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जेहि कम्मादाणष्पमुहा जणणिदणिज्जववहारा । पञ्चस्काया नियगिहवावारा वज्जिया सययं ॥४४॥ तेहि जइ सुद्धकठ्ठाइद लेहिं पयदसगभत्तिमिच्छिज्जा । जम्हा न लोयखिसा हविज्ज सागारओ भयणा ॥ ४५ ॥ थूलतसपाणररकण अहिगारी नो परं स सुहमेसु । गिहिवावारे जइ वि हु किं पुण अरिहाइभत्ती ||४६ ॥ तिकरणतिजोगजुत्तं पञ्चरकाणं सया मुणीणं च । सद्वृाणं संथारे अहवा वत्युं समणुपप्प ॥ ४७ ॥ कयपुढविपञ्चरकाणे पडिमाकारावणे वि न हु दोसा । जलजलणपवणवणाणं ठाणठाणं न कुव्विज्जा ॥ ४८ ॥ जिणपूयाइनिमित्तं जइ कुज्जा अप्पणो सिया सढो । जइ अण्णो न सहाओ हविज्ज नो तत्थ वयदरको ॥४९॥ पूयाए कार्यवहो जइ विहु हुज्जा तहा विसुद्धगणं । जलगलणधम्ममिव जं निरविज्जप्पाण सुहजोगं ॥ ५० ॥ जत्य सहजोगाणं पवित्तिमेत्तं च पापनिव्वित्ती । तं भत्तिजुत्तिजुत्तं परनिरवज्जं न सावज्जं ॥५१॥ जयणा तसाण निचं कायव्वा सा वि जइ अणाभोगे । जं तह पायच्छित्तं जहारिहं तत्थ घेत्तव्वं ॥ ५२ ॥ तिगरणतिजोगजुत्ता मुणिणो वि हु तत्थ जं पए भासा । विहिफलनिसेहमोणप्पयारिया भत्तिकज्जेसु ॥ ५३ ॥ परिणामविसेसाओ पुढवाइ व होइ वि अह जिणाययणे । भणिओ गुणाय एव मुणिविहारुव्व निऊहिं ॥ ५४ ॥ तरइ तित्थविसेसे जह पाहाणो विसज्जियं गरलं । नो मारइ बलपुट्ठि कारइ जह दव्वजोएण ॥ ५५ ॥ चप्पभावओ चिय अग्गी णो डहइ तं हियं कुणइ । तह कायवहो वि तया सुहजोगनिमित्तसंजयणा ॥ ५६ ॥ परिणाम विसेसो वि हु सुहबझगओ सुहफलो होति । ण उ इयरो वेयवहोव्व मिच्छस्स जह विप्पं ॥ ५७॥ सइ सव्वत्थामाभावे जिणाण भावावयाए जीवाणं । वेसि नित्थरणगुणं पुढवाइवहे विमाययणे ॥ ५८ ॥
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