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उपाध्याय जैनमुनि आत्माराम जी
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तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वय
समन्वयकर्ता साहित्यरत्न, जैनधर्मदिवाकर उपाध्याय मुनि श्री आत्माराम जी महाराज
( पञ्जाबी)
प्रकाशिका श्रीमती रत्नदेवी जैन
लुधियाना द्वितीयावृत्ति ५००] १६४१ [वीर सम्वत् २४६७
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FOREWORD
The Upadhyaya, Sri Atma Ram ji is a well known monk of the Sthanakavasi Sect. Ever since his initiation into the order he has devoted himself to a study of Jaina Philosophy and literature. He has done a useful work by translating the following Sutras into Hindi:
1 The Anuyogadvara. 2 The Avasyaka. 3. The Dasasrutaskandha. 4 The Dasavaikalika. 5 The Uttaradhyayana. · Besides these he compiled from the Sutras an original treatise entitled Jaina-tattua-Kalika-. sikasa where the original texts have been translated into Hindi and explained fully...
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For use in Jain Schools the Upadhyaya compiled a set of readers wherein he has combined sacred and secular instruction.
Upadhyaya Atma Ram Ji is a thorough scholar of Jaina literature not only on the traditional lines, but on the comparative lines also. Some years ago he published a valuable paper in the Hindi monthly "Saraswati" wherein he compared a number of passages from the Jaina Sutras with similar ones found in the Buddhist literature. The present volume i. e., the Tattvarthasutra-JainagamaS-amanavaya is another work of this kind. Here, of course, the material compared comes from the Jaina sources only. The Tattvart ha or the Tattvarthadhigama Sutra (also called the Moksa-Sastra) is the
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earliest extant Jaina work in Sanskrit and is composed in the Sutra style. It is regarded authoritative both by the Digambaras and the Svetambaras. Its author Umasvati (according to the Digambaras, Umasvami ) lived about 2,000years ago. This Sutra was one of the most widely and deeply studied works in the past as the number of commentaries on it (about forty) shows. Leaving aside the question whether the Agamas are older or later than the Tattvartha Sutra, Upadhyaya Atma Ram ji has been able to find out from the Agamas passages corresponding to all the individual sutras of the Tattvartha. For his comparison he has chosen the Digambara recension of the Tattvartha, perhaps to indicate that, so far as the fundamental
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principles are concerned, there is not much difference of, opinion between the Digambaras and the Svetambaras. The passages quoted from the Agamas often have a striking similarity with the sutras of the Tattvartha both in words and meaning.
It hardly needs to be added that the present work of Upadhyaya Atma Ram ji is a highly valuable apparatus for Research connected with Jaina philosophy and literature, and as such it will be fully appreciated by scholars working in that direction.
· Oriental College, L.
LAHORE. S BANARSI DAS JAIN
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प्रस्तावना
इस अनादि संसार-चक्र में परिभ्रमण करते हुए आत्मा को मनुष्य जन्म और आर्यत्व भाव की प्राप्ति हो जाने पर भी श्रुतिधर्म की प्राप्ति दुर्लभ ही है। इस के अतिरिक्त सम्यग्दर्शन भी सम्यक् श्रुत पर ही निर्भर है। अतएव उक्त सर्व साधन मिल जाने पर भी सम्यग्दर्शन की प्राप्ति के लिये सम्यक्श्रुत का अध्ययन अवश्य करना चाहिये । __ अब यह प्रश्न उपस्थित होता है कि उक्त प्राप्ति के लिये अध्ययन करने योग्य कौन २ ग्रन्थ ऐसे हैं जिनको सम्यक्श्रुत का प्रतिपादक कहा जाए । इसका स्पष्ट उत्तर यह है कि जिन ग्रंथों के प्रणेता सर्वज्ञ अथवा सर्वज्ञसदृश महानुभाव हैं वे आगम ही
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( २ )
अध्ययन करने योग्य हैं । क्योंकि जिसका वक्ता आप्त होता है वही आगम सम्यग्दर्शन की प्राप्ति में कारण होता है ।
यद्यपि सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति क्षायिक, क्षायोपशमिक अथवा पशमिक भाव पर निर्भर है तथापि सम्यक् श्रुत को उसकी उत्पत्ति में कारण माना गया है । अतएव सिद्ध हुआ कि सम्यक् श्रुत का अध्ययन अवश्य करना चाहिये ।
श्वेताम्बर–स्थानकवासी सम्प्रदाय के अनुसार सम्यकश्रुत का प्रतिपादन करने वाले ३२ श्रागम ही प्रमाणकोटि में माने जाते हैं । वे निम्न प्रकार हैं:
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११ अङ्ग, १२ उपाङ्ग, ४ मूल, ४ छेद और ३२वां आवश्यक सूत्र |
इनके अतिरिक्त इन आगमों के आधार से एवं इनके विरुद्ध बने हुए ग्रन्थों को न मानने में भी उक्त सम्प्रदाय आग्रहशील नहीं है ।
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(३) उक्त शास्त्रों के विषय में विशेष परिचय प्राप्त करने के लिये इस विषय के जैन ऐतिहासिक ग्रंथ देखने चाहिये। ___ अनेक महानुभावों ने उक्त आगमों के आधार पर अनेक प्रकार के ग्रंथों की रचना की है, जिनका अध्य. यन जैन समाज में अत्यन्त आदर और पूज्य भाव से किया जा रहा है। इन लेखकों में से भी जिन महानुभावों ने आगमों में से आवश्यक विषयों का संग्रह कर जनता का परमोपकार किया है उन को अत्यन्त पूज्य दृष्टि से देखा जाता है और उनके ग्रन्थ जैन समाज में अत्यन्त आदरणीय समझे जाते हैं। वर्तमान ग्रन्थ तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्ष शास्त्र) की गणना उन्हीं आदरणीय ग्रंथों में है। इस ग्रन्थ में इस के रचयिता ने आगमों में से आवश्यक विषयों का संग्रह कर जनता का परमोपकार किया है। इसमें तत्त्वों का संग्रह समयोपयोगी तथा सूक्ष्म दृष्टि से किया गया है
