Book Title: Sambodh Prakaranam
Author(s): Haribhadrasuri, 
Publisher: Jain Granth Prakashak Sabha

View full book text
Previous | Next

Page 72
________________ सेसाण नारयाणं तिरिइत्थीणं च तिविहदेवाणं । नत्यि हु खइयं सम्मं पंच नराणं न अन्नेसि ॥११॥ सयलमवि जीवलोए तेण इह घोसिओ अमाघाओ। इक्क पि जो दुहत्तं सत्तं बोहेइ जिणवयणे ॥९२॥ सम्मत्तदायगाणं दुप्पडियारं भवेसु बहुएसु । सव्वगुणमीलियाहि बि उवयारसहस्सकोडिहिं ॥१३॥ सम्मत्तंमि उ लद्धे छ(ठ)इयाई नरयतिरियदाराई । दिवाणि माणुसाणि य मुरकसुहाई सहीणाइ ॥९४॥ सम्मत्तं सम्मत्तं सब्वेवि वयंति अप्पधम्मदिढे । जइ एवं तो भिच्छत्तवित्थारं कत्थइ न भवे ॥१५॥ अरिहंतेसु य भत्ती निरुवयारा हविज्ज सुद्धप्पा । संजलणाण कसाए मंदरसे मंदमणुबंधे ॥९६॥ मूलोत्तरगुणसुद्धे सुसाहुबग्गे य जा य पडिवत्ती। समयखित्तपइवे भत्ती सम्मत्तजुयसंघे ॥९॥ तत्तमिणं जा बुद्धी अणत्थजिणिंदवक्कमणुसारि । मझत्थो तप्परके मिच्छत्तच्चायओ सव्वं ॥९८॥ सो सुद्ध दंसणधरो अलंकियं तेण भूयलं सव्वं । अण्णो ममत्तमिच्छत्तवासिओ पासिसारिच्छो ॥१९॥ कुसमयसुईण महणं सम्मत्तं जस्स सुष्ठियं हियए । तस्स जगुज्जोयकरं नाणं चरणं च भवमहणं ॥१०॥ लब्भइ सुरसामित्तं लब्भइ पहुयत्तणं न संदेहो । एर्ग नवरि न लब्भइ दुल्लहरयणं च सम्मत्तं ॥१०॥ गुरुणो गुरुगुणजुत्ता समयपमाणेण ताण नाऊण । वयणायरणा संविग्ग-परकाइगुणेहि भइयव्वा ॥१२॥ ॥ इति सम्यक्त्वाधिकारः॥ ॥३५॥ Jain Education ational For Private & Personal Use Only ww b rary.org

Loading...

Page Navigation
1 ... 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112 113 114 115 116 117 118 119 120 121 122 123 124 125 126 127 128 129 130