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जिस दिन मत्य-दूत यमराज मेरे आँगन में आयेंगे । उस दिन सच मैं उन्हें खाली हाथ जाने नहीं दूंगा। मतली संध्या-प्रभात, दिन रात, शरद-बसन्त द्वारा मेरी जीवन वाटिका में खिले हये सूख-दु:ख छाया-प्रकाश केविविध पत्र पूष्पों से भरी फलदानी उसे बेखटके बिना किसी हिचकिचाहट के अपर्ण कर दूंगा। जितना संचित धन, जो कुछ भी संग्रहीत है. वह सजा कर यात्रा के अंतिम दिन मृत्यु आयेगी तब उसे बधाई देकर अंतिम बेला के उपहार सम उसके पवित्र पात्र में प्रेम से घर दूंगा।
३९. रे मृत्यू !
सर्वरक्षी अन्तिम मित्र नवकार !
अरे, मेरे मरण तुम शौक से आ जाओ। मुझसे बातें करो, मैं तुम्हारे लिए ही जाग रत हूँ। जीवन भर तुम्हे पाने की कामना से
हे नवकार महान
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