Book Title: Tulsi Prajna 1992 01
Author(s): Parmeshwar Solanki
Publisher: Jain Vishva Bharati

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Page 21
________________ मसिभ्य: पशुबन्धः पशु बन्धादग्निष्टोमाद्राजसूयो राजसूयाद् वाजपेयो वाजपेयश्वमेधोऽश्वमेधात् पुरुषमेधः पुरुषमेधात् सर्व मेधः सर्व मेधात् दक्षिणावन्तो दक्षिणावदभ्येऽदक्षिणा अदक्षिणाः सहस्रदक्षिणे प्रागतिष्ठस्ते वा एते यज्ञ क्रमाः । - गोपथ, ५.७ (vi) ऋग्वेद (१.६२.४ ) - ( स सुष्टुभा सस्तुभा' - आदि मंत्र पर सायण भाष्य - 'आङ्गिरसो द्विविधाः । सत्रयागमनुतिष्ठन्तो ये नवभिर्मासः समाप्य गतास्ते नवग्वाः ( नवग्वा नवनीत गतय — निरुक्त, ११. १६) इति यास्को व्याचख्यौ । ये तु दशभिर्मासः समाप्य जग्मुस्ते दशग्वा: ।' १५. शतपथ ब्राह्मण में सप्तर्षियों के नाम लिखे हैं- गौतम, भरद्वाज, विश्वामित्र, यमदग्नि, वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि । महाभारत में सप्तर्षि क्रमश: इस प्रकार लिखे हैं - मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलह, ऋतु, पुलस्त्य, वसिष्ठ । पुराणों में एक अन्य क्रम इस प्रकार है- भारद्वाज, कश्यप, गौतम, विश्वामित्र, जमदग्नि, वसिष्ठ और अत्रि । सप्तर्षि अंगिरापुत्र बृहस्पति हैं । १५. ठाणम् (जैन विश्व भारती, लाडनूं) २.४४३-४६, ३.५२८-२६, ५.२३७, ७.१४५, ८. ११७ और ६.६३ । १६. ऋग्वेद (१०.८५.१३ ) में एक मंत्र इस प्रकार है सूर्याया वहतुः प्रागात्सविता यमवासृजत् । अघासु हन्यन्ते गावोऽर्जुन्योः पर्युह्यते ॥ अर्थात् कन्या के लिए दी गई गो मघा में यम गृह को और फाल्गुनी में सविता के यहां होकर सोमगृह को लाई जाती हैं । १७. वर्षाणां द्वादशशतीं षष्टिः षड्भिश्च संयुता । भूभुजां काल संख्यायाः तद् द्वापंचाशतो मता ॥ + + अष्ट षष्ट्यधिकाब्द शतद्वाविंशतिकं नृपाः । अपलंस्यते कश्मीरान्गोगन्दाद्याः कलौ युगे ॥ 18. The Sacred books of China, Tr, by james Legge Pt. I, 1990, P-13 & 23. १९. इण्डियन एन्टिक्वेरी भाग- २५ पृ० २४५ और आगे तथा भारतीय ज्योतिष, बंबई - संस्करण, १९६३ पृ० १५१ । २०. कल्यब्दारूपरहिता पाण्डवाब्दाः प्रकीर्तिता । बाणान्धगुणदोना २३४५ शूद्रकाब्दा गतेर्गलिः ॥ ७१ ॥ गुणाब्धि व्योम रामोना ३०४३ विक्रमाब्दा कलेर्गताः ॥ — कंचु यल्लार्यभट्ट विरचित ज्योतिष दर्पण पृ० २२ ( अनूप संस्कृत लाइब्रेरी, बीकानेर MS No. ४६७७ ) २१. कीलहार्न की उत्तर भारत की अभिलेख सूची (एपी. इ. जिल्द ५ ) में क्रमांक १४४३ से १४५८ तक १६ शिलालेखों में सप्तर्षि संवत्सर के प्रयोग बताए गए हैं । OO १६१ खण्ड १७, अंक ४ ( जनबरी - मार्च, १२) Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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