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( ४ )
इसके कर्ता ने आगमों की मूल भाषा अर्द्धमागधी से विषयों का संग्रह कर उनको संस्कृत भाषा के सूत्रों में प्रकट किया है । सूत्रकार ने अपने ग्रंथ में जैन तत्त्वों का दिग्दर्शन विद्वानों के भावानुसार संस्कृत भाषा में किया । प्रायः विद्वानों का मत है कि तत्त्वार्थसूत्र के रचयिता का समय विक्रम की प्रथम शताब्दी है । संस्कृत भाषा उस समय विकसित हो रही थी । जिस प्रकार इस ग्रंथ के कर्ता ने इस संग्रह में अपनी अनुपम प्रतिभा का परिचय दिया है उसी प्रकार अनेक विद्वानों ने इसके ऊपर भिन्न र टीकाओं की रचना करके जैन तत्त्वों का महत्व प्रगट किया है । और इस ग्रंथ को आगम के समान ही प्रमाण कोटि में स्थान देकर इसके महत्व को बहुत अधिक बढ़ा दिया है ।
पूज्यपाद उमास्वातिजी महाराज ने जैन तत्त्वों को आगमों से संग्रह कर जैन और जैनंतर जनता का बड़ा भारी उपकार किया है ।
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इस सूत्र को संग्रह ही माना गया है । यह ग्रन्थ सूत्रकार की काल्पनिक रचना नहीं है । कारण कि इस ग्रन्थ में जिन२ विषयों का संग्रह किया गया है, उन सब का आगमों में स्पष्ट रूप से वर्णन है। अतः स्वाध्याय प्रेमियों को योग्य है कि वे भक्ति और श्रद्धापूर्वक जैन आगम तथा तत्त्वार्थसूत्र दोनों का ही स्वाध्याय करें, जिससे भेद भाव मिट कर जैन समाज उन्नति के शिखर पर पहुँच जावे । ___अब रहा यह प्रश्न कि क्या यह ग्रन्थ वास्तव में संग्रह ग्रन्थ है ? सो आगमों का स्वाध्याय करने वाले तो इस ग्रंथ को आगमों से संग्रह किया हुआ मानते ही हैं। इसके अतिरिक्त आचार्यवर्य हेमचन्द्रसूरि ने अपने बनाये हुए 'सिद्धहेमशब्दानुशासन' नाम के व्याकरण में पूज्यपाद उमास्वाति जी महाराज को संग्रह कर्ताओं में उत्कृष्ट संग्रहकर्ता माना है । जैसा कि उन्होंने उक्त ग्रन्थ की स्वोपज्ञवृत्ति में कहा है।
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उत्कृष्टोऽनपेन २ । २ । ३६
उत्कृष्टार्थादनूपाभ्यां युक्ता द्वितीया स्यात् । अनुसिद्धसेनं कवयः। उपोमास्वातिं संग्रहीतारः ॥३६॥
स्वोपज्ञ बृहद्वृत्ति में भी उक्त आचार्यवर्य ने उक्त सूत्र की व्याख्या में कहा है :
"उत्कृष्टऽर्थे वर्तमानात् अनूपाभ्यां युक्ताद् गौणान्नाम्नो द्वितीया भवति । अनुसिद्धसेनं कवयः । अनुमल्लवादिनं तार्किकाः । उपोमास्वातिं संग्रहीतारः। उपजिनभद्रक्षमाश्रमणं व्याख्यातारः तस्मादन्ये हीना इत्यर्थः ॥३६ ॥" __ आचार्य हेमचन्द्र का समय विक्रम की १२ वीं शताब्दी सभी विद्वानों को मान्य है। आपके कथन से यह भली प्रकार सिद्ध हो जाता है कि पूज्यपाद उमास्वाति संग्रह करने वालों में सबसे बढ़कर संग्रह करने वाले माने गये हैं । आगमों से संग्रह किये जाने से यह ग्रन्थ भी संग्रह ग्रंथ माना गया है।
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अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि भगवान् उमास्वाति ने संग्रह किस रूप में किया है ? इसका उत्तर यह है कि इस ग्रन्थ में दो प्रकार से संग्रह किया गया है। कहीं पर तो शब्दशः संग्रह है अर्थात् आगम के शब्दों को संस्कृत रूप दे दिया गया है और कहीं पर अर्थ संग्रह है अर्थात् आगम के अर्थ को लक्ष्य में रखकर सूत्र की रचना की गई है। कहीं २ पर आगम में आये हुए विस्तृत विषयों को संक्षेप रूप से वर्णन किया गया है।
आगमों से किस प्रकार इस शास्त्र का उद्धार किया गया है ? इस विषय को स्पष्ट करने के लिये ही वर्तमान ग्रन्थ विद्वत्समाज के सन्मुख रखा जा रहा है। इसका यह भी उद्देश्य है कि विद्वान लोग आगमों के स्वाध्याय का लाभ उठा सकें। __इस ग्रंथ में सूत्रों का आगमों से समन्वय किया गया है। इसमें पहले तत्त्वार्थसूत्र का सूत्र, दिया है
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(८) फिर आगम प्रमाण, जिससे पाठकवर्ग आगम और सूत्र के शब्द और अर्थों का भली प्रकार ज्ञान प्राप्त कर सकें।
यहां यह बात ध्यान देने योग्य है कि इस ग्रन्थ में दिये हुए आगम प्रमाण आगमोद्धार समिति द्वारा मुद्रित हुए आगमों से दिये गये हैं।
यह ग्रन्थ इतना महत्त्वपूर्ण है कि प्रत्येक व्यक्ति के स्वाध्याय करने योग्य है । वास्तव में यह तत्त्वार्थसूत्र आगम ग्रन्थों की कुञ्जी है। अतः जिन २ विद्यालयों, हाईस्कूलों और कालेजों में तत्त्वार्थसूत्र पाठ्यक्रम से नियत किया हुआ है उन २ संस्थाओं के अध्यक्षों को योग्य है कि वह सूत्रों के साथ ही साथ बालकों को
आगम के समन्वय पाठों का भी अध्ययन करावें, जिससे उन बालकों को आगमों का भी भली भांति ज्ञान हो जावे ।
कुछ लोग यह शंका भी कर सकते हैं कि 'संभव
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(६) है कि श्वेताम्बर आगमों में तत्त्वार्थसूत्र के इन सूत्रों की ही व्याख्या की गई हो । इस विषय में यह बात स्मरण रखने की है कि जैन इतिहास के अन्वेषण से यह बात सिद्ध हो चुकी है कि आगम ग्रन्थों का अस्तित्व उमास्वाति जी महाराज से भी पहले था इसके अतिरिक्त तत्त्वार्थसूत्र और जैन आगमों का अध्ययन करने से यह स्वतः ही प्रगट हो जावेगा कि कौन किस का अनुकरण है । अतएव सिद्ध हुआ है कि आगमों का स्वाध्याय अवश्य करना चाहिये, जिस से सम्यग्दर्शन, सम्यज्ञान और सम्यक्चारित्र की प्राप्ति होने पर निर्वाणपद की प्राप्ति हो सके। अन्त में आगमाभ्यासी सज्जनों से अनुरोध है कि वे कहीं पर यदि कोई त्रुटि देखें या किसी स्थल में आगमपाठों के साथ किये गये समन्वय में कुछ न्यूनता देखें और उन की दृष्टि में कोई ऐसा आगम पाठ हो जिससे कि उस कमी की पूर्ति हो सके तो वे
