Book Title: Agam 43 Uttarajjhayanam Mulsutt 04 Moolam
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Agam Shrut Prakashan

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Page 41
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ||५०४||-11 ॥५०६|-13 उत्तरायणाषि-१५/५०० (१००) जेण पुणजहाइजीवियं मोहे वा कसिणं नियच्छई नरनारंपजहे सया तवस्सी न य कोऊहलं उवेइसभिक्षु ॥९९|| -8 (९०१) छित्रंसरं मोमंअंतलिक्खं सुमिणं लक्खणदंडवत्युविजं अंगवियारं सरस्स विजयंजोविाहिनजीवइस भिक्खू ॥५००।-7 (५०२) मंतं मूलं विविहं वेचर्चितं वमणविरेयणधुमणेत्तसिणाणं आउरे सरणं तिगिछियं च तं परित्राय परिव्वएस भिक्खू ॥५०१||8 (५०३) खत्तियगणउग्गरायपुत्ता माइप्पभोइय विविहाय सिप्पिणो नो तेसि वयइ सिलोगपूर्व तं परित्राय परिव्यएस भिखू ॥५०२॥-9 (५०) गिहिणोजे पव्यइएण दिट्ठा अपवइएणव संयुया इविया तेर्सि इहलोइयफलहाजो संयवंन करेइसमिक्खू ॥५०३||-10 (५०५) सपणासणपाणभोयणं विविहं खाइमसाइमं परेसि । अदए पडिसेहिए नियंठे जे तत्य न पउत्सईस मिक्खू । (५०६) जंकिंचि आहारपाणगं विविहंखाइमसाइमं परेसि लप्यु जोतं तिविहेणं नाणुकंपे मणययकायसुसंवुडेस मिक्ख् ॥५०॥-12 (५००) आयामगंचेव जयोदएं च सीयं सोवीरजवोदगंध नहीलए पिंडं नीरसंतु पंतकुलाई परिब्बएसभिक्खू (५०८) सदा विविहामवन्ति लोएदिव्या माणुस्सगा तिरिच्छा भीमा भयमेरवा उरालाजो सोद्यान विहिाईसभिक्खू ५०७॥-14 (५.१) वादंविविहंसमिश्चलोह सहिए खेयाणुगए यकोवियप्या पन्ने अभिभूय सव्वदंसी उवसंते अविहेडएसभिक्खू ॥५०८|| -16 (५१०) असिप्पजीवी अगिहे अमित्ते जिइंदिए सव्वओ विष्पमुझे अणुक्कसाई लहुअप्पमक्खी विद्यागिह एगचरे स भिक्खु ॥५०९॥ त्ति बेमि॥ __ परसम अन्नपूर्ण तमा | सोलसपं अज्झयणं-बंभचेरसमाहिाणं (119) सुयं मे आउसं-तेणं भगवया एवमक्खायं इह खलु येरेहि भगवंतेहिं दस बमचेरस माहिठाणा पन्नता जे मिक्खू सोधा निसप्म संजमबहुले संवरबहुले समाहिबहुले गुत्ते गुतिदिए गुत्तबंपयारी सया अप्पमत्ते विहरेजा RI-1 कयो खलु ते येरेहि भगवंतेहिं दस बंमचेरसमाहिठामा पनत्ता जे मिक्खू सोडा निसम्म संजमबहुले संवरबहुले समाहिवाले गुत्ते गुतिदिए गुत्तबंभयारी सया अप्पमत्ते विहरेशा इमे खलु ते घेहिं भगवंतेहिं दस बंभचेरसमाहिठाणा पत्रता जे मिक्स् सोचा निसम्म संजमबहुले संवरबहुले समाहिबहुले गुत्ते गुत्तिदिए गुत्तबंपयारी सया अप्पमत्ते विहरेजा तं जहा वियित्ताई सयणासणाई सेविज्जा हवह से निगथे नो इत्यीपसु-पंडग संसत्ताइ सयणासयाई सेविता इवइ से निग्गये तं कहपिति चे आयरियाह निगंधस्स खलु इत्यिपसुपंडगसंसत्ताई सयणासणाई सेवमाणस्स बंपयारिस्स बंमधेरै संका वा कंखा वा विइगिच्छा वा समुपनिआ भेदं वा लभेजा For Private And Personal Use Only

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