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संबोध ॥१५॥
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कयसिगारा- अज्जा सभासु पुरओट्ठिया कयकहरूका | अहवा भोयणवेलासु इत्यीरज्जं न तं गच्छं ॥ ७३ ॥ इइ बहुहा सावज्जं जिणपडिकुटुं च गरहियं लोए । जे सेबंति कुमग्गं करंति कारंति निम्मा ॥ ७४ ॥ इहपरलोयहयाणं सासणजसघाईणं कुदिट्ठीगं । कह जिणदंसणमेसि को वेसो किं च नमणाइ ॥ ७५ ॥ बाला वयंति एवं वेसो तित्थंकराण पुसो वि । नमणिज्जो धिद्धी अहो सिरमूलं कस्स पुक्करिमो ॥ ७६ ॥ 'ते लोयाणं पुरओ वयंति एवं खु किं करिस्सामो | सामग्गीअभावाओ वक्कजडाणं पुणो कालो ॥७७॥ दूसमकाले दुलहो विहिमग्गो तंभि चेव कीरंते । जायइ तित्थुच्छेओ तम्हा समए पवत्तव्वं ॥ ७८ ॥ पुवं पवयण भणिया विहिपुण्णा साहुसावगा कत्थ । जम्हा ते सिवगमणा संपइ मुख्कस्स विच्छेए ॥ ७९ ॥ धिइसंवयणबलाइ हाणी इह जिणवरेहिं निद्दिठा । को मेओ सुहअसुहाण केसि चिय कुग्गहो एसो ॥ ८० ॥ बहुजणपवित्तिमित्तं लोयपवाहेण किज्जए धम्मो । जइ निम्मलं मणं चिय तो सव्वत्थावि पुण्यफलं ॥ ८१ ॥ एयारिस दुब्बयणं भासंता अप्पणो पमायंता । बुडुंति भवसमुद्दे बुड्डावंता परेसि पि ॥८२॥ पवयणनामग्गाहं वख्काणे जो करेइ विगहाइ । कामत्थहासविह्नियकारि किर मुद्धबालाणं ॥८३॥ बझभंतरगठि धरइ सया भासइ पुण जणाणं । दूसमदोसेण जओ समणाणं दुल्लहसामग्गी ॥८४॥ जइ कहमवि जत्थ गणे भिरूकुजणा संजमे कुसीला य । जइ सूरि सुद्धधम्म-डिओ हविज्ज त्थ सो गच्छो ॥ ८५ ॥ संजमहीणा मुणिणो जत्थ गणे हुंति सो वि मुत्तव्वो । जइ सूरि कुमग्गपरो सोवागकुलुव्व भव्वेहिं ॥ ८६ ॥ निम्मलजलसंपुण्णो सोवागंधुव्व गरहणिज्जो सो । तिविहेण तस्स संगो वज्जेयव्वो सुसाहूहि ॥ ८७ ॥
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प्रकरणः
॥ १५
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