Book Title: 20 Vi Shatabdi Ke Jain Manishiyo Ka Yogdan
Author(s): Narendrasinh Rajput
Publisher: Gyansagar Vagarth Vimarsh Kendra Byavar

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Page 270
________________ 249 सम्यक्त्व चिन्तामणि में शैली के विभिन्न रूप दृष्टिगोचर होते हैं । 1. दृष्टान्त शैली । 2. संवाद शैली । 4. विवेचनात्मक शैली । 3. व्याख्यात्मक शैली । 5. समास शैली । प्रस्तुत रचना के विभिन्न मयूखों में उक्त शैलियों का विवेचन मिलता है । वस्तुस्थिति और वातावरण का सजीव चित्रण करने में रचनाकार पारङ्गत हैं । भाषा शैली की दृष्टि से सम्यक्त्व चिन्तामणि पं. पन्नालाल साहित्यचार्य की लोकोत्तर प्रतिभा का उत्कृष्ट निदर्शन है । इस कृति में प्रसाद गुण पूर्ण सरस पदावली सर्वत्र ही उच्चकोटि के काव्य का सा आनन्द प्रदान करती है । इस काव्यकृति में वैदर्भी रीति की प्रधानता है । इसमें साहित्यिक एवं शैलीगत सभी तत्त्वों का समुचित प्रयोग किया गया है । सज्ज्ञान चन्द्रिका रस शान्तरस के प्रस्तुत कृति " सज्ज्ञान चन्द्रिका" में आद्योपान्त शान्तरस विद्यमान है सागर में मानव मन अवगाहन करने लगता है- वैराग्य वृत्तियाँ उठने लगती हैं । छन्द प्रस्तुत ग्रन्थ विविध अठारह छन्दों में निबद्ध है ग्रन्थ प्रस्तुत प्रयुक्त छन्दों की में नामावली अन्त में दी गई हैं- तदनुसार अनुष्टुप् आर्या, आर्यागीति, इन्द्रवज्रा, उपजाति, द्रुतविलम्बित, भुजङ्गप्रयात, मज्जुभाषिणी, मन्दाकान्ता, रथोद्धता, वंशस्थ, स्रग्धरा, स्वागता, शार्दूलविक्रीडित, शालिनी, शिखरिणी, हरिगीतिका और हिन्दी गीतिका का प्रयोग विभिन्न प्रकाशों में हुआ है । - - अलङ्कार इस रचना में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, दृष्टान्त, विशेषोक्ति, अनुप्रास, श्लेष, यमक इत्यादि अलङ्कारों का बाहुल्य दृष्टिगोचर होता है। भाषा प्रस्तुत ग्रन्थ सरल संस्कृत भाषा में लिखा गया है - इससे साधारण संस्कृत जानने वाले भी पाठक आसानी से समझ सकते हैं जैसे- . च मतिज्ञानं श्रुतज्ञानम्, अवधिज्ञानमेव मन:पर्ययसंज्ञानं, केवल ज्ञान च इस प्रकार विषय के प्रतिपादन हेतु लेखक ने संस्कृत के सरल, बोधगम्य, सुकोमल वर्णों का प्रयोग करके ग्रन्थ को सरलता और सरसता प्रदान की है। भाव सजीव हो उठे हैं। 1 11 शैली ग्रन्थकार ने भावों का अभिव्यक्ती करण विवेचनात्मक और समाहार शैली में किया है । इसके साथ ही दृष्टान्त शैली, समास शैली, प्रश्नोत्तर शैली का निदर्शन भी विभिन्न प्रस्थलों पर है ।

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