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ग्रन्थ-परीक्षा।
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न पर (पाँचवें पर्वमें ) एकसंधि भट्टारककी बनाई हुई संहिताके अनुसार होमकुंडोंका लक्षण वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा भी की है और साथ ही तद्विषयक कुछ. श्लोक भी उद्धृत किये हैं । वह प्रतिज्ञावाक्य. और संहिताके दो श्लोक नमूनेके तौर पर इस प्रकार हैं:- . लक्षणं होमकुंडानां वक्ष्ये शास्त्रानुसारतः । भट्टारकैकसंधेश्च दृष्टा निर्मलसंहिताम् ॥१०३॥ त्रिकोणं दक्षिणे कुंडं कुर्याद्वर्तुलमुत्तरे। तत्रादिमेखलायाश्चाप्यवसेयाश्च पूर्ववत् ॥ (५-११०) अथ राजन प्रवक्ष्यामि शृणु भो जातिनिर्णयम् । यस्मिन्नेव परिज्ञानं स्यात् त्रैवर्णिकशूद्रयोः ॥ (११-२.)"
अन्तके दोनों श्लोक 'जिनसंहितामें क्रमशः नम्बर २१० और ४३ पर दर्ज हैं। एकसंधिभट्टारक भगवजिनसेनसे बहुत पीछे हुए हैं। उनका समय विक्रमकी १३ वीं शताब्दीके लगभग - पाया जाता है। उन्होंने खुद अपनी संहितामें बहुतसे श्लोक आदिपुराणसे उठाकर रक्खे हैं, जिनमेंसे. दो श्लोक नमूनके तौर पर इस प्रकार हैं:. "वांछन्त्यो जीविकां देव त्वां वयं शरणं श्रिताः। ..
तन्नस्त्रायस्व लोकेश तदुपायप्रदर्शनात् ॥४७॥ श्रुत्वेति.तद्वचो दीनं करुणाप्रेरिताशयः। मनः प्रणिधावेवं भगवानादिपूरुषः ॥४८॥
ये दोनों श्लोक आदिपुराणके १६ वें पर्वके हैं । इस पर्वमें. इनका नम्बर क्रमशः १३६ और १४२ है । इससे भी प्रगट है कि यह ग्रंथ भगवजिनसेनका बनाया हुआ नहीं है। . . .
(६) श्रीसोमदेवसूरिविरचित 'यशस्तिलक, श्रीहेमचंद्राचार्यप्रणीत ‘योगशास्त्र' और श्री जिनदत्तसूरिकृत : विवेकविलास' के पद्य. भी इस ग्रंथमें पाये जाते हैं, जिनका एक एक नमूना इस प्रकार है:
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