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(१०) महानुभाव हमें अवश्य सूचित करें ताकि इस ग्रन्थ की आगामी आवृत्ति में उसका प्रबन्ध किया जावे । आशा है सज्जन पुरुष हमारे इस कथन पर अवश्य ध्यान देंगे।
श्री श्री श्री १००८ आचार्यवर्य श्री पूज्यपाद मोतीराम जी महाराज, उनके शिष्य श्री श्री श्री १००८ गणावच्छेदक तथास्थविरपदविभूषित श्री गणपतिराय जी महाराज, उनके शिष्य श्री श्री श्री १०८ गणावच्छेदक श्री जयरामदास जी महाराज और उनके शिष्य श्री श्री श्री १०८ प्रवर्तकपदविभूषित श्री शालिगराम जी महाराज की ही कृपा से उनका शिष्य मैं इस महत्त्वपूर्ण कार्य को पूर्ण कर सका हूँ।
गुरुचरणरजः सेवी जैनमुनि उपाध्याय आत्माराम
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आवश्यक सूचना खाध्याय के समान दूसरा कोई तप नहीं स्वाध्याय सर्व दुःखों से विमुक्त करने वाला है
[सभाय सव्व दुक्ख विमोक्खणे] प्रिय विज्ञ पुरुषो! आपको यह जानकर अत्यन्त हर्ष होगा कि हमने, साहित्यरत्न जैनधर्मदिवाकर उपाध्याय मुनि श्रीआत्माराम जी महाराज संगहीत तत्त्वार्थसूत्र जैनागमसमन्वय में से केवल मूल-सूत्रों
और मूल आगम-पाटों को, उनसे ही पुनः सम्पादित कराकर, स्वाध्यायप्रेमी महानुभावों के लिये, एक सुन्दर गुटका के आकार में प्रकाशित कर दिया है । इस स्वाध्याय गुटका में पूर्व प्रकाशित
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(२)
बृहद् ग्रन्थ की अपेक्षा, उपाध्याय जी महाराज ने हमारी प्रार्थना पर इतनी और विशेषता कर दी है कि पहले संस्करण में, जहां श्रागमों के कहीं उपयोगी मात्र आंशिक पाठ उद्धत किये थे, अब वहां इस गुटके में उनका सम्पूर्ण पाठ दे दिया है तथा कई एक आवश्यक पाठ अधिक बढ़ा दिये हैं, ताकि स्वाध्याय प्रेमियों को श्रागम-पाठों के अधिक परामर्श का पुण्य अवसर प्राप्त हो सके । इसलिये सर्वज्ञ वीतराग प्रणीत धर्म में अभिरुचि रखने वाले प्रत्येक महानुभाव को, यह लघु पुस्तकरत्न, प्रतिदिन के स्वाध्याय के लिये, अवश्य अपने पास रखना चाहिये।
गुजरमल प्यारेलाल जैन
चौड़ा बाजार,
लुधियाना।
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त्रिविध धर्म
तिविहे भगवता धम्मे पण्णत्ता, तंजहासुअधिज्झिते सुज्झातिते सुतवस्सिते, जया सुअधिज्झितं भवति तदा सुज्झातियं भवति जया सुज्झातियं भवति तदा सुतवस्सियं भवति, से सुअधिज्झिते सुज्झातिते सुतवस्सिते सुतक्खाते णं भगवता धम्मे पएणत्ते ।
टीका-'तिविहे' इत्यादि स्पष्टं, केवलं भगवता महावीरेणेत्येवं जगाद सुधर्मस्वामी जम्बूस्वामिनं प्रतीति, सुष्टु-कालविनयाराधनेनाधीतं-गुरुसकाशात् सूत्रतः पठितं स्वधीतं, तथा सुष्ठ-वि
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( २ ) धिना तत एव व्याख्यानेनार्थतः श्रुत्वा ध्यातम्-- अनप्रेक्षितं, श्रुतमिति गम्यं सुध्यातम्, अनुप्रेक्षणाभावे तत्त्वानवगमेनाध्ययनश्रवणयोः प्रायो. ऽकृतार्थत्वादिति, अनेन भेदद्वयेन श्रुतधर्म उक्तः, तथा सुष्टु-इह शोकाद्याशंसारहितत्वेन तपस्यितं-- तपस्यनुष्ठानं, सुतपस्यितमिति च चारित्रधर्म उक्त इति, त्रयाणामप्येषामुत्तरोत्तरतोऽविनाभावं दर्शयति-'जया' इत्यादि व्यक्तं, परं निर्दोषाध्ययनं विना श्रुतार्थाप्रतीतेः सुध्यातं न भवति, तदभावे ज्ञानविकलतया सुतपस्यितं न भवतीति भावः, यदेतत्-स्वधीतादित्रयं भगवता वर्द्धमानस्वामिना धर्मः प्रज्ञप्तः 'से'त्ति स व्याख्यातः--सुष्ठुक्तः सम्यगज्ञानक्रियारूपत्वात्, तयोश्चैकान्तिकात्यन्तिकसुखावन्ध्योपायत्वेन निरुपचरितधर्मत्वात्, सुगतिधारणाद्धि धर्म इति उक्तं च--
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(
३
)
'नाणं पयासयं सोहो तवो संजमो य गुत्तिकरो। तिण्हपि समारोगे मोक्खो जिणसासणे भणियो।' शानं प्रकाशकं शोधकं तपः संयमस्तु गुप्तिकरः । प्रयाणामपि समायोगो मोक्षो जिनशासने भणितः ॥ णमितिवाक्यालंकारे। सुतपस्यितमितिचारित्रयक्त।
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"6
स्वाध्याय का महाफल
क
सुयस्स श्राराहण्याए णं भंते ! जीवे किं
जणयइ ? सु०
अन्नाणं खवेइ न य संकिलिस्सइ ॥ २४ ॥
उत्तराध्ययन सू० अध्य० २६ सज्भाषणं भंते ! जीवे किं जणयइ ? स० नाणावरणिजं कम्मं खवेइ ॥ १८ ॥
उत्तरा० अ० २६
सज्झाए वा निउत्तेणं सव्वदुक्खविमोक्खणे
उत्तरा० अ० २६ गा० १०
सज्झायंत्र तो कुजा सव्वभावविभावणं-
उत्तरा० अ० २६ गा० ३७
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स्वाध्याय महातप है
बारसविहम्मिवि तवे,
भितरवाहिरे कुसल दिट्ठे ।
नव निविय होही,
सज्झायसमं तवोकम्मं ॥ १२६ ॥
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धन्यवाद
इस पुस्तक के संशोधन कार्य में पंडित मुनि श्री हेमचन्द्रजी महाराज ने विशेष भाग लिया है। एतदर्थ पण्डितजी महाराज का धन्यवाद किया जाता है।
निवेदक
गुजरमल जैन
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सम्मति पत्र
सुप्रसिद्ध श्रीमान् पं० हंसराज जी शास्त्री
प्रस्तुत ग्रन्थ तत्त्वार्थसूत्र जैनागमसमन्वय स्वनामधन्य उपाध्याय मुनि श्री श्रात्मारामजी की प्रोज्ज्वल प्रतिभा तथा उनके दीर्घकालीन सतत जैनागमाभ्यास का सुचारु फल है । आप श्वेताम्बर जैनधर्म की स्थानकवासी सम्प्रदाय में एक द्वितीय विद्वान् है । यद्यपि आज तक आपने जैनधर्म से संबन्ध रखने वाली कई एक मौलिक पुस्तकें लिखीं तथा कई एक जैन आगमों का सुबोध हिन्दी भाषा में अनुवाद भी किया तथापि प्रस्तुत ग्रंथ के संकलन द्वारा श्रापने साहित्य - प्रेमी जैन तथा जैनेतर सभ्य संसार की जो अमूल्य सेवा की है उसके लिये आपको जितना भी धन्यवाद दिया जाय उतना ही कम है ।
आपका यह संग्रह तत्वज्ञान के जिज्ञासुत्रों की अभिलाषा
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पूर्ति के लिये तो पर्याप्त है ही, परन्तु भारतीय तत्त्वज्ञान की ऐतिहासिक दृष्टि से गवेषणा करने वाले विद्वानों के लिये भी यह बड़े महत्व की वस्तु है । .
