Book Title: Agamsaddakoso Part 3
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Agamdip Prakashan

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Page 410
________________ (सुत्तंकसहिओ) ४०८ भारिया [भार्या पत्नी, स्त्री २५३,२५८,२५९,३९०,३९५,४१२,४२७, आया. ३४६; सूय. १८६; ४२८,४५८,४६४,५१०.५५०,५७५,५९२, ठा.६५० सम. २६१ ६२०,६७५,६९८,७०३.७८८,८९७,९५३; भग. ५४९: नाया. २८,२२० नाया. ३८,६७,९१,१३४,१४४,२११; उवा. ५: अंत. १०ः उवा. १८,३८,४४,४६,५२,५५; विवा १२: सूर. १९७ः पण्हा. ८,११,१९,२९,३६,४३,४५; चंद. २०१: जंबू. ४३ः विवा १०,१४,२२,२६,२८,३०,३२; पुष्फि . ८; पुण्फ.३; राय. २३,२९; जीवा. १६७,२०२; दसा. १०४; उत्त. ३१९: पन्न..२,१७८,१८४,२४७,३८३; भारुड [भारुण्डमानाम पक्षी जंबू. ४४; पुष्फि.५; आउ. २०; सूय. ६७० उत्त. १२२; महाप. १६; भत्त. ७०; देविं. २९२: भारुडपक्खि भारुण्डपक्षिन] ७५२' दसा. १७,११२ जीय. ६४,७४; उव. १७; राय. ८४: दस. १४,५३२; उत्त. ४५१,७१३; भाल भाल] पाण नंदी. २२,८०, अ.नंदी. १: भत्त. १७; अनुओ. ९,२३ थी २८,४१,५२,३२७; भालयल/भालतल] पात, ecue भाव [भावय] वासित रघु, चिंतन ५२कुंभावना भत्त. १७; ભાવવી भालुंकी [भालूकी] शीयाली ठा.३६९; सम. ८७; भत्त. १६०; भत्त. ५३,१७२; दसा. ७७; भाव [भाव] भाव, वस्तु, पार्थ, अभिप्राय, दस. ४६५: ચિત્તવૃત્તિ, જીવની અવસ્થા, સંયમસ્થાનાદિરૂપ भावअणुजुयया भावअनृजुकता मावनी विशुद्ध परिए।म, मे माह, भोर, ३५- અસરળતા, કપટભાવ રસ-ગંધ-સ્પશદિગુણ, અનુભાગકર્મનોરસ, ___ठा. २६८; યોગના પરિણામ, અંશ, ભાગ, વસ્તુનો ગુણ भावअणुपुवी भावानुपूर्वी भावसंबधि પર્યાય, હિસ્સો, ઉપયોગ, ઉદય-ઉપશમ આદિ અનુપૂર્વ-પરિપાટી છભાવ, અંતઃકરણનોભાવ-લાગણી, વસ્તુના अनुओ. ६१ परिएम, विधि, पर्याय, शान-उपयोग भावअणुरत्त [भावानुरक्त] पाहिमा मासति आया. ५३५; सूय. १६,५४,४१३, | હોવીતે ५३७,५७६,६०१,६६३: भग. ४५८ ठा. १९५,२२२,२७२,२७५,२९०,२९४, भावआय [भावात्मन्] भाव३५मात्मा ३३०,३३३,३४२,४८८,५१०,५११, पिंड. १०४; ५२१,५८८,५९३,६६६,७२०,७२१, भावइत्ता [भावयित्वा भावनाशने, वियारीने ९३९,९४४,९६६; सम. २२३: सम. १४,४२,२१५ थी २२८,२३२; भावओ [भावतस् भावथी भग. ७२.७५,१७१,१८१,२२५.२३८. || ठा. ४७९; भग. १०७.११२: Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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