Book Title: Kahe Kalapurnasuri Part 03 Hindi
Author(s): Muktichandravijay, Munichandravijay
Publisher: Vanki Jain Tirth

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Page 315
________________ 'सव्वपाणभूअजीवसत्ताणं आसायणाए ।' जीव तो सिद्धों के साधर्मिक बन्धु हैं। उनके साथ चाहे जैसे कैसे व्यवहार किया जाये ? शुद्ध नय की दृष्टि से यह जीव भगवान है। उनका अपमान तो भगवान का अपमान है । भारत सरकार के एक सैनिक का अपमान भारत सरकार का अपमान है । ये जीव भी भगवान का परिवार है। भगवान ने सबके साथ एकता की है। * सूर्य की तरह भगवान का भी स्वभाव है - उपदेश का प्रकाश देना, तीर्थ की स्थापना करना । मौन रहने से बाल जीव समझते नहीं हैं । शब्दों की दुनिया में रमण करते जीवों को शभ्दों से ही समझाना पड़ता है । अशब्द नहीं चलते । हमारे लिए ही भगवान शब्दातीत अवस्था में गये हुए होने पर भी शब्दों की दुनिया में आते हैं । भगवान की यही करुणा है । उसे देखने के लिए अपने पास दृष्टि चाहिये । * शास्त्रीय पदार्थों में स्व-उत्प्रेक्षा कि मति-कल्पना नहीं चलती । यहां तो सम्पूर्ण शास्त्राधार ही चाहिये । * मैं नित्य पीछे की थोड़ी पुनरावृत्ति करके ही आगे बढ़ता हूं क्योंकि मुझे विश्वास है। आप पुनरावृत्ति नहीं करते हो । आप यदि पुनरावृत्ति करते हों तो मुझे पुनरावृत्ति कराने की आवश्यकता ही न रहे । * यह मैं बोलता हूं, वह मात्र भगवान के बल से ही बोलता हूं, यह मानता हूं । बाकी उम्र के हिसाब से तो बोला नहीं जा सकता । जो कुछ भी बोलता हूं वह भगवान के प्रभाव से ही बोलता हूं और भगवान के चरणों में ही उसे समर्पित करता हूं। इन भगवान को मैं कदापि भूलता नहीं हूं और आपको भी यही सलाह देता हूं। भगवान को कदापि न भूलें । 'साधना में बहुत ही आगे बढ़ गया हूं । क्षमा आदि गुण आत्मसात् हो गये हैं । अतः अब भगवान की आवश्यकता नहीं है' - यह मान कर भगवान को छोड़ मत देना । अपने गुण तो कांच की बरनी (भरनी ) हैं। फूटने में क्या देर लगती है ? क्षायोपशमिक भाव को बना रखना पड़ेगा ही । भगवान के बिना उन्हें बनाये रखना असम्भव है। कहे कलापूर्णसूरि - ३00ooooooooooooooo २८३)

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