Book Title: Aacharopnishad
Author(s): Kalyanbodhisuri
Publisher: Jinshasan Aradhana Trust

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Page 11
________________ अथ आचारोपनिषद दशमी चोपसम्पत् स्यात्, सामाचारी जिनोदिता । अनन्ता यां समाचर्य, तीर्णाः संसारसागरम् ॥ ६ ॥ ४ यतनीयमतोऽवश्यं, सामाचारीसुपालने । श्रामण्यस्य सुनिर्वाह, एवमेव यतो भवेत् ।। ७ ॥ सामाचारीस्वरूपं तद्, विज्ञातव्यं प्रयत्नतः । तदविज्ञस्य सामर्थ्यं तद्विधौ सम्भवेन्न यत् ।। ॥ ( उपजाति) प्रदत्तशश्वच्छुभसौख्यभोगं, परम्पदं प्राप्तुममोघयोगम् । सिद्ध्यङ्गनाकार्मणमद्वितीय मेकाग्रचित्तं शृणुतैतदेव ।। ९ ।। -

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