जैनतत्वज्ञान के संस्कृत वाङ्मय में तत्वार्थसूत्र का स्थान सबसे ऊचा है। जैन तत्व ज्ञान विषयक संस्कृत भाषा का यह पहला ही ग्रन्थ है । जनधर्म के प्रत्येक सम्प्रदायका इस के लिये बहुमान है । यही कारण है कि श्वेताम्बर और दिगम्बर आम्नाय के सभी विद्वानों ने, अपनी २ योग्यता के अंनुसार इस पर अनेक भाष्य वार्तिक और विशद टीकाएँ लिखकर अपने स्वत्व एवं श्रद्धा का परिचय दिया है।
तत्वार्थसूत्र के प्रणेता वाचकवर्य उमास्वाति भी अपनी कक्षा के एक ही विद्वान् हुए हैं । जैन विद्वानों में तत्त्वज्ञान । सम्बन्धी संस्कृत रचना में सबसे अग्रस्थान इन्हीं को ही : प्राप्त हुआ है । इन्होंने अपनी उक्त रचना में अागमों में रहे हुए समग्र जैनतत्त्वज्ञान को प्रांजल संस्कृत भाषा में जिस खूबी से संग्रहीत किया है वह उनके प्रौढ़ पाण्डित्य, जैनागम
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विषयिणी उनकी गम्भीरगवेषणा और लोकोत्तर प्रतिभा चमकार के लिये ही अाभारी है ।
प्रस्तुत ग्रन्थ में तत्त्वार्थसूत्रान्तार्गत सूत्रों की रचना जिनर आगम-पाठों के आधार पर की गई है उन सभी अागम-पाठों का उपयोगी अंश उन२ सूत्रों के नीचे उद्धृत कर दिया गया है। कहीं २ पर तो तत्त्वार्थ के मूल सूत्र और आगे के मूलपाठ मं अक्षरशः समानता देखने में आती है । केवल भाषा के उच्चारणमात्र में ही अन्तर है तथा शब्दशः और भावश साम्य तो प्राय: है ही। इससे वाचकउमास्वातिजी की उक्त रचना का मूल जैनागमों के साथ कितना गहरा सम्बन्ध है इस बात के निर्णय के लिये किसी प्रमाणान्तर के ढूढने की श्रावश्यकता नहीं रहती। मुनिजी के इस समन्वय रूप संकलन को देखकर मेरी तो यह दृढ़ धारणा हा गई है कि तत्वार्थसूत्रों की आधारशिला निस्सन्देह प्राचीन श्वेताम्बर परम्परा में उपलब्ध जैनागम ही है ।
मेरे विचार में तत्वाथ का यह अागमसमन्वयसाम्प्रदायिक
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व्यामोह के कारण अन्धकार में रहे हुए बहुत से विवादास्पद उपयोगी विषयों की गुत्थी को सुलझानेमें भी सफल सिद्ध होगा । एवं तत्त्वार्थसूत्र पर विशिष्ट श्रद्धा रखने वाले विद्वानों की उसके (तत्त्वार्थसूत्र के ) मूल स्रोतरूप जैनागमों की तरफ़ अभिरुचि बढ़ने की भी इससे पूर्ण आशा है । मेरी दृष्टि में तत्त्वार्थसूत्र ही एक ऐसा ग्रन्थ है जो जैनधर्म की सभी शाखाओं को बिना किसी हिचकिचाहट के मान्य हो सकता है । इसलिये इस मूल्य पुस्तक का सुचारु रूप से सम्पादन कर के उसका प्रचार करना चाहिये ।
अन्त में मुनि जी के इस उपयोगी और सुचारु समन्वय का अभिनन्दन करता हुआ मैं उनसे साग्रह प्रार्थना करता हूँ कि जिस प्रकार उन्होंने इस कार्य में सब से प्रथम श्रेय प्राप्त किया है उसी प्रकार वे तत्वार्थ के सांगोपांग सम्पादन में भी सबसे अग्रसर होने का स्तुत्य प्रयास करें ।
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PROF. DR. M. WINTERNITZ
XIX, CECHOVA 15, Prague, Czechoslovakia.
October 26th 1936. THE SECRETARY, OFFICE OF JAIN BARADARI, RAWALPINDI CITY,
India/Punjab. Dear sir,
I am greatly obligod to you sending me a copy of tho Tattvarth-Sutra-Jainagamasaman vaya edited by the Upadhyaya Sri Atma Ram. This famous manual of Jaina Philosoplıy and ethics by the great Umasvati, in its boautiful new garb will certainly attract many readers who wish to be introducod into the Jainagama.
Yours Faithfully,
M. WINTERNITZ.
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WORLD CONFERENCE
For International Peace Through Religion. (Formerly Universal Religious
Peace Conference.) "ECCLEPAX, NEW YORK.”
October, 28, 1936. KEVRA MALL JAIN, SECRETARY
JAIN BARADARI, Rawalpindi City,
INDIA, PUNJAB. Dear Sir,
Thank you very much for the book of Tattavartha Sutra, edited by Uphadhaya Atma Ram Ji, Maharaj, which was received a few days ago. We greatly appreciate this courtesy and have placed the book in our library.
Cordially Yours HENRY A. ATKINSON,
GENERAL SECRETARY.
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HAMBURGIFCHE UNIVERFITAT
Senior Fur Kultur Und
CEFCHICHTE INDIENS. HAMIURG, 9TH NOVEMBER, 1936. MR. KEVRA MALL JAIN, Secretary, Jain Baradari,
RAWALPINDI CITY. Dear Mr. Jain,
I duly received a copy of the Tattavaitha Sutra edited by Upadhyaya Shri Atmaram Ji and want to express my best thanks for the same which please convey to the Upadhyaya Maharaj. “His book is not only excellenty printed and can thus serve as a model volume to most printers of your country, but above all shows a great learning and intimate knowledge of the Agamas and is worth of being studied by all those who want to go back to the sources of Jain
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ism. For there cannot be any doubt that Umasvati based his Sutras upon the prakrit texts. The fact that these, though belonging to the Svetambaras, have been selected to illustrate the Digambara recension of the Tattvartha, seems most suitable to promote the harmony between both those creeds." With best wishes,
I am
Yours Sincerely, Dr. W. Schubring, PROFESSOR.
