Book Title: 20 Vi Shatabdi Ke Jain Manishiyo Ka Yogdan
Author(s): Narendrasinh Rajput
Publisher: Gyansagar Vagarth Vimarsh Kendra Byavar

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Page 275
________________ 254 अर्थात्-सन्तोष के अमृत से सन्तुष्ट मानव को त्रिलोकी का राज्य तृणवत् है, ऐसे व्यक्ति हजारों विपत्तियों में भी दुःखी नहीं होते । यहाँ सन्तुष्ट व्यक्ति रस का आश्रय एवं-राज्य आलम्बन है सन्तोष गुण उद्दीपन विभाव है उसका पान करना, राज्य के प्रति उदासीनता, सुख-दुःख में उत्तेजित न होना आदि अनुभाव है और निवेद, वैराग्य त्याग आदि सञ्चारी भाव है । इनसे संयुक्त होकर यहाँ शान्त रस विद्यमान है । इस प्रकार सम्पूर्ण ग्रन्थ में शान्तरस की अभिव्यक्ति हुई है। छन्द सौष्ठव यह ग्रन्थ संस्कृत भाषा के सुप्रसिद्ध छन्दों में निबद्ध है । इसके 49 पद्यों में आया, | 30 पद्यों में अनुष्टुप्, 15 पद्यों में उपजाति इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा89,7 पद्यों में द्रुतविलम्बित 4 पद्यों में वसन्ततिलका", एक-एक पद्य में रथोद्धता और स्वागता तथा दो पद्यों में स्रग्धरा छन्द का प्रयोग निदर्शित है । इस प्रकार उक्त छन्दों में धर्मकुसुमोद्यान के 109 पद्य सङ्गुम्फि हुए हैं। आलङ्कारिक छटा . इस रचना में अनुप्रास, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, विरोधाभास, अन्योक्ति, एवं अर्थान्तरन्यास अलङ्कार विद्यमान हैं। अनुप्रास अलङ्कार के अनेक प्रयोग हैं । यहाँ म, ज, त, वर्गों की बार-बार आवृत्ति का प्रयोग अधोलिखित त पद्यांशों में दृष्टव्य है - मार्दव मण्डिते मर्ये प्रसीदन्ति जगज्जनाः 95 तीवं तपः प्रभावं दृष्ट्वा जैनेतरे जना जैनाः ।। उपमा अलङ्कार धर्मकुसुमोद्यानम् के अनेक पद्य उपमा से मण्डित है - अधोलिखित पद्य प्ररूपित है पन्नग वैष्ठित वित्तं न लाभाय कल्पेत् पुंसाम् । मायाचारयुतस्य तथा न विद्या धनच्चापि । यहाँ सर्प द्वारा रक्षित धन की उपमा मायावी की विद्या से की गई है । क्योंकि इनका लाभ मनुष्यों को नहीं मिलता । इसमें पद्य पन्नगवेष्टितधन उपमेय है और मायावी की विद्या उपमान है तथा वाचक है जिससे उपमा की प्रतीती होती है । रूपक अलङ्कार की छटा भी अनेक पद्यों में व्याप्त है - यहाँ भी एक उदाहरण प्रतिपादित मार्दव धनाधनोऽयं मान दावाग्नि प्रदीप्त भवकक्षम् । सत्प्रीति वारिधारां मुच्चन्निभिषेण सान्त्वयति । अर्थात्-मार्दव रूपी मेघ प्रीतिरूपी जलधारा को छोड़ता है, जिससे अहङ्कार रूपी वनवन्हि से दीप्त संसार रूपी कानन की रक्षा होती है। यहाँ क्रमश: मार्दव, प्रीति, अहङ्कार, संसार उपमेय हैं जिनमें क्रमशः मेघ, जलधारा, वनवह्नि, कानन उपमानों का अभेद वर्णन किया गया है अत: रूपक अलंकार विद्यमान है। उत्प्रेक्षा अलङ्कार। ___ यह अलङ्कार भी इस ग्रन्थ के कतिपय पद्यों में उपलब्ध होता है। यहाँ एक उदाहरण ,

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