Book Title: 20 Vi Shatabdi Ke Jain Manishiyo Ka Yogdan
Author(s): Narendrasinh Rajput
Publisher: Gyansagar Vagarth Vimarsh Kendra Byavar
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हो चुकी है । सात अन्य शोधार्थी सम्प्रति शोध-निरत हैं । डॉ. भागेन्दु जी अखिल भारतीय स्तर की अनेक संस्थाओं, शोध संस्थानों और विश्वविद्यालयों से निकटतः सम्बद्ध है । आप कुशल लेखक, यशस्वी संपादक, सफल प्राध्यापक और अच्छे वक्ता हैं।
रचना संसार - आपकी प्रसिद्ध कृतियाँ "देवगढ़ की जैन कला का सांस्कृतिक अध्ययन", भारतीय संस्कृति में जैन धर्म का योगदान, जैन दर्शन का व्यावहारिक पक्षः अनेकान्तवाद, अतीत के वातायन से आदि हैं । आपने अनेक कृतियाँ का सम्पादन भी किया है । साहित्याचार्य डॉ. पन्नालाल जैन अभिनन्दन ग्रन्थ के प्रधान सम्पादक और संयोजक डॉ. भागेन्दु जी ने प्राच्य विद्याओं के अनेक मनीषी विद्वानों-सर्वश्री न्यायाचार्य डॉ. दरबारीलाल जी कोठिया, पं. सरदारमल्ल सच्चिदानंद और सरस्वती वरद्पुत्र पं. वंशीधर व्याकरणाचार्य अभिनन्दन ग्रन्थ का कुशलतापूर्वक सम्पादन किया है ।
संस्कृत भाषा में आपकी अनेक प्रसाद गुणपूर्ण स्फुट रचनाएँ हैं । इस शोध प्रन्ध में "सोऽयं लोके भवतु नितरां कस्य नो पूजनीयः" तथा "तुभ्यं नुमः भव्यं हितङ्कराय शीर्षक रचनाएँ दृष्टिपथ में रखी गई हैं ।
___ संस्कृत रचनाएँ: सोऽयं लोके भवतु नितरां कस्य नो पूजनीय :
"सोऽयं लोके भवतु नितरां कस्य नो पूजनीयः" शीर्षक रचना ग्यारह पद्यों में निबद्ध है । यह रचना संस्कृत के प्रसिद्ध उपजाति, शार्दूल विक्रीडित स्रग्धरा, मन्दाक्रान्ता आदि वृत्तों में ग्रथित होकर रचनाकार के प्रौढ़ पाण्डित्य का निदर्शन कराती है । रचना में सर्वत्र प्रसाद गुण और वैदर्भी रीति की छटा निदर्शित है । यहाँ प्रस्तुत रचना का एक पद्य प्रस्तुत है -
दर्श दर्श प्रभवति मनो कस्य नो कस्य दिव्यं, विद्वज्जाते: सघन-रुचिरं ज्ञान-विज्ञानतेजः ।
लोकालोके दिशि-दिशि चिरं श्रूयते यस्य कीर्तिः, . श्रीमन्मान्यो द्विवेदि-वर्यों विलसतुतरां धीमतामग्रगण्य॥
"तुभ्यं नुमः भव्य हितङ्कराय" शीर्षक रचना में दस पद्य हैं । इस रचना में अनुष्टुप्, आर्या, गीति, उपगीति, चम्पकमाला, तथा शार्दूल विक्रीडित छन्दों का उपयोग कर भाव प्रसूनों को मूर्त रूप प्रदान किया है । इसका एक पद्य समुद्धृत है -
"ज्ञानार्जने लब्ध विशिष्टकृच्छ, विशाल दृष्टे ! गुणि-वृन्द-वन्द्य । विद्वद्-वरेण्याय महोदयाय, तुभ्यं नुमः भव्य ! हितङ्कराय ॥"
डॉ. साहब का प्राकृत भाषाओं पर भी समान अधिकार है । उन्होंने दसवीं शताब्दी के प्रख्यात जैन आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्त चक्रवर्ती द्वारा शौरसेनी प्राकृत में निबद्ध, "गोम्मटेश थुदि" का प्रसाद गुण पूर्ण संस्कृत भाषा में रूपान्तरण किया है -
उदाहरणार्थ मूल रचना और डॉ. साहब द्वारा रूपान्तरित संस्कृत पद्य अधोनिदर्शित
विसट्ट-कंदोट्ट-दलाणुयारं, सुलोयणं चन्द-समाण-तुण्डं । घोणाजियं चम्पय -पुण्फसोहं, तं गोम्मटेसं - पणमामि णिच्चं ॥