Book Title: Mukti Ke Path Par
Author(s): Kulchandravijay, Amratlal Modi
Publisher: Progressive Printer

View full book text
Previous | Next

Page 83
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir उसका श्रेष्ठ उपाय है। यही मोहछेदक सयम योग तथा संयम के विशुद्ध अध्यवसाय की जनक है । ___ एवं विसुज्झमाणे भावणाए कम्मापगमेणं उवेगइएअस्स जुग्गयं । तहा संसार विरत्ते संविग्गो भवइ, अममे अपरोवतावी, विसुद्ध विसुद्धमाण भावे ॥ इतिसाहुधम्मपरिभावणासुत सम्मत्त ॥२॥ इस प्रकार विशुद्ध भावना करता हुया श्रावक कर्म के अनेक बधन तोड डालता है और उस कर्म नाश से साधुधर्म को योग्यता प्राप्त करता है। इस तरह के सोच विचार व चिंतन से ससार से विरागी बनकर मात्र मोक्ष का इच्छुक बनता है। अब संसार की किसी वस्तु से उसे ममत्व नहीं है। वह परपरिताप (पर पीडक) सं दूर हो जाता है । सर्व के प्रति अनुकंपा वाला वह रागद्वेष के ग्रन्थि भेद से शुभ अध्यवसायों को वृद्धि से अधिकाधिक विशुद्ध बनता जाता है। इस तरह साधु धर्म परिभावना नामक द्वितीय सूत्र समाप्त हुना। ॥ * ॥ [७०] For Private And Personal Use Only

Loading...

Page Navigation
1 ... 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112 113 114 115 116 117 118 119 120 121 122