Book Title: Agam 43 Uttarajjhayanam Mulsutt 04 Moolam
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Agam Shrut Prakashan

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Page 61
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir उत्तराणाधिन (ar) एहिता मुंजिमो मोह माणुस्सं सुदुल्लाई मुतभोगीतओ पच्छाजिणमग्गं चरिस्समो ।।२०।-38 (१५) दगुण रहनेर्मितं भग्गुओयपराइयं राईमई असंभंता अप्पार्ण संवरे तहिं ॥४२॥-38 (८1) अहसा रायवरकनासुटिया नियमव्यए जाई कुलं चसीलं च रखमाणी तर्य वए ८२२॥ -40 (८३७) जइसिरुवेण वेसमणो ललिएण नलकुब्बरो तहावि तेनइच्छामिजइसिसक्खं पुरंदरो १८२३॥ 41 (414) पित्यु तेऽजसोकामीजोतंजीविषकारणा वंत इच्छसि आवेउं सेयं ते मरणं भवे १८२४|| 42 (41) अइंच पोगरायस्स तं च सि अंधगवण्हिणो मा कुले गंधणा होमो संजमं निहुओ चर ॥८२५॥ 43 (४४०) जइत काहिसि मावंजाजा दिच्छसि नारिओ वायाविद्धो व्य हो अहिअप्पा भविस्ससि ॥८२६|| 44 term) गोवालो मंडवालो वा जहा तव्यणिसरो एवं अणिसरोतं पिसामण्णस्स भविस्ससि ||२७|| -45 (८४२) कोहं माणं निगिहितामा लोभय सब्यसो इंदियाई वसेकाउँ अप्पाणं उल्संहरे ॥५०॥ (८४३) तीसे सो वयणं सोधा संजयाए सुभासियं अंकुसेण जहानागोधमे संपडियाइओ ||८२८॥ 48 (en) मणगुत्तो वयगुत्तो कायगुत्तोजिइंदिओ सामण्णं निसलं फासे जावजीवंदढव्दओ ॥८२९।। -47 (ers) उग्गंतवं चरित्ताणं जाया दोण्णि विकेवली सव्वं कम्मखवित्ताणं सिद्धिं पत्ता अनुतरं ||३०|| -48 (e) एवं करति संवुखा पंडिया पवियखणा विणियति भोगेसुजहा सो पुरिसोत्तमो-ति बेमि ।। ||८३91-48 बातम मणावं समत. | तेविसइमं अज्झयणं-केसिगोयमिझं | (ers) जिणे पासि त्ति नामेण अरहालोगपूइओ संबुद्धपाय सव्यधम्पतित्थयो जिणे IH८३२11 -1 (ere) तस्स लोगपदीवस्स आसि सीसे महायसे केसी कुमारसमणे विझाचरणपारगे ॥८३३|| (ere) ओहिनामसुए बुद्धे सीससंघसमाउले गामाणुगाम रीयंते सावत्यि पुरमागए 1८३४||-3 (८५०) तिन्दुर्य नाम उपाणं नंमि नगरमंडले फासुए सिखसंपारे तत्य वासमुवागए ।।८३५|| -4 For Private And Personal Use Only

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