Book Title: Anuyogdwar Sutra Part 01
Author(s): Kanhaiyalal Maharaj
Publisher: A B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti

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Page 765
________________ ७५२ अनुयोगदारणे उपशान्ताः कषायाः, इति । अयं भावः-औदयिके भावे मनुष्यत्वं मनुष्यगवि. रुत्पद्यते । उपलक्षणमिदम्-तिर्यगादिगतिजातिशरीरनामादिकर्मणामपि, तेषामप्यत्र संभवात् । औपशमिके भावे तु कषाया उपशान्ता भवन्ति । इदमप्युदाहरण. मात्रम्-दर्शनमोहनीयनोकषायमोहनीयावपि औपशमि के भावे समुत्पद्यते। एकदुपसंहरन्नाह-एस गं' इत्यादि । एतत् अनन्तरोक्तं, 'खलु' इति वाक्यालङ्कारे, तत्-प्रसिद्धम् औदयिकोपमिकनिष्पन्नं नाम बोध्यमिति प्रथमद्विकयोगे यदिदमुक्त तद् विवक्षामात्रम् । न पुनरीदृशो भङ्गः कचिज्जीवे संभवति तथाहि यस्य भाव के संयोग से जो सान्निपातिक भावरूप भंग उत्पन्न होता है वह ऐसा है-(उदाएत्तिमणुस्ते उवसंता कसाया) औदयिकभाव में मनुप्यत्वमनुष्यगति-उपशांत कषाय यहां "मणुस्से" यह पद उपलक्षण है, इससे तिर्यगादि चारों गतियां, जाति और शरीरनामादिकर्मों का भी ग्रहण हुआ है। क्योंकि यहां पर उनका भी सद्भाव पाया जाता है। औपशमिकभाव में कषाय उपशान्त होती है । सो यह भी-उदा. हरण मात्र है । क्योंकि औपशमिक भाव में दर्शनमोहनीय और नो कषायमोहनीय इन दोनों का भी उपशम रहता है । (एस णं से णामे उदइयउवसमियनिष्फण्णे) - इस प्रकार यह औदयिकौपशमिकनाम का प्रथम सान्निपातिकभावरूप भंग है। इस प्रथम भंगरूप सोन्निपातिक भाव में मनुष्यगति उपशांत कषाय ऐसा जो कहा है वह केवल विवक्षामात्र है। क्योंकि ऐसा सान्निपातिक भाव किसी भी जीव में उत्तर-(उदइयउवममियनिष्फण्णे) मौयि: भने औपशभिः भावना સગથી જે સાન્નિપાતિક ભાવરૂપ ભંગ ઉત્પન્ન થાય છે તે આ પ્રકારને छ-(उदइएचि मणुस्से उवसंता कसाया) मौयि लामा भनुष्यत्व-मनुष्य. ગતિ અને ઓપશમિકભાવમાં ઉપશાન્ત કષાયને ગણાવી શકાય. અહીં મનુષ્યગતિ આ પદ ઉદાહરણ રૂપે વપરાયેલું હોવાથી તેના દ્વારા તિર્યંચ આદિ ચારે ગતિએ, જાતિ અને શરીરનામાદિ કર્મોને પણ ગ્રહણ કરવામાં આવેલ છે. કારણ કે અહીં તેમને પણ સદૂભાવ રહે છે પથમિક ભાવમાં કષાય ઉપશાન્ત હોય છે આ વાત પણ ઉદાહરણ રૂપે જ આપવામાં આવી છે, કારણ કે પશમિક ભાવમાં દર્શન મોહનીય અને નેકષાયમહનીય, भाम-२ २ना भनि५५ 8५शम २२ . (एसणं से णामे उदइय उपसमियनिष्फण्णे) मा २२ मा मोहयो ५५भि नामन। प्रथम सानि પાતિક ભાવ રૂપ ભંગ છે. આ પ્રથમ ભંગમાં “મનુષ્યગતિ અને ઉપશાન્ત કષાય” આ પ્રકારનું જે કથન કરવામાં આવ્યું છે, તે કથન માત્ર વિવક્ષારૂપ

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