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अधर्म न हो । उदा० पूजा करने जाय, तब कोई निंदा करे, उसकी परवाह नहीं । पर पूजा करने जाते समय कोई अनुचित कार्य किया, गाली दी या हिंसक व्यापार की अनुमति प्रादि से लोगों को धर्म पर जो अभाव उत्पन्न हो, वह अनुचित प्रवृत्ति से उत्पन्न कहा जायगा । या धर्म कार्य में काफी खच करने पर भी सामान्य कार्य में थोडा खर्च करने में आनाकानी करे तो उसे लोग 'धर्मद'भी' कहेंगे । लोगों को धर्म के प्रति अरुचि उत्पन्न हो उसकी दया श्रावक ही करेगा न ? अन्य कौन ?
दूसरे को धर्म सिखाने या उपदेश करने का कार्य है वह तो दूर रहा, पर उसके कार्य से धर्म के प्रति सद्भाव खोने या अनादर से उसे धर्म के प्रति भरुचि उत्पन्न होने से वह दुलंभबोधि बने, वैसा कार्य श्रावक कैसे कर सकता है ? लोगों को प्रबोधि का कारण होने से स्वयको भवांतर में बोधिबीज दुर्लभ बनता है।
एवमालोएज्जा, न खलु इत्तो परो अणत्यो, अंधत्तमेग्नं संसाराडवीए जणगमणिट्ठावायाणं
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