Book Title: Sambodh Prakaranam
Author(s): Haribhadrasuri,
Publisher: Jain Granth Prakashak Sabha
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संबोध
॥३३ ॥
अरिहं देवो गुरुणो सुसाहुणो जिणमयं महप्पमाणं । इच्वाइसहो भावो सम्मत्त बिति जगगुरुणो ॥३४॥ सम्मठिी जीवो गच्छइ नियमा विमाणवासीसु । जइ न घइयसमत्तो अहव न बद्धाउओ पुचि ॥३५॥ जं सक्कइ तं कीरइ जं च न सक्कइ तयं च सद्दहणा । सद्दहमाणो जीवो वच्चइ अयरामरं ठाणं ॥३६॥ एगत्थ सव्वधम्मा लोइयलोउत्तराइणुठाणा । एगत्थ दंसणं खलु न समं होइ तेसि तु ॥३७॥ संका १ करखा २ य तहा वितिगिच्छा ३ अण्णतित्थियपसंसा ४ परतित्थियाण सेवण ५ मइयारा पंच सम्मचे ॥३८॥ सव्वे देसे धम्मे अत्थि नत्थित्ति संसओ संका । कंखा कुमयभिलासो दयाइगुणलेसदसणओ ॥३९॥ वितिगिच्छा य फलं-पइ संदेहो मलिणयंमि वि दुगंछा । परतित्थीण पसंसा परिचयकरणं पसंगो य ॥४०॥ मिच्छत्तथिरीकरणं अतत्तसद्धा पवित्तिदोसो य । तह तिव्वकम्मबंधो पसंसओ इह कुदंसणिणं ॥४१॥ अन्नेसि सत्ताणं मिच्छत्तं जो जणेइ मूढप्पा । सो तेण निमित्तणं न लहइ बोहिं जिणाभिहियं ॥४२॥ जाणिज्ज मिच्छद्दिट्टी जो पडणालंबणाइ धिप्पंति । जे पुण सम्मद्दिठी तेसि पुण चढइ पयडीए ॥ ४३ ॥ दुविहं लोइयमिच्छं देवगर्य गुरुगयं मुणेयव्वं । लोउत्तरं पि दुविहं देवगयं गुरुगयं होइ ॥४४॥ चउमेयं मिच्छत्तं तिविहं तिविहेण जो विधज्जेइ । अकलंक सम्मत्तं होइ फुडं तस्स जीवस्स ॥४५॥ एवं अणतरुत्तं मिच्छं मणसा न चिंतइ करेमि । सयमेसो व करेउ अन्नेण कए व सुख कयं ॥४६॥ अभिग्गहियमणभिग्गहं च तहाऽभिनिवेसियं चेव । संसइयमणाभोगं मिच्छत्तं पंचहा एयं ॥ ४७॥ मिच्छत्तं पुण सव्वाणत्थाण निबंधणं मुणेयव्वं । तत्थाभिग्गहियं पुण कविलाईणं मुणेयव्वं ॥४८॥
३३॥
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