Book Title: 20 Vi Shatabdi Ke Jain Manishiyo Ka Yogdan
Author(s): Narendrasinh Rajput
Publisher: Gyansagar Vagarth Vimarsh Kendra Byavar
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248 अनुष्टुप, का प्रयोग अत्यन्त आकर्षक बन पड़ा है -
यस्या लोके लसकीर्त्या पूर्ण चन्द्रोऽपि लज्जितः ।
जयाताच्छुभचन्द्रोऽयं, चिरं चारु गुणालयाः ॥7(अ) इस प्रकार अन्य छन्दों की प्रस्तुति भी "सम्यक्त्व चिन्तामणि" ग्रन्थ को सम्पूर्णता प्रदान करती है । पं. पन्नालाल जी का विविध छन्दों में एकाधिकार है, छन्द विषयक रचना कौशल के कारण ही कवि ने अनेकानेक छन्द लेकर विषय को उपयोगी बनाया है ।
अलंकार "सम्यक्त्व चिन्तामणि' में शब्दालङ्कारों और अर्थालङ्कारों का मणिकाञ्चन समन्वय हुआ है । इस ग्रन्थ के प्रत्येक मयूख में अलङ्कारों का बाहुल्य है । अनुप्रास, यमक, श्लेष, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, दृष्टान्त, प्रतिवस्तपमा, अर्थान्तरन्यास, विशेषोक्ति, अतिशयोक्ति, निदर्शना आदि अलङ्कारों ने इस कृति में आकर्षण उत्पन्न किया है । सत्य के माहात्म्य विवेचन में अनुप्रास अलङ्कार की छटा दर्शनीय है -
सत्येन मुक्तिः सत्येन भुक्ति, स्वर्गेऽपि सत्येनपद प्रसक्तिः । सत्यात्परं नास्ति यतः सुतत्त्वं, सत्यं ततो नौमि सदा सभक्तिः ॥72(ब)
मेघ, समुद्र, चन्दन, शाल्य आदि अन्योक्तियों के माध्यम से विषय को रोचक बनाया है । कुछ लोग धनवान होकर भी परोपकार नहीं करते- ऐसे लोगों को खजूर वृक्ष की अन्योक्ति प्रयुक्त की है।
रे खजूरा नो कह । किमेव मुत्तग्ड मान मुद्वहसि ।
छायापि ते न भोग्यां पान्थानां कि फलैरभिः ॥372(स) इस प्रकार सम्यक्त्व चिन्तामणि में सर्वत्र आलंकारिकता का प्रभाव परिलक्षित होता है । काव्यत्व में श्रीवृद्धि हुई है ।
भाषा शैली सम्यक्त्व चिन्तामणि की भाषा परिष्कृत साहित्यक संस्कृत है । इसमें दुर्बोधिता का अभाव है । भाषा के भावानुकूल प्रयोग से शब्द चित्रों में निखार आ गया है । प्रसादगुण पूर्ण भाषा शैली के माध्यम से अपना मन्तव्य जन-जन तक पहुँचाना कवि का लक्ष्य रहा है । गूढ विषयों में भाषा शैली सञ्जीवनी के समान क्रियाशील है । द्वितीय मयूख में प्रतिपाद्य शैली के द्वारा दार्शनिक तत्त्वों को प्रभावशाली ढंग से स्पष्ट किया है । सूक्ष्म विषय को तर्क-वितर्क या वादी-प्रतिवादी के द्वारा समझा जा सकता है । प्रत्येक मयूख में लेखक के व्यक्तित्व की छाप अङ्कित हो गई है । इस ग्रन्थ में कोमलकान्त पदावली ने काव्यसौन्दर्य में चार-चाँद लगा दिये हैं । इस ग्रन्थ में सुकुमार वर्णों का प्रयोग हुआ है । माधुर्य गुण की छटा अधोलिखित पद्य में प्रेक्षणीय है -
हार स्वभावेन भूतः स कश्चिच् । चामीकरो मेखलया प्रजातः । नितम्ब बिम्बेषु नितम्बिनीनां, विशोभते यद्यपि मन्द्ररावः ॥372(द)
रचनाकार का शब्द भण्डार व्यापक है । धर्मपरक और दार्शनिक विषय में भावुकता उत्पन्न करना काव्यकौशल का जीवन्त प्रतीक है । दुर्बोध प्रसंगों को सरल बनाने के लिये दृष्टान्तों, अन्योक्तियों, उपमाओं का आश्रय लिया है। प्रश्नोत्तरों की पद्धति अपनाकर रचनाकार ने मन्त्रमुग्ध किया है । प्रस्तुत ग्रन्थ में दृष्टान्त प्रधान ललित शैली बोधगम्य है ।।