Book Title: Pravachansara Saptadashangi Tika
Author(s): 
Publisher: ZZZ Unknown

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Page 479
________________ प्रवचनसार-सप्तदशांगी टीका ४६५ तथाभूतश्च बध्यत एव न तु विमुच्यते । श्रत अकाग्रयस्य न मोक्षमार्गत्वं सिद्धयेत् ॥ २४३॥ दृष्टि वर्त० अन्य० एक० क्रिया । वा जदि यदि अन्य । दव्वं अण्णं यं अन्यत्-द्वितीया एक से कम आसाद्य - सम्बन्धार्थप्रक्रिया | समणो श्रमणः अण्णाणी अज्ञानी-प्रथमा एकवचन | बज्मादि अध्यतेस्वतं ० अन्य० एक० भावकर्मप्रक्रिया | कम्र्मोह कर्मभिः विविहेहि विविधैः तृतीय बहुवचन । निरुक्तिredit श्रमणः । समास - विविधा विधा येषां ते विविधाः तः विधिः॥२४३॥ प्रसंगविवरण- अनन्तरपूर्व गाथा में ग्रागमज्ञान, तत्त्वार्थश्रद्धान, संरचना ग्रामज्ञान इन चारोंके यौगपद्य रूप ऐकाग्रचपनेका मोक्षमार्गरूपसे समर्थन किया था। अब इस गाथा में एकाग्रतारहित भावके मोक्षमापने का निषेध किया है। तथ्य प्रकाश- (१) जो ज्ञानस्वरूप एकमात्र श्रात्माको नहीं भावता, अनुभवता, वह अवश्य ही अन्य ज्ञेयभूत द्रव्यका प्राश्रय करेगा। ( २ ) जो पुरुष ज्ञानात्मक ग्रात्माको नहीं मानेसे शेयभूत अन्य द्रव्यका आश्रय करता है वह ज्ञानस्वरूप ग्रात्मतत्त्वके ज्ञानसे भ्रष्ट हु स्वयं अज्ञानी होकर मोह राग द्व करता है । ( ३ ) ग्रात्मज्ञानी अन्य द्रव्यका आश्रयी मोही राग द्वेषी प्राणी कर्मोंसे बैधता ही है, विमुक्त नहीं होता । ( ४ ) चूंकि ऐका के अभाव में वे सब विडम्बनायें होतों सो प्रकट सिद्ध है कि काय परिणमनके मोक्षमापना सिद्ध नहीं होता । सिद्धान्त - ( १ ) रागो द्वेषी मोही श्रमण श्रज्ञानी है और वह नावा कमसे ब जाता है । दृष्टि - १- अशुद्धभावनापेक्ष अशुद्ध द्रव्यार्थिकनय ( २४स ) । प्रयोग - कर्मोंसे छुटकारा पानेके लिये ज्ञानात्मक प्रात्मतत्वको भावना करना जिससे त तो अन्य द्रव्यका आश्रय हो सके और न राग द्वेष मोह उत्पन्न हो ॥२४३॥ अब एकाग्रता के मोक्षमार्गपना निश्चित करते हुये मोक्षमार्ग-ज्ञापनका उपसंहार करते हैं [ यदि यः श्रमरणः ] यदि श्रमण [ प्रर्येषु] पदार्थों में [न मुह्यति ] मोह नहीं करता [[न हि रज्यति ] राग नहीं करता, [न एव द्वेषम् उपयाति] और न द्वेषको प्राप्त होता है [[:] तो वह [ नियतं ] नियमसे [ विविधानि कर्मारिए ] विविध कर्मीको [ क्षपयति ] गुर कर देता है अर्थात् नष्ट कर देता है । तात्पर्य - मोह राग द्वेष न करने वाला श्रमण नाना कर्मो को नह कर देता है । टोकार्थ -- जो ज्ञानात्मक आत्माको एक श्रग्ररूपसे भाता है वह ज्ञेयभूत अन्य द्रव्यका (प्राश्रय नहीं करता; श्रीर उसका माश्रय नहीं करके ज्ञानात्मक आत्मज्ञान से भ्रष्ट वह स्वयमेव ज्ञानीभूत रहता हुआ मोह नहीं करता, राग नहीं करता; द्वेष नहीं करता, और ऐसा

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