Book Title: Vyakhyapragnaptisutram Part 02
Author(s): Divyakirtivijay
Publisher: Shripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust

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Page 482
________________ श्रीभगवत्यज श्रीअभय वृत्तियुतम् भाग-२ // 1004 // असुरकुमारावाससयसहस्सेसुसंखेजवि० असुरकुमारावासेसु किं सम्मट्ठिी असुरकुमारा उव० मिच्छादिट्ठी एवं जहा रयणप्पभाए 13 शतके तिन्नि आलावगा भणिया तहा भाणि०, एवं असंखेजवि वि तिन्नि गमगा, एवं जाव गेवेजवि० अणुत्तरवि० एवं चेव, नवरं तिसुवि उद्देशकः 2 देवाधिकारः। आलावएसु मिच्छादिट्ठी सम्मामिच्छादिट्ठी य न भन्नति, सेसंतं चेव / 15 से नूणं भंते! कण्हलेस्सा(स्से) नील जाव सुक्कलेस्से सूत्रम् 473 भवित्ता कण्हलेस्सेसु देवेसु उव०?, हंता गोयमा! एवं जहेव नेरइएसु पढमे उद्देसए तहेव भाणियव्वं, नीललेसाएवि जहेव नेरइयाणं चतुर्निकाय देवभेदप्रभेद जहा नीललेस्साए, एवं जाव पम्हलेस्सेसुसुक्कलेस्सेसु एवं चेव, नवरं लेस्सट्ठाणेसुविसुज्झमाणेसु वि०२ सुक्कलेस्सं परिणमति सु० प्रत्येकानामारत्तासुक्कलेस्सेसु देवेसु उववखंति, से तेणटेणं जाव उव०।सेवं भंते! २॥सूत्रम् 473 / / 13-2 // वासैकसमये उत्पादोद्वर्तना 1 कइविहे त्यादि, 3 संखेजवित्थडावि असंखेन्जवित्थडावि त्ति, इह गाथा जंबुद्दीवसमा खलु भवणा जे हुंति सव्वखुड्डागा। संखेज्जवित्थडा मज्झिमा उ सेसा असंखेज्जा॥१॥ इति, 4 दोहिवि वेदेहिं उव० ति द्वयोरपि स्त्रीपुंवेदयोरुत्पद्यन्ते, तयोरेव तेषु सम्यग्दृष्ट्या दीनामुत्पादभावात्, असण्णी उव्वद्वृति त्ति, असुरादीशानान्तदेवानामसजिष्वपि पृथिव्यादिषुत्पादात, ओहिनाणी ओहिदसणी यन उव्वट्ठति / भूत्वादित्ति, असुराधुद्वृत्तानां तीर्थकरादित्वालाभात्तीर्थकरादीनामेवावधिमतामुद्वृत्तेः, पण्णत्तएसु तहेव त्ति प्रज्ञप्तकेषु प्रज्ञप्तपदोपलक्षितगमाधीतेष्वसुरकुमारेषु तथैव यथा प्रथमोद्देशके। कोहकसाई इत्यादि, क्रोधमानमायाकषायोदयवन्तो देवेषु कादाचित्का। अत उक्तं सिय अत्थी त्यादि, लोभकषायोदयवन्तस्तु सार्वदिका अत उक्तं संखेज्जा लोभकसाई पन्नत्त त्ति, तिसुवि गमएसु चत्तारिक लेसाओ भाणियवाओ त्ति, उववजंति उव्वलृति पन्नत्ते त्येवंलक्षणेषु त्रिष्वपि गमेषु चतस्रो लेश्यास्तेजोलेश्यान्ता भणितव्याः, एता एव ह्यसुरकुमारादीनां भवन्तीति, 5 जत्थ जत्तिया भवण त्ति यत्र निकाये यावन्ति भवनलक्षाणि तत्र तावन्त्युच्चारणीयानि, यानि सर्वक्षुल्लानि भवनानि तानि जम्बूद्वीपसमानि भवन्ति मध्यमानि सङ्ख्येयविस्तृतानि शेषाणि त्वसद्धयेयविस्तृतानि // 1 // लेश्यावान् प्रश्राः / // 1004 / /

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