Book Title: Bhagavati Jod 04
Author(s): Tulsi Acharya, Mahapragna Acharya
Publisher: Jain Vishva Bharati
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५००. ऊपरला माणस तणां,
। माणस तणां संयुध देव पिछाण तेह विषे जे ऊपजै, अनंत काय थी आण ॥ वा० - ऊपरलो, बिचलो और नीचलो ए तीन मानस नां सद्भाव थकी ते माहिलो ए दोष रामवा ने अर्थ ऊपरलो इस क माणसेत्ति गंगादि प्ररूपणा थकी पूर्वोक्त स्वरूप सर नैं विषे युक्त इत्यर्थः ।
सर प्रमाण आउखा
"
,
संजूहेत्ति निकायविशेष देव तेहने विषे देवपण ऊपजं ए पहिलो देव भव कह्यो । महामाणस संजूह संख्या एतली सर्व नदी हुवै, दोय हजार नव सौ उस कोटाकोडि, पचहत्तर लाख कोड़ि अडतालीस हजार कोड़ि एली नदी जाणवी ।
५०१. तिहां देव संबधिया,
भोग भोगवी ताम । विचरी ते सुरलोक थी, आउ क्षय करि आम ॥ ५०२. भव स्थिति क्षये अंतर रहित, तनु प्रति तजी तिवार प्रथम सन्नि गर्भ मनुपणे उपजे जीव जिवार ॥ ५०३. तेह जीव ते भव चकी निकले अणंतरेह । मज्झिम माणस संयुधे, देवपणे वा० - जे सन्नी गर्भज मनुष्यपणो ऊपनों ते
उपजेह ॥
जीव ते मनुष्य नां भव थकी
अंतर रहित नीकली नैं मज्झिम कहितां बिचले मानस प्रमाण आउखा युक्त संयुथ
ते निकाय विशेष देव नैं विषे ऊपजै ।
५०४. तिहां देव संबंधिया,
भोग
ते सुरलोक यकी तदा,
जाब विचरेह
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आयू जाव
चवेह ||
५०५. द्वितीय सन्नि गर्भजपणे तेह जीव ते भव थकी, ५०६. निकली हेठला मानसे,
मनुष्यपणें उपजेह | अनंतरं निकले ह || प्रमाण आयू युक्त। संयुथ देवपणे तिको, उपजे एहबू उक्त ॥ ५०७. ते तिहां देव संबंधिया, जाव चवी ने जान
।
तृतीय सग्निगर्भ मनुपर्ने, ५०८. तेह वहां भी जान ही महामाणस संयुय विषे वा० - महामानस पूर्वोक्त महाकल्प प्रमित आउखावंत नैं विषे, जे पूर्वे प्रथम महामानस अपेक्षाये इसो
जीव ऊपने आण ॥ निकल ऊपर लेह देवपणे ऊपजेह ॥
कह्य ं चउरासी लाख महाकल्प खपावी नैं ते देखवूं । अन्यथा महामानस त्रिण नैं विषे ते कल्प घणां थावे ते मार्ट एहनां तीन भेद - उपरिला, मध्यम, हेठला । ते मांहि ऊपरला महामानस प्रमाण आउखायुक्त तीन हीज संयूथ तीन देव भव ने विषे ऊपजै ।
५०६. ते तिहां देव संबंधिया, जाव चवी नें जाण । तुर्यसन्नि गर्भ मनु विषे, जीव ऊपजै आण ।।
५१०. तेह जीव ते भव थकी, निकली
अणंतरेह | उपजेह ||
मध्यम महामाणस संयुथ, देवपणें
५००. उवरिल्ले माणसे संजूहे देवे उववज्जति ।
वा० - 'उवरिल्ले' त्ति उपरितनमध्यमाधस्तनानां मानसानां सद्भावात् तदन्यस्यायोपरितने इत्युक्तं 'माणसे' ति गङ्गादिप्ररूपणत प्रागुक्तस्वरूपे खरसि सरः प्रमाणाते इत्यर्थः 'संजू'त्ति निकायविशेषे देवे 'उववज्जइ' त्ति प्रथमो दिव्यभवः ।
(बु०प०६०६)
५०१. से णं तत्थ दिव्वाई भोगभोगाई भुंजमाणे विहरइ, विहरिता ताम्रो देवलगाओ
५०२. भवक्खएणं ठिइक्खएणं अनंतरं चयं चइत्ता पढमे सणिगब्भे जीवे पच्चायाति ।
५०३. से णं तओहिंतो अनंतरं उव्वट्टित्ता मज्झिल्ले माणसे संजू हे देवे उववज्जइ ।
५०४. से पं तत्य दिव्वाई भोगभोगाई भुजमाणे विहरद विहरिता ताली देवमोगाओ उरणं जाव (सं० पा० ) चइत्ता ।
५०५. दोच्चे सण्णिगन्भे जीवे पच्चायाति ।
५०६. से णं तमोहितो अनंतरं उब्वट्टित्ता हेट्ठिल्ले माणसे संजू देवे उबवज्जइ ।
५०७. से णं तत्थ दिव्वाइं भोग भोगाई जाय चइत्ता तच्चे सण्णिगब्भे जीवे पच्चायाति ।
५०० से मोहित जाव उच्चट्टिता उपरि माणुसुत्तरे संजू हे देवे उबवज्जइ ।
बा० मानसोत्तरे' ति महामानसे पूर्वोक्तमहाकल्पप्रमितापुष्कवति यच्च प्रागुक्तं चतुरशीति महाकल्यान् शतसहस्राणि परिवेति तत्प्रथम महामानसापेक्षयेति द्रष्टव्यं अन्यथा त्रिषु महामानसेषु बहुतराणि तानि स्युरिति एतेषु चोपरिमादिभेदात् त्रिषु मानसोत्तरेषु श्रीप्येव संयानि श्रयश्य देवभवाः ।
"
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(२०१०६७६)
५०९. से णं तत्थ दिव्वाइं भोगभोगाई जाव चइत्ता चउत्थे सण्णिगन्भे जीवे पच्चायाति ।
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५१०. से णं तओहितो अनंतरं उब्वट्टित्ता मज्झिल्ले माणुसुत्तरे संजू हे देवे उववज्जइ ।
भ० श० १५ ३३७
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