फर्ग्युसन व विलिंग्डन कॉलिज त्रैमासिक पत्रिका Tattavartha-Sutra. Jainagamasamanvayah Edited by Upadhyaya Jain Muni Atma
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(
E
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ramaji; published by Chandrapatiji Suputri (daughter) of Lala Sher Sinhji Jain Rohtak; Feb 1936.
Tattvartha Sutra or Tattvarthadhigama Sutra is a very important manual in Sanskrit on Jain philosophy composed in Sutra style by the well-knowri Jain writer Umasvati. The authoritativeness of the manual is recognised by both the sects, the Svetambaras as well as the Digambaras, although the versions recognised by each of these sects are not without variations in the total number of Sutras as well as in the readings of individual Sutras, Similarly, there seems to be a difference of opinion regarding the authorship of the Bhashya on the Sutras
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(Po)
The special and the most attractive and useful feature of this edition is that the Editor has added after each Sutra the original passages in Ardhamagadhi Prakrit from the Jain Sacred Works- the passages which according to the editor formed as it were the basis for the Sutras composed by Umasvati. The editor has taken care to give references to the editions of the agama works published by "Agamoddhra Samiti”. Those who have the experience of editing works which require passages to be traced to the original sources can very well understand and appreciate not only the vast erudition of the learned edi. tor but also the patient and laborious task which the editor must have willingly sub
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mitted himself to. The editor has also given in an appendix a comparative statement of the Sutras admitted by the Digambaras as well as the Svetambaras. * The prosent edition is printed in a very clear type and is very good, handy, pocket size edition with attractive binding and we have great pleasure in recommending it to students of Jainism. We have no doubt that it will be specially welcomed by all students of Jain Philosophy who desire to go to the original sources.
P. V. BAPAT.
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( १२ ) पं० सुखलालजी, प्रो. हिन्दू युनिवर्सिटी, बनारस
श्रापका तत्त्वार्थ विषयक गुटका मिला, तदर्थ कृतज्ञ हूं। इसकी बाह्य रचना अाकर्षक है, पर मैं तो इसके पीछे तो श्रापका आन्तरिक स्वरूप विषयक प्रयत्न है, उसका विशेष श्रादर करता हूं। क्योंकि इस प्रयत्न से तत्त्वार्थ के ऐतिहासिक और तुलनात्मक अभ्यासियों को बहुत कुछ मदद मिलेगी।
श्रापका यह समन्वय मेरे लिए बड़ा ही सन्तोषप्रद है । जिस एक परिशिष्ट में समग्र श्रागमों और तत्त्वार्थ सूत्रों का समन्वय तोलन करने का स्वप्न चिरकाल से था, वह वस्तु विना प्रयत्न से अन्यसाधित सामने देखकर भला किसे अानन्द न होगा ? अतएव मेरी विशाल और माध्यमिक योजना के एक अंश के पूरक रूप से आपके प्रयत्न का सविशेष अादर करना मेरे लिए तो स्वभाव से ही प्राप्त है ।
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( १३ ) पं० बेचरदास जी दोशी, भू० पू० प्रो० गुजरात
विद्यापीठ (अहमदाबाद)
आगमों के मूल में तत्वार्थसूत्र सम्बन्धी जो सामग्री पाई, वह सब इस संग्रह में संगृहीत कर दी है । प्रायः अनेक स्थानों में तो तत्वार्थ के मूल सूत्रों और प्रागमों के मूल पाठ के बीच शब्दशः और अर्थशः साम्य दृष्टिगोचर होता है।......" तुलनात्मक दृष्टि से अभ्यास करने वालों के लिए तो यह संग्रह खास तौर पर उपयोगी सिद्ध होगा ।""अागम स्वाध्यायी समन्वयकार श्रीमान् उपाध्याय आत्मारामजी मुनिवर के हृदय को जहां तक मैं समझ सका हूँ, वहां तक मुझ पर उनके समदृष्टि गुण की ही अधिकाधिक छाप है । और इसी दृष्टि से मैं उनके इस संग्रह का प्रयोजन धार्मिक समभाव को उत्पन्न करना एवं अधिकाधिक पुष्ट करना ही समझता हूँ, जो मेरे लिए तो सोलहों आने सन्तोषकारक है।
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( १४
)
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जैन इतिहासिक के प्रखर अभ्यासी विद्वान्
पं० नाथूराम जी प्रेमी, बम्बई . यह एक बिल्कुल नई चीज है । तत्वार्थ सूत्र जैनागमों पर से किस प्रकार संगृहीत हुअा है, यह दृष्टि इस से प्राप्त होगी और जैन साहित्य के विकास क्रम को समझने के लिए यह बहुत उपयोगी होगा.....।
कविरत्न उपाध्याय जैन मुनि श्री अमरचन्द्रजी
अापकी इस शोध ने भारतीय साहित्य में जैनागमों का मस्तक ऊंचा कर दिया है । तत्त्वार्थ सूत्र पर आज के इतिहास में इस प्रकार का तुलनात्मक प्रयत्न कभी नहीं हुआ। सुविस्तृत आगम साहित्य में से प्रत्येक सूत्र का उद्गम स्रोत ढूंढ निकालना, वस्तुतः आपका ही काम है । आपकी यह अमर कृति युग युग चिरञ्जीवी रहे ....... ।
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( १५ )
सुप्रसिद्ध जैन विद्वान् मुनि श्री विद्याविजयजी
तत्वार्थ सूत्र पर क्या अभिप्राय लिखू ? ऐसे सामान्य तात्विक ग्रन्थ को ।जस सुन्दरता के साथ निकाला है, उसको देखकर हर किसी को प्रसन्नता हुए बिना नहीं रह सकती । खास कर. प्रत्येक सूत्र का, पालामा के पाठ के साथ जो समन्वय किया गया है, वह सुवर्ण में सुगन्ध के समान है।
शतावधानी पं० श्री सौभाग्यचन्द्र जी, 'सन्तबाल'
___ मुझे कहना पड़ेगा कि यह प्रयत्न अत्यन्त सुन्दर है और नूतन है । साहित्यिक एवं ऐतिहासिक दृष्टिं से बाज जैन साहित्य की खोज जो पाश्चात्य एवं पौर्वात्य विद्वान कर रहे हैं, उनको इस कृति से बहुत सहायता मिलेगी। अतएव जैन इतिहास में यह कृति अमर अाधार रूप है ।"....."
