थियवेसधरा अत्थिक्काभरणसव्वंगा ॥ ३०२ ॥ पवयणमग्गसुठ्ठिी दिठ्ठीहि अत्तदोसपासणया । सत्तिकयाणुठ्ठाणा संविग्गा तइयपरकधरा ॥ ३०३ ॥ सुझइ जई सुचरणो सुझइ सुसावओ वि गुणकलिओ । उसन्नचरणकरणो वि सुझइ संविग्गपरकरुई ॥ ३०४॥ पंचमहव्वयजुत्ता परमवसन्ना हु उसमे भावे । संजलणाणं सढागुणेहिं उज्जुत्ता हुंति ॥ ३०५ ॥ पवयणमोसावायं मुणंति तेणत्थकारयं हियए । अप्पपरजाणणठ्ठा जम्हा सुद्धं परूवंति ॥ ३०६ ॥ सुद्धं सुसाधम्मं कहेइ निंदेइ निययमायारं । सुविहियमुणीण पुरओ होई य सव्वोमराइणिओ ॥ ३०७ ॥ बंद न य वंदावर किइकम्मं कुणइ कारवे नेय । अत्तष्ठा नवि दिरकइ देइ सुसाहूण बोहेउं ॥ ३०८ ॥ Page #62 -------------------------------------------------------------------------- ________________ P संबोध ॥३०॥ REC4 अहंवा देइ दिरकं अत्तठा धम्मियाण तप्पुरओ । सव्वं विरयायारं परवेत्ता जुजए सम्मं ॥३०९॥ अह जोअ णो गिण्हई दिरकं अमुणियमुणित्तणुज्जोओ। तं दिरकइ नियविणयठाए तं जुजए य पुणो ॥३१०il ओसन्नो अत्तठ्ठा परमप्पाणं च हणइ दिरकंतो । तं छुहइ (बुडइ) दुग्गईए अहिययर बुडुइ सयं च ॥३११॥ गीय कप्पनिसीहाइ सुत्तं अत्थं च तदुभयविहिन्नू । सो गीयत्यो अन्नो समवायधरोंऽणुओगधरो ॥३१२॥ गीयत्यो वि हु गीयत्थसेवाबहुमाणभत्तिसंजुत्तो । परिसागुणनयहेऊ-वाएहि देसणाकुसलो ॥३१३॥ विहिवाए विहिधम्म भासइ नो अविहिमग्गमण्णत्थं । इक्को वि जणमझ-ट्टिओ व दिया व राओ वा ॥३१४॥ पाणते वि न मिच्छा भासइ आयारगोयरं परमं । जिणमग्गे पडिकूलं न रुयइ बहिककिरिया वि ॥३१५॥ सव्वत्थ उचियदिछी उचियपवित्ति करेइ सव्वत्थ । परदोसा दठूणं मुणइ सगकम्मपयडिभवा ॥३१६॥ ओसन्नो जइवि तहा पायडसेवी न हुंति दोसाणं । जम्हा पवयणदोसो मोहो उ सुद्धजणमझे ॥३१॥ गीयत्थाणं पुरओ सच्चं भासेइ निययमायारं । जम्हा तित्थसारिच्छा जुगप्पहाणा सुए भणिया ॥३१८॥ सारणवारणचोयण-पडिचोवणमाइएसु कज्जेसु । तप्पुरओ कायवो नाणीणं दंसियं जम्हा ॥३१९॥ पवयणमुभावंतो ओसन्नो वि हु वरं सुसंविग्गो । चरणालसो वि चरण-ट्ठियाण साहूण परकपरो ॥३२०॥ नाणाइगुणविहीणा अत्तुक्वरिसा अणज्जुनियडिपरा । धम्मच्छ लेण गिहिसंथवकारया तेसि मा संगो ॥३२॥ धन्नाणं होइ जोगो मुणीण परमत्थतत्तजुत्ताणं । संविग्गपरिकयाणं पुण संगो भब्वभद्दकरो ॥३२२॥ (काव्यं ३) तत्त्व १ ज्ञानां २ ग ३ धम्झे ४ न्द्रिय ५ मद ६ विषय ७ द्रव्य ८ संभोग ९ योगाः १० । ३०॥ Jain Education ational w elbrary.org Page #63 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संज्ञा ११ दिग १२ संयम १३ र्द्धि १४ व्रत १५ विहृति १६ वचो १७ भावना १८ व १९ लेश्याः २० ॥ पर्याप्ति २१ प्राण २२ योनि २३ स्वर २४ मरण २५ समुद्रात २६ ची २७ र्हदाद्याः २८ । दाना २९ वस्था ३० वधा ३१ श्रुत ३२ नय ३३ विनया ३४ कार ३५ गर्भ २६ क्षुदाद्याः ३७ ॥ ३२३ ॥ aa ३८ स्त्री ३९ शस्त्र ४० मिथ्या ४१ मल ४२ तनय ४३ गुण ४४ ध्यान ४५ षट्स्थान ४६ कामा: ४७ । वैयादृत्त्यो ४८ पसर्गा ४९ स्तृण ५० चरण ५१ लिपि ५२ ब्रह्म ५३ कर्मी ५४ ट (६) ५५ भाषाः ५६ ॥ शय्या ५७ मानादि ५८ सामायिक ५९ करण ६० नमस्कार ६१ कल्पां ६२ क ६३ लोकाः ६४ । निग्रंथ ६५ क्षेत्र ६६ कल्पद्रुम ६७ कण ६८ गतयो ६९ मुंड ७० भाव ७१ प्रमादाः ७२ ॥ ३२४॥ स्थाना ७३ नुष्ठान ७४ मुद्रा ७५ व्रत ७६ जपविधयः ७७ सप्तमंगी ७८ प्रमाण ७९ । प्रायश्चित्त ८० प्रवृत्ति ८१ प्रवचनपटुता ८२ वश्यकं ८३ हेतु ८४ वर्गः ८५ ॥ प्रत्याख्याना ८६ नुयोगा ८७ णिमपरमगुणा ८८ मैत्रि ८९ निक्षेप ९० दीक्षाः ९१ । धर्म: ९२ सम्यक्त्व ९३ रत्नो ९४ पनय ९५ शम ९६ यम ९७ ब्रह्म ९८ शिल्प ९९ प्रमेयाः १०० ॥ ३२५॥ इस समय परसमयरहस्सगुणनिहीभूया । सम्मत्तस्स पभावणपयडा भव्वाण कप्पदुमा ॥ ३२६॥ कि बहुणा भगिएणं तन्निस्साए सुसाइणो वि सया । विहरति तस्स आणा धारंति सरंति तव्वयणं ॥ ३२७॥ जे विहिमग्गं परूवंति जिणपवयणप्पभावया । ते संविग्गायरिया जयउ चिरं दूसमे काले ॥ ३२८ ॥ के यि सम्मतव वित्तिविहाणेहिं दव्ववेसधरा । सव्वत्थ वि बीयप वर्द्धता चरणगुणहीणा ॥ ३२९॥ *4%94 Page #64 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध ॥ ३१ ॥ सिरतुंडंमि मुंडा उभडवेसा विचित्तवत्थधरा । विज्नंजणचुण्णाइ कुब्वंता कुलममत्ताइ ॥ ३३० ॥ सम्मं भासइ जीवाणं पुच्छमाणाण ज़िणमयं ते वि । सारूविणो य पवयणमोसं दुठ्ठेति मन्नंता ॥३३१॥ पच्छाकडित्ति जेण य चरणं पच्छाकडं कयं रम्मं । उरिकत्ता गिही जाओ ससिहो भिरकइ अभज्जो य ॥ ३३२ ॥ सिंह भज्जगोविय सिद्धपुत्तो सकूचिओ भणिओ । नो भिरकइ सिप्पाइवम् काऊण जीवेइ ॥ ३३३ ॥ केवि भणति पच्छा - कडपुत्तो सिद्धपुत्तगो भणिओ । ससिहो वा असिहो वा सभज्जगो वा अभज्जो वा ॥ ३३४ ॥ एए सव्वे विसम्मत्त संजया जइ हवंति नामाणि । नो तेसिं जइ सम्मत्तं भङ्कं सव्वे वि ते गिहिणो ॥ ३३५ ॥ आलोयणाइकज्जे एए जुग्गा हवंति कइयावि । जइ नाणा सच्चभासण गुणप्पहाणा मुणियठाणा ॥ ३३६ ॥ जेवि कुसीला कुवएस-दायगा दंभधम्मछलमाणा । ते वि हु अदंसणिज्जा कुसीललिंगं धरेमाणा ॥३३७॥ धन्ना विहिजोगो विहिपरकाराहगा सया धन्ना । विहिबहुमाणी धन्ना विहिपरकअदूसगा धन्ना ॥ ३३८ ॥ विकिरणं विहिराओ अविहिञ्चाओ कए वि तम्मिच्छा । अनुक्करिसं कुज्जा णेव सया पवयणे दिठ्ठी ॥ ३३९॥ आसन्नसिद्धियाणं जीयाणं सयलअत्थिवाईणं । लरकणमेयं विवरीय-मभव्वजियदूरभव्वाणं ॥ ३४० ॥ सम्मत्तनाणचरणानुच्चाइमाणाणुगं च जं जत्थ । जिणपन्नत्तं भत्तीए पूअए तं तहाभावं ॥ ३४९ ॥ केसिंचि अ आएसो दंसणनाणेहिं वट्टए तित्थं । वुच्छिन्नं च चरितं वयमाणे होइ पच्छित्तं ॥ ३४२ ॥ दुप्पसर्हतं चरणं जं भणियं भगवया इहं खित्ते । आणाजुत्ताणमिणं न होइ अहुणोत्ति वामोहो || ३४३ ॥ कालोचियजयणाए मच्छररहियाण उज्जमंताण । जणजत्तारहियाणं होइ जइत्तं जईण सया ॥ ३४४॥ प्रक ॥३१॥ Page #65 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जत्थ न बालपसंगो नोक्कडवंचणबलाइकारवणं । गीयत्थाणं सेवा तत्थ जइत्तं सया जाण ॥३४५॥ सव्वजिणाणं तित्थं बकुसकुसीलेहि वट्टए इत्थं । नवरं कसायकुसीला पमत्तजइणो विसेसेण ॥३४६॥ न विणा तित्थं नियंठेहि नातित्था य नियंठया । छक्कायसंजमो जाव ताव अणुसज्जणा इण्हि ॥३४७॥ एवं अठ्ठवियप्पा परिहरियव्वा हु पदमभंगिल्ला । बीयनिसेवियव्वा निच्च तुरिया वि सेविज्जा ॥३४८॥ तेसिमभावे तइया दुव्बुठ्ठिनाएण संधिमभिगिझ । भइयव्वा अवरे वि हु कारणमासज्ज सुद्धगुणा ॥३४९॥ दसणतिगहीणपढमा बीया दंसणतिगेण परिसुद्धा । तुरिया चरणविहीणा दंसणभयणा हु तइयंमी ॥३५०॥ दब्वेण य भावेण य चरणं नेयं जहक्कम तेसिं । अवरंमि दंसणगुणं नेयं भयणा हु नाणस्स ॥३५१॥ वृहदुवारगंथे छेयाइसुवित्थरो मुणेयव्वो । संजमठाणा सेढी पज्जाया कंडगाठत्थ ॥३५२॥ ॥ इति गुरुस्वरूपाधिकारः॥ ॥ अथ सम्यक्त्वाधिकारः॥ चरणाईया धम्मा सव्वे सहला हवंति थोवा वि । दंसणगुणेण जुत्ता जइ नो उण उच्छुदंडनिभा ॥१॥ दसणमिह सम्मत्तं तं पुण तत्तत्यसद्दहणरूवं । दसणमोहविणासे निम्मलमझप्पगुणठाणं ॥२॥ खइयाइपणविहं पुण दंसणं तत्थ पदममुवसमियं । लम्भइ णाइअणंते संसारे सुभोमिरो जीवो ॥३॥ For Private & Personal use only Page #66 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध ॥३२ ॥ पालमाइअहापवत करणेहि कोवि पंचिदी । भव्वो अवढपुग्गलपरियहवसेससंसारो ॥ ४ ॥ पलिय असंखविभागे एगा कोडि हविज्ज कम्मठिई । सतह वि कम्माणमहापवत्तेण करणेणं ॥ ५ ॥ itor ओकरकडघगरूडगूढगंटिव्व । जीवस्स कम्मजणिओ घणरागदोसपरिणामो ॥६॥ भित्तूणं तमपुव्वकरणेणझप्पझाणसुद्धेण । तत्थ य अंतरकरणं करेइ अंतीमुहुत्तभियं ॥७॥ उवसमसेढिगयस्स वि होइ उवसाभियं तु सम्मत्तं । जो वा अकयतिपुंजो अखवियभिच्छो लहइ सम्मं ॥ ८ ॥ खीणंभि उईण्णभि अणुइज्ते अ सेसमिच्छत्ते । अंतोमुहुत्तभित्तं उवसमसम्मं लहइ जीवो ॥ ९ ॥ जागंठी ता पढमं गठि समइच्छओ भवे बीयं । अनियट्टीकरणं पुण सम्मत्तपुररकडे जीवे ॥१०॥ आलंबणमलहंती जहठ्ठाणं न मुंचए इलिया। एवं अकयतिपुंजी मिच्छत्तं उवसमी एइ ॥ ११ ॥ उस सम्मद्दिी अंतरकरणे टिओ वि जइ को वि । देसविरई पि लहइ केवि पमत्तापमत्तं पि ॥ १२ ॥ भव्वो वाऽभव्वो वा गठिसमी िन भिदंतो । संखिज्जमसंखिज्जं कालं चिट्ठेइ जइ को वि ॥ १३ ॥ दव्वयस्स य लाही हविज्ज पुव्वं विमुत्तदिरकंभि । जिगरिद्धिदंसणाओ उवरिमगे विज्जगहङ्कं ॥ १४ ॥ एयमभव्वाणं चिय भव्वाणं पुणमभिन्नदसपुब्वा । अंतमुहुंत्तेण वि कोइ गठिं भिन्ना लहेइ सिवं ॥ १५ ॥ उवसमसम्मत्ताओ चइउं भिच्छे अपावमाणस्स । सासायणसम्मत्तं तयंतरालंमि छावलियं ॥ १६ ॥ पच्छा मिच्छद्दिठ्ठी सासायणचुओ हवे नियमा । उक्कोसं सासायण - मुवसमियं पंचत्तमिह ॥ १७ ॥ पुत्रमपुत्रकरणेणं अंतरकरणेण वा कयतिपुंजी 1 कोहवनिदंसणेण य सुद्धाणुवेयगो होइ ॥ १८ ॥ मक० ★ ॥३२॥ nelibrary.org Page #67 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 4%A8% AS मिच्छत्तं जमुइण्णं तं खीणं अणुइ च उवसंतं । मीसीभावपरिणयं वेइज्जतं खओवसमं ॥१९॥ उवसमसम्मत्ताओ खाओवसमस्स को विसेसोस्थि । उवसंमि मिच्छत्तं पएसवेजं न इह वेजं ॥२०॥ वेयगसम्मत्तं पुण सव्वोइअचरमपुग्गलावत्थं । खोणे इंसणमोहे तिविहंमि वि खाइयं होइ ॥२१॥ अंतमहत्तोवसमो छावलि सासाण वेयगो समओ। साहियतित्तीसायर खइओ दुगुणो खओवसमो ॥२२॥ वेयगखाइगमिक्कसि वारमसंखिज्जओ खओवसमो। साइअणंतो कालो खइयस्स य सिद्धभावंमि ॥२३॥ अंतोमुहुत्तमित्तं पि फासियं हुज्ज जेहि सम्मत्तं । तेसिमवद्दपुग्गलपरियट्टवसेससंसारो ॥२४॥ उक्किठ्ठरसेण नोकि-ठिइबंधो हवइ कम्मपरडीणं । सम्मत्तपरिचाए वि पडिवडिओवसमी खओ वा ॥२५॥ खाइयमपडिवाइ सत्तगरखीणो तिदंसचउअणओ । चउतिभवभाविमुरको तब्भवसिद्धी अबद्धाऊ ॥२६॥ सम्मत्तमि उ लद्धे विमाणवज्जं न बंधए आऊ । तिरिमणुओ देवो पुण नराउमवि चउगइ सबद्धाऊ ॥२७॥ सम्मत्तमि य लद्धे पलियपहुत्तेण सावओ हुज्जा । चरणोवसमखयाणं सागरसंखंतरा हुँति ॥२८॥ उवासमसे ढिचउक्कं जायइ जीवस्स आभवं नूणं । ता पुण दो एगभवे खवगस्सेढी पुणो एगा ॥२९॥ सामाइयं चउद्धा सुय १ सण २ देस ३ सव्व ४ मेएहि । नाणभवे आगरिसा एगभवं पप्प भणियव्वा ॥३०॥ तिण्हं सहसपुहुतं सयप्पटुत्तं च होइ विरईए । एगभवे आगरिसा एवइया हुंति नायव्वा ॥३१॥ तिण्हमसंखसहस्सा सहस्सपुहुत्तं च होइ विरईए । नाणभवे आगरिसा एवइया हुंति नायव्वा ॥३२॥ अरिहंतेसु य रागो रागो साहुस बंभयारीसु । एस पसत्थो रागो अज्ज सरागाण साहूणं ॥३३॥ I C For Private & Personal use only bayong Page #68 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध ॥३३ ॥ अरिहं देवो गुरुणो सुसाहुणो जिणमयं महप्पमाणं । इच्वाइसहो भावो सम्मत्त बिति जगगुरुणो ॥३४॥ सम्मठिी जीवो गच्छइ नियमा विमाणवासीसु । जइ न घइयसमत्तो अहव न बद्धाउओ पुचि ॥३५॥ जं सक्कइ तं कीरइ जं च न सक्कइ तयं च सद्दहणा । सद्दहमाणो जीवो वच्चइ अयरामरं ठाणं ॥३६॥ एगत्थ सव्वधम्मा लोइयलोउत्तराइणुठाणा । एगत्थ दंसणं खलु न समं होइ तेसि तु ॥३७॥ संका १ करखा २ य तहा वितिगिच्छा ३ अण्णतित्थियपसंसा ४ परतित्थियाण सेवण ५ मइयारा पंच सम्मचे ॥३८॥ सव्वे देसे धम्मे अत्थि नत्थित्ति संसओ संका । कंखा कुमयभिलासो दयाइगुणलेसदसणओ ॥३९॥ वितिगिच्छा य फलं-पइ संदेहो मलिणयंमि वि दुगंछा । परतित्थीण पसंसा परिचयकरणं पसंगो य ॥४०॥ मिच्छत्तथिरीकरणं अतत्तसद्धा पवित्तिदोसो य । तह तिव्वकम्मबंधो पसंसओ इह कुदंसणिणं ॥४१॥ अन्नेसि सत्ताणं मिच्छत्तं जो जणेइ मूढप्पा । सो तेण निमित्तणं न लहइ बोहिं जिणाभिहियं ॥४२॥ जाणिज्ज मिच्छद्दिट्टी जो पडणालंबणाइ धिप्पंति । जे पुण सम्मद्दिठी तेसि पुण चढइ पयडीए ॥ ४३ ॥ दुविहं लोइयमिच्छं देवगर्य गुरुगयं मुणेयव्वं । लोउत्तरं पि दुविहं देवगयं गुरुगयं होइ ॥४४॥ चउमेयं मिच्छत्तं तिविहं तिविहेण जो विधज्जेइ । अकलंक सम्मत्तं होइ फुडं तस्स जीवस्स ॥४५॥ एवं अणतरुत्तं मिच्छं मणसा न चिंतइ करेमि । सयमेसो व करेउ अन्नेण कए व सुख कयं ॥४६॥ अभिग्गहियमणभिग्गहं च तहाऽभिनिवेसियं चेव । संसइयमणाभोगं मिच्छत्तं पंचहा एयं ॥ ४७॥ मिच्छत्तं पुण सव्वाणत्थाण निबंधणं मुणेयव्वं । तत्थाभिग्गहियं पुण कविलाईणं मुणेयव्वं ॥४८॥ ३३॥ For Private & Personal use only Page #69 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अणभिग्गहियं पुण कुदिछिदिरकाणमपत्तसमत्ताणं । मणुअतिरियाणमा-बालगोवालाईण विष्णेयं ॥४९॥ अभिनिवेसं गोठामाहिलपभिईण लद्धजिणवयणे । अण्णहवागरमाणाण पच्छीमाए वि तम्भावो ॥५०॥ संसइयं पुण सुत्ते अत्थे वा तदुभए वि संकित्तं । जिणदत्तसढपमुहाण बोद्धसंगयकिलिठ्ठाणं ॥५१॥ एगिदियविगलिंदियमुच्छिमपमुहाण वा अणाभोगं । अन्नाणुवओगो य तेसिं सव्वत्थ विप्फुरइ ॥५२॥ एवं पंचवियप्पं मिच्छत्तमणाइणंतयं णेयं । तच्चाए सम्मत्तं पयडइ भव्वाण जीवाणं ॥५३॥ न वितं करेइ अग्गी नेव विसं नेव किण्हसप्पो वा । जे कुणइ महादोसं तिव्वं जीवस्स मिच्छत्तं ॥५४॥ क; करेसि अप्पं दमेसि अत्थं चिणसि धम्मत्थं । इक्कं न चयसि मिच्छत्तविसलवं जेण बुडिहसि ॥५५॥ तो मिच्छमहादोसं नाऊण य जेण नासियमसेसं । ते धन्ना कयपुण्णा जे सम्मत्तं धरिजंता ॥५६॥ अवउझियमिच्छत्तो जिणचेइयसाहुपूयणुज्जुत्तो। आयारमठ्ठभेयं जो पालइ तस्स सम्मत्तं ॥५॥ तस्स विसुद्धिनिमित्तं भणियाई सत्तसठि ठाणाइं । धारिज परिहरिज्ज व जहारिहं पबयणे परमो॥५८॥ चउसद्दहण ४ तिलिंगं ३ दसविणय १० तिसुद्धि ३ पंचगयदोस । अठ्ठपभावण ८ भूसण ५ लरकण ५ पंचविहसंजुत्तं ॥५॥ छविहजयणा ६ गार ६छम्भावण भावियं ६ च छठ्ठाणं। इय सत्तसठि ६७ लरकणमेयविसुद्धं च सम्मत्तं॥६०॥ द्वारगाथे२॥ परमत्थसंथवो खल्ल १ सुमुणिय परमत्थजइजणणिसेवा । वावण्ण ३ कुदिठीण य वज्जण ४ मिइ चउह सद्दहणं॥६॥. परमागमसुस्सूसा १ अणुराओ धम्मसाहणे परमो २। जिणगुरुवेयावच्चे नियमो ३ सम्मत्तलिंगाइ ॥१२॥ अरिहंत १ सिद्ध २ चेइय ३ सुए य ४ धम्मे य साहुबग्गे य ३ । आयरिय ७उवझाए ८ पवयणे ९ दंसणे १० विणओ॥६३॥ lan Education Internal Page #70 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भत्ती पूलावणुज्जलणं वजणमवन्नवायरस । आसायेगपरिहारी दंसण विणओं समासेण ॥४॥ मण १ वाया २ कायाणं ३ सुद्धी सम्मत्तसोहणी जत्थ । मणसुद्धी जिणजिणमयवज्जमसारं मुणइ लोयं ॥६५॥ तित्थंकरचलणारा-हणेणं जं मझ सिज्जइ न कज्जं । पत्थेमि तत्थ नन्नं देवविसेसे हि वयसुद्धी ॥६६॥ छिज्जतो भिज्जतो पिलिज्जतो वि डझमाणो वि । जिणवजदेवयाणं न तमइ जो तस्स तणसुद्धी ३ ॥६॥ पावयणी १ धम्मकही २ वाई ३ निमित्तिओ ४ तवस्सी य । विज्जा ६ सिद्धो य ७ कई ८ अठ्व पभावगा भणिया॥६॥ विहिभासओ १ विहिकारओ वि २ पवयणपभावणाकरणो ३। थिरकरण ४ सुद्धकहगो ५ समयंमि सव्वसमयन्नू ६ ॥६९ पवयणपसंसकरणो ७ पवयणुड्डाहगोवओ८ । पुवुत्तस्साभावे अठेव पभावगा एए ॥७॥ अइसेसि इठि १ धम्मकही २ वाई ३ आयरिय ४ खवग ५ नेभित्ती६। विज्जा राया ८ गणमंमया य निच्च तित्थं पभावति ॥१॥ जिणसासणे कुसलया १ पभावणा २ तित्थसेवणा ३ थिरया ४ । भत्ती य गुणा ५ सम्म-त दीवगा उत्तमा पंच ॥७२॥ लरिकज्जइ सम्मत्तं हिययगयं जेहि ताई पंचेव । उवसम १ संवेगो २ तह निव्वेय ३ णुकंप ४ अस्थिक्कं ५॥७३॥ परतित्थीणं तद्देवयाणं तग्गहियचेइयाणं च । जं छविहवावारं न कुणइ सा छ विहा जयणा ॥४॥ वंदणनमंसणं वा दाणाणुपयाणमेसि वज्जेइ । आलावं संलावं पुष्वमणालत्तगो न करे ॥७॥ रायाभिओगो य १ गणाभिओगो २ बलोमिओगो य ३ सुराभिओगो ४। कंतारवित्ती ५ गुरुनिग्गहो य ६ छच्छिडियाओ जिणसासणंमि ॥७६॥ W॥३४॥ For Private & Personal use only Page #71 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भांविज मूलभूयं १ दुवारभूयं २ पइठ ३ निहिर्भूयं ४ । आहार ५ भायणमिमं ६ सम्मत्तं चरणधम्मस्स ॥७७॥ अत्थि जिओ १ तह णिच्चो २ कत्ता ३ भुत्ता य पुण्णपावाणे ४ । अत्थि घुवं निव्वाणं ५ तस्सोवाओ य ६ छ ठाणा॥७॥ तं चेगविहं १ दुविहं २ तिविहं ३ चउ ४ पंचहा ५ तहा नेयं । तत्थेगविहं सम्मं रुइमित्तं संमयं तित्थे ॥७९॥ दुविहं दवे १ भावे २ निच्छय १ ववहारओ य २ अहवा वि । दव्वं अयाणमाणे भावे पुण जाणमाणे य ॥८॥ निच्छयओ सम्मत्तं नाणाइमयप्पसुद्धपरिणामो। भत्तीबहुमाणमाइलरकणजुत्ते य ववहारे ॥१॥ तिविहं कारगरोयगदीवगभेएहि साहुसेणिगाईणं । मिच्छादिठीणं पुण अभव्वाईणं पि तइयं तु ॥२॥ खइयं १ खओवस मियं २ उवसमियं ३ वा हविज्ज सत्तखए । खइयमुदिण्णरस खए अणु दिणुवसमं खओवसमं ॥३॥ मिच्छत्तस्स उवसमा उवसंमं तं भणति समयष्णू । तं उवसमसेढीए आइमसम्मत्तलामे वा ॥८४॥ विहियागुष्ठाणं पुण कारगमिह रोअगं तु सद्दहणं । मिच्छद्दिठ्ठी दीवइ ज तत्ते दीवगं तं तु ॥८५॥ खड्याइसासायण-सहियं तं चउब्विहं तु सम्मत्तं । तं सम्मत्तभंसे मिच्छत्तापत्तिरुवं तु ॥८६॥ वेयगसम्मत्तं पुण एवं चिय पंचहा मुणेयव्वं । सम्मत्तचरिमपोग्गलवेयणकाले तयं होइ ॥८॥ एवं चिय पंचरूवं निस्सग्गुवएसमेयओ दसहा । अहवा निस्सग्गाइ-रूइदसगं पवपणे भणियं ॥८॥ निस्सग्गु १ बएसरुइ २ आणरुइ ३ सुत्त ४ बीयरुइ चेव ५। अभिगम ६ वित्थाररुइ ७ किरिया ८ संखेव ९ धम्मरुई १० ॥८९॥ आइसु पुढवीसुतिसु खय १ उपसम २ खओवसम ३ सम्मत्तं । वेमाणियदेवाणं पणिदि तिरियाण एमेव ॥१०॥ Jain Educatie tamational For Private & Personal use only Williamelibrary.org Page #72 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सेसाण नारयाणं तिरिइत्थीणं च तिविहदेवाणं । नत्यि हु खइयं सम्मं पंच नराणं न अन्नेसि ॥११॥ सयलमवि जीवलोए तेण इह घोसिओ अमाघाओ। इक्क पि जो दुहत्तं सत्तं बोहेइ जिणवयणे ॥९२॥ सम्मत्तदायगाणं दुप्पडियारं भवेसु बहुएसु । सव्वगुणमीलियाहि बि उवयारसहस्सकोडिहिं ॥१३॥ सम्मत्तंमि उ लद्धे छ(ठ)इयाई नरयतिरियदाराई । दिवाणि माणुसाणि य मुरकसुहाई सहीणाइ ॥९४॥ सम्मत्तं सम्मत्तं सब्वेवि वयंति अप्पधम्मदिढे । जइ एवं तो भिच्छत्तवित्थारं कत्थइ न भवे ॥१५॥ अरिहंतेसु य भत्ती निरुवयारा हविज्ज सुद्धप्पा । संजलणाण कसाए मंदरसे मंदमणुबंधे ॥९६॥ मूलोत्तरगुणसुद्धे सुसाहुबग्गे य जा य पडिवत्ती। समयखित्तपइवे भत्ती सम्मत्तजुयसंघे ॥९॥ तत्तमिणं जा बुद्धी अणत्थजिणिंदवक्कमणुसारि । मझत्थो तप्परके मिच्छत्तच्चायओ सव्वं ॥९८॥ सो सुद्ध दंसणधरो अलंकियं तेण भूयलं सव्वं । अण्णो ममत्तमिच्छत्तवासिओ पासिसारिच्छो ॥१९॥ कुसमयसुईण महणं सम्मत्तं जस्स सुष्ठियं हियए । तस्स जगुज्जोयकरं नाणं चरणं च भवमहणं ॥१०॥ लब्भइ सुरसामित्तं लब्भइ पहुयत्तणं न संदेहो । एर्ग नवरि न लब्भइ दुल्लहरयणं च सम्मत्तं ॥१०॥ गुरुणो गुरुगुणजुत्ता समयपमाणेण ताण नाऊण । वयणायरणा संविग्ग-परकाइगुणेहि भइयव्वा ॥१२॥ ॥ इति सम्यक्त्वाधिकारः॥ ॥३५॥ Jain Education ational ww b rary.org Page #73 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥ अथ श्रावकधर्माधिकारः॥ संपत्तदसणाइ पइदियहं जइजणाओ निसुणेइ । सामायारिं परमं जो खलु तं सावगं बिति ॥१॥ वेसागिहेसु गमणं जहा निसिद्धं मुकुलवहूयाणं । तह हीणायार जइजण-संगं सदाण पडिसिद्धं ॥ २ ॥ वरं दिष्टिविसो सप्पो वरं हालाहलं विसं । हीणायारागीयत्थ-वयणपसंग खु णो भदं ॥३॥ जिणपवयणस्स सवर्ण कायव्वं सुगुरुपायमूलंमि । अणुकंपादाणं पुण निच्च सद्धेहिं कायव्वं ॥४॥ संपइ दूसमकाले धम्मत्थी सुगुरुसावया दुलहा । नामगुरु. नामसट्टा सरागदोसा बहू अत्थि ॥५॥ धम्मरयणस्स जुग्गो अरकुद्दो १ रूववं २ पगिइसोमो ३। लोगप्पिओ ४ अकूरो ५ भीरू ६ असढो ७ सुद रिकण्णोद॥६॥ लज्जालुओ ९ दयालू १० मझत्थो ११ सोमदिठ्ठी १२ गुणरागी १३। सक्कहसुपरकजुत्तो १४ सुदीहदंसी १५ विसेसन्नू१६॥७॥ वृट्टाणुगो १७ विणीओ १८ कयन्नुओ १९ परहियत्थकारी २० य। तह चेव लद्धलरको २१ इगवीसगुणो हवइ विहिवायं नयवायं आगमवायं खु चरियअणुवायं । नाऊण सुसीलाणं जो कुणइ सयावि सो सढो ॥९॥ चिइवंदण गुरुवंदण पइदिणमावस्सयाइकरणं च । गोसे पच्चरकाणं चऊदसनियमाण संगहणं ॥१०॥ सच्चित्तदष्वविगई-वाहणतंबोलवत्थकुसुमेसु । वाहणसयणविलेवण-बंभदिसन्हाणभत्तेसु ॥११॥ वसहीसपणासणभत्त-पाणमेसज्जवत्थपत्ताइ । जइवि न पन्नत्तधणो योवा वि हु थोवयं देइ ॥ १२॥ साहूण चेइयाण य पडिणीय तह अवण्णवायं च । जिपपवयणस्स अहियं सव्वत्थामेण वारेइ ॥१३॥ Jain Educaton tamatonal . Page #74 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध ॥३६ ॥ पढमं जईण दाऊण अप्पणा परमिऊण पारेइ । असइ सुविहियजणंमि भुंजेइ कयदिसालोओ ॥१४॥ संजईणदव्वलिंगीण - मंतर मेरुसरिसवसरिच्छं । नाऊण पत्तदाणे जयइ सो गुणजुओ सढ्ढो ॥ १५ ॥ मन्नइ जिणाण आणं मिच्छं परिहरइ धरइ सम्मत्तं । छव्विहआवस्सयंमी उज्जुत्तो होइ पइदिवसः ॥ १६ ॥ पव्वे पोसहवयं दाणं सीलं तवो य भावो य । सझायनमुक्कारो परोवयारो य जयणा य ॥ १७ ॥ जिणपूया जिणथुणणं गुरुधुइ साहम्मियाण वच्छल्लं । बवहारेण पवित्ती रहजत्ता तित्थजत्ताय ॥ १८ ॥ उवसम विवेगसंवर-भासासमिइछज्जीवकरुणा य । धम्मियजणसंसग्गो करणदमो चरणपरिणामो ॥ १९ ॥ संघोवरि बहुमाणो पुत्थयलिहणं पंभावणा तित्थे । जिणसासणंमि राओ णिच्च सुगुरूण विणयपरो ॥ २० ॥ इच्छइ नियहिययंमी परिग्गहं णवविहं परिचज्ज । गहिऊण संजमभरं करेमि संलिहणमणिदाणं ॥ २१ ॥ कप्परधूववत्थ-प्यभिइ दव्वेहिं पुत्थयाणं च । निम्माइ सया पूया पव्वदिणंमि विसेसाओ ॥ २२ ॥ दव्वसए संजाए गेहंमि जिणिदचिबसंठवणं । पवयणलिहणं सहस्से लरके जिणभवणकारवणं ॥ २३ ॥ द्विरणाई कि जिइ दससहस्सेहिं । इच्चाइधम्मकिञ्च सत्तीए कुणइ जो सढो ॥ २४ ॥ संवच्छरचाउम्मा- सिएस अठाहियासु तिहीसु । सव्वायरेण लग्गइ जिणवरपूयातवगुणे ॥ २५ ॥ अठमी चउदसी पुण्णि-मसी उद्दिठा तिहिचउक्कंमि । चारित्तस्साराहण-कएकरे पोसहाईयं ॥ २६ ॥ बीया पंचमि इक्कारसीतिहिनाण हेऊयाएया । तत्थय नाणाईणं पूया भत्तीइ कायव्वा ॥ २७॥ अण्णा दंसतिहिओ तत्प्रजिणिदाण भत्ती जुत्तीओ । विविहा विविहपयारा कायव्वा पइदिणं सम्मं ॥ २८ ॥ प्रक० ||३६| helibrary.org Page #75 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अट्टाहियमि भूयाण ससाण जीवाण जो अमाघारे । निरवज्ज कायव्वं असणाई जिणिंदआणाए ॥२९॥ जिणदव्यनाणदव्वं साहारणमाइद्रव्यसंगहणं । न करेइ जइ करेइ नो कुज्जा नियधणप्पसंगं ॥३०॥ जई वढावई तो पुण लेहयभिच्चाइ सवमन्नत्थ । संघसमरकं रकइ नासे जइ देइ मूलधणं॥३१॥ एवं तित्थयरत्तं पावइ तप्पुणओ महासदो। ईत्यविहिविवरीओ ज्जो सो दुल्लहबोहिओ हवइ ॥३२॥ तम्हा आगममग्गं करेइ सव्वत्थ अग्गओ कुसलो। सो खलु दंसणसट्टो बुढो सो संघमझमि ॥३३॥ विहिकरणं गुणिराओ अविहिचाओ य पवयणुज्जोओ। अरिहंतसुगुरुसेवा इमाइ सम्मत्तलिङ्गाई ॥३४॥ धम्मकरणे सहाओ दूसारपुत्तुव्य सेणियस्सेव । धम्मथिरिकरणजोओ अभयस्सेवाणुओगपरो ॥३५॥ साहम्मियवच्छल्लं करेइ सत्तीइ कारवे अण्णं । जिणदव्वाइअणाहाइदुहियनियसयणपभिइयं ॥३६॥ सगवित्तिनिसेहाइ-इच्चाइसयललोयगरहिजं । जह न हविज्जा तह कुज्जा वच्छल्लपभावणाइया ॥३७॥ पवयणलिंगेहिं दुहा चउहा ते दव्वभाव भेएहिं । साहम्मिया विसेसा भावजुया तम्मि विष्णेया ॥३८॥ इच्चाइ धम्मकिच्च कुव्वइ सव्वत्थ उचियभत्तीए । जिणसासणप्पसंसा विसेसओ जायए एवं ॥३९॥ कल्लाणगतिहीसु पव्वेसु तह य पव्वतिहीसु । जिणपडिवत्तीसम्म किज्जइ तह धम्मजागरिया ॥४०॥ अविरयसम्मदिठ्ठी वि पोसहमाइ करिज्ज अब्भासा । पवयणपभावणटुं जहुत्तविहिसुलहलाहट्टं ॥४१॥ इति सम्यक्त्वस्वरूपाधिकारः, तथा अविरतसम्यक्त्वश्रावकाचारः॥ Page #76 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध ॥३७॥ प्रक० ॥ अथ श्राद्धप्रतिमाधिकारः॥ नमिय जिण सञ्चन्नू सधनयाण पयासग सारं । अह सवाअट्ठाणं मेयवियारं भणिस्सामि ॥१॥ सदा दुविहा वुत्ता सम्मजुया देसविरइ विरया य । मूलगुणोत्तरगुणया ते दुविहा देससव्वा य ॥२॥ इक्विका वि य चउहा नाणन्नाणेहिं बालभद्देहिं । अहवा दबाईहिं देसे सव्वे य विण्णेया ॥३॥ मूलगुणा पण थूलगपाणाइवायपमुहभेएहिं । सत्त य सिरकाइवया उत्तरगुणिमे विणिदिष्ठा ॥४॥ ते देससव्वओ वि ह तसाण जीवाणमेगपमुहं वा । ते विहु सिरकपमुहा सव्वे णेगेण भेएहिं ॥५॥ जं जं पच्चरकाणं देसे सव्वे य जे पकुञ्छति । भंगगुणेहिं समेहि ते सट्टा णाणगुणजुत्ता॥६॥ तप्पण्णाइविहूणो अइयाराइं वि जे न सम्माई । ते अन्नाणपराणा केवलमुज्जुत्तया जुत्ता ॥७॥ सारं मण्णइ सव्वं पचरकाणं खु भवद्रुहपमई । सुभसंसासंजणिया बाला रुइमत्तसम्मत्ता ॥८॥ जज भणियं समए तं तं वि तह गुरु विणिद्दिष्ठं । इइ मुणिऊण समग्गं कुवंति हु भद्दिया ते य ॥ ९॥ देसे सढो बारस-वयजुत्तो गिहिपसत्तवावारो। सव्वे पडिमाभिग्गहनिरओ णिधूयपावरओ ॥१०॥ जिणपूआ गुरुसेवा सझायझाणसंजमो दाणं । एयारिसनाणाविहा-भिग्गहा हुंति सढाणं ॥११॥ उक्किमझिमजहन्नमेएहि ते वियाणिज्जा । उक्किठो पडिमठिओ मझिमओ बारसवओ य ॥१२॥ एगाइवयजहण्णो सक्रम्मनिरओ जहुत्तविहिकलिओ । भत्ता इय नियम-ज्जुत्तो संपत्तसम्मत्तो ॥ १३ ॥ ॥३॥ For Private & Personal use only Page #77 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दव्वाइचउक्केहि जाणगमाईहि सव्वमेएहिं । जहभावं पडिवज्जिय पञ्चरकाणाइकज्जो य ॥१४॥ सब्बोवहाणनिरओ विहिपडिपुण्णो य सबकज्जेसु । जिणधम्मं परम, सेसमण8 मुणेइ सया ॥१५॥ अरिहंताइपयदससु भत्तिपुव्वं खु संसणिरविरकं । पञ्चरकाणं किंचि होइ णियपरमुभयगाणं ॥१६॥ कुलगणसंघपय; सागारं जइ हविज्ज तो कुज्जा । निरगारपच्चरकाणेवि अरिहंताईणमुझित्था ॥१७॥ अरिहंतसिद्धचेइयसुए य धम्मे य साहुवग्गे य । आयरियउवझाया पवयणे दंसणे दसगं ॥१८॥ अरिहंता विहरंता चउक्कनिरकेवयाइसंजुत्ता । सिद्धा कम्मविमुक्का चेइयपासायपडिमा वा ॥१९॥ सामाइयमाइसुयं धम्मो चारित्तधम्मपरिणामे । तस्साहारो साहू वग्गोत्त दुहणणठ्ठा ॥२०॥ आयरिया तह वायग विसेसगुणसंपयाइसयजुत्ता। पवयणसमओ संघो दंसणमिह मिच्छपडिकूलं ॥२१॥ जइ वि हु सावज्ज हेऊहिं तहवि निरवज्जमणणुबंधपरं । नहु होइ तयठं खलु पच्चरकाणं सुसवाणं ॥२२॥ सारंभं सावज्जाणुबंधयं सव्वहा ण कायव्वं । तप्पच्चइयं णेयं पच्चरकाणं सुसढाणं ॥२३॥ गिहिवावारपरम्मुह सच्चित्ता-बंभचाइणो जइवि । तह वि हु पयदसयस्स य भत्तिपराणं निरणुबंध॥२४॥ कुलगणपभिइपएसु भयणा सागारमियर जयणाओ । कज्जाकज्जविसेसं लाहालाहं तहा नचा ॥२५॥ नामाइचउम्मेया सट्टा तह नामठवणओ सुगमा । इगवीसगुणसमेओ दब्वे समओ जिणमयस्स ॥२६॥ संतो दंतो धीरो असढन्जु परहियत्थकारी य । अविहिवाई उदत्तो अवंचणो पावभीरू य ॥२७॥ सद्धालूओ वियन्नू पइण्णवाई अणिंदसुपरिरको । अत्तगुणमि सुलद्ध-लरको हु परमसमए ॥२८॥ BIRUGARRE*** ** Jain Education onal For Private & Personal use only www.jammelibrary.org | Page #78 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध ॥३८॥ मियभासी करणिक्को सज्जणसेवी विवेयसुपइण्णो । मुरुवयणे ददृचित्तो जुग्गो पवयणसवर्णमि ॥२९॥ जुग्गाणुसारी पणतीसगुणजुत्तो धम्मकम्मसंजुत्तो। ववहार दवओ सो विण्णेओ सुगुरुपयसेवी ॥३०॥ नयसंपुण्णधणोहो सिठ्ठायारप्पसंसओ सययं । नियकुलसीलेहि समं सगुत्तवजं कयवीवाहो ॥३१॥ पावाणुविस्ककारी विसिठ्ठजणक्यसुकिच्चकारिल्लो । कत्थ विन अवण्णवाइ विसेसगुरुजणाईणे ॥३२॥ नो अणतिगुत्तगेहो सुसंगकारी न गेहबहुदारो। कयसुविहिपमुणिसंगो अम्मापियराइभत्तियओ ॥३३॥ विवष्ठाणचाइ निदियवावारकरणनिवित्ती। लाहुच्चियवयकत्ता उन्भडवेसो न कइया वि ॥३४॥ सुस्सुसाइधीगुणजुत्तो जिणधम्ममसईसुणमाणो । काले भोयणरुइओ संतोसे दाणगुणजुत्तो ॥३५॥ साहियतिवग्गरयणो अणोण्णमवाहकालवत्थूहि । कयपडिवत्ती पवित्ती साहुतिहिदीणपमुहाणं ॥३६॥ नयकुग्गहियचित्तो सुगुणो गुणपरकवाय तत्तिल्लों। तहदेसकाल चरियाइ चरमाणो बलाबलं जाणे ॥३७॥ णिच्चं सुदीहदंसी विसेसदरको कयन्न सव्वत्थ । सइओ वुढजणाणं पूयाकडपेसपोसयउ ॥३८॥ जणवल्लहो सलज्जो सोमो य परोबयारनिरओ य । मग्गाणसारिगुणगणसहिओ सहिओ कुडंबेहिं ॥३९॥ पच्चरकाणे कुसलो अद्धाभिग्गहवयाइनियमे य । दवाइचउक्केहि देसे सम्वेगदुगजोगे ॥४०॥ दुविहे वि अइक्कमवइक्वमाइयाराहि तह वइयरेहिं । सुवियारजाणसुगुरूप्पवयणसवणरओ सुद्धसद्धाए ॥४१॥ तिगरणतिजोगजुत्तं सब्वं तदियरं च देसओ भणियं । सावजं सानुबंध सावज्ज निरणुबंधं च ॥४२॥ निरबंघमसावज्जं साणुबंधं तहा असावजं । चउमेयं जं किञ्च पञ्चरकाइ जहाजुरंग ॥४३॥ P॥३८॥ Page #79 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जेहि कम्मादाणष्पमुहा जणणिदणिज्जववहारा । पञ्चस्काया नियगिहवावारा वज्जिया सययं ॥४४॥ तेहि जइ सुद्धकठ्ठाइद लेहिं पयदसगभत्तिमिच्छिज्जा । जम्हा न लोयखिसा हविज्ज सागारओ भयणा ॥ ४५ ॥ थूलतसपाणररकण अहिगारी नो परं स सुहमेसु । गिहिवावारे जइ वि हु किं पुण अरिहाइभत्ती ||४६ ॥ तिकरणतिजोगजुत्तं पञ्चरकाणं सया मुणीणं च । सद्वृाणं संथारे अहवा वत्युं समणुपप्प ॥ ४७ ॥ कयपुढविपञ्चरकाणे पडिमाकारावणे वि न हु दोसा । जलजलणपवणवणाणं ठाणठाणं न कुव्विज्जा ॥ ४८ ॥ जिणपूयाइनिमित्तं जइ कुज्जा अप्पणो सिया सढो । जइ अण्णो न सहाओ हविज्ज नो तत्थ वयदरको ॥४९॥ पूयाए कार्यवहो जइ विहु हुज्जा तहा विसुद्धगणं । जलगलणधम्ममिव जं निरविज्जप्पाण सुहजोगं ॥ ५० ॥ जत्य सहजोगाणं पवित्तिमेत्तं च पापनिव्वित्ती । तं भत्तिजुत्तिजुत्तं परनिरवज्जं न सावज्जं ॥५१॥ जयणा तसाण निचं कायव्वा सा वि जइ अणाभोगे । जं तह पायच्छित्तं जहारिहं तत्थ घेत्तव्वं ॥ ५२ ॥ तिगरणतिजोगजुत्ता मुणिणो वि हु तत्थ जं पए भासा । विहिफलनिसेहमोणप्पयारिया भत्तिकज्जेसु ॥ ५३ ॥ परिणामविसेसाओ पुढवाइ व होइ वि अह जिणाययणे । भणिओ गुणाय एव मुणिविहारुव्व निऊहिं ॥ ५४ ॥ तरइ तित्थविसेसे जह पाहाणो विसज्जियं गरलं । नो मारइ बलपुट्ठि कारइ जह दव्वजोएण ॥ ५५ ॥ चप्पभावओ चिय अग्गी णो डहइ तं हियं कुणइ । तह कायवहो वि तया सुहजोगनिमित्तसंजयणा ॥ ५६ ॥ परिणाम विसेसो वि हु सुहबझगओ सुहफलो होति । ण उ इयरो वेयवहोव्व मिच्छस्स जह विप्पं ॥ ५७॥ सइ सव्वत्थामाभावे जिणाण भावावयाए जीवाणं । वेसि नित्थरणगुणं पुढवाइवहे विमाययणे ॥ ५८ ॥ 20435++++ Page #80 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध साहुनिवासो तित्थगर-ठावणा आगमस्स परिवुद्धी। इकिक भावावइनित्थरणगुणं तु भव्वाणं ॥५९॥ साहूण वासो सद्धम्मदेसणा धम्मकामपरियरणं । तित्थयरष्ठावणाओ परमगुरुगुणागमो भवतो ॥६॥ सझायझाणकरणे आगमपरिवणं तओ नियमा। रागादीण पहाणं तत्तो मोस्को सया सोस्को ॥६॥ ता इह सुहबझराओ संविग्गस्स जयणापवत्तस्स । जिणभवणकायघाए परिणामो होइ जीयस्स ॥२॥ मुत्तगसरीरदव्वस्स पूया भवियत्तकम्मनिद्दलणी । नो आरंभपवित्ती पसत्तया सम्मसुद्धिकरी ॥३॥ जस्स य सुद्धो भावो णिरकेवो तत्थ तं मुहपबंधं । अत्तष्ठपरठमुभयमिदियरागेहि पडिबंधं ॥६४॥ निरकेवा सुद्धं जं तद मुच्चावरेहितं भयणा । सागारमणागारं जह बुत्तं तं निरवहेज्जा ॥६५॥ सिरकावयंमि जइ व य अइरिते धम्मकज्जमुठविए । साहुव्व तत्थ इरियापरएहि तत्थ कायव्वं ॥६६॥ पडिमापडिवण्णाणं पुण तिकरणजोओ तसंगओ जम्हा । नो कहमियराणं पुण देसवयाणं न धम्मट्टा ॥६॥ कयकम्मादाणवओ जिणभूसणकरणकारणे निरओ । वणकम्मवओ वि जिणवरपूयणकुसुमाणि उवचिणइ ॥८॥ एमाइ सव्वकरणे न दोसपोसो वि कहवि सढाणं । नियगिदियत्थमाहण-संकप्पो जाव न हु हुज्जा ॥६९॥ उक्किट्ठजहन्नमज्झिम-वयधणसत्तीहि भत्तिनिम्माणे । पासायाइविहाणे आयवयं समतुलिज्जा य ॥७॥ गिहिकज्जे वि विगिंचइ पञ्चरकाणं खु देसकालाइ । जाणगचउभंगमी सइअंतद्धाण वज्जिज्जा ॥१॥ सइ एयंमि गुणेहिं संजाए भावसावगत्तंमि । तस्स पुण लरकणाई एयाई भणंति गीयत्था ॥७२॥ कयधम्मो १ तह सीलवं २ च गुणवं च ३ उज्जु ववहारी ४ । गुरुसुस्सूसो ५ पवयणकुसलो ६ खलु सावगो भावे ॥७३॥ ॥३९॥ For Private & Personal use only Page #81 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भावगयाई सतरस मुणिणो एयस्स बिति लिंगाई । जाणिय जिणमयसारा समयन्नूणो जओ आहु ॥७४॥ इत्थि १ दिय २ त्थ ३ संसार ४ विसय ५ आरंभ ६ गेह ७ दंसणओ८। गडरिगाइं पवाहे ९ पुरस्सर आगम पवित्ती १० ॥ ७५ ॥ दाणाइ जहा सत्ती पवत्तणं ११ विहिर १२ रत्तदुठाई १३ । मझत्थ १४ मसंबद्धे १५ परत्थकामी अभोगी य १६॥७६॥ बेसाइव गिहवासं पालइ १७ सत्तरस गुण निबद्धंतु । भावगयभावसावग लरकणमेयं समासेण ॥७७॥ एयस्स य लिंगाई सयला मग्गाणुसारिणी किरिया १ । सद्धा पवरा धम्मे २ पण्णवणिज्जत्तमुज्जुभवा ३ ॥७८॥ किरियासु अप्पमाओ ४ आरंभो सक्कणिज्जणुठाणा ५ । गुरुओ गुणाणुराओ ६ गुरुआणाराहणं परमं ७ ॥७९॥ लद्धं दंसणरयणं जे निमित्तं तं बहु समन्नेइ । परदोसाण पलोए भावइ न कम्मसंवायं ॥८॥ थिरकरणतं धम्मे सिढिलाणं मुच्छमुद्धजीवाणं । इच्चाइयलिंगाई भावसढुस्स वुत्ताइ ॥८१॥ नहु अप्पणा पराया साहूणो सुविहिया य सढाणं । अगुणेसुय नियमावं कयावि कुब्वंति गुणिसदा ॥ ८२ ॥ प्रणामंगलपडिक्कमणसक्कथयनामचेइसुयसिद्धा । एसि तवोवहाणाइ विहिजुत्तो संभवे तत्थ ॥८३॥ इंदियजोयकसायविजयतबाईण करणसवरओ । पडिमाभिग्गहधारी तत्थ सया जहक्कम हुज्जा ॥८४॥ वयपडिमाण विसेसो को इत्थ हविज सीसजणपुच्छा । अन्न १ सहस्सा २ गाराविणा निरालंबणा पडिमा ॥८५॥ रायाइपयसमेओ बहुविहमेएहि हुज्जवय धम्मो । सागारजहागहिओ पडिमा पुण मेयभिण्णाणो ॥८६॥ वह कहवि एमवारं हविज रायाइपयसमालंबो। तो पविजइ चरणं पुण करणं अणसणं खु जहा ॥८॥ Wwrijainelibrary.org Page #82 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध ॥४०॥ दसण १ वय २ सामाइय ३ पोसह ४ पडिमा ५ अर्बम ६ सचित्ते ७ आरंभ ८ पेस ९ उद्दिष्ठवज्जए १० समणए य ११॥ ८८॥ जस्संखा जा पडिमा तस्संखा तीइ हुंति मासा वि । कीरंतिसु वि कज्जाओ तासु पुब्बुत्तकिरियाओ ॥८९॥ पसमाइगुणविसुद्धं कुग्गहसंकाइसल्लपरिहीणं । सम्मइंसणमणहं दंसणपडिमा हवइ पढमा ॥९॥ एया- खलु एक्कारस गुणठाणगभेयओ मुणेयव्वा । समणोवासगपडिमा बज्झाणुट्ठाणलिंगेहि ॥९१॥ जम्हा दंसणपमुहाण कज्जमुपत्तिकायकिरियाइ । सम्म लरिकज्जइ तिवेलपूयाओ पढम पडिमा ॥१२॥ सुस्सूस धम्मराओ गुरूण देवाणं जहा समाहियं । वेयावच्चे नियमो दंसणपडिमा भवे एसा ॥१३॥ वावन्नदंसणाणं निन्हयहाछंदकुग्गहहयाणं । मणसावि न वंदंति य दंसणपडिमाठिया सदा ॥९४॥ बीयाणुव्वयधारी सामाइयकडो हविज्ज तइयाए । होइ चउत्थी चउद्दसीअट्टमाईसु दियहेसु ॥९५॥ पोसहवउविहं पी पडिपुन्नं सम्म सो य अणुपाले । बंधाइअइयारे पइन्नओ वज्जमाईसु ॥१६॥ पोसहकिरियाकरणं पव्वेसु चउसु तहा सुपरिसुद्धं । जइ भवभावपसाहग मणहं तह पोसहप्पडिमा ॥९॥ असिणाण वियडभोई मोलियडो दिवसबंभयारी य । रत्तिपरिमाणकडो पडिमावज्जेसु दिवसेसु ॥९८॥ चउदिसि काउसग्ग-प्पडिमाकरणं तु इह भवे पडिमा । पुव्वुत्तसयलकिरियाजुत्तो वा जावपणमासा ॥९९॥ एवं किरियाजुत्तो बंभं वज्जेइ नवरि राई पि । छम्मासावहि नियमा एसा हु अचंभपडिमत्ति ॥१०॥ सिंगारकहाविभूसुक्करिसं इत्यीकहंमि वजंतो। चयइ अबंभमेग-तओ य छठीइ छम्मासे ॥१०१॥ यो चउद्दसीजमाईसु । पडिमा ॥९॥ ॥४॥ Page #83 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जावज्जीवाए वि हु एसा बंभस्स य वज्जणा होई । एवं चिय जोयजुत्तो सावगधम्मो बहुप्पयारो ॥१०२॥ एवं विहो वि नवरं सच्चित्तं पि परिवज्जए सव्वं । सत्त य मासे नियमा फासुयभोयणग तप्पडिमा ॥१०३॥ सत्तमि सत्त उ मासे नवि आहरइ सन्चित्तमाहारं । जा जा हिट्टिल्ल किरिया नवरमुवरिमाण सा सव्वा ॥१०४॥ आरंभसयमकरणमट्टमिया अट्टमासं वज्जेइ । असिणाणो वि हु पूयापरायणो उसिणजलन्हाणो ॥१०५॥ जावज्जीवं सच्चित्तवज्जणा होइ जस्सावि । कयपूओ भुंजेमित्ति पइण्णो जस्स तरसेवं ॥१०६॥ नवमी नवमासं पुण पेसारंभ विवज्जए सव्वं । पुवकिरियासमेओ पूया कप्पूरवासेहिं ॥१०७॥ दसमी पुण दसमासं उद्दिकडंपि तत्थ न भुंजे । छुरमुंडो ससिहो वि हु सज्झायज्झाण पुव्वुत्तो ॥१०८॥ जनिहियमत्थजायं पुच्छतं सुयाण नवरि सो तत्थ । जइ जाणइ तो साहइ अह नवि तो बेइ न वियाणे ॥१०९॥ खुरमुंडो लोएण व रयहरणपडिग्गहं च गिण्हेत्ता । समणभूओ विहरइ मासा इक्कारमुक्कोसं ॥११०॥ नियकुलनिस्साए वा साहम्मियाण भिरकत्थमुवहिंडे । पडिमापडिवनस्स य दलाहि मे भिरकमिइवयणो ॥१११॥ मुविसहीओ बहिया वसही पुब्बुत्तज्झाणसंजुत्तो । गामंतरे बिहारं साहुव्व करिज्ज मपमाओ॥११२॥ ससहाओ जइ नईवि संतरिज्जा वि तहाविहे कज्जे । भावस्थयसंजुत्तो दधत्थयमित्थ नो कुज्जा ॥११३॥ आसेविऊण एया पडिवज्जइ सव्वविरइ महदेसे । गिहिभावं पडिवज्जइ कोवि पुणो जह तहा भावे ॥११४॥ अंतमुहुत्तप्पमाणा सव्वा पडिमा जहन्नओ हुंति । उक्किठ्ठा पुण एवं भणिया सिरिखीणरागेहि ॥११५॥ ॥ इति श्राद्धप्रतिमाधिकारः॥ Page #84 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रक. संबोध ॥४१॥ ॥ अथ श्राव्रताधिकारः॥ पाणिवह १ मुसावाए २ अदत्त ३ मेहुण ४ परिग्गहे विरओ५। दिसि ६ भोग ७ दंड ८ समए ९ देसे १० तह पोसह ११ विभागे १२ ॥१॥ जीवा मुहुमा धूला संकप्पारंभओ य ते दुविहा । सावराह निरखराहा साविरका चेव निरविरका ॥२॥ दुतिचउरिदिय पाणा भूया पत्तेय तरुगणा नेया । सव्वे पणिदि जीवा सेसा सत्ता थिराईया ॥३॥ सुहुमा सव्वत्य ठिया अहवा णो चम्मचरकुणो गिन्झा । थूला तसावि दुविहा चरकुगिज्झा अगिज्झा य ॥४॥ वहबंधछविच्छेए अइभारे भत्तपाणरोहे य । पढमाणुव्वयंमि य अइयारा पंच विण्णेया ॥५॥ संकप्पो संरंभो परितावकरो भवे समारंभो । आरंभो उद्दवओ सब्चव(न)याणं विसुद्धाणं ॥६॥ आभोगाणाभोगे इक्किको सो हविज्ज दुहओ य । अइक्कमवइक्कमअईयाराणायारेहिं सव्वगया ॥७॥ भूजलजलणानिलवणबितिचउपंचिदिएहिं जे जीवा । मणवयणकायगुणिया वहंति ते सत्तवीसेत्ति ॥८॥ इक्कासीइ करणकारणाणूमईहिं ताडिया होइ । सच्चिय तिकालगुणिया दुन्निसया हुँति तेयाला ॥९॥ पाणिवहे वहता भमंति भीमासु गम्भवसहीसु । संसारमंडलगया णिरयतिरिरकासु जोणीसु ॥१०॥ देसे भंगो सवंमि नी भंगमित्थपरिणामे । एवं भंगाभंगं अइयारे लरकणं नेयं ॥११॥ जं भारुग्गमुदग्गमप्पडिहयं आणेसरत्तं फुडं । रूपं अप्पडिरूवमुज्जलधरा कित्ती धणं जुम्वणं दीहं आउमवंचनो परियणो पुत्ता विणीया सया । तं सम्वं सचराचरंभि वि जए नूणं दयाए फलं ॥१२॥ ॥४१॥ For Private & Personal use only Page #85 -------------------------------------------------------------------------- ________________ धण्णाण धणररकट्ठा कीरति वईओ जहा तहेवेत्थ । पढमवयररकणट्ठा कीरति वयाई सेसाई ॥१३॥ किताए पढियाए पयकोडीए पलालभूयाए । जं इत्तियं न नायं परस्स पीडा न कायव्वा ॥१४॥ किं सुरगिरिणो गरुयं जलनिहिणो किं व हुज्ज गंभीरं । किं गयणाओ विसालं को य अहिंसासमो धम्मो ॥१५॥ अलियं न भासियव्वं अत्थि हु सच्चपि जं न वत्तव्वं । सच्चपि तं न सच्च जं परपीडाकरं वयणं ॥१६॥ दुविहो य मुसाबाओ सुहुमो थूलो य तत्थ इह सुहुमो । परिहासाइप्पभवो थूलो पुण तिव्वसंकेसा ॥१७॥ कन्नागहणं दुपयाणं सूयगं चउपयाण गोवयणं । अपयाणं सव्वाणं धण्णाणं भूमिवयणं तु ॥१८॥ सहसाकलंकणं १ रहसदूसणं २ सदारमंतमेयं च ३। तह कूडलेहकरणं ४ मुसोवएसो ५ मुसादोसो ॥१९॥ लाउयबीयं इक्कं नासइ भारं गुडस्स जह सहसा । तह गुणगणं असेसं असच्चवयणं विणासेइ ॥२०॥ वायसपयमिक्कं पि हु सामुद्दियलरकणाण लरकंपि । अपमाणं कुणइ जहा तह अलियं गुणगणं सयलं ॥२१॥ तालपुडं गरलाणं जह बहुवाहीण खित्तओवाही । दोसाणमसेसाणं तह अविगिच्छा मुसादोसो ॥२२॥ ज जं वच्चइ जाई अप्पियवाई तर्हि तहिं होइ । न य सुणइ सुहे सद्दे सुणइ य सोयव्वए सद्दे ॥२३॥ दुग्गंधो पूइमुहो अणिवयणो अफरुसवयणो य । जलएलमूयमम्मण अलियवयणपणे दोसा ॥२४।। इह लोएच्चिय जीवा जीहाछेयं वहं च बंधं च । अपसं धणनासं वा पार्वति य अलियवयणाओ ॥२५॥ सामी जीवादत्तं तित्थयरेणं तहेव य गुरुहि । एवमदत्तसरूवं परूवियं आगमघरेहिं ॥२६॥ सामी अदत्तं सहाण पडिसेहो थूलओ जईण पुणो । सव्वमदिनादाणं चउप्पयारं भवे जम्हा ॥२७॥ Jain Education Stional For Private & Personal use only ww s brary.org Page #86 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध -॥४२॥ चोराणीयं १ चोरप्पओगगं.२ कूडमाणतुलकरणं च ३। रिउरज्जववहारो ४ सरिसजुई ५ तइयवयदोसा ॥२८॥ उचियं मुतृण कलं दवाइकमागयं च उक्करिसं । नियडियमजाणतो परस्स संतं न गिव्हिज्जा ॥२९॥ भलणं १ कुसलं २ तज्जा ३ रायमेया ४ बलोयणं । अमग्गदसणं ६ सिज्जा ७ पयभंगो८ तहा पुणो ॥३०॥ विस्सामण ९ पायपडणं १० चासणं ११ गोवणं १२ तहा । महरज्जा १३ तहपहा १४ जला १५ निल १६ रज्जु १७ दाणं १८ च ॥३१॥ सव्वं वियाणइत्ता जं किज्जइ तं अदत्तदाणं च । एया तेणपसूई णेया अठार तइयवए ॥३२॥ खित्ते खले अरपणे दिवा य राओ विसत्थयाए वा । अत्थो से न विणस्सइ अचोरियाए फलं एयं ॥३३॥ गामागरनगराणं दोयमुहमडंबपट्टणाणं च । सुइरं हवंप्ति सामी अचोरियाए फलं एवं ॥३४॥ इह चेव खरारुहणं गरहाधिक्कारमरणपज्जंतं । दुरकं सकरपुरिसो लहंति निरयं परभवंमि ॥३५॥ निरयाओ उवट्टा केवट्टा कुंटमुटबहिरंधा । चोरिक्कवसणनिहया हुंति नरा भवसहस्सेसु ॥३६॥ भुंजइ इत्तरपरिग्गह १ मपरिग्गहियं थियं २ चउत्थवए । कामे तिब्बहिलासो ३ अणंगकीला ४ परविवाहो ५ ॥३७॥ दुविहं दिव्वमुरालं करणकारणाणुमइतिमेयजुयं । मणवयणकायगुणियं नवहाठारसविहं मिलियं ॥३८॥ छन्नंगदसणे फासणे य गोमुत्तग्गहणकुस्सुमिणे । जयणा सव्वत्थ करे इंदिय अवलोयणे य तहा ॥३९॥ वसहिकहनिसिजिदियकुडुतरपुवकीलियपणीए । अइमायाहारविभूसणाइ नव बंभब्वयगुत्तीओ ॥४०॥ परदाखज्जिणो (चेव) पंच हुंति तिनि उ सदारसंतुढे । इत्थीए तिन्नि पंच व भंगविगप्पेहिं नायव्वा ॥४१॥ SAROSASSASR558549 ४२॥ For Private & Personal use only Page #87 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 4444 आणाईसरियं वा इट्टी रज्जं च कामभोगा य । कीत्ति बलं च सग्गो आसन्ना सिद्धि बंभाओ ॥४२॥ कलिकाओ fव जणमारओ वि सावज्जजोगनिरओ वि । जं नारओ वि सिज्झइ तं खलु सीलस्स माहप्पं ॥ ४३ ॥ वह बंधण उब्बंधणनासिदियछेयधणरकयाइया । परदाराओ बहुहा कयत्थणाओ इह भवे वि ॥ ४४ ॥ परलोए सिंबल तिरक - कंटगालिंगणाइ बहुरुवं । नरयंमि दुहं दुस्सहं परदाररया लहंति नरा ॥ ४५ ॥ छिन्नदिया नपुंसा दुरूव दोहरिगणो भगंदरिणो । रंड कुरंडा वंझा निंदु विसकन्ना हुंति दुस्सीला ॥ ४६ ॥ जोएइ खेत्तबत्थूणि १ रूप्पकणयाइ देहसयणाण २ | धणधन्नाइं परघरे बंधइ ३ जानियमपज्जंतो ॥४७॥ दुपाई चप्पयाई गब्भं गद्देइ ४ कुप्पसंखेवो । अप्पधणं बहुमुल्लं ५ करेइ पंचमवए दोसा ॥ ४८ ॥ बझभंतर मेएहिं नायव्वो परिग्गहो दुविहमेओ । मिच्छत्तरागदोसाइ अभितरओ मुणेव्व ॥ ४९ ॥ झो नवविहो ओ धणधन्नखेत्तवत्थुरुप्पाइं । सोवन्नकुवियपरमाण दुपयचउप्पयमुह वृत्तो ॥ ५० ॥ धन्नाइ चउव्वीसं धणरयणाइं वि हुंति चउवीसं । दसहा चउप्पयं पुण दुविहं दुप्पयं कुप्पमेगं ॥ ५१ ॥ • वस्थांवररूवं तिविहं एवं हवंति चउसठ्ठी | अहवा गणिमं १ धरिमं २ मेयं ३ तह पारिछिज्जं च ॥५२॥ गणिमं जाइफलफोप्फलाइ १ धरिमं तु कुंकुमगुडाइ २ । मेज्जं चोप्पडलोणाइ ३: रयणवत्थाइ परिच्छेज्जं ४ ॥ ५३ ॥ धन्नाइ चउव्वीसं जव १ गोहुम २ सालि ३ वीहिया ४ सठ्ठि ५ । कोदव ६ अणुया ७ कंगू ८ राल ९ तिल १० मुग्ग ११ मासा य १२ ॥ ५४ ॥ अयसि १३ हरिमंथ १४ तिऊडिय १५ निप्पाव १६ सिटिंद्र १७ रायमासा य १८ । *%%%% Page #88 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध वारसदाब- इकू १९ मसूर २९ तुवरि २१ कुलत्या २२ तह धनय २३ कलामा २४ ॥१५॥ रयणाई चउवीसं २४ सुवन १ तउ २ तंब ३ रयय ४ लोहाइ ५। सीसग ६ हिरण्ण ७ पासाण ८ वयरमणि मोतियप्पवालं ॥५६॥ संखो तिणिसागुरुचंदणाणि वत्थमल्लाणि कठाइ । नहचम्मदंतवाला गंधा दवोसहाइं च ॥५॥ मूमिगिहा य तरुगण तिविहं पुण थावरं मुणेयध्वं । चक्कारबद्धमाणुस्स दुविहं पुण होइ दुपयं तु ॥५८॥ गावो महिसा ओट्टिय अयएलय आसआसतरगा य । घोडगगद्दहहत्थी चउप्पयं होई पसुयाओ ॥५९॥ णाणाविहोवगरणं णेगविहं कुप्पलरकणं होइ । एसो अत्थो भणिओ छबिह चऊमठ्ठ मेओ य ॥६॥ खित्तं सेउ १ केउ २ उभयमयं३ वत्थुति विहमेवं तु। खाउ १च्छियं २.च खाओच्छिय ३ मेयं तिविह मुणेयव्वं ॥६॥ जह जह अप्पो लोहो जह जह अप्पो परिग्गहारंभो। तह तह सुहं पवढ्इ धम्मस्स य होइ संसिद्धी ॥२॥ आरोग्गसारियं माणुस्सत्तणं सच्चसारिओ धम्मो । विज्जा निच्छयसारा सुहाइं संतोससाराई ॥६३॥ तिरियं अहो य उढं दिसिवयसंखा अइक्कमे तिण्णि । दिसिवयदोसा सइ-विह्मरणं खित्तबुढी य॥६४॥ उवभोगो विगईओ तंबोलाहार पुप्फफलमाई । परिभोगे वत्थसुवण्ण-माईयं इत्थिगेहाई ॥६५॥ भोयणओ कम्माओ दुविहं उवभोगपरियभोगेहिं । वाणिज्जं सामण्णं विण्णेयं तिविहमईयारे ॥६६॥ P॥४॥ अप्पकं दुप्पक्कं सच्चित्तं तह सच्चित्तपडिबद्धं । तुच्छोसहिभरकणयं दोसा उवभोगपरिभोगे ६७॥ सइवेलं खलु भोगो सणपुप्फाईणमसइमुवभोगो । भोगुवभोगं दुविहा संकप्पारंभओ अहवा ॥६८॥ CRORSC - For Private & Personal use only Page #89 -------------------------------------------------------------------------- ________________ समसई कम्मगओ आयाणं सव्वहा परिचाओ । वाणिज्जं ववहारं सामण्णं सव्वसंगाओ ॥ ६९ ॥ निरवज्जाहारेण निज्जीवेणं परित्तमीसेणं । अत्ताणुसंघणपरा सुसावगा एरिसा हुंति ॥७०॥ रंधणखंडणीसणदलणं पयणं च एवमाईणं । निचं परिमाणकरणं अविरइबंधो जओ गुरुओ ॥ ७१ ॥ कटुपिडभवं मज्जे से जलथलखयरेहिं तिहा । अहवा चम्मं उहिर भेएहिं दुविहमामिस्सं ॥ ७२ ॥ गुरुमोहकलहनिद्दा परिभवउवहासरोसमयहेऊ । मज्जं दुग्गइमूलं हिरिसिरिमइ धम्मनासकरं || ७३॥ पंचिदिवभूयं मंसं दुग्गंधमसुइबीभत्थं । ररकपरिच्छलियभरकग मामयजणगं कुगइमूलं ||७४ || आमा अपrary विपञ्चमाणासु मंसपेसेसु । सययं चिय उववाओ भणिओ निगोयजीवाणं ॥ ७५ ॥ मज्जे महुंमि मंसंमी नवणीयंमि चउत्थए । उपज्जेति असंखा तव्वण्णा तत्थ जंतुणो ॥ ७६ ॥ मज्जंगालातीयं महुपुडपुलभावसंपन्न । मंसाई अतणुपत्तं तक्करबहिअं च नवणीयं ॥ ७७ ॥ (तत्था भरकाणि) पंचुंबरि ५ चउविगई ९ हिम १० विस १९ करगे य १२ सव्वमट्टी य १३ । रणी भोयri far १४ बहुबीय १५ मणंत १६ संधाणं १७ ।। ७८ ।। घोलवडा १८ वायंगण १९ अमुणियनामाणि पुप्फफलयाणि २० । तुच्छफल २१ चलियरसो २२ बज्जह द्रव्वाणि बावीस ।। ७९ ।। मेहं पिवलियाओ हणंति वमणं च मच्छिया कुणइ । जूना जलोदरत कोठियओ कोष्ठरोगं च ॥८०॥ वाको सरस्स भंग कंटो लग्गइ गर्छमि दारुं च । तानि विध- अली वंजणममी मुंजते ॥८१॥ JSSUS Page #90 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध ॥४४॥ मालंति महीयलं जा-मिणीसु रयणीयरा समंतेणं । ते विहु च्छलंति हु फुड रयणीए भुंजमाणं तु ॥२॥ जीवाणं कुंथुमाईण घायणं भाणधोयणाईसु । एमाइ रयणीभोयणदोसे को साहिउं तरइ ॥३॥ सवेसु वि देसेसु सव्वेसु वि चेव तह य कालेसु । कुसुणिसु आमगोरस-जुत्तेसु निगोयपंचिंदी ॥४॥ जमि उ पीलिज्जते नेहो नहु होइ बिति तं वियलं । विदले वि हु उप्पन्नं नेहजुयं होइ नो विदलं ॥८५।। उग्गममाणो विदलं विदल सव्वं च कठ्ठदलयं च । निन्नेहं समदलयं जं हुज्जा तं हवे विदलं ॥८६।। निन्नेहविदलसंभवमवितयपत्ताइसव्वमविविदलं । जइ गोरसंमि पडइ ता तस जीवाण उप्पत्ती ॥८॥ जइमुग्गमासपभिइविदलं कच्चमि गोरसे पडइ । ता तस जीवुप्पत्ति भणति दहिए वि बिदिणुवरि ॥८८॥ दव्वंतरसंपत्ते सीए विहु गोरसंमि उसिणंमि । उसिणे वि अवरकेवो न जुज्जए गोरसाईणं ।।८९।। सवाओ कंदजाई सूरणकंदो य वज्जकंदो य । अल्लहलिद्दा य तहा अल्लं तह अल्लकच्चूरो ॥९॥ सत्तावरी विराली कुंआरि तह थोहरी गलोइआ । लसणं वंसकरिल्ला गज्जरलूणो य तह लोढो ॥९१॥ गिरिकण्णी किसलपत्ता खरंसूया थेग अल्लमुत्थाय । तह लोणरुरकच्छल्ली खिल्लुहडा अमयवल्ली य ॥१२॥ मूला तह भूमिरुहा विरुहा तह ढंकवत्थुल्लो । पढमो सूयरवल्लो य तहा पल्लंको कोमलंबिलिया ॥९३॥ आलू तह पिंडालू हवंति एए अणंतनामेणं । अण्णमणंतं नेयं लरकणजुत्तीइ समयाओ ॥९४।। गूढसिरसंधिपव्वं सच्छीरंजं च होइ निच्छीरं । समभंगं छिन्नरुहं साहारणसरीरय जाण ॥९५॥ इंगाली बणसाडी भाडी फोडी सुवज्जए कम्मं । वाणिज्जं चेव दंतलस्करस केस विस विसयं ॥ ९६ ॥ ॥४४॥ Jain Education Wational www.nelibrary.org Page #91 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एवं खुजतपील्लया कम्म निल्लंकणं च दवदाणं । सरदहतलाय सोसं असइपोसं घ वज्जिज्जा ॥९॥ जं इंदियसयणाई पडच्च पावं करेज सो होइ । अत्थे दंडे इत्तो अन्नो उ अणत्यदंडो य ॥९८॥ तह वज्झाणायरियं पावोबएसं च हिंसदाणाई । चउत्थं पमायचरियं अवज्झाणं अहरुद्देहि ॥१९॥ सत्थग्गिमुसलजंतग तणकट्ठे मंतमूलभेसज्जे । दिन्ने दवाविए वा हिंसप्पयाणमणेगविहं ॥१०॥ न्हाणुव्वट्टणवनग-विलेवणे सहरूवरसगंधे । वत्थासणआभरणे पावृवएसमणेगविहं ॥१.१॥ कुक्कुइयं मोहरियं भोगुवभोगाइरेगकंदप्पा । जुत्ताहिगरणमेए अइआरा णस्थदंडवए ॥१०२॥ सामाइझं करितो पंचुवगरणाइसंजुओ सड्ढो । मुहपत्ती रयहरणं अस्का दंडाण पुंच्छणगं ॥१०३।। सावज्जजोगविरओ तिगुत्तो छसु संजओ । उवउत्तो य जयमाणो आया सामाइयं होइ ॥१०४॥ जो समो सवभूएस तसेसु थावरेसु य । तस्स सामाइयं होइ इमं केवलिभासियं ॥१०५॥ सामं समं च सम्मड्गमिइ सामाइयस्स एगठा । तस्स सामाइयं होइ एयं केवलिभासियं ॥१०६॥ महुरपरिणाम सम्मं समं तुला सम्मखीरखंडजुई। दोरे हारस्स ठिई इगठमियाई तु दवमी ॥१०॥ आउवमाइ परदुरकमकरणं १ रागदोसमज्झत्थं २ । नाणाइतियं ३ तस्साइ पोयण ४ भावसामाई ॥१०८॥ सामाइयं तु काउं गिहकजं जो य चितए सहो। अट्टवसट्टोवगओ निरत्थयं तस्स सामाइयं ॥१०९॥ न सरइ पमायजुत्तो जो सामाइयं कया य कायव्वं । कयमकयं वा तस्स हु कयं पि विहलं तयं नेयं ॥११०॥ सामाइयंमि उ क्रए समणो इच सावओ हवइ जम्हा । एएण कारणेणं बहुसो सामाइयं कुज्जा ॥१११॥ Page #92 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध जीवो पमायबहुलो बहुसो वि य बहुविहेसु अत्थेसु । एएण कारणेण बहुसो सामाइयं कुज्जा ॥११२॥ दिवसे २ लरकं देइ सुवन्नस्स खंडियं एगो । एगो (इयरो) पुण सामाइयं करेइ न पहुप्पए तस्स ॥११॥ सामाइयं कुणतो समभावं सावओ यं घडियदुगं । आउं सुरेसु बंधइ इत्तियमित्ताइं पलियाई ॥११४॥ बाणवईकोडीओ लरका गुणसटि सहस्स पणवीसं । नवसय पणवीसाए सतिहा अडभागपलियस्स ॥११५॥ अंकतोऽपि । ९२ ५९ २५ ९२५॥ |८|१| |९|३| तिव्वतवं तवमाणो जन वि निवइ जम्मकोडीहिं । तं समभावियचित्तो खवेइ कम्म खणद्वेण ॥११६॥ जे के वि गया मोरकं जे वि य गच्छंति जे गमिस्संति । ते सव्वे सामाइयमाहप्पेणं मुणेयव्वं ॥११७॥ कायमणोवयणाणं दुष्पणिहाणं सइअकरणं च । अणवठ्ठियकरणं चिय सामाए पंच अइयारा ॥११८॥ पुछि दिसिवयमाणं जं विहियं जम्मपभिइ देसिक्कं । तं चेव मुहुत्तमित्तं जहन्नओ सव्ववयमाणं ॥११९॥ एगमुहत्तं दिवसं राई पंचाहमेव परकं वा । वयमिह धारेह दढं जावइयं उव्वहे कालं ॥१२०॥ सच्चित्तदध्वविगई-वाणहतंबोलवत्थकुसुमेसु । वाहणसयणविलेवणबंभदिसिन्हाणभत्तेसु ॥१२१॥ देसावगासियं पुण दिसिपरिमाणस्स निच्चसंखेवो । अहवा सव्ववयाणं संखेवो पइदिणं जो उ ॥१२२॥ आणवणं पेसवणं सदाणुवाओ य रूवअणुवाओ। बहिपुग्गलपरकेवो दोसा देसावगासिस्स ॥१२३॥ पोसं पुट्टि धम्मस्स धारिजइ तेण पोसहो भणिओ। पव्वमि जो भत्तटुं सो पोसहोवाससवाणं ॥१२४॥ ॥४५॥ in Education International Page #93 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तत्थाहारसरीरा-बंभव्वावारभेयओ चउहा । देसे सव्वे य तहा अडभंगा पोसहे भणिया ॥१२५॥ दुगसंजोगे छक्कं चउवीस चउगुणा कमेण इमे । तियसंजोगे चउरो छत्तीसं हुंति सव्वे वि ॥१२६॥ चउसंजोगि सोलस असीइ भंगा हवंति ते सव्वे । संपइ मइदुग्बलाओ देसे सव्वेहिं आहारो ॥१२॥ तं सत्तिओ करिज्जा तवो य जो वनिओ समणधम्मे । देसावगासिएणं जुत्तो सामाइएणं वा ॥१२८॥ जो सामाइयजुत्तो दुविहं तिविहेण होइ सो नियमा । संपइ एसोत्थ विही कुसलस्स जहाजहं भयणा ॥१२९॥ कंचणमणिसोवाणं थंभसहस्सूसियं सुवण्णतलं । जो कारिज्जइ जिणहरं तओ वि तवसंजमो अहिओ ॥१३०॥ पोसेहि सुहे भावे असुहाई खवेइ नत्थि संदेहो। छिदइ नरयतिरिगइ पोसहविहिअप्पमत्तो य ॥१३१॥ सामाइअसामग्गि अमरा चिंतंति हिययमज्झमि । जइ हुज्ज पहरमिक्कं ता अम्ह देवत्तणं सहलं ॥१३२॥ पोसहमसुहनिरंभण-मपमाओ अत्थजोगसंजुत्तो । दव्वगुणठ्ठाणगओ एगठ्ठा पोसहवयस्स॥१३३॥ सत्तहत्तरि सत्तसया सतहत्तरि सहस सत्तकोडीओ। सगवीस कोडिसया नव भागा सत्त पलियस्स ॥१३४॥ अंकतोऽपि । ७७७७७७७७७७८ | ५०/५० ७/७॥ अपडिले हिय अपमज्जियं च सिज्जाइ थंडिलाणि तहा। सम्मं च अणणुपालण ५ मइयारा पोसहे पंच ॥१३५॥ वेहिं लोइयपव्वतिहि-वजओ भोयणंमि वेलाए । संपत्तो गुणजुत्तो साहू वा सडओ भणिओ ॥१३६॥ तस्स य जो संभागो निरवज्जाहारवत्थपत्तवत्थूणं । जो अइहिसंविभागो विष्णेयो निच्चकरणिज्जो ॥१३॥ न For Private & Personal use only wahaahelibrary.org Page #94 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध ॥४६॥ सच्चित्ते निरिकवर्ण सचिसपिहणं च अन्नववएसो । मच्छरिय तह काला इक्कममिइ पंच अइयारा ॥१३८॥ साहूण कप्पणिज्जं जं न वि दिन्नं कहं पि किंचि तहिं । धीरा जुहुत्तकारी सुसावगा तं न मुंजंति ॥१३९॥ वसहीसयणासणभत्तपाणभेसजवत्थपत्ताइ । जइ वि न पञ्जत्तधणो थोवा वि हु थोवर्ष देइ ॥१४०॥ इहपरलोयासंसा जीवियसंसा य मरणआसंसा । तह कामभोगसंसा भइयारा पंच संलिहणे ॥१४१॥ सीलव्वयाइं जो बहुम्फलाइं हंतूण सुरकमभिलसइ । धिइदुबलो तवस्सी कोडीए कागिणी कुणइ ॥१४२॥ निव १ सिष्टि २ इत्धि ३ पुरिसे ४ परपवियारे य ५सपवियारे य । अपरय सुर८ दरिद्दे ९ हुज्जा नव नियाणाई॥१४३॥ सुबहु पि तवं चिन्नं सुदीहमवि पालियं च सामण्णं । तो काऊण नियाणं मुहाई हारिति अत्ताणं ॥१४४॥ उद्गामी रामा के सबसव्वे विज अहोगामी । तत्थ वि नियाणकारणमओ य मइम इमं वजे ॥१४५॥ काले विणए बहुमाणुवहाणे तहा अनिम्हवणे । वंजणअस्थतदुभए अविहो नाणमायारो ॥१४६॥ निस्संकिय निक्कंखिय निवितिगिच्छा अमूदादिठी य । उवव्हथिरीकरणे वच्छल्लप्पभावणे भट्ठ॥१४७॥ पणिहाणजोगजुत्तो पंचहि समिईहि तिहि गुत्तीहि । चरणायारा तिन्हि वि विवरीयाए अईयारा ॥१४८॥ अणसणभूणोयरिया वित्तीसंखेवणं रसच्चाओ। कायकिले सो संलीण-या य बज्झो तवो होइ ॥१४९॥ पायच्छित्तं विणओ वैयावच्च तहेव सज्झाओ । झाणं उस्सग्गो वि य अम्भितरओ तबो होइ ॥१५०॥ सम्ममकरणे बारस तवाइयारा तिगं तु वीरियस्स । मणवयकाया पावपवत्ता वीरियत्तिगइयारा ॥१५१॥ सम्मत्ते विजयमिवोऽहिंसाए हरिबलो मुसे कमलो। वरदत्तोऽदिम्नमि बंभवए सीलबह इत्थी ॥१५२॥ 1४६॥ For Private & Personal use only Page #95 -------------------------------------------------------------------------- ________________ घणसेही परिग्गहमी दिसिपरिमाणमि होइ महाणंदो । मंतिसुया उवभोगे मित्ततयं रपणिभोयणए ॥१५३॥ मियसुंदरी उ लोए अणदंडंमी वीरसेणनियो । सामाए धणमित्तो धणदो देसाबगासमी ॥१५४॥ पोसहवयंमि हु देवकुमरो तह पेयकुमरदिद्रुता । गुणधरगुणाकराणं दिटुंता अइहिसंभागे ॥१५५॥ ॥ इति श्रावकव्रताधिकारः॥ ॥ अथ संज्ञाधिकारः॥ आहारभयपरिग्गह मेहुणे तह कोह माण मायाए । लोभे लोगे ओघे सन्नदस भेया सव्वजीवाणं ॥१॥ रुरकाण जलाहारो समिच्च सत्थं भएण संकुचए । नियतंतेहिं वेढइ वल्ली रुरकं परिग्गहेइ ॥२॥ कुरुबयतरुणो फुल्लति जत्थ आलिंगण तरुणीणं । तरुणीपयोहरपुठ्ठा असोयतरुणो वि वियसंति ॥३॥ तरुणीमइरागंण तोसिया केसरा वि कुसुमति । चंपयतरुणो वरुणो फुल्लंति सुरहिजलसिच्चा ॥४॥ वियसंति तिलयतरुणो तरुणिकडरकेहि पडिहया जत्थ । फुल्लंति विरहरुरका सोऊणं पंचमुग्गारं ॥५॥ सिणगार चारुवेसो तरुणीतंबोलसंगओ तारो । पायं कोकणदस्स कंदो हुंकारो मुयइ कोहेण ॥६॥ माणे झरई रुयंती च्छायद वल्ली फलाण मायाए । लोहे बिल्लपलासा खवंति मूले निहाणुवरि ॥७॥ रयणीए संकोओ कमलाणं होइ लोगसण्णाओ। ओहे चइत्तु मग्गं चढंति रुस्केसु वल्लीओ ॥८॥ एगिदियजीवाण वि इय दस सन्ना जिणेहि पण्णत्ता। न ह हुंति मोहसुहदुह-वितिगिच्छासोगधम्मा य ॥९॥ ॥ इति संज्ञाधिकारः॥ Jain Education int o nal For Private & Personal use only www.trialibrary.org Page #96 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मकर संबोध ॥४॥ ॥अथ लेश्याधिकारः॥ सन्नाणं लेसाणं मेओ वा अत्तवेयणा सण्णा। सा दुविहा जीवाणं सुद्धासुद्धा य वीरियभवा ॥१॥ तत्थ परिणामजणिया सिलेसदव्वप्पकम्मगयभावा । कव्हाइ दव्वसइ वा फलिहस्सिव दवओ अप्या ॥२॥ (दिलुता जहा) जह जंचूपायवेगो सुपक्कफलभारनमियसव्वंगो। दिठो आह किमन्ने ते बिति जंबू भरकेमो ॥३॥ दिद्रुतस्सोवणओ च्छिदह मूलाओ बेइ जो एवं । सो वट्टइ किण्हाए साहमहल्ला य नीलाए ॥४॥ हवइ पसाहा काऊ गुच्छा तेऊ फलाइं पम्हाए । पडियाइ सुक्कलेसा अहवा अन्नं इमाहरणं ॥५॥ चोरा गामवहत्थं विणिग्गया एगु बेइ घाएह । जं पिच्छह तं सव्वं दुपयं चउप्पयं वा वि ॥६॥ बीओ माणुस, पुरिसे तइओ, वह साउहे चउत्थो उ । पंचमओ जुझंते, छठ्ठो पुण तत्थिमं भणइ ॥७॥ इक्कं ता हरह धणं बीयं मारेह मा कुणह एयं । केवल हरह धणे ता उवसंहारो इमो तेसिं ॥८॥ सव्वे मारेहित्ती वट्टइ सो किण्हलेसपरिणामो । एवं कमेण सेसा जा चरमो सुक्कलेसाए॥९॥ (संग्रहणी चेयं) मूलं १ साह २ पसाहा ३ गुच्छ ४ फले ५ छिंद पडियभरकणया ६। सव्वं १ माणुस २ पुरिसा ३ साउह ४ झूझंत ५ धणहरणा ६ ॥१०॥ वेरेण निरणुकंपो अइचंडो दुम्मुहो खरो फरुसो । किण्हाइ अणझप्पो वहकरणरओ य तत्कालं ॥११॥ मायादमे कुसलो उक्कोडालद्धचबलचलचित्तो । मेहुणतिव्वभिरओ अलियपलावी य नीलाए ॥१२॥ मूदो आरंभपिओ पावं न गणेइ सव्वकज्जेसु । न गणेइ हाणिवुढी कोहजुओ काउलेसाए ॥१३॥ ॥४७॥ For Private & Personal use only Page #97 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दरको संवरसीलो रिजुभावो दाणसीलगुणकुसलो । धम्मंमि होइ बुद्धी अरूसणो तेउलेसा ॥ १४ ॥ सत्तणुकंपो य थिरो दाणं खलु देई सव्वजीवाणं । अइकुसलबुद्धिमंतो धिइमंतो पहलेसा ॥ १५ ॥ धम्मंमि होइ बुद्धी पावं वज्जेइ सव्वकज्जेसु । आरंभेसु न रज्जइ अपरकवाई य सुक्का ||१६|| हाई व्वजोयण फलिहस्सिव अप्पणो यं परिणामो । जायइ कज्जपवित्ती दव्वओ सा भवे लेसा ॥ १७॥ परिणाम सव्वत्थ वि जायइ समत्तकज्जसंपत्ती । सा या भावलेसा कम्मनिस्संदरूवा य ॥ १८ ॥ लेसाणं परिणामा तिगनवइगसीइदुसयतेयालं । बहुं वा बहुविहं वा हुंति य जा सुक्कलेसाओ ॥१९॥ पत्तेयं लेसाओ अणतवग्गणमईओ पण्णत्ता । तहाणंतासंखिज्जप्पएसगाढाओ सव्वाओ ॥२०॥ अज्झवसायड्डाणाणि तासिं संखाइयाणि सव्वासिं । खित्तओ असंखलोगा-गाससमाणिप्पमत्ताइ ॥ २१ ॥ असंखिज्जाण उस्सप्पिणीण वस्सप्पिणीण जे समया । संखाईया लोगा लेस्साणं हुंति ठाणाई ॥२२॥ जोगगयदव्वलेसा के वि भांति जावजोगीणं । तो ण अजोगित्ते वि हु नज्जइ ता जुत्तिवयणमिणं ॥ २३ ॥ ता न कसायसहाया लेसा जम्हा अणण्णवत्तिरया । जुज्जइ अकसायाणं कसायसंदीवणे तासि ॥२४॥ जइ लेसा निस्संदो कम्माणं ता हविज्ज केसिं वा । जइयाइ कम्मजणिया ता केवलिणं न जुज्जइ य ॥ २५ ॥ जइ भव कम्मनिरुद्धा न भवे ताऽजोगकेवलीणं च । जम्हा लेसाईंयं सुक्कझाणं चउत्थं जं ॥ २६ ॥ लिसा कसाय पुट्ठि - कारया परमाणुभागाण बंधहेऊ य। ठिइमणुभागं कसाया पर्यडिपएसाण जोगा य ॥२७॥ कम्मसहचारिकारिण अणुभागगुणस्स हेउणो भणिया । लेसाण सव्वमेवप्पयारविन्नाण उद्दिहं ॥ २८ ॥ Page #98 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सवधि ॥४४॥ सुविसुद्धा सुपसस्था लेसा मुहमाणसोहिणी भणिया । अविसुद्धा अपसत्था दुहझाणजणियसम्भावा ॥२९॥ अणुभागहेऊरूका भावा-पुण कम्मझरणओ दव्या । कारणपवित्तिनिमित्ता जोगाणं सरूवमेयासि ॥३०॥ ॥ इति लेश्याधिकारः॥ ...] maatarvaHISTORIER ॥ अथ ध्यानाधिकारः॥ वीरं सुक्कझाणग्गिदढ़कम्मिघणं पणमिऊणं । जोगीसरं सरणं झाणज्झयणं पवरकामि ॥१॥ जं घिरमज्झवसाणं तं ज्झाण तं चलंतयं चित्तं । तं हुज्ज भावणा वा अणुप्पेहा वा अहब चिंता ॥२॥ अंतोमुहुत्तमित्तं चित्तावत्थरणमेगवत्थुमी । छउमस्थाणं ज्झाणं जोगनिरोहो जिणाणं तु ॥३॥ अंतोमुहुत्तपरओ चिन्ता झाणतरं व हुज्जा हि । सुचिरं पि हुज्ज बहुवत्थु-संकमे झाणसंताणो ॥४॥ अट्ट रुई धम्म मुक्कं ज्झाणाई तत्थ अंताई । निव्वाणसाहणाइं भवकारणमट्टरुद्दाइं ॥५॥ अमणुण्णाई सद्दाइ-विसयवत्थुण दोसमइलस्स । धणियं विओगचिंतण-मसंपओगाणुसरणं च ॥६॥ तह मूलसीसरोगाइ-वेयणाए विओगपणिहाणं । तदसंपओगचितण तप्पडियाराउलमणस्स ॥७॥ इठ्ठाणं विसयाइण वेयणाए रागरत्तस्स । अविओगझवसाण तह संजोगाभिलासो य ॥८॥ देविचक्कवहि-तणाई गुणरिदीपत्थणामईय। अहम नियाणचितम मन्नाणाणुगयमचंत ॥९॥ ॥४ For Private & Personal use only Page #99 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एवं विहराग-दोसमोहंकियस्स जीवस्स । अहं ज्झाणं संसार चंद्धणं तिरियगइमूलं ॥१०॥ मज्झत्थस्स उ मुणिणो संकमे परिणामजणियमेयं ति । वत्थुस्सहावचितणपरस्स सम्म सहतस्स ॥ ११॥ कुण व पसत्था - लंबणस्स पडियारमप्पसावज्जं । तवसंजमपडियारं च सेवओ धम्ममनियाणं ॥ १२ ॥ रागो दोसो मोहो जेण संसारहेयवो भणिया । अहंमि ते तिन्नि वि तो तं संसारतरुबीयं ॥ १३ ॥ arat नीलकाला लेसाओ णाइकिलिठ्ठाओ । अट्टज्झाणोवगयस्स कम्मपरिणामजणियाओ ॥ १४॥ तस्स कंदणसरेयणपरिदेवणताडणाई लिंगाई । इट्ठाणिविओगा-विओगवियणानिमित्ताई ॥ १५ ॥ निंदर निययकाई पसंसइ सविम्हिऔ विभूईओ । पत्थेइ तासु रज्जइ न तयज्जणपरायणो होइ ॥ १६ ॥ साइसिद्धि सद्धम्मपरम्मुंहो पमायपरो । 'जिंणमयमणविस्कंतो वट्टइ अट्टमि झाणंमी ॥१७॥ तद विरयदेस विरया पमायपरसंजयाणुगं झाणं । सव्वप्पमायमूलं वज्जेयब्बं जइजणेण ॥ १८ ॥ ॥ अज्झाणं सम्मत्तं ॥ सत्तबहवेहबंधणडहणंकणमारणाइपणिहाणं । अइ कोहग्गहवत्थं निग्विणमणसोहमविवागं ॥ १९ ॥ पिसुणास झासन्भूयभूयधायाइवयणपणिहाणं । मायाविणोतिसंधणपरस्स पच्छन्नपावस्स ॥२०॥ वह तिब्वकोहलोहाउलस्स भूओवघ्रायणमेव (क)ज्जं । परदव्वहरणचित्तं परभोगावायनिरविरकं ॥ २१ ॥ सद्दाइविसयसाहणघणसंररकणपरायणमणि । सव्वाभिसंकणपरोवघायकलुसाउलं चित्तं ॥ २२ ॥ इयं करणकारणाणु-मविसयमणुश्चितणं चन्येयं । अविरयदेसासंजय-जणमणसंसेवियमहणणं ॥ २३ ॥ w Page #100 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रक संबोध ॥४९॥ एवं चउम्विहं राग-दोसमोहंकियस्स जीवस्स । रुदं झाणं संसार-चढण नरयगइमूलं ॥२४॥ कावोयनीलकाला लेसाओ तिनि संकिलिष्ठाओ। रुद्दझाणोवगयस्स कम्मपरिणामजणियाओ ॥२५॥ लिंगाइ तस्स उस्सन्नबहुलनाणाविहा मरणदोसा । तेसि चिय हिंसाइसु बाहिरकरणोवउत्तस्स ॥२६॥ परवसण अभिनिंदइ निरविरको निद्दओ निरणुतावो। हरिसिज्जइ कयपावो रुद्दझाणोवगयचित्तो ॥२७॥ ॥ रुदज्झाणं सम्मत्तं २॥ झाणस्स भावणाओ १ देसं २ कालं ३ तहा सण ४ विसेसं । आलंबणं ५ च कम्मं ६ झायव्वं झेय ७ झायारो८॥२८॥ तत्तोऽणुप्पेहाओ ९ लेसा १० लिंगं ११ फलं च १२ नाऊणं । धम्मं झाइज मुणी तक्कयजोगो तओ सुक्कं ॥२९॥ पुवकयब्भासो भाव-गएहिं झाणस्स जुग्गयमुवेइ । ताओ य नाणदंसणचरित्तवेरग्गजणियाओ ॥३०॥ नाणे निच्चब्भासो कुणइ मणोधारणं विसृद्धिं च । नाणगुणमुणियसारो तो झाईसु निच्चलमईओ॥३१॥ संकाइदोसरहिओ पसमत्थिज्जाइगुणगणोवेओ। होइ असंमूढमणो दंसणसुद्धीई झाणंमी ॥३२॥ नवकम्माणायाणं पोराणविणिज्जरं सुभादाणं । चारित्तभावणाए झाणमयत्तेण य समेइ ॥३३॥ सुविइयजगस्सहावो निस्संगो निभओ निरासो य । वेरग्गभावियमणो झाणंमी सुनिच्चलो होइ ॥३४॥ निच्च चिय जुवइपसु-णपुंसगकुसीलवज्जियं जइणो । ठाणं वि य णं भणियं विसेसओ झाणकालम्मि ॥३५॥ थिरकयजोगाणं पुण मुणीण झाणेसु निच्चलमणाणं । गामंमि जणाइण्णे सुभेरन्ने य न विसेसो ॥३६॥ ॥४९ For Private & Personal use only Page #101 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तो जत्थ समाहाणं होइ मणोवयणकायजोगाणं । भूओवरोहरहिओ सो देसो झायमाणस्स ॥ ३७॥ कालो व सुचि जहिं जोगसमाहाणमुत्तमं लहइ । न उ दिवसनिसावेलाइ नियमणं झाइणो भणियं ॥ ३८ ॥ जच्चय देहावत्था जियाण झाणोवरोहिणी होइ । झाइज्जा तयवत्थो टिओ निसण्णो निविन्नो वा ।। ३९॥ सव्वासु वट्टमाणासु णओ जं देसकालचिट्ठासु । वरकेवलाइलाभं पत्ता बहुसो समियपावा ॥ ४० ॥ तो देसकाल चिट्ठा - नियमो झाणस्स नत्थि समयंमी । जोगाण समाहाणं जह होइ तहा पयइयब्वं ॥ ४१ ॥ आलंबणाइ वायण-पुच्छणपरियट्टणाणुचिंताओ । सामाइयाइयाई सद्धम्मावस्सयाई च ॥४२॥ विसमंमि समारुहइ दढदव्वालंबणो जहा पुरिसो । मुत्ताइकपालंबो तह झाणवरं समारुहइ ॥ ४३ ॥ झाणपडिवत्तिकम्मो होइ मणो जोगनिग्गहाईओ । भवकाले केवलिणो सेसम्मि जहासमाहीए ॥ ४४ ॥ आणाविजयमवाए विवागसंठाणओ वि नायव्वा । एए चत्तारि पया झायव्वा धम्मझाणस्स ॥४५|| सुणिऊणमणाइनिहणं- भूअहियं भूयभावणमहग्धं । अमियमजियं महत्थं महाणुभावं महाविसयं ॥ ४६ ॥ झाइज्जा निरवज्जं जिणाण आणं जगप्पईवाणं । अनिउणजणदुन्नेयं नयभंगप्पमाणगमगहणं ॥४७॥ तत्थ य मइदुब्बलेणं तब्विहायरियविरहओ वा वि । नेयगहणत्तणेण य नाणावरणोदणं च ॥ ४८ ॥ हेऊदाहरणसंभवे वि सइ सुष्ठु जं न बुज्झिज्जा । सव्वन्नुमयमवितहं तहावि तं चितए मइमं ॥ ४९ ॥ अणुवकयपराणुग्गह परायणा जं जिणा जुगप्पवरा । जियरागदोसमोहा य नन्नहावाइणो तेणं ॥ ५० ॥ सम्बनई जा हुज्ज वाड्या सव्वोदहीण जं उदयं । इत्तो वि अणंतगुणो अत्थो इक्कस्स सुत्तस्स ॥ ५१ ॥ Page #102 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रक संबोध ॥५०॥ जिणवयणमोअगस्स उ रतिं च दिया य खज्जमाणस्स । तत्ति बुहो न वच्चइ हेउसहस्सोवगूढस्स ॥५२॥ नरनिरयतिरियसुरगणसंसारियसव्वदुस्करोगाणं । जिणवयणमागमोसहमपवग्गसुहरकयप्फलयं ॥५३॥ रागहोसकसायासवाइकिरियासु वट्टमाणाणं । इह परलोगावाए झाइज्जावज्जपरिवज्ज ॥५४॥ पयइठिइपएसाणु-भावभिन्नं सुहासुहविहत्तं । जोगाणुभावजणियं कम्मविवागं विचिंतिज्जा॥५५॥ जिणदेसियाइ लरकण-संठाणासणविहाणमाणाइं । उप्पायठिइभंगाइपज्जवा जे अ दवाणं ॥५६॥ पंचत्थिकायमइयं लोयमणाइनिहर्ण जिणरकायं । नामाइमेयभिण्णं तिविहमहोलोगमेयाइ ॥५॥ खिइवलयदीवसायर-नरयविमाणभवणाइसंठाणं । वोमाइपइठ्ठाणं निययं लोगठ्ठिइविहाणं ॥५८॥ उवओगलरकणमणाइ-निहणमत्थंतरं सरीराओ । जीवमरूवि कारिभोइं च सगस्स कम्मस्स ॥५९॥ तरस य सकम्मजणियं जपमायजलं कसायपायालं । वसणसयसावयगणं मोहावत्तं महाभीमं ॥६॥ अन्नाणमारुएरिय-संजोगविओगवीइसंताणं । संसारसागरमणोर-पारमसुहं विचिंत्तिज्जा ॥६१।। तस्स य संतरणसहं सम्मइंसणसुबंधणमणग्धं । नाणवरकण्णधार चारित्तमयं महापोयं ॥२॥ संबरकयनिछिर्छ तवपवणाविद्धजवणतखेगं । वेस्ग्गमग्गपडियं विसुत्तियावीइनिस्कोभं ॥६३।। आरो, मुणिवणिया महग्घसीलंगरयणपडिपुण्णं । जहत्तं निव्वाणपुरं सिग्घमविग्घेण पावंति ॥६४॥ तत्थ य निरयणविणिओ-गमइयमेगंतिय निराबाहं । साहावियं निरुवमं जहसुरकं अस्कयमुर्विति ॥६५॥ किं बहुणा सव्वं चिय जीवाइपयत्थवित्थरोवेअं। सवनयसमूहमयं झाइझा समयसम्भावं ॥६६॥ . 04 MAI५० Jain Education Internatonal Page #103 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सच्चपमायरहिया मुणओ खीणोवसंतमोहा य । झायारों नाणधणा धम्मझाणस्स निद्दिठ्ठा ॥६७॥ एए च्चिय पुवाणं पुव्वधरा सुप्पसत्यसंघयणा । दुन्ह सजोगाजोगासुझाणपराण केवलिणो ॥६८॥ झाणोबरमे वि मुणी निच्चमनिच्चाई चिंतणापरमो । होइ सुभावियचित्तो धम्मझाणेण जो पुब्धि ॥६९॥ हुति कम्मविसुद्धाओ छेसाओ पम्हपीयसुक्काओ। धम्मझाणोवगयस्स तिव्वमंदाइमेयाओ॥७॥ आगमउवएसाणा-निसग्गओ जे जिणप्पणीयाणं । भावाणं सद्दहणं धम्मझाणस्स तं लिंगं ॥७१॥ जिणसाहुगुणकित्तण-पसंसणादाणविणयसंपत्तो। सुयसीलसंजमरओ धम्मझाणी मुणेयव्वो ॥७२॥ ॥धम्मज्झाणं सम्मत्तं ॥३॥ अह खंतिमद्दवज्जव-मुत्तीओ जिणमयप्पहाणाओ। आलंबणाहिं जेहि उ सुक्कझाणं समाहेइ ॥७३॥ तिहुयणविसयं कमसो संखिविऊ मणं अणुंमि छउमत्थो । झायइ सुनिप्पकंपो झाणं अमणो जिणो होइ ॥७४॥ जह सब्बसरीरगयं मंतेण विसं णिरुभए डंके । तत्तो पुणोवि णिज्जइ पहाणतरमंतजोगेण ॥५॥ तह तिहुयणतणुविसयं मणोविसं मंतजोगबलजुत्तो। परमाणुंमि निरंभइ अवणेइ तओवि जिणविज्जो ॥७६॥ ओसारिइंधणभरो जह परिहाइ कमसो हुयासव्व । थोवेधणोवसेसो निव्वाइ तओवणीओ य ।।७७॥ तह विसइंधणहीणो मणोहुयासो कमेण तणुअंमी। विसइंधणे निरंभइ निव्वाइ तओवणीओ य ॥८॥ तोयमिव नालियाए तत्तायसमायणोदरत्थं वा । परिहाइ कमेण जहा तह जोगिमणोजलं जाण ॥७९॥ Jain Education I ntonal For Private & Personal use only www.jamalibrary.org Page #104 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एवं चिय वयजोगं निरंभइ कमेण कायजोगं च । तो सेलेबब्व थिरो सेलेसी केवली होइ॥८॥ उप्पायठिइभंगाइ-पज्जवाणं जमेगदव्यंमी । नाणानयाणुसरणं पुष्वगयसुयाणसारेणं ॥१॥ सवियारमत्थवंजण-जोगंतरओ तयं पढमसुक्कं । होइ पहुत्तवियकं सविपारमरागभावस्स ॥८२॥ जं पुण सुनिप्पकंपं निवायसरणप्पईवमिव चित्तं । उप्पायठिइभंगाइयाणमेगंपि पज्जाए ॥८३॥ अवियारमत्थवंजण-जोगंतरओ तयं बोइअमुक्कं । पुव्वगयसुयालंबणमेगत्तवियक्कमवियारं ॥४॥ निव्वाणगमणकाले केवलिणो दरमिरुद्धजोगस्स । मुहुमकिरियानियट्टी तइयं तणुकायकिरियस्स ॥५॥ तस्सेव य सेलेसी-गयस्स सेलुल्व निप्पकंपस्स । वुच्छिन्नकिरियमप्पडि-वाई झाणं परमसुक्कं ॥८६॥ पढमं जोगे जोगे-सु वा मयं बीयमेगजोगंमी । तइयं च कायजोगे सुक्कमजोगंमि उ चउत्थं ॥८॥ जह छउमत्थस्स मणो झाणं भन्नइ सुनिचले संतं । तह केवलिणो काओ सुनिच्चलो भन्नए झाणं ॥८॥ पुवप्पओगओ चिय कम्मविणिज्जरणहेउओ वा वि । सद्दत्थबहुत्ताओ तह जिणचंदागमाओ य ॥८९॥ चित्ताभावेवि सया सुहुमोवरयकिरियाइ भन्नंति । जीवोवओगसब्भा-वओ य भवत्थस्स झाणाइ ॥९॥ सुक्कझाणसुभावियचित्तो चिंतेइ झाणविरमे वि । निययमणुप्पेहावी चत्तारि चरित्तसंपत्तो ॥९१।। आसवदारावाए तह संसारासुहाणुभावं च । भवसंताणमणंतं वत्थुणं विपरिणामं च ॥९२॥ सुक्काए लेसाए दो तइयं परमसुक्कलेसाए । थिरियाजियसेलेसं लेसाईयं परमसुक्कं ॥९३।। अवहास-मोहविवेग-वुस्सग्गा तस्स हुंति लिंगाई । लिंगिज्जइ जेहिं मुणी सुक्कझाणोवगयचित्तो ॥१४॥ For Private & Personal use only Page #105 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jain Education national चालिज्जइ बीहेइ व धोरो न परीसहोवसग्गेहिं । सुहुमेसु न संमुज्झइ भावेसु न देवमायासु ॥ ९५ ॥ देहे विचित्तं पिच्छs अप्पाणं तह य सव्वसंजोए । देहोवहिवुस्सग्गं निस्संगो सव्वहा कुणइ ॥ ८६ ॥ हुति सुभासुभसंवर - विणिज्जरामर सुहाइ विउलाई । झाणवरस्स फलाई सुहाणुबंधाणि धम्मस्स ॥ ९७ ॥ ते अविसेसेण सुहा-सवादओणुत्तरामरसुहंच । दुण्हं सुक्काण फलं परिनिव्वाणं परित्ताणं ॥ ९८ ॥ आसवदारा संसारहेयवो जं न धम्मसुक्केसु । संसारकारणाई ततो घुवं धम्म सुक्काई ॥ ९९ ॥ संवरविणिज्जराओ मुरकस्स पहो तवो पहो तासिं । झाणं च पहाणंगं तबस्स तो मुरकहेऊ य ॥ १०० ॥ अंबरलोह महीणं कमसो जह मलकलंकपंकाणं । सुब्भावणघणसोसे साहंति जलानलाइच्चा ॥ १०१ ॥ तह सुझाई समत्थी जीवंचरलोहमे इणिगयाणं । झाणजलानलसूरा कम्ममलकलंकपंकाणं ॥ १०२ ॥ तावो सोसो मेओ जोगाणं झाणओ जहा निययं । तह तावसोसमेआ कम्मस्स वि झाइणो नियमा ॥ १०३ ॥ जह रोगासयसमणं विसोसणविरेअणोसहविहीहि । तह कम्मामयसमणं झाणाणसणाइजो गेहूं ॥ १०४ ॥ जह चिरसंचियमिंधणमनलो पवणसहिओ धुवं डहइ । तह कम्मिधणममियं खणेण झाणानलो डहइ ॥ १०५ ॥ जह वा घणसंघाया खणेण पवणाया विभिज्जति । झाणपत्रणावहूया तह कम्मघणां विलिज्जति ॥ १०६ ॥ कसायसमुत्थेहि वाहिज्जइ माणसेहिं दुस्केहिं । ईसाविसायसोगाइएहि झाणोवगपचित्तो ॥ १०७ ॥ सीआइवाइएहि सारीरेसु बहुष्पगारेहिं । झाणसुनिश्चलचित्तो न वाहिज्जइ निज्जरापेही ॥ १०८ ॥ इय सव्वगुणठाणं दिवादिष्ठ्ठसृहसाहणं झाणं । सुपसत्थं सद्धेअं नेअं झेअं व नियंपि ॥१०९॥ ॥ सुक्कज्झाणं सम्म ४ ॥ इति ध्यानाधिकारः ॥ www.aaibrary.org Page #106 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रक संबोध ॥५२॥ इइपुव्वुत्तचउक्के झाणेसु पढमदुगि खु मिच्छत्तं । पुरिमदुगे सम्मत्तं तयपुष्वं सव्वणुष्ठाणं ॥१॥ मिच्छत्तं तत्थ दुहा-णाइसपज्जंतमणाइपमपज्जं । भव्वाणमभव्वाणं णेयं खु वि पज्जयाईणं ॥२॥ भिन्नाण भिन्नगंठीण पुणो भवे जं च साइपज्जंतं । अष्टविहं मिच्छत्तं पण्णत्तं खीणदंसीहिं ॥३॥ एगतिय १ संसइयं २ वेणइयं ३ पुवबुग्गहं ४ चेव । विवरीयरुइ ५ निसग्गं ६ संमोहं ७ मूढदिष्ठिभवं तल्लक्षणानि यथा स्वयं ग्रन्थकारोऽप्याह ॥ ॥४॥ क्षणिकोऽक्षणिको जीवः सर्वथा सगुणोऽगुणः । इत्यादिभाषमाणस्य तदैकान्तिकमुच्यते ॥५॥ सर्वज्ञेन विरागेण जीवाजीवादिभाषितं । तथ्यं न वेति संकल्पैदृष्टिः सांशयिकी मता ॥६॥ आगमालिंगिनो देवा धर्माः सर्वे सदागमाः । इत्येषा कथ्यते बुद्धिः पुंसां वैनयिकी जनैः ॥७॥ पूर्णः कुहेतुदृष्टान्त न तत्त्वं प्रतिपद्यते । मण्डलश्चर्मकारस्य भोज्यं चर्मलवैरिव ॥८॥ अतथ्यं मन्यते तथ्यं विपरीतरुचिर्जनः । दोषातुरमनास्तिक्तं ज्वरीव मधुरं रसं ॥९॥ दीनो निसर्गमिथ्यात्व-स्तत्त्वातत्त्वं न बुध्यते । सुंदरासुंदररूपं जात्यन्ध इव सर्वथा ॥१०॥ देवो रागी यतिः संगी धर्मः प्राणिपिशुम्भनं । मूढदृष्टिरिति ब्रूते युक्तायुक्ताविवेचकः ॥११॥ पदार्थानां जिनोक्तानां तदश्रद्धानलक्षणं । ऐकान्तिकादिभेदेन सप्तभेदमुदाहृतं ॥१२॥ एएसिं धम्मरुई धाउरकयरोगिणो जहा अन्ने । तह जिगधम्मे मिच्छ-द्दिठित्त न भन्नए मिच्छं ॥१३॥ ॥५२॥ For Private & Personal use only Page #107 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सइ पंचरूपभावा नीली कसिणत्तणं खु नी चयइ । दव्यपरिकम्मणाहिं तहा अभव्वाण मिच्छत्तं ॥ १४ ॥ जह पारसफासेण वि कणयत्तं नो लहिज्ज उवधाऊ । एवं जुग्गोपायाण-मंतरा अभव्वजीवों वि ॥१५॥ आगमपारसफासेण सिद्धत्तं नो लहिज्ज कइयावि । जइ अत्थि नाणदंसणलरकणगुणसंमओ आया ॥ १६ ॥ अभिणिवे सियवज्जं चउहा मिच्छपि मझओ एसिं । जीवाणमणाइनिहणमणतपुग्गलपरं हुज्जा ॥१७॥ अह अठ्ठममिच्छत्तं दिठ्ठिजुयं नामओ विणिद्दिवं । तं पुण चरमावत्तंमि हविज्ज मग्गाणुपरिवत्ती ॥ १८ ॥ जिणधम्मं बहु मन्नइ भावायरियं णिसेवए निययं । आसेवइ जमनियमाई गिण्हइ सुहजोयबीयं च ॥ १९ ॥ न धरेइ वयरदोस दव्वाइअभिग्गहाइ गिण्हेइ । नियपरसत्थसमग्गं धारेइ मझत्थभावेण ॥ २० ॥ तिविहअवंचकजोग-किरियाफलमाई ओसहाईहिं । दाणविणयाइजुत्तो नाणगुणवुढिकरणरओ ॥२१॥ पुव्वाइयमहिज्जइ गंथं वियारं कहेइ बंधेइ । केवलमभव्वमिच्छो पुवं न सुणेइ नो गंथं ॥ २२ ॥ गुणिसंगजोगसुकहाकहापरो उचियकिञ्चतप्परओ । किरियाई अणुव्विग्गो जिग्गासा तच्चभावाणं ॥ २३॥ धारयभवसंतासो भवपासी मन्नइ व्व पाससमो। सवणसमीहा सच्चा उज्जुमइ धम्मनिरविग्वो ॥२४॥ भवपासमीत्थं सव्वं कट्ठे करेइ धणदाणं । गुरुभत्तिखंतिजुत्तो अदोहभावेण झाणबीयधरो ॥ २५ ॥ दोणो माई मच्छरठाणी किवणो भवाहिनंदी य । माणी अहलारंभी अवेज्जपयठ्ठदोसजुओ ॥ २६ ॥ अत्तुकरिसं अतंति न धरई लोगुत्तरंभि परकवहो । पच्छाणुतावनिरओ साणुकोसो य लोयगुणो ॥२७॥ इचाइणेगपवयणगुणविहिनिरओ नराण तल्लिच्छो। वेज्जपयलिंगजुत्तो विवरिओ वज्जपयअट्टो ||२८ ॥ Page #108 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध ॥ ५३॥ sarsaraईओ निच्छयववहारपरकवाओ य । चरिमावत्ते य चरिमं करणं कारेइ सो दिठी ॥ २९ ॥ घणरागद्दोसठि भिदइ पावेइ तञ्चसम्मत्तं । पच्चुप्भडपावपरिभवाणुबंधी किञ्चाओ विरमेइ ॥ ३०॥ सम्मत्तंमि उ लद्धे जइवि गुणा हुंति नोवि पुव्वृत्ता । तह वि हु संविज्जपए रमई मुरकठ्ठमेगठ्ठा ॥३१॥ पुव्वत्तं सत्तविहं मिच्छत्तं पत्तमईयकालभावं । भव्वेहिमभव्वेहि-मणतपुग्गलपरट्टगयं ॥ ३२ ॥ अट्ठममिच्छत्तं पुण भव्वमिच्छेहि णो अभव्वेहि । मग्गाणुसारिमईहिं परमपयठ्ठे किलिट्ठेहि ॥ ३३ ॥ नो जिधम्मे खिसादाहिणकरुणाइगुणसमिद्धेहिं । मंदयरकसाएहिं तेहिमिणं मिच्छमुज्जूढं ॥३४॥ आभिणिवेसियमिच्छं सम्मं जाणिज्ज जो कयग्गेण । तं पुणमभव्वजीवेहि नो पत्तं भवसमुद्दम्मी ॥ ३५ ॥ अठ्ठममिच्छत्तंमि रुई धम्माइरुईण हुज्ज वित्थारो । जइ कहवि पर्यट्टिज्जइ तहा वि तस्संसणा हुज्जा ॥ ३६ ॥ पायमिह संपदायाओ खओवसमियं लहिज्ज सम्मत्तं । खइयमवि केवि अहवा जइ हुज्जा तब्भवे सिद्धी ॥३७॥ चउदस दस य अभिन्ने नियमा सम्मं तु सेसए भयणा । मइउहिविवज्जासे होइ मिच्छंत सेसेसु ॥ ३८ ॥ माइला सम्मेउवसामियं भवे शियमा । पडिवाइस णो नियमं खायं खाओवसमियं वा ॥ ३९ ॥ मिच्छत्तंमी अ खीणे तिप्पुंजी सम्मद्दिठ्ठिणो नियमा । मिच्छत्तंमि उ खीणे दुएगपुंजी व खवगो वा ॥ ४० ॥ उवसमवेयगखइया अविरयसम्माइ सम्मद्दिठिसु । उवसंतमप्पमत्ता तह सिद्धं ता जहाकमसो ॥४१॥ वेम्राणिया य मण्यारयणाइतिनिरआ असंखवासतिरिया य। तिविहा सम्मद्दिठी वेयगओवसामगा सेसा ॥ ४२ ॥ अबद्धआउयाणं मणुयाणं खाइयं खु सेणिगयं । तब्भवियं परभवियं पुव्वनिबद्धाउयाणं च ॥ ४३ ॥ 5506456756756+56+ प्रक० ॥५३॥ Page #109 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भवणवणजो इसंखा उयसन्निपणिदितिरियजीवाणं । पंकाइनारयाणं परतप्भवखाइयं णत्थि ॥ ४४ ॥ इगबितिचउरअसणि-पणिदिजीवाणमेगमवि सम्मं । तब्भवियं न हविज्जइ परभवियं पुव्वभणियाणं ॥ ४५ ॥ 'उवसमखायगवेयय अपुग्गलाई च तह अवेइयाइं । पुग्गलवेयं खाओवसमं तेणित्ति तद्दिठी ॥४६॥ उवसमपुग्गलजणियं भणियं जं तत्थ सहियसासाणं । उभयविहीणं विवागपएसवेयणपसाहिकमं ॥४७॥ तम्हा मिच्छत्तखए बंधो दुविहो हविज्ज कम्माणं । मिच्छ अणनिरणुबंधा हेऊणो साणुबंधन्ने ॥ ४८ ॥ जइ विहु अविरइकसायजोगाईयाण हेऊणो बंधो। हुज्जाऽमंदमंदो मंदयरो तग्गुणप्पभवो ॥४९॥ तम्हा परमं सल्लं परमविसं परमबंधपञ्चइयं । अवितहजोएहि सया मिच्छं हेयं सहावेहिं ॥ ५० ॥ भवविरहहेऊ जिणमय - निस्संदं परमदिठिवायसं पुन्नं । भव्वाणुभव्वभावुय - नंदणवणजलहरं सम्मं ॥ ५१ ॥ ॥ इति मिथ्यात्वाधिकारः ॥ Mad ॥ अथ आलोचनाधिकारः ॥ आराहणाहियारो अह भण्णइ सयलपावकम्माणं । जीवा विविहा वृत्ता सम्मद्दिठीवि मिच्छा वा ॥१॥ जाणिवयणे जयणा विहिकरणं दव्वपमुहजोगेहिं । सा धम्माराहणा खलु विराहणा ताण पडिसेहो ॥२॥ भिऊण जिणं वीरं मोहारिनिसूयणे महावीरं । आलोयणचक्क निहणियकम्मनिवलद्धजयकेउं ॥ ३ ॥ हत्थु ३ तर ३ सवणतिगं ३ रोहिणी २ रेवइ २ पुणव्वसूण २ दुगं । अणुराहसमं भणिया सोलस आलोयणारिरका ॥४॥ Page #110 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध 119811 आलोयणातहीओ नंदा भद्दा जिया य पुण्णा थ । रविससिबुहगुरुमुक्का वारा करणाणि विठिविणा ॥ ५ ॥ सूरे घणुमीणगए गुरुहॅरिविठ्ठे य गंडविइवाए । अण्णे वि असुहजोगा सोहिपयाणे परिचाया ॥ ६ ॥ वसहि पवेयइत्ता वासावासं तहा विवज्जित्ता । कयसम्मत्तविसुद्धी जिणगुरुठवणारियाण पुरो ॥७॥ आलोयणाणिमितं गीयत्थगवेसणा य उक्कोसा । जोयणसयाईं सत्त उ बारस वासाई कायव्वा ॥ ८ ॥ itect संविग्गो अपरवाओ अवज्जभीरू य । मूलत्तरगुणसुद्धो मुणियपवयणरहस्सो य ॥९॥ जुग्गाजुग्गगवेसण “बालतरुणाइवुगुसामत्थो । जो कुसलो 'सव्वत्थे आलोयणदायगो स मुणी ॥१०॥ तह भावे संविग्गो गीयत्थो जो अवज्जसनगुप्पो । संभोगी असंभोगी तयभावे होइ सारूवी ॥ ११ ॥ तयभावे पच्छाकड-ससिहो वा सिद्धपुत्तयसदारो । सामाइय दाऊणं तप्पुरओराहणा कुज्जा ॥ १२ ॥ तयभावे विहु जत्थ य जरकाययणं पुराणमिज्जजणं । जिणगणहरसाइसया - रियाई पुष्षं ठियावासं ॥ १३॥ पुव्युत्तरदिसिसमुह विदिसं उत्तरपुरत्थिमाभिमुहो । पागडियसव्वसल्लो पुरठ्ठओ भइ विणयपरो ॥ १४॥ पुति पमज्जिऊणं काऊ किइकम्मचेइवंदणयं । वासठ्ठावणपुवि अइयारा सव्वभणियव्वा ॥ १५ ॥ आलोयणापरिगओ पावं फेडेइ सयलभवजणियं । जइ निस्सल्लगुणेहि ससल्लओ तं समज्जेइ ॥ १६ ॥ पायइ सोयइ पुण्णं पासइ गुडेइ जीववत्थं वा । पावसद्दस्स अत्यो णिज्जुत्ती एहि विणेओ ॥१७॥ लोयालोयस्स मज्जाया अतिलोयत्तिलोयणं तस्स । आसणित्ति संपाडण - मालोयणसद्दणिज्जुत्ती ॥१८॥ तम्हा अगीओ न वि जाणइ सोही चरणस्स देइ ऊणहियं । तो अप्पाणं आलो-यगं च पाडेइ संसारे ॥ १९ ॥ प्रक० ॥५४॥ Page #111 -------------------------------------------------------------------------- ________________ *154% *%* सल्लो जइ विकदुग्गं घोरं वीरं तवं चरे । दिव्वं वाससहस्स तु तओ वि तं तस्स निष्फलं ॥ २० ॥ जइ सुकुसलो वि विज्जो अन्नस्स कहे अप्पणो वाहिं । एवं जाणंतस्स वि सल्लुद्धरणं गुरुसगासे ॥ २१ ॥ अरकंडियचारित्तो वयगहणाओ य जो य गीयत्यो । तस्स सगासे दंसणवयगहणसोहिकरणं च ॥ २२॥ आलोयणापरिणओ संमं संपटिओ गुरुसगासे । जइ अंतरा वि कालं करिज्ज आराहगो तहवि ॥ २३ ॥ लज्जागरणं बहुस्सुयमएण को वि दुच्चरियं । जो न कहेइ गुरूणं न हु सो आराहगो भणिओ ||२४|| जह बालो जपतो कज्जमकज्जं च उज्जुयं भणइ । तं तह आलोइज्जा मायामयविप्पक्को य ॥२५॥ संवेगपरं चित्तं काऊणं तेहि तेहि सुत्तेहिं । सल्लुदरणविवाग-दंसगाईहि आलोए ॥ २६ ॥ मायाइदोसरहिओ पइसमयं वढ्ढमाणसंवेगो । आलोइज्ज अकज्जं न पुणो काहिं ति निच्छयओ ||२७|| लहुया १ ल्हाइजणणं २ अप्पपरनिवत्ती ३ अज्जवं ४ सोही ५ । दुक्करकरणं ६ आढा ७ निस्सल्लत्तं च सोहिगुणा ॥ २८ ॥ नवितं सत्यं च विसं व दुप्पउत्तो व कुणइ वेयालो । जंतं च दुप्पउत्तं सप्पो व्व पमायओ कुद्धो ॥ २९॥ जं कुणइ भावसल्लं अणुद्धियं इत्थ सव्वबहुमूलं | दुल्लहबोहियत्तं अणंतसंसारियत्तं च ॥३०॥ अप्पं पि भावसल्लं अणुद्धियं रायवणियतणएहिं । जायं कडुगविवागं किं पुण बहुयाइं पावाई ॥ ३१ ॥ आलोयणासहाणे लिंगमिणं विंति मुणियसमयत्था । पच्छित्तकरणमुदियं अकरणयं चेव दोसाणं ॥ ३२ ॥ परिक चाम्मासे आलोयणा नियमओ य दायव्वा । गहणं अभिग्गहाण य पत्थं गहिए निवेएउ ॥ ३३ ॥ fagarपावकम्मा सम्मं आलोइयं गुरुसगासे । पत्ता अनंतसत्ता सासयसुरकं अणाबाहं ॥ ३४ ॥ Page #112 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध ॥५५॥ आलोयणा वि दुविहा कयवयकम्मा अकिच्चवयकम्मा । इक्किक्का वि य दुविहा सद्धासत्तीविमेएहिं ॥३५॥ नाएहि अनाएहि दुहावि तिविहा हवंति इक्विका । उक्किठजहन्नमझिम-मेएहिं सावि चऊरूवा ॥३६॥ आउट्टिपमायदप्प-कप्पभेएहिं सावि दुगभेया । उस्सग्गववाएहिं सावि पुणो होइ चउरूवा ॥३७॥ दवओ खित्तओ कालं भावं पुरिसे पडच्च णेयव्वं । पच्छित्तं नाऊणं कायव्वं भावसुद्धीए ॥३८॥ तिविहेणं करणजोएण सततपरतंतहेऊ नाऊण । ववहारपणगपुव्वं जहक्कम कप्पभासाए॥३९॥ जारिसयं जं तित्थं मूलुत्तरगुणगणस्स सुद्धीए । सवे देसे चउभंगीगमणेण सया पयट्टव्वं ॥४०॥ पाणिवहमुसावायादत्तअबंभप्परिग्गहनिसाइं । उक्किठ्ठजहन्नमझिम-दव्वाइ चउविहाऽविरई ॥४१॥ एवं दुवालसविहा इक्किक्का अविरईओ बिसयरी । मूलगुणे छठाणा सव्वं मि पडिसेवणा चउहा ॥४२॥ देसमी उत्तरगुणे सत्तण्हं हुंति चुलसीभेयाणं । जईण पुण चरणकरणे नायव्वं आसयगुणेहिं ॥४३॥ तत्थ ववहारपणगं नाऊणं दिज्जए जहाजुग्गं । पुरिसाणं चउकणं छकण्णगं होइ इत्थीणं ॥४४॥ सावि हु पवयणभत्ता पवित्तिणी वा हविज्ज तत्तुल्ला । गुरुपरकागुणकरी जा दरकाऽतुच्छासया इत्थी ॥४५॥ अपरिस्सावी धीरो दढसंघयणी निरासवो हियओ। पवयणसुत्तत्थोभयविण्णू वुढो गुरू भणिओ ॥४६॥ विहियप्पकयालोय-लोयणो सोहणगुणजुत्तो । खतो दंतो संतो णासंसी गाहणाकुसलो ॥४७॥ आलोयणपडिक्कमणमीसविवेगे तहा विउस्सग्गे । तवच्छेयमूलअणव-कृया य पारंचियं चेव ॥४८॥ आलोइज्जइ गुरुणो पुरओ कज्जेण हत्थसयगमणे । संमिइपमुहाण मिच्छा-करणे कीरइ पडिक्कमणं ॥४९॥ सद्दाइएसु रागाइवियरणं साहिओ गुरूण पुरो। दिज्जइ मिच्छादुक्कड-मेयं मीसंति पच्छित्तं ॥५०॥ For Private & Personal use only Page #113 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - कज्जे अणेसणिज्जे गहिए असणाईए परिचाओ । कारइ काउस्सग्गे दिखे दुस्सविपणमुहंमि ५१॥ निविगयाइं दिज्जइ पुढवाई वियट्टणे तब विसेसे । तवदुद्दमस्स मुणिणो किज्जइ पज्जायवुच्छेए ॥५२॥ पाणाइवायपमुहे पुणब्वयारोवणं विहेयव्वं । नाविज्जइ नवएसुं कराइघायप्पदुठमणो ॥५३॥ पारंचियमावज्जइ सलिंगनिवभारियाइसेवाहिं । अव्वत्तलिंगधरणे बारस वरिसाइं सूरीणं ॥५४॥ नवरं दसमावत्तीए नवममझावयाण पच्छित्तं । छम्मासे जाव तवं जहन्नमुक्कोसओ वरिसे ॥५५॥ दस ता अणुसज्ज़ती जाव चउदपुव्वा पढमसंघयणी । तेण परं मूलंत दुप्पसहो जाव चारित्ती॥५६॥ पढमछक्कं पुलायाणे बउसपडिसेवणाकुसीलथिरकप्पाणं । दसहा पायच्छित्तं जिणकप्पालंदए अठ॥५७॥ आलोयणा विवेओ णिग्गंथाणं दुहावि पच्छित्तं । एगं च सिणायाणं विवेगरूवं खु पच्छित्तं ॥५८॥ सामाइयेचरित्ताणं थेरकप्पंमि हुज्ज दसगमवि । जिणकप्पे पुण अडगं छेयं मूलं दुवे नत्थि ॥५९॥ छेयंमि पढमछक्कं परिहारविसुद्धयमि थिरकप्पे । अंड जिणकप्पे छग पुण आलोयणविवेय सुहुमंमि ॥६॥ आलोचनार प्रतिक्रमण२| मीसग ३ | विवेग ४ उत्सर्ग ५ | तप६ | छेद ७ प्य ९. १० एवं देश वि.सर्व ४ सर्वेषां । सर्वेषां | सर्वेषां - सर्वेषां सर्वेषां सर्वेः । सर्वे | सर्व० | आचार्यो आचार्यस्यैव वि.सामान्यज्ञदेशविराति दशावरत देश शि-जदेश० सर्व प्रदेसासर्व सर्वविरतिः सर्वविरतिMa वि० गीता वि. गीता-१२ रि। अपदस्थानां पदस्थानांत पेतशाता णोपयुक्तराष्टभंगीयंत्रक.। गतशिया-[ गतशिष्या अशातलोके व्याच्यादी सर्व० र्थानां, जस्त्रीसंयती दीनां दीनां र्थानां शाताना नां सेवनादी | मल८ | अनवस्था- पारचिक संविशगणा-सुविहितगमस्यापदस्थ. Page #114 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध ॥५६॥ श्याइतवक्सेिसा नाऊण य जो पदेइ जाहजुग्गं । न कुणइ जो जहवायं न सम्ममालोइयं तस्स ॥६१॥ जइ सालंबणसेवी संकप्पाईण वन्जिओ सययं । नहु तस्स दिज्ज एवं आलोयणपयं पयट्टाओ ॥२॥ तित्थयराइपयाणं अणासायणपरस्स सव्वग्गं । पायच्छित्तं दिज्जा हुज्जा जइ संजमुज्जुत्तो ॥६३॥ आयरियं साइसयं तित्थयरं गणहरं महद्वियं । अझा(आसा)यंतो बहुसो अणतसंसारिओ भणिओ॥६४॥ सइ सामत्थे पवयणकज्जे उज्जुत्ते उन तस्सावि । पायच्छित्तं जायइ अणायरेणं कहं किमवि ॥६५॥ । आगमसुय आणा धारणा य जीयं च होइ ववहारो। केवलमणोहिचउदसदसनवपुव्वाइ पढमो य॥६६॥ कहेहि सव्वं जो वुत्तो जाणमाणो विगृहइ । न तस्स दिति पच्छित्तं बिंति अन्नत्थ सोहियं ॥६॥ न संभरेइ जे दोसा सब्भावा न पमायओ। पच्चरकं साहंति उ माइणो न उ साहेइ ॥६८॥ आयारपकप्पाइ खेसं सध्वसुयं विणिद्दिष्ठं । देसंतरठियाणं गूढपयालोयणं आणा ॥६९॥ गीयत्थेणं दिण्णं सुद्धं अवहारिऊण तं चेव । दितस्स धारणा साओ धिई पइ धारणा रूवा ॥७॥ व्वाइं चिंतिऊणं संघयणाईण हाणिमासज्ज । पायच्छित्तं जीयं रूढि वा जं जहिं गच्छे ॥१॥ तत्थ य इमे विसेसा आगमववहारणेहिं दायव्वा । जत्थ जहिंभिप्पायविसेसमूहिस्स सोहीए ॥७२॥ सुयधरेहि लिंगस्स ववहारायारमाणसो कप्पो। तत्थ पुलोइज्ज सया दायव्वा जं जहासुद्धी ॥७३॥ पुव्वं जो संकलिया गूढपएसत्थसत्थपडिबद्धा । गीयत्थनिदेसेहिं दायव्वा जे जहा सोही ॥७॥ जह जम्मकम्मनाल-छिंदणओ अठमाइ जं बद्धं । ववहारपए सोही सम्वत्थोचियविसेसेण ॥५॥ For Private & Personal use only Page #115 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सो आणावा सामन्नेणित्थ दिज्जमाणो वि । गीयत्यदत्तपाय- च्छित्तं विष्णाय जं बद्धं ॥ ७६ ॥ तं पुरओ कट्टिज्जा सरिसासरिसेवि दव्वपच्छित्ते । जं दिज्जइ लिहियमत्तं ववहारो धारणारूवो ॥ ७७ ॥ बहुगयत्येहि आइन्नं तं जीयं समावण्णं । देसाइसव्वववहार पुरओ कारिज्ज दिज्जज्जा ॥ ७८ ॥ तत् यदुविहाविरई देसे सब्वे य गंठिभेयपरा । अण्णा विरईअविरइ-भवाणुबंधीण सा होइ ॥ ७९ ॥ जत्थय दंसणमूला उक्किठ्ठालोयणा वि लहु पयया । जा मिच्छत्तयमूला लहु वि उक्किट्ठपयकलिया ॥८०॥ उक्किउक्कि उक्किटं मझिमं च उकिठं । जहणणं पुणमिक्किक्कं तिविहं तं नवविहं हुंति ॥ ८१ ॥ सणनाणचरितं सइ सामत्थे तवे य वीरियए । सव्वं विगंचिऊणं दायव्वं तं बहुसुएहिं ॥ ८२ ॥ नागलिवी आवत्ती दाणं विस्सोवमओ विन्नेयं । एए पंचठाणा नीवीपुरिमाएस जोइज्जा ॥ ८३ ॥ पण १ मासलहुँ २ तह मासगुरु ३ चउलहुं च ४ चउगुरुयं ५ । छल्लहुयं ६ छग्गुरुयं ७ कल्लं ८ पणकल्ल ९ मूलं १० च ॥ ८४ ॥ निव्विगयं १ पुरिमनुं २ इगभत्तं ३ च अबिलि ४ चउत्थं ५ च । छठ्ठे ६ च अट्टमं ७ चिय दो ८ दस ९ उववास असीइसयं दसम १० ॥ ८५ ॥ पण च १ भिन्नमासो २ निव्वीए मुक्कलं च पोल्लरयं । दुतिचउआहारेसु सुहयं दुहयं निराहारं ॥ ८६ ॥ निव्वीय पुरिमेगभत्तं अंबिलखवणं च छठ्ठअठ्ठमयं । इइ य सत्ततवा जीयठ्ठाणे ववहरंति ॥८॥ भिन्नमास लहुमासो गुरुमासो चउलहुय चउगुरुया । छम्मासलय छम्मासे गरुयं निब्बियाईणं सन्ना य ॥ ८८ ॥ Page #116 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध ॥ ५७ ॥ निव्वियं तह पणगं पुरिमढ्ढ कुंडलं च मासलहुं । एगासणं च सुष्णं मासगुरू हुंति एगठा ॥ ८९ ॥ पण कुंडलसुण्णं बिल खमणाणं जह कमेण परिमाणं । पायजुएक्क १ | दुअद्धं २|| पण ५ दस १० वीसा २० तहविसोया ॥ ९० ॥ तपनाम तपसंज्ञा विशोधिते अविशोधि वा विशोषका दानं नीवी पुरिम एकास आंबिल चोथ उपवास छठ अठम पणगंभि- मासल हु |मासगुरु चउलहु चउगुरु चउगुरुश्रमास १ * ३ छलहु ४ ५ तरं ५५२५ ०२८ SE 0000 १। ५ २॥ १० ५ १५ 0000 १० २० 0000 २० २५ ४० ३० 00000 ६० ३५ दशम छग्गुरु कलं કાર 90000 ८० ४२ ९५ ४५ दुवा- पणक लस मेरुः लाणो मूलतः | पणपश्च एकसो | षाण्मापणकल्ल काणं पेंशी सिकं | उलीएक कलाणु औ* समग्र १२२३|४| १८० याव १०० ५० ५५ ६० पूर्णविशे पका ७५ नि १२ ए १ १ उ.१ कल्लाणं पणकल्लाणं च हुंति तग्गुणणे। दो आयामा निव्वियाणि तिन्नि चउगुरु मासा ॥ ९१ ॥ दोलहुया दोगुरुया दोछग तिन्नेव दोवि गुरुलहुया । अद्धदुगाएगभत्ता दसतिगअवढबारसगं ॥ ९२ ॥ चवीस पोरसीया नवकारसीयाण हुंति पणयालं । अट्ठ य मुक्कलनिव्विय एगोवासेण नायव्वा ॥ ९३ ॥ सुन्नं तह पणवीसा मुकल इगं १ लिपी • दुं २ पण ५ तिगाय ३ । च ४ च ४ धी पण ५ छग ६ द्दी सग ७ कल्लं ५ पंचकल्याणं २५ ॥ ९४ ॥ प्रव ॥५७ Page #117 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मझण्डं पुवण्हं कालाइक्कमयं लहुं । विलंबो सढकालो य एगठ्ठा पुरिमवड्ढस्स ॥९५॥ पाओ मुणी सहावो पाणाहारो सुभोयणं । आरोग्गं खंतिउक्किंठं एगठ्ठा एगभत्तस्स ॥९६॥ अरसं विरसं लूहं तिप्पायं साहुकम्ममिठं च । निम्मायं पोल्लरयं एगठ्ठा निविगइयस्स ॥९॥ अंबिलनीरसजलं दुप्पायं धाउसोसणं । कामग्धं मंगलं सीयं एगठा अंबिलस्सावि ॥९८॥ मुत्तो समणो धम्मो निप्पावो उत्तमो अणाहारो । चउप्पाओ भत्तठो उववासो तस्स एगठ्ठा ॥१९॥ पसमो पत्थो दंतो चउम्मुहो हियकरो य उक्किठो। भदं पुणं सुहीयं छठ्ठभत्तस्स एगठ्ठा ॥१०॥ धिइबलसुंदरदिव्वं मीसं नामाणि अठ्ठमस्सावि । विक्किठं जूहकामं दसमभत्तस्स नामाइं॥१०१॥ दुक्करकरणं मुक्को दुवालसभत्तस्स हुंति नामाई । पूयं जूयं विमलं चउद्दसभत्तस्स नामाई ॥१०२॥ जीवं जीवविसिठं सत्तं भत्तं च सत्तभत्तस्स । वृढी गुणवुढी वा अठ्ठमदिणभत्तनामाई ॥१०३॥ अणसणरम्मं तारं भव्वं नव्वं चऊदसअभत्तठे। दिणवुबीए पुव्वं तवोवमाई पउंजिज्जा ॥१०४॥ परमन्नं खीरं दही विकिपरमं विसिविमलं च । मंगलनिहिसंपुण्ण घोसं अंगं तहा ठाणं ॥१०५॥ वुच्छिन्नं सिद्धधक्लं भोयणसुद्धं तहा य संसुद्धं । दुगसंपुषणं नंदा-वत्तं मुणिलं (पुलिणं) च णलिणं च ॥१०६॥ सोमंधं आवत्तं सिगं कूडंव सिहरसंदिन्नं । तिगसंपुण्णं भमगं पत्तं छत्तं च पज्जत्तं ॥१०७॥ सन्नाणं परिभासाचउत्थाइ चउतीसभत्तपज्जंता । सेहं च सिंहाभूयं तियचउहाहारमणसणयं ॥१०८॥ दसणनाणायाराणमइयारा मणसि चितिया हुज्जा। चारित्ताईयारे एमाइतवो पयट्टिज्जा ॥१०९॥ Page #118 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ॥ यन्त्रस्थापना यथा ॥ संबोध ॥५८॥ १२ २४॥ २५ विकिठं ।४. । उ दही परमं विसि] विमलं | १५ १८ | वुच्छिन्नं | १४|उ संसुद्धं |१९| दुगसंपुण्णं २०/उ नंदावत्तं |२१|उ ठाणं सिद्धं धवलं भोयणं सुद्धं पुलिणं नलिणं. सोगधं आवत्तं सिंग .. । |२९| उ २८ | 33/उ ४|उ | भमरगणं | ३१/उ तिगसंपुण्णं ३०/उ सिहरं दिनं छत्तं पजंतं परमान मंगलं निही न्यांसोयं संज्ञाच सिंहं १ सिंहीभूर्य र संबाद्वयं त्रिविधचतुर्विधसंलेखनाजोषितस्य. तह नाणदंसणाइण नढे भग्गे गए अणाविरके । उवगरणाणं सोही पुणो कए तओ विसेसेहिं ॥११०॥ तह चेइपदव्वभरकणउवरकणमणुवररकणुवएसे । परिभोगपरिच्चाए जहजोगं तमुवजोइज्जा ॥१११॥ दुगुणतिगुणाइसेसे विसोवबुद्दीहिं तत्थ दायव्वं । सत्तीए णो कुज्जा तवो पवजाणसणतित्थे ॥११२॥ एवं नाणस्सावि अप्पवरदं च तत्थ भइयध्वं । तम्हा दरके हिंसया वायाए निरुवबंधिज्जा ॥११३॥ चरित्तायाराणमईया-रविमुद्धिहेऊणमासज्ज । सम्भितरबाहिरयं तवोवहाणं खु कारिज्जा ॥११४॥ पडिकुट्ठस्स य करणे किच्चाणमकरणए य वियहाए । पवयणपरूवणाए पच्छित्तं दिज्जए जम्हा ॥११॥ For Private & Personal use only Page #119 -------------------------------------------------------------------------- ________________ sisss SIISIS ||LIS दुविहंमि वि मिच्छत्ते लोईयणो उत्तरे य मीसे य । इक्किक्के वि य तिविहे देवयगुरुपव्वगयभेए ॥११६॥. तब्बुद्धीए करणं उक्किठजहण्णमझिमा भणिया । विवरीए विवरीया मूलगहाणीहि नायव्वा ॥११॥ बालं पलंबतरुणं दरकं परिणयमइय वुद्वृत्तं । जुण्णमबीयं सुण्णपज्जतं वयस्स एगट्ठा ॥११८॥ जहजोगं कायव्वा भंगा दुतिचउपंचछगसत्ता । सठ्ठाणपरष्ठाणे सोहिं तेसि पयट्टिज्जा ॥११९॥ दुतिचउपणगपमाणे पच्छित्तं पणगपायमुक्किट्ठ । अण्णेहि जहा सुद्धी सत्तिगुणमुविस्क दायब्वं ॥१२०॥ दसणनाणाईणं नासे भंगे उविरकभोगेसु । पुण तक्करणे सुद्धी चरणायारंमि होइ तबो ॥१२१॥ अजिणेसु य जिणबुद्धी असाहुबग्गे सुसाहबुद्धी य । अचरणधम्मे चरणधम्मोत्ति परूवणा जा सा॥१२२॥ ताणं चिय पडिवत्ती करणे लोउत्तर हवे मिच्छं । नाणाइतिगगहणे तप्पुरओ होइ पच्छित्ते ॥१२३॥ उक्किट्ठ चउसुहगं मझिममारोग्गजहन्नयं पुरिमं । अहवा हुंति विसोया सहाण दंसणजुयाणं ॥१२४॥ बयभंगे पुण एवं कुतित्थिनमणप्पसंससंथवणे । इच्चाईण विभासा णायय्या सम्मदिठ्ठीहिं ॥१२५।। सढाणं मुणिभवणे उक्किठा मझिमा दविणचाए । बंभव्वयधरणे पुण जहन्नया सव्वपच्छित्ते ॥१२६॥ साहूण भत्तपञ्च-रकाणे करणे विगिकृतवकरणे । विगईण परिश्चाए मायव्वा ओमजहणा य ॥१२७॥ अइयारेसु अइक्कमवइक्कमे तह पुणो अणायारे । मालातुलापलंबापभिइमेएण दायव्वा ॥१२८॥ इगकन्ना दुमकन्ना तिगकन्ना चउय पंचकना य । छगकन्नाइकमेणं मणवयणाइक्कमाईसु ॥१२९॥ नमुपोपुरिमावढगदुति खु.पोल्लरं पुण्णं । इचाइ उत्थाइ दायव्वं तणूण अइक्रमणे ॥१३०॥ Isis ।। ॥5 ॥ For Private & Personal use only Page #120 -------------------------------------------------------------------------- ________________ र संबोध ॥५९॥ नियपरतित्थियसवासढसहासहलायमन्नाए । जोग्गमजोग्गमहा जे पउँजियव्वं विसोहिपयं ॥१३१॥ अरिहंतसिद्धपवयण-आयरिया थेरसाहुवझाया । चेइयपडिमाईण-मवनवाई मइकुडिला ॥१३२॥ तेसिमासायणा आणा-मंगाइअणेगदोससंकिष्टा । जे तेसि पवयणस्स य बाहिरा एव पच्छित्तं ॥१३३॥ इच्चाइभावसल्लं उद्धरणं जेहिं भावओ न कयं । तेसिमठाणं पुण दवाइदोसपरिकलियं ॥१३४॥ जो एवं निस्सल्लत्तं सम्म काऊण सुगुरुपयमूले । सत्तीए भत्तीए बहुमाणं जे पठंजंति ॥१३५॥ - तेसि निराणुबंधी रागद्दोसा हविज्ज निरवज्जा । सुहकयतुही पुष्टी पुणरिसयरस्स संसुद्धी ॥१३६॥ जुग्गाणं भव्वाणं संविग्गाणं विसुद्धसम्माणं । संविग्गपरिकयाणं दायव्वं सव्वहा तेसि ॥१३७।। तग्गुणविपरिकयाणं तप्पुरओ भासमाणमिणम खु । पव्वयणगुणनीसंदं हुज्जा पच्छित्तमित्थत्तं ॥१३८॥ णिच्च पसंतचित्ता पसंतवाहियगुणेहिं मझत्था । नियकुग्गहपडिकूला पवयणमग्गंमि अणुकूला ॥१३९॥ इच्चाइगुणसमेया भवविरह पाविऊण परमपयं । पत्ता अणंतजीवा तेसिमणुमोयणा मझ ॥१४०॥ इति श्रीसंबोधप्रकरणं तत्त्वप्रकाशकनाम कृतं श्वेताम्बराचार्यश्रीहरिभद्रसूरिभिः याकिनीमहत्तराशिष्यणीमनोहरीयाप्रबोधनार्थमिति श्रेयः ॥ कम्म For Private & Personal use only Page #121 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | सांप्रतं जीतव्यवहारे सातैव तपसां बहुशः प्रायः प्रदानं संभवति तयंत्रं. . २॥ नामानि | आपत्तयः ' संज्ञालिपयः| लिपिन्यासा| विश्वोपका नीवीमुक्कलयं| २५ । भिन्नमास । पुरिमाई | २७ | लवुमास एकासणु ३० ।गुरुमास आयाम १०५ चतुर्लयु ::धि १० उपवासं १२० चतुर्गुरु | धि | २० १६५ । पदलघु :::दि ४० अठम १८०. | पदगुरु | पु. ए. नी०५ ४ उ.१कल्या छठअठम६ प्रमादसहितस्येदं व्यवहारचूर्ण्यभिप्रायेण दानयंत्रक एकेन्द्रिाद्वींद्रिय |त्रींद्रिय चतुरिद्रि पंचेंद्रिय संघह । ० । ४ । ४ । ६ दी ६ परिताप | उपद्रव | ४ । ६ । ६ । उ४| उ ५ एतदानयंत्रकं जीतकल्पोक्तं प्रमादसहितस्य. । एकेंद्रिय द्वीद्रिय । त्रीद्रिय । चतुरिद्रिय पंचेंद्रिय संघट्ट | . . . . ४ परिताप । ४ । ४ । ४ । उपद्रव । एक । क क क । क थावराणां सा.वन. विकला पंचद्रिय |जातअन्नाते संघट्टे ....२५ पणगं आगादपरि। गाढपरिता०। . ४ | धी. धी 1 उपद्रव ४ १४ एककल्पा एककल्प SENSE Jain Educati mational For Private & Personal use only wvsenelibrary.org Page #122 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध स्वस्थानं चारित्रिणां सर्व प्रक० प्रा० । सूत्र अद० अद मै० म प. दि० भो० खस्थानं सम्यक्त्वस्य देशे. परस्थानं सम्यक्त्वस्य सर्वे आ. प्र. द. प्रा० आ. प्र... | पा० श्रा. प्र. द. मृ० अद आ. प्र. द. | अद० आ. प्र. द. आ. प्र. द. | मै० आ. प्र. द. आ. प्र. द. । प० | आ. प्र. द. । रा० आ. प्र. द. भो० | आ. प्र. द. | ज्ञा० आ. प्र. द. अन० आ. म. द. | द० आ. प्र. द. | सा० आ. प्र. द. आ. प्र. दु. दे० आ. प्र. द. त० आ. प्र. ६. | पो० | आ. प्र. द. | वी० आ. प्र. द. | अति० । आ. म. द. मूलत: त्रिगुण मूलतः अपावृत्ती नवगुणं वा त्रिगुणं नवगुणंवा | आ. प्र. द. प्रा० मा. प्र. द. मृ० आ. प्र. द. आ. प्र. द. | आ. प्र. द. प० | . म. द. रा० । आ. प्र. द. ज्ञा० । आ. प्र. द. आ. प्र. द. चा० आ. प्र. द. तप० आ. म. द. | वी० आ. म. द. | मूलतो मूलं त्रिगुणं वा CESSOROSCARDSk | परस्थान लिंमिना आ. म. द. आ. म. द. बा. म. द. आ. प्र. द. आ. प्र. द. आ. म. द. आ. म. द. | आ. म. द. आ. प्र. द. आ. म. द. | आ. प्र. द. अन० द० सा० द. चा० अति० । ॥६ मूलाभावात् त्रिगुण नवगुणं वा. For Private & Personal use only Page #123 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | निरपेक्षा आचारकृत आचारकृ- उपा० कृ-उपा०ऽकृ-गीतार्थ-गीतार्थ- गीतार्थस्थि अमीतार्थ अगीतार्थड निरापेक्षा तद | तकर | तकरण | तकरण कृतकरण अकृतकरण तअकृतक स्थिकृअकृ-स्थितकृत तकरण करण (रण अनवस्था मूल | मूल | छेद | छेद | छेद । ६१ ! ६ | छेद | मूल | छेद | छेद | ६१ । ६१ । ६१ । ६ । ४१ | ४१ ४१ । ४१ । ४१ . ४ । 1.४१ । ४१ । ४ । ४ । । । . . | २५ । २५ Page #124 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध ॥ ६१ ॥ अगीतार्थs अगीतार्थ अगीतार्थ- निरपेक्षी आचार्यकृ- आचार्यअ- उपाध्याय - उपाध्याय गीतार्थंकृस्थितकृत- स्थितकृत- अस्थित निरपेक्षा तकरण कृतकरण कृतकरण अकृतकरण तकरणसमवस्त्र करण करण कृतकरण ४१ मूल ५१ ६ ४ ४ ० ० २० ५१ ४१ ० o ० २५ १५ ४ मूल ० २५ २० ४ ० ० मूल ६१ ६ ४१ ४ पारांचिक अनवस्था-अनवस्था प्य अनवस्था प्य छेद ६ ४१ ४ ० प्य मूल छेद ६ 120 120 ६ ४१ ४१ .४ मूल ० ४१ ४ ० मूल छेद * 0x0|0| ६१ ४१ ४ उपदार यंत्र |४|६|५ उत्कृष्टापत्तौ गुरुउमं उठउ । १२१२१७१ उ छेद त्कृष्टापत्तौ लघुउउ १५ उत्कृष्टापत्ती ६.१ ४१ ४ . . .c लघुक गुरुतरं ममउ० देघु तिरंमपउ |६ लघुतमं मउ ४ | प्रक● ॥ ६१॥ Page #125 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मिथ्यात्वमुख्येषु भव्याभव्यमा-मिथ्यात्वभव्य प्रायश्चित्तविशोधि मार्गानुसारिप्रायश्चित्तविशोधि । प्रपतितसम्यक्त्ववतां सम्यक्त्वर्गानुसारिपडिवज्जया. वता च॥ ३४ ३४ । ३४ ३७४ | ३७४ ३७४ १६ तो १६ ३७४ ( ३७४ |३७४ मंद १६ 30 उत्कृष्टसं० १% १६ स्थित्या मंदस्थि त्यात्मना |३४|३४ ३३४ उत्कृष्टस्थितिऽपाद्वंपुडलपरिवर्तनामन मुहूत्तेवा १३३ | १३३ । १३३ उत्कृष्टसंज्ञा US Col ___३ ३३ । १३३ ३३ | १३३ Page #126 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संबोध ॥६२॥ देशविरतिप्रायोग्यप्रायश्चित्तवि शोधि. ३४६ १२१८ १२s १६ Jain Education national एकादिवतानौ द्वादशानां वाविशोधिस्थापना १३३ ३०४ ३४ १२०८ १२८ १२८१२८ १६ | १६ (१२६८) १६ सर्वविरतिप्रायोग्यप्रायश्चित्तविशोधि. नो ३२ ३०४ ३०४ १२८ ३५४ १२६८ १६ देवतान्यगतोपशमश्रेणीषु ॥ क्षपक श्रेणिगतानां लोकाग्रस्थ - सिद्धस्थानस्थापना ॥ 3:-: 8 प्रक० १) ॥ ६२ ॥ Page #127 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रभृतीनां मागांनु-पतामावर ता । वत्तिनां 15. सावद्य. | असावद्य | असांवद्य | मन ३ ३करण| अंतींत ३| स्वार्थ । सावद्या | असावद्या | मनद्र | करण ३ अत्र यथायोग्य 8 सारंभ निरारंभ | सारंभ वचन३३कारा अनागत३] परार्थ | निराशंसा निराशंसा वचन३ कारावण ३ एकविधद्विवि धत्रिविधादयो 18 सानुबंध | सानुबंध | सानुबंध काया३ अनुमो३ वर्तमान ३| उभयाथे | निरनुबंध | निरनुबंध काया३ अनुमोदिनी भंगकानां योमिथ्यात्व बालतपः | सभ्यक्त्व योगव- करण एतत्प्रसङ्गतो लिखितं तपःप्रदानं बुद्ध्या परगुणस्थानवत्तिनां ज्यं गुरुतम उप तु यथा २ करणव्यापारेष्वाशयभेदाद्भदस्स तु आगमश्रुतव्यवहा-|१०३लवुउप स्थानक वता रिणो गुरुलघुप्रायश्चित्तप्रदानादिविधानं सांप्रतन्तु व्रतातिचा-८लकामदा. | तानां | सारिणां। रिणामेव क्षयिव प्रायश्चित्तादिदानं जीतव्यवहारता यन्त्रकम् निरा. आ० उ ५उ । ।गी गीगी२० गी२० गी२० गी२०/१५० ल ०ल.. | ० निर आ० श्रा० ४० | ४ |२५|२५ २०२० १५ | १५ | १५ | १० | • गु • गु, २५ | | 0 |२५|२०|२०|१५|१५|१५ १०|१०|१०|१०| २५/२५/२०१५ १५/१५/१०/२० ५||५| ५| २०/२५/२०|१०|१५|१० |_निरपेक्षनिरापेक्षा आचार्योपाध्यायगीतार्था | १५ | १५ | १० |१०|१०| • • • गीतार्थकृतकरण उझिज्ताधष्टानां यंत्रक 1१०1० । । । । स्थापना. स्थापना.. . २५/२५ २० २०/२०१६ | RAI For Private & Personal use only Page #128 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - - H ॥शिशिरदानयन्त्रकं । संबोध गुरुतमउ८४॥३मध्यमापन्नो ६.५। उत्कृष्टा-गुरुतम उम, गुरुतमतज४।३मध्य-गुरुतरमम६२।१ जघन्या-गुरुकंजघन्य गुरुकजज W लघुजघन्यउदगुरुतरं मध्यम पन्नोगुरुतरंम-लघुउमददलघुउत्त-मापनोगु-लघुतरं मम पन्नोगुरुकंज-४ लघु० ज० आंबिलयुजनाम लालघुकजघन्य १०२५मध्यमप-ध्य०२।७उत्कृलघुकम ४४ लघुउ० रुतमःम-आबिल लघु-उदा२० जघ-म० आंबिल-एका लघुकना उ४४ बोलघुतरं८१०टापत्तोलघुउ-॥४ ज आंबिलध्यमउ६२-तरं मजएका-न्यापन्नो लत-लघुजघन्य जज पुरिमह गुरुतबममउ मध्यमपत्तो रतपुउ०१५ उत्कृध ५ मध्यमा-सणा. मजाउ४।५। म०एकासणो हिमंतदाने यंत्र लघुतरंमम न २६२।१जघ- पत्तोलघुकउउ पन्नोलघुत जघन्या लघु गुरुतरंलघु न्यापन्नोगुरुकंज गुसतमत्रदल रमाउदम आंबिल. 15 मम ४॥ धन्यापत्तोलघुत-घुत्तमजउ ४ ध्यमापत्तो मं२६।५जघन्य-लघुकतम० लघुकतरंलघुतमजउ०४॥आचाम्ल॥ मउ४॥ २१जघन्या गुरुकंजघन्यम- गुरुकंजजए-गुरुकंजज ६।५।उत्कृ गुरुतमर गुरुतम आं- ४१३ मध्यमा-गुरुतरमजआंगुरुजमम ४ पन्नो गुरुकं जध्यम आंबिलपु- का० लघुतमं उप ४ लघु-टापन्नोगुरु मदलघुओ बिल लघुकज पन्नो मउ५६-- ---लघुतम आं० Pउ४॥२० जघ रिमट्ठलफकंजज पुरिमट्ठ लघु-त्तमजज-उ०८१२ म ४ लघुक एकासगुं. २५ मध्यमा- लघुतरमज. || लघुतम महिन्यापन्नो लघु निवीग्रीष्म. कंजजनीवी. क्तांबिलं उत्कृष्टा आंबिल. पन्नो १० म- एकासणा ल-आलघुतमजउआ।५जघ एका. व-पन्नो ल०६ ध्यमापन्नोमउ घुतरम० ज०म एकासणो.ल३॥ न्यापनो लघु गीष्मदानयंत्र ग्रीष्मदानेयंत्र पर्षादानयंत्र.१५उत्कृष्टा आंबिल. पुरिमढ. क जउ० ०४,,ग्रीएका RSSTER मदानयंत्र For Private & Personal use only Page #129 -------------------------------------------------------------------------- ________________ For Private & Personal use only Page #130 -------------------------------------------------------------------------- ________________ මුලික කුමාර දහා ඔහුබුක්‍රමුඛ මෙම තෙලුමෙහි Main Education international For Private & Fersonal use only www.sainelibrary.org