Book Title: 20 Vi Shatabdi Ke Jain Manishiyo Ka Yogdan
Author(s): Narendrasinh Rajput
Publisher: Gyansagar Vagarth Vimarsh Kendra Byavar

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Page 278
________________ 257 किन्तु इस काव्य में,सर्वत्र वियोग शृंगार का प्रभाव छाया हुआ है। राजीमति की विरहावस्था अप्रतिम है, जैसे - सखियाँ नेमि से राजुल की दीनदशा का वर्णन करती हैं - "अस्या कान्तं नयनयुगलं चिन्तया स्पन्दशून्यं, कद्धा पागं चिकुरनिकरै रंजन भ्रूविलासैः । दीनं मन्ये त्वदुपगमनात्तवदा र्वष्टलाभात्, मीनक्षो भा च्चलकुवलय श्री तुला मेष्यतीति 105 निर्वेद स्थायी भाव शान्तरस का है । नेमि की वैराग्य भावना का चित्रण शान्तरस के धारतल पर है । इस काव्य में श्रृंगार का पर्यावसान शान्तरस में हैं । राजुल अपने पिता के समक्ष साधना पथ पर चलने का सङ्कल्प लेती है - "कल्ये दीक्षामहमपि च पितः । धारयिष्यामि नूनम् आज्ञां दत्वा सफलय मनोभावमेवं विदित्वा, कार्या कार्ये पितु पदसमाध्यासिना नात्र बाधा शोकं मोहं विगलयनमे कोऽपि कस्यापि नाहम् ।।३06 राजीमती के माता-पिता, नेमि के समक्ष अपनी पुत्री की वियोगावस्था का मर्मस्पर्शी बखान करते हैं, अत: यहाँ प्रस्तुत पद्य में वात्सल्य रस की प्रतिष्ठा हुई है "सा मे पुत्री व्यथितहृदया प्रत्यहं दुर्विकल्पैः, त्वच्चित्तोत्थैः स्वपिति न मनाग् निर्विमेषक्षियुग्म् । वक्त्रं तस्या हिमकरनिभं त्वद्वियोगेऽसत् शौभम् , सूर्यापाये न खलु कमलं पुष्यति स्वाभिमुख्याम् 107 नेमि ने राजीमती के द्वार पर आकर एकाएक वैवाहिक सामग्री का परित्याग कर वैराग्य धारण किया । राजुल द्वार से लौटते हुए, नेमि को देखकर शान्संतृप्त भी है और आश्चर्यचकित भी, अतएव इस वर्णन में करुणरस और अद्भुत रस की सफल अभिव्यंजना हो गई है - "द्वारा ऽज्ञयातंप्रतिगत ममुं स्वामिनं वीक्ष्य बाला, हा हा । जातं किमिदमशुभं मे विधेर्दुर्विपाकात् । लब्धे स्त्रीणां न भवति सुखं सत्यपीष्टे प्रदथ्यौ, कण्ठाश्लेष प्रणयिनि जने किं पुनर्दूर संस्थे ।"408 छन्द योजना वचन दूतम् में कवि ने अपने भावों को मन्दाक्रान्ता छन्द और तोटक छन्द में अभिव्यजित किया है । मन्दाक्रान्ता वृत्त का लक्षण इस प्रकार है - "मन्दाक्रान्ताऽम्बुधि रस नगैर्मो भनौ तौगयुग्मम् ।” मन्दाक्रान्ता छन्द के प्रतिपाद में क्रमश: मगण, भगण, नगण, दो तगण और अन्त में दो गुरु वर्ण होते हैं । 17 अक्षर के इस छन्द में चतुर्थ षष्ठ और सप्तम अक्षरों के पश्चात् यति होती हैं । उदाहरण - "याचेऽहं त्वां वुक मपि कृपां मास्मभूनिर्दयस्त्वम् । नास्तीदं ते गुणगणममे । साधुयोग्यं शरीरम् । सौरव्यैः सेव्यं विरम तपसो नाथ ! सेव्या पुरी मे, बाह्योघानस्थितहरशिरश्चद्रिका धौतहा 0

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