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( १६ )
जैनशास्त्राचार्य आशुकवि पं० श्री घासीलालजी महाराज आपका सर्वाङ्ग सुन्दर तत्वार्थ समन्वय नामक ग्रन्थरत्न देखकर अतीव आनन्द प्राप्त हुआ । श्रागम साहित्य के अथाह समुद्र का आपने बुद्धि रूप मेरुदण्ड से मथन कर यह ग्रन्थरत्न आपने निकाला है । प्रस्तुत ग्रन्थरत्न के अध्ययन, मनन, एवं तदनुकूल श्राचरण तथा प्रचार करने से जैनशासन की अतीव उत्कृष्ट प्रभावना होगी
। बाबू कीर्तिप्रसादजी जैन भू० पू० अधिष्ठाता जैन गुरुकुल गुजरानवाला ( पंजाब ) आपने तत्वार्थ सूत्र के सब सूत्रों के मूल स्थान खूब ढूंढ निकाले हैं | आपका परिश्रम अतीव सराहनीय है । दिगम्बर और श्वेताम्बर मान्यताऽनुसार जो सूत्रों में न्यूनाधिकता है, उसको भी बड़ी खूबी के साथ अन्त में दिखा दिया है । महाराज श्री की श्रागमसम्बन्धी जानकारी का यह एक अच्छा नमूना है |
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पंक्ति
१४
शुद्धि पत्र अशुद्धि
शुद्धि
उद्दे० चरित्ताराहण चरित्ताराहणा
सू०८ मणं० श०
श०८ इयि अत्थ पव्विा
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- अशुद्धि · शुद्धि
गुणा असखि असंखि निंग्गोए निग्गोए खोवसम खोवसमे लद्धा लद्धी गवसगा गवेसणा
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बितए बितिए अंतोवट्ठा अंतोवट्टा अतिखहा अतिखुहा पढविं पुढविं रुप्पिणाम रुप्पिणामं पंचयएगूण पंचय एगण गण गूण दसहा उभव दसहा उ भव
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(
३
)
पंक्ति
अशुद्धि शुद्धि अच्चत्ता अच्चुत्ता आणाइ आणाई
६७
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केवज्य केवइयं विमणाई विमाणाई ३३८ ३३ अशुद्धि शुद्धि सणकुमारे सणंकुमारे १४ ४१ संजते संजुत्ते खद्दका खुद्दका
जंतना जतूना स्थानाभ्यमनया स्थानाभ्यामनयोर्वा
२५ २४ कम्प कम्पा
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पंक्ति
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१५६ १६०
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अशुद्धिः शुद्धि ज्जवयाए ज्जुययाए समणे समणो पोसहा पोसहो उच्चयं दुच्चयं असर असरणा विक्त विविक्त स ज्झए सज्झाए अन्तमुहुत्तं अंतोमुहुत्तं लबु लाबु
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संख्या
संखा निदश्य निर्देश्य उववाइअ उववाइअं ओरलिय ओरालिय अणादव्वेणं अण्णदव्वेणं
२२७ २२८
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पंक्ति
शुद्धि
२३१
अशुद्धि २५ वेयरणत्ति वेयरणित्ति
२४
२४३
२४७
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दरिण दुरिण २५३
ठाणंग ठाणांग २५८
एयं रायं २५६
५६
२५६ , १० मण्णरणामणुणुइमण्णुण्णामण्णुणाई २६३ १४ अ० .
अ०७ __परिशिष्ट नं० ३ का शुद्धि पत्र पृष्ठ दि० सू० नं० अशुद्धि शुद्धि २० ४० ज्येकयाग ज्येकयोग पृष्ठ श्वे० सू० नं० अशुद्धि
शुद्धि ४२ तव्ये
तत्व्ये
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धन्यवाद
इस तत्त्वार्थसूत्र जैनागम समन्वय की द्वितीयावृत्ति को श्रीमती रत्नदेवी जी (धर्मपत्नी स्वर्गीय लाला लब्भूराम सर्राफ फर्म लाला तोतामल तिलकराम जैन सर्राफ लुधियाना) अपने स्वर्गीय पतिजी की स्मृति में निज व्यय से छपवा कर प्रकाशित कर रही हैं।
प्रत्येक महानुभाव को इनका अनुकरण करना चाहिये।
निवेदिकादेवकीदेवी जैन
मुख्याध्यापिका जैन गर्ल्स स्कूल
लुधियाना।
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स्वर्गीय ला०
लब्भूरामजी सर्राफ
आपकी धर्मपत्नी ने आपकी पवित्र स्मृति में यहे पुस्तक प्रकाशित की है।
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तत्त्वार्थसूत्र - जैनागम समन्वयः ।
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प्रथमोऽध्यायः ।
सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः ॥१॥ नादंसणिस्स नाणं नाणेण विना न हुन्ति चरणगुणा । अगुणिस्स नत्थि मोक्खोनत्थि अमोक्खस्स निव्वाणं॥
उत्त० अ० २८ गा० ३० सम्मदंसणे दुविहे पण्णत्ते । तं जहा-णिसग्गसम्मइंसणेचेव अभिगमसम्मइंसणे चेव । णिसग्गसम्मइंसणे दुविहे पएणत्ते । तं जहा-पडिवाई चेव अपडिवाई चेव । अभिगम मम्मइंसणे दुविहे पण्णत्ते । तं जहा--पडिवाई चेव अपडिवाई चेव।
स्था० स्थान २ उद्दे० १ सू०७०
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प्रथमोऽध्यायः।
तिविहे सम्मे पगणतं । तं जहा-नाणसम्मे, दसणसम्मे, चरित्तसम्मे ।
स्था० स्थान : उद्देश ४ सू० १६६ दुविहे गाणे पण्णत्ते । तं जहा--पचक्वे चेव परोकरवे चंब । पच्चम्ग्वे णाणे दुविहे पण्णत्ते । तं जहा-केवलागाणे णव णोकेवलणाणे चवर । केवलणाणे दुविह परमाते । तं जहाभवत्थकेवलणाणं चत्र सिद्ध केवलगाणे चव ३ । भवत्थकवलणाणे दुविहे पण्णले । तं जहा-सजोगिभवत्थ केवलणाणे चव अजोगिभवत्थकेवलणाण चव ४ । सोगिभवत्थकेवलणागा दुविहे पण्णत्ते । तं जहा-पढमसमयमजोगिभवत्थकेवलणागा चेव, अबढमसमयसजोगिभवत्थकेवलणाणे चेव ५ । अड्या चरिमसमयसजागिभवत्थकवलणाणे चेव अचरिमसमयसजोगिभवत्थ केवलणाणे चव ६ । एवं यजोगिभवत्थकेवलणाणे वि७-८ सिद्धकवलणाणे दुविहे पणगात्ते। तं जहा-यणंतरसिद्धकंवलणागो चैव परंपमिद्ध केवलणाग चेव ६ । अणंतर्गमद्ध
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तत्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
मोक्खमग्गगई तश्च, सुणेह जिणभासियं ।
चउकारणसंजुत्तं, नाणदंसरणलक्खरणं ॥ केवलणाणेदुविहे पएणत्ते। तं जहा-एक्काणंतरसिद्धकेवलणाणे अणेक्काणंतरसिद्ध केवलणाणे चेव १० । परंपरसिद्धकंवलणाणे दुविहे पण्णत्ते । तं जहा-एकपरंपरसिद्धकेवलणाणे चेव अणेक्कपरंपरसिद्धकेवलणाणे चेव ११ । णोकेवलणाणे दुविहे पएणत्ते । तं जहा-अोहिणाणे चेव मणपजवणाणे चेव १२। श्रोहिणाणे दुविहे पण्णत्ते । तं जहा-भवपच्चइए चेव खत्रो. वसमिए चेव१३। दोरहं भवपच्चइए परणत्ते। तं जहा-देवाणं चेव नेरइयाणं चेव १४ । दोण्इं खग्रोवसमिए पण्णत्ते तं जहा-मणुस्साणं चेव पंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं चेव १५ । मणपजवणाणे दुविहे पण्णत्ते । तं जहा-उज्जुमति चेव विउलमति चेव १६ । परोक्खेणाणे दुविहे पएणत्ते। तं जहा.
