Book Title: 20 Vi Shatabdi Ke Jain Manishiyo Ka Yogdan
Author(s): Narendrasinh Rajput
Publisher: Gyansagar Vagarth Vimarsh Kendra Byavar
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जयोदय 12/1-139
जयोदय 12/61/503
271
छन्दोमञ्जरी 2/2/34 छन्दोमञ्जरी 2/1/33
छन्दोमञ्जरी 2/3/111 पृष्ठ जयोदय 1/113
दयोदय 1/27/15
सुदर्शनोदय 5 / पृष्ठ 80 सुदर्शनोदय 5 / पृष्ठ 100
वही, 5/88
6/115 पृष्ठ
प्रत्येक गीत के स्वर, लय, ताल, वादी, संवादी, गायनसमय आदि सूक्ष्म परिचय के लिए ये ग्रन्थ द्रष्टव्य हैं -
(अ) रागविज्ञान, विनायक राव पट वर्धनकृत, प्रकाशक सङ्गीत गौरव ग्रन्थमाला पुणे- 2 (महाराष्ट्र) सप्तम संस्करण, 1967 (ब) सङ्गीत प्रवीण दर्शिका, पं. नारायण लक्ष्मण गुणे, पुरा, ढाकू, कीटगञ्ज, इलाहाबाद 3. द्वितीय सं. 1972 (स) सङ्गीत विशारद, बसन्त, प्रकाशक - सङ्गीत कार्यालय, हाथरस, सन् 1968. (द) सङ्गीत कौमुदी, क्रमादित्य सिंह निगम, हरिनगर ( लखनऊ ) चतुर्थ संस्करण 1967 (इ) सङ्गीत शास्त्र दर्पण, शान्तिगोवर्धन पाठक पब्लिकेशन 27 महाजनी टोला इलाहाबाद 3 द्वितीय संस्करण सन् 1973 ई.
साहित्य दर्पण 10/3 विश्वनाथ चौलम्बा विद्याभवन, वाराणसी सन् 1969
जयोदय 5/33/23
वीरोदय 9/17/141
सुंदर्शनोदय 1/15/6
श्री समुद्रदत्त चरित्र 2/20/19
दयोदय चम्पू 2/9/24
सम्यक्त्वसार शतक पद्य सं. 48 पृष्ठ 93
वीरोदय 1/12/5
सुदर्शनोदय 6 / 21
काव्यप्रकाश वनम उल्लास का 83
(अ) "पाद द्विधा, वा त्रिधा विभज्य तत्रैकदेशजं कुर्यात
आवर्तयेत्तमशं तत्रान्यत्राति वा भूयः - रुद्रट काव्यालङ्कारः, प्रकाशक वासुदेव प्रकाशन,
दिल्ली प्रथम संस्करण सन् 1965-3/20 पर्यायेणान्येषामावृत्तानां सहादिपादेन
मुखसंदंशावृत्तयः क्रमेश यमका निजयते रुद्रट काव्यालंकार 3/3
" पिरिवृत्तिर्नाम भवेद्यमकं गर्भावृत्ति प्रयोगेण ।
मुख पुच्चयौश्च योगाद् युग्मरूमिति पादर्ज नवमम् ॥” रुदट काव्यालंकार, 3/13
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