Book Title: 20 Vi Shatabdi Ke Jain Manishiyo Ka Yogdan
Author(s): Narendrasinh Rajput
Publisher: Gyansagar Vagarth Vimarsh Kendra Byavar
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तिर्यञ्च गति
अपने नाम कर्म को चरितार्थ करती हुई बहुत अधिक माया युक्त होती है । इसी माया से प्रभावित अज्ञानी जीव ही इस गति में उत्पन्न होकर निरन्तर दुःख सहते हैं तिर्यन्वों के भेद-प्रभेदों का व्यापक वर्णन भी किया गया है ।
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मनुष्य गति - अपने नाम कर्म के उदय से गतिच्छेद के अभिलाषी मनुष्यों द्वारा जानी जाती है । पूर्वकृत कर्मों के अनुसार ही मनुष्य इस गति में सुख और दुःख को प्राप्त करते हैं । इसी सन्दर्भ में मनुष्यों के लक्षण, आर्य मलेच्छ, भोगभूमिज, कुभोगभूमिज आदि का विश्लेषण किया गया है। लवण समुद्रादि समुद्रों से घिरे हुए असंख्यात द्वीप समुद्रों का विस्तृत परिचय दिया गया है । जिनमें जम्बूद्वीप, धातकीद्वीप, वारूणीवर द्वीप, क्षीरवर, द्वीप, घृतवर द्वीप, इक्षुवर द्वीप, नन्दीश्वर द्वीप, अरूणवर द्वीप । इस प्रकार द्वीपसमुद्रों की नामावली प्रस्तुत हुई है । जम्बूद्वीप के सात क्षेत्रों, छह कुलाचलो ", सरोवरों" एवं उनमें रहने वाली देवियों तथा कमलों और चौदह महानदियों का समीचीन निरूपण हुआ है । धातकी खण्ड आदि द्वीपों के वर्णन के साथ ही मनुष्यगति के सम्बन्ध में लिखते हैं कि अपने-अपने भाग्य के अनुसार ही पुरुष इस मनुष्यगति में एवं कर्मों के अनुसार तो चारों गतियों में जन्म लेते हैं।
देवगति - इसी नाम कर्म के द्वारा प्रादुर्भूत जीवों की आकृति है। यह गति केवलज्ञान से परिज्ञात है । भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिषी तथा वैमानिक नाम से देवों के चार भेद हैं। ये चार प्रकार के देव अनेक कोटि के होते हैं अर्थात् उनके भी अवान्तर भेद होते हैं । देवों के आवास स्थानों का परिचय भी दिया गया है । उर्ध्व लोक के वर्णन में लेखक ने सावधानीपूर्वक वैमानिक देवों, उनकी गति, शरीर की अवगाहना एवं आयु की सुरम्य व्याख्या उपस्थित की है । वैमानिक देवों की स्थिति, ऊत्पत्ति, स्थान एवं गुणस्थानादि का मनोज्ञ प्रतिपादन भी इसी मयूख में समाविष्ट हुआ है । इस प्रकार संसारी जीवों की गति का वर्णन पूर्ण होता है ।
चतुर्थ मयूख
इस मयूख में प्रयुक्त विभिन्न मार्गणाओं के द्वारा जीवतत्त्व का परिष्कृत विवेचन निबद्ध है। इन्द्रिय, काय, योग, वेद, कषाय, ज्ञान, संयम दर्शन, लेश्या, भव्यत्व, सम्यक्त्व संज्ञी, आहार इत्यादि मार्गणाएं ही ग्रन्थ में पल्लवित हुई हैं ।
इन्द्रिय
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अपना (स्पर्शादि) विषय ग्रहण करने में स्वतन्त्र है । आत्मा का परिचय कराने के लिए साधन स्वरूप इन्द्रियों के द्रव्य और भाव ये दो भेद हैं। स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु, कर्ण ये पाँच इन्द्रियाँ विद्वानों को मान्य हैं। स्पर्श, रस, गंध, रूप शब्द ये इनके पाँच विषय कहे गये हैं । स्पर्शनादि इन्द्रिय के संयोग से एकेन्द्रियादि पाँच प्रकार के जीव होते हैं । ये जीव, अपने-अपने अनेक भेदों से संयुक्त हैं । इन्द्रियों के आकार एवं विषय भी अत्यन्त व्यापक है । कायमार्गणा के अन्तर्गत षट्काय (पांच स्थावर और त्रस) जीवों का विश्लेषण मिलता है । पृथ्वी कायिक आदि जीवों के आकार तथा साधारणं एवं वनस्पति कायिक जीवों का विश्लेषण सूक्ष्मता के आधार पर हुआ है। योग मन, वचन तथा काय से युक्त जीवों के कर्मों की कारणभूत वह शक्ति हैं, जो शरीर नामकर्म से निष्पन्न होती है । यह योग मन, वचन, काय से 3 ही प्रकार का है। मनोयोग और वचन योग के सत्य, असत्य भय और अनुभव इन पदार्थों में प्रवृत्त होनें से चार-चार भेद होते हैं । काययोग के भी औदारिक,