आभिणिबोहियणाणे चेव सुयनाणे चेव १७ । अाभिणिबोहियणाणे दुविहे पण्णत्ते । तं जहा-सुयनिस्सिए चेव असुय
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प्रथमोऽध्यायः ।
नाणं च दंसणं चेव, चरितं च तवो तहा । एस मग्गु ति परणत्तो, जिरोहिं वरदं सिहिं ॥ निस्सिए चेव १८ | सुयनिस्सिए दुविहे पाते । तं जहाश्रत्थोग्गहे चेव बंजरगोग्गहे चैत्र १६ । सुयनिस्सिते वि एमेव २० । सुना दुविहे पत्ते । तं जहा - ग्रंगपविष्ठे चेव अंगबाहिरं चेव २१ | अंगबाहिरे दुविहे पण्णत्ते । तं जहाश्रावस्सए चैव श्रावस्यवइरिते चैत्र २२ | श्रावस्तयवतिरित्ते दुविहे पत्ते । तं जहा -कालिए चैव उक्का लिए चैव २३ ॥ स्था० स्थान र उद्दे० १ सू० ७१. दुवि मे पत्ते । तं जहा - सुयधम्मे चेत्र चरितम्मे चेत्र । सुयधम्मे दुबिहे पत्ते । तं जहा - सुत्तमुयधम्मं चेत्र त्थसुयधम्मे चैव । चरित्तधम्मे दुविहे पण्णत्ते । तं जहाआगारचरितम्मे चैव ग्रगुगारचरितम्मे चेव ।
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दुविहे संजमे पत्ते । तं जहा सरागसंजमे चैव वीत* 'गुगारचरित्तधम्मे दुविहे पत्ते' इत्यपि पाठान्तरम् ।
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तत्त्वार्थमूत्रजैनागमसमन्वये
नाणं च दंसणं चेव, चरित्तं च तवो तहा । पयं मग्गमणुप्पत्ता,जीवा गच्छन्ति सोग्गइं॥
उत्त० अ० २८ गा० १-३ गगसंजमे चेव । सरागसंजमे दुविहे पण्णत्ते । त जहा-सुहुमसंपरायसरागसंजमे चेव बादरसंपरायसरागसंजमे चेव । सुहुमसंपरायसरागसंजमे दुविहे पण्णत्ते । त जहा-पढमसमयसुहुमसंपरायसरागसंजमे चैव अपढमसमयमु० । अथवा चरमसमयेसु० अचरिमसमयेसु० । अवा मुहुमसंपरायसरागसंजमे दुविहे पण्णत्ते । त जहा-संकिलेसमागाए चेव विसुज्झमाणए चेव । बादरमंपरायसरागसंजमे दुविहे पण्णत्ते । त जहा-पढ़मसमयबादर० अपढमसमयबादरसं० । अह्वा चरिमसमय० अचरिमसमय अड्वा वायरसंपरायसरागसंजमे दुविहे पण्णत्ते। न जहा-पडिवाति चेव अपडिवाति चेव । वीयरागसंजमे दुविहे पण्णत्ते। तजहा-उवसंतकसायवीयरागसंजमे चेव खीणकसायवीयरायमंजमे चेव। उवमंतकमायवीयगगमंजमे दुविहे पणगते।
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प्रथमोऽध्यायः ।
तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम् ॥२॥
तहियाणं तु भावाणं. सग्भावे उपसणं । भावेणं सहहन्तस्स सम्मतं तं वियाहियं ॥ उ० प्र० २८ गा० १५
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तं जहां पढमसमयउवसंतकसायवीयरागसंजमें चैव पढमसमयउव० । ब्रह्वा चरिमसमय चरिमममय० । स्त्रीरणकमायत्रीयरागसंज में दुविहे पण ते । तं जहा छ उमत्थवीक मायवीयरागसंजमेचेव केवलिखी एक सायवीयरागमं जमे चैव । उमत्थरवीणक सायवीयरागमंजमें दुविहे पत्ते । न जहा-मयंबुद्धउमत्थरवीण कसाय० बुद्धबोहियल उमस्थ । सबुद्धल उमत्थ ० दुविहे पत्ते । तं जहा पदमसमयपदमममय हवा चरिमसमय ग्रचग्मिममय । केवलिवीणुकसायवीतरागज विहे पत्ते । तं जहा मजीगिकेच लिखीणकमाय जोगिकेवत्तिवीक सायवीयराग० । मजोगि केव लिखीएक सायमं जमे दुहि पाने तं जाय
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- तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
तन्निसर्गादधिगमाद्वा ॥३॥ सम्मइंसणे दुविहे पराणत्ते । तं जहा-णिसग्गसम्मइंसणे चेव अभिगमसम्मइंसणे चेव ॥
स्था० स्थान २ उ० १ सू० ७० अपढमसमय० । अवा चरिमसमय० अचरिमसमयः । अजोगिकेवलिखीणकसाय० संजमे दुविहे पण्णत्ते । त जहापढमसमय० अपढमममय । अवा चरिमसमय० अचरिमसमय० ॥
स्था०स्थान २ उद्द० १ सू० ७२. कतिविहा णं भंते ! पाराहणा पण्णत्ता ? गोयमा ! तिविहा याराहणा पण्णत्ता । त जहा-नाणाराहणा दंसणागहणा चरित्ताराहणा । णाणाराहणा णं भंते ? कतिविहा पगणत्ता ? गोयमा ! तिविहा पण्णत्ता । त जहा-उक्कोसिया मज्झिमा जहन्ना । दंसणाराहणाणं भंते ? एवं चेव तिविहावि, एवं चरित्ताराहणावि ।। जस्सणं भंते ? उक्कोमिया णा
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प्रथमोऽध्यायः ।
जीवाजीवास्रवबन्धसंवर निर्जरामो
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नास्तत्त्वम् ॥४॥
णाराहणा तस्म उक्कोसिया दंसणाराहणा, जस्स उक्कोसिया दंसणाराहणा तस्स उक्कोमिया गाणाराहणा ? गोयमा ! जस्स उक्कोसिया खाणाराहणा तस्स दंसणाराणा उक्कोसिया वाग्रजहन्न उक्कोसिया वा । जस्स पुरण उक्कोसिया दंसणाराइणा तस्स नाणाराणा उक्कोसा वा जहन्नावा जहन्नमरणुकोसाबा । जस्सरणं भंते ? उक्कोमिया नाणाराहणा तस्स उक्कोसिया चरिताराणा जस्सुकोसिया चरिताराणा तस्सुकोसिया खाणाराहणा, जहा उक्कोसिया खाणाराह्णाय दंसणाराहरणाय भणिया तहा उक्कोमिया नाणाराइणाय य चरितारणाय भणियव्वा । जस्स गं भंते ! उक्कोसिया दंसणाराणा तस्सुकोसिया चरिताराणा जस्सुकोमिया चरिताराहणा तस्सुक्कोसिया दंसणाराहणा ? गोयमा ? जस्स उक्कोमिया दंसणाराहणा तस्स चरिताराह
