Book Title: Pravachansara Saptadashangi Tika
Author(s): 
Publisher: ZZZ Unknown

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Page 498
________________ ४८४ सहजानन्दशास्त्रमालायां अथ कारणवैपरीत्यफलवपरीत्ये दर्शयति- दुमत्यविदिवत्थु वदणि यमज्झयण झाणदागरदो । लहदि भाव भावं सादपगं लहदि ॥ २५६॥ विहित पदमें, व्रत नियम पठन ध्यान दानमें रत । पुनर्भव नहि पाता, सातात्मक साथ कुछ पाता ।। २५६ ॥ स्थविदित वस्तुषु व्रतनियमाध्ययनध्यानदानरतः । न लभते अपुनर्भावं भात्रं सातात्मकं लभते ॥२५६|| शुभarita सव्यवस्थापितवस्तुषु प्रणिहितस्य पुण्योपचयपूर्वकोऽपुनर्भावोपलम्भः किल फलं तत्तु कारणनैपरीत्याद्विपर्यय एव । तत्र छद्मस्यव्यवस्थापितवस्तूनि कारणवैपरीत्यं नामसंज्ञ--छदुमत्यविहिवत्थु बदनियमज्भाणदाणरद ण अपुणभाव भाव सादप्पग | घातुसंज्ञलभ प्राप्ती । प्रातिपदिक-- छ्मस्थविहितवस्तु ब्रतनियमाध्ययनदानरत न अपुनर्भाव भाव सातात्मक सिद्धान्त - ( १ ) शुद्धभावनाके परिणाममें अशुद्धता ही चलती है । दृष्टि- १- अशुद्ध भावनापेक्ष अशुद्ध द्रव्याथिकनय (२४स ) । प्रयोग- शुद्ध ग्रन्तस्तत्त्वकी प्रतीति रखते हुए अंतस्तव में उपयुक्त न हो रहेकी स्थिति में सुदेव सुशास्त्र सुगुरुको आश्रयभूत कर शुभोपयोगरूप प्रवर्तना ॥ २५५ ॥ अब कारणको विपरीतता और फलको विपरीतता दिखलाते हैं - [स्थविहितवस्तुषु ] द्यस्थ-ज्ञानीके द्वारा कथित देव-गुरु-धर्मादिके विषय में [ व्रतनियमाध्ययनध्यानदानरतः ] व्रत नियम- अध्ययन- ध्यान दानमें रत जीव [ अपुनर्भावं] मोक्षको [न लभते ] प्राप्त नहीं होता, किन्तु [सातात्मकं भावे ] सातात्मक भावको [लभते ] प्राप्त होता है । तात्पर्य --- कल्पित देव गुरु धर्मादिकके प्रति किया हुआ शुभ कार्य मोक्षको नहीं देता, किन्तु सांसारिक सुखको प्राप्त करा सकता है | टोकार्थ- सर्वज्ञ द्वारा व्यवस्थापित वस्तुनों में युक्त शुभोपयोगका फल पुण्यसंचयपूर्वक मोक्षका लाभ है । वह फल, कारणकी विपरीतता होनेसे विपरीत ही होता है । वही छद्मस्थ स्थापित वस्तुयें कारणवैपरीत्य है; उनमें व्रत नियम अध्ययन - ध्यान दान रत रूपसे युक्त शुभोपयोग का फल मोक्षशुन्य केवल पुण्यापसदको प्राप्ति है फलवैपरीत्य है; वह फल सुदेवत्व व सुमव्यत्व है । प्रसंगविवरण - प्रनंतरपूर्व गाया में बताया गया था कि कारण विपरीत होनेपर शुभोपयोगका फल विपरीत होता है । अब इस गाथामें कारणको विपरीतता व फलको विप रोवता दोनों बताई गई है | तथ्यप्रकाश - ( १ ) सर्वज्ञदेव द्वारा उपदिष्ट तत्त्व शुभोपयोग के विपरीत श्राश्रयभूव

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