Book Title: Gurupad Puja
Author(s): Ajitsagarsuri
Publisher: Shamaldas Tuljaram Shah

View full book text
Previous | Next

Page 52
________________ ४१ सघलां काप्यारे; दान, मुमुक्षुने आप्यारे. तमे क्लेश तणा तो तमे आत्मविद्या के हतो ऊर्द्ध तमाशे प्रदेश' कोइ जन जाणेरे; तमे अनुभव मार्ग प्रवीण, जाणे ते माणेरे. तमे ध्यानी तणा पण ध्यानी, ज्ञानीना ज्ञानीरे; तमे प्रेमी तणा पण प्रेमी दानीना दानीरे. तमे अखंड जगावी अलेख, अवधूत तमे जगायो आतमराय वखाण्या संतेरे. सूरि अजित कहे गुरुदेव, उत्तम आचारीरे; सदा आपतणा गुण गाय, अरजी उच्चारीरे. पंथेरे; मूल, ||6|| ॥८॥ ॥९॥ ॥१०॥ 11??11 ३ अलि साहेली जंगम तीरथ नोवा उभीरेने - ए राग. गुरुदेव तमो भववनमांही सिद्धो पंथ बतावता. सहु प्राणी तणा, कूडमति हरवाने औषध आपता; ए टेक. तमे संत सदा परउपकारी, तमे सुख परित्याग्यां संसारी. हति प्रभु तणी भक्ति प्यारी; गुरु० ॥ १ ॥ जए जोग विषे निशदिन जाग्या, आतम रस माटे अनुराग्या. वली विश्व भोग मिथ्या लाग्या; गुरु० ||२|| तमे धर्म तणां बहुत्त पाल्यां, तमे आधि उपाधि बधां टाल्यां. तमे शिवपुर के घर भाल्यां; गुरु० |३|| Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

Loading...

Page Navigation
1 ... 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112 113 114 115 116 117 118 119 120 121 122