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तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
नव सब्भावपयत्था परणत्ते । तं जहा-जीवा अजीवा पुराणं पावो पासवो संवरो निजरा बंधो मोक्खो॥
स्था० स्थान ६ सू० ६६५ उक्कोसा वा जहन्ना वा अजहन्नमणुक्कोसा वा । जस्स पुण उक्कोसिया चरित्ताराहणा तस्स दंसणाराहणा नियमा उक्कोसा । उक्कोसियं णं भंते ? णाणाराहणं अाराहेत्ता कतिहिं भवग्गहणेहिं सिझति जाव अंत करेंति ? गोयमा ! अत्थेगइए तेणेव भवग्गहणे णं सिझंति जाव अंत करेंति । अत्थे गतिए दोच्चेणं भवग्गहणे गं सिझंति जाव अंत करेंति । अत्थेगतिए कप्योवएसु वा कपातीएसु वा उववज्जति । उक्कोसियं णं भंते ! दंसणाराहणं पाराहेता कतिहिं भवग्गहणेहिं एवं चेव उक्कोसियएणं भंते ! चरित्ताराणं पाराहेत्ता एवं चेव, नवरं अत्थेगतिए कप्यातीय एसु उववज्जंति मझिमियं णं भंते ! णाणाराहणं पाराहेत्ता कतिहिं भवग्गहणेहिं मिझति जाव अंत करति ? गोयमा ? अत्थेगनिए
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प्रथमोऽध्यायः।
नामस्थापनाद्रव्यभावतस्तन्न्यासः॥५॥ जत्थ य ज जाणेजा निक्खेवं निक्खिवे निरवसेसं । जत्थवि अ न जाणेजा चउक्कगं निक्खिवे तत्थ ॥
श्रावस्सयं चउविहं पगणत्ते। तं जहा-नामावस्स. यं ठवणावस्सयं दवावस्सयं भावावस्सयं ॥अनु०सू०
प्रमाणनयैरधिगमः ॥६॥ दोच्चे णं भवग्गदणेगं मिज्झइ जाव अंतं करेंति त च्चं पुण भवग्गहणं नाइक्कमइ, मझिमियं भंते ! दंसणाराहणं पाराहेत्ता एवं चेव, एवं मज्झिमियं चरित्ताराणं पि । जन्नियन्नंभंते ? नाणाराहणं पाराहेत्ता कतिहिं भवग्गहणेहि सिझंति जाव अंतं करेंति ? गोयमा ! अत्थेगतिए तच्चेणं भवग्गहणेमणं मिज्झइ जाव अंतं करेइ सत्तट्ट भवग्गहणाई पुण ना इक्कमइ । एवं दमणारादणं पि एवं चरित्ताराहणं पि ।। भग० श० उद्दे०१० सूत्र ३५५ ।।
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तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
दव्वाण सव्वभावा,सव्वपमाणेहिं जस्स उवलद्धा । सव्वाहिं नयविहीहिं, वित्थाररुइ त्ति नायव्वो ॥
उत्तरा० अ० २८ गाथा २४ निर्देशस्वामित्वसाधनाधिकरणस्थितिविधानतः ॥७॥
१समग्रपाठस्त्वयम्
से किं तं उबग्घाय निज्जुति अणुगमे ? इमाहिं दोहिं गाहाहिं अणुगंतव्यो । त जहा-उद्देसे १ निद्देसे अ २ निग्गमे ३ खेत्त ४ काल ५ पुरिसेय ६ कारण ७ पच्चय ८ लक्खण ६ नए १० समोयारणागुमए ११||१३३।। किं १२ कइविहं १३ कस्स १४ कहिं १५ केसु १६ कहं १७ किच्चिरं हवइ कालं १८ कइ १६ संतर २० मविरदियं २१ भवा २२ गरिस २३ फासण २४ निरुत्ति २५ ॥१३४|| सेतं उवग्घाय निज्जुत्ति अणुगमे।
मृ० १५१
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प्रथमोऽध्यायः ।
निदेसे पुरिसे कारण कहिं केसु कालं कइविहं ॥
अनु० सू० १५१
सत्संख्या क्षेत्रस्पर्शन कालान्तरभा
१३
वाल्पबहुत्वैश्च ॥८॥
से किं तं गमे ? नवविहे पण्णत्ते । तं जहा - संतपयपरूवण्या १ दव्वपमाणं च २ खित्त ३ फुसरणाय 3 कालोय ५ अंतरं ६ भाग ७ भाव = अप्पा बहु चेव ।
अनु० सू० ८०
मतिश्रुतावधिमनः पर्यय केवलानि
ज्ञानम् ॥६॥
पंचविहे गाणे पणत्ते । तं जहा - श्राभिणिबोहिगाणे सुयणाणे श्रहिणाणे मरणपज्जवणाणे केवल - गाणे ॥
नन्दि १
स्था० स्थान ५ उद्दे० ३ सू०४६३, अनु० सू० १, भगवती शतक ८ उद्दे० २ सू० ३१८
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१४
तत्त्वार्थ सूत्र जैनागमसमन्त्रये
तत्प्रमाणे ॥१०॥ आद्ये परोक्षम् ॥ १०॥
प्रत्यक्षमन्यत् ॥१२॥
से किं तं जीवग राप्यमाणे ? तिविहे परागते । तं जहा - गाणगुणप्पमाणे इंसणगुणष्पमाणे- चरित गुणप्पमाणे ।
ग्रनु० सू० १४४.
दुविहे नाणे परणत्ते । तं जहा - पच्चक्खे चेव परोकखे चेव १ । पञ्चक्खे नाणे दुविहे पण्णत्ते । तं जहा - केवलणाणे चेव गोकेवलणाणे चेव २ |
गोकेवलणाणे दुविहे पण्णत्ते । तं जहा - श्रोहिगाणे चेव मणपज्जवणाणे चेव । परोक्खे गाणे दुविहे पण्णत्ते । तं जहा - आभिणिबोहियणाणे चेव, सुयणाणे चैत्र ।
स्था० स्थान र उद्दे० १ सू० ७१
..........
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प्रथमोऽध्यायः ।
मतिः स्मृति: संज्ञा चिन्ताऽभिