Book Title: Mahapurana Part 2 Adipurana Part 2
Author(s): Jinsenacharya, Pannalal Jain
Publisher: Bharatiya Gyanpith

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Page 10
________________ द्वितीयभागस्य विषयानुक्रमणिका विषय पृष्ठ | विषय पृष्ठ जंगलमें जाकर दीक्षा ले ली। उन्होंने एक अनन्तर कन्वय क्रियानोंका निरूवर्षका प्रतिमायोग लिया और कायोत्सर्ग पण किया। २७७-२८६ करते हए तपश्चरण करते रहे। भरत चत्वारिंशत्तम पर्व चक्रवर्तीने उनके चरणों में अपना मस्तक षोडश संस्कार तथा हवनके योग्य टेक दिया। बाहुबली केवलज्ञान प्राप्त मंत्रोंका वर्णन । २६०-३१६ कर मोक्षको प्राप्त हुए। २००-२२० एकचत्वारिंशत्तम पर्व सप्तत्रिंशत्तम पर्व कुछ समय व्यतीत होनेपर भरत चक्रवर्तीने बड़े वैभवके साथ अयोध्या चक्रधरने एक दिन रात्रिके अन्तिम भागमें नगरमें प्रवेश किया। उनके वैभवका अद्भुत फल दिखलानेवाले कुछ स्वप्न वर्णन । २२१-२३६ | देखे । स्वप्न देखनेके बाद उनका चित्त अष्टत्रिशत्तम पर्व कुछ त्रस्त हुा । उनका वास्तविक फल जाननेके लिए वे भगवान् प्रादिनाथके एक दिन भरतने सोचा कि हमने जो समवसरण में पहुँचे। वहां जिनेन्द्र बन्दनावैभव प्राप्त किया है उसे कहाँ खर्च करना के अनन्तर उन्होंने श्री प्राद्यजिनेन्द्रसे चाहिए। जो मुनि है, वे तो धनसे निःस्पृह निवेदन किया कि मैंने ब्राह्मण वर्णकी रहते हैं। प्रतः अणुव्रत धारी गृहस्थोंके सृष्टि की है। वह लाभप्रद होगी या लिए ही धनादिक देना चाहिए। एक हानिप्रद । तया मैंने कुछ स्वप्न देखे हैं विन भरत चक्रवर्तीने नगरके सब लोगोंको उनका फल क्या होगा? भरतके उत्तरमें किसी उत्सबके बहाने अपने घर बुलाया। श्री भगवान्ने कहा कि वत्स! यह ब्राह्मण घरके अन्दर पहुँचने के लिए जो मार्ग थे वर्ण प्रागे चलकर मर्यादाका लोप करनेये हरित अंकरोंसे पाच्छादित करा दिये। वाला होगा यह कहकर उन्होंने स्वप्नोंका बहुतसे लोग उन मार्गोसे चक्रवर्तीके महल फल भी बतलाया, जिसे सुनकर चक्रवर्तीके भीतर प्रविष्ट हुए। परन्तु कुछ लोग ने अयोध्या नगरीम वापिस प्रवेश किया। बाहर खड़े रहे। चक्रवर्तीने उनसे भीतर और दुःस्वप्नोंके फलकी शान्तिके लिए न पानेका जब कारण पूछा तब उन्होंने जिनाभिषेक आदि कार्य कर सुखसे प्रजाका कहा कि मार्गमें उत्पन्न हुई हरी घास प्रादि पालन करने लगे। में एकेन्द्रिय जीव होते हैं। हम लोगोंके द्विचत्वारिंशत्तम पर्व चलनेसे वे सब भर जाएँगे अतः दयाकी रक्षाके लिए हम लोग भीतर पाने में असमर्थ एक दिन भरत सम्राट राजसमामें हैं। चक्रवर्ती उनके इस उत्तरसे बहुत प्रसन्न बैठे हुए थे। पास ही अनेक अन्य राजा हुए। उन्होंने उन्हें दूसरे प्रासक मार्गसे विद्यमान थे। उस समय उन्होंने विविध भीतर बुलाया और उन्हें दयालु समझकर दृष्टान्तोंके द्वारा राजाओंको राजनीति श्रावक संज्ञा दी, वही ब्राह्मण कहलाए। तथा वर्णाश्रम धर्मका उपदेश दिया। ३३१-३५० इन्हें ब्राह्मणोचित क्रियाकाण्ड प्रादिका त्रिचत्वारिंशत्तम पर्व उपदेश दिया। अनेक क्रियाओंका उपदेश , यहांसे गुणभद्राचार्यकी रचना है। दिया। सबसे पहले गर्भान्वय क्रियानोंका सर्वप्रथम उन्होंने गुरुवर जिनसेनके प्रति उपदेश दिया। २४०-२६८ भक्ति प्रकट कर अपनी लघुता प्रदर्शित की। अनन्तर श्रेणिकने समवसरणसभामें एकोनचत्वारिंशत्तम पर्व खड़े होकर श्री गौतम गणधरसे प्रार्थना प्रयानन्तर भरत चक्रवर्तीने दीक्षा की कि भगवन् ! अब मैं श्री जयकमारका न्वय क्रियाओंका उपदेश दिया। . २६६-२७६ । चरित सुनना चाहता हूँ कृपा कर कहिये। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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