Book Title: Agam 43 Uttarajjhayanam Mulsutt 04 Moolam
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Agam Shrut Prakashan

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Page 91
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir (१३४२) मौसस्स पच्छा य पुरत्यओ य पओगकाले यदुही दुरंते एवं अदत्ताणि समाययंती भावे अतित्तो दुहिओ अणिस्सं ॥१२५११-०७ (१३४३) भावागुरत्तस्स नरस्स एवं कत्तो सुहं होज कयाइ किंचि तत्यो भोगे वि किलेसदुक्खं निव्यत्तई जस्स कएण दुक्खं ॥ १२५२॥-87 (१३४४) एमेव भावम्मि गओ पओसं उवेइ दुक्खोहपरंपराओ पदुद्रुतचित्तोय चिणाइ कम्मं जं से पुणो होइ दुहं वियागे (१२४५) भावे विरतो मणुओ विसोगो एएण दुक्खोहपरंपरेण 11924311-98 न लिप्पई मवमज्झे वि संतो जलेण या पोक्खरिणीपलासं ॥। १२५४॥ -98 (१३४५) एविंदियत्या य मणस्स अत्या दुक्खस्स हेउं मणुयस्स रागिणो ते चैव थोयं पि कयाइ दुक्खं न वीयरागस्स करेति किंचि (१३४७) न कामभोगा समयं उर्वेति न यावि भोगा विगई उयति जेतप्पओसी य परिग्गही य सो तेसु मोहा विगई उवेइ (१३४८) कोहं च माणं च तहेव भायं लोहं दुर्गच्छं अरई रई च हासं भयं सोगपुमित्धिवेयं नपुंसवेयं विविहे य भावे (१३४९) आवाई एवमणेगरूवे एवंविहे कामगुणेसु सत्तो । अत्रेय एवम्पभवे विसेसे कारुण्णदीर्ण हिरिभे वइस्से (१३५०) कप्पं न इच्छिल सहायतिच्छू पच्छाणुतावे न तव्यप्पभावं एवं वियारे अभियष्मायारे आबाई इंदियचोरवरसे (१३५१) तओ से जायंति पओयणाई निमित्रउं मोहमहणमि सुसिणो दुक्खविणोयणट्ठा तप्पचयं उमए य रागी (१३५१) विरज्जमाणस्स य इंदियत्या सद्दाइया तावइयप्पगारा उत्तरायणाणि- १२/१३४२ बत्तीसह अश्यणं सम● तेतीसइमं अज्झयणं-कम्मपयडी (१३५८) अहं कम्माई घोच्छामि आणुपुवि जहाकमं जेहिं बद्धो अयं जीवो संसारे परिवट्टई For Private And Personal Use Only 11924411-100 ||१२५६|| -101 11924011-102 11924614103 न तस्स सव्वे वि मणुत्रयं वा निव्वतयंती अमणुज्ञयं या (१३५२) एवं स संकष्पविकपणासु संजायई समयमुदट्ठियस्स अत्ये असंकम्पयओ तओ से पहीयए कामगुणेसु तण्डा (१३५३) स वीयरागो कयसव्वकियो खवेइ नाणावरणं खपेर्ण तहेव जं दंसणमावरे जं चंतरायं पकरेइ कम्पं (१३५४) सव्यं तओ जाणइ पासए य अमोहणे होइ निरंतराए अण्णासवे झाष्णसमाहिजुत्ते आउक्खए मोक्खमुवेइ सुखे (१३५५) सो तस्स सव्वरस दुहस्स मुक्को जं बाहई सययं जंतुमेयं दीहामय विप्पमुक्को पसत्यो तो होइ अांतसुही कयत्थी ॥१२६५/- 110 (१३५३) अण्णाइकालप्पभवस्स एसो सव्वस्स दुक्खस्स पमोक्खमग्गो वियाहिओ जं समुविश्व सत्ता कमेण अचंतसुही भवंति |||१२५९।-104 ||१२६०||-105 ||१२६१||-106 ||१२६२||-107 ||१२६३|| 108 11934811109 ||१२६६||-111 -त्ति बेमि ॥ ।।१२६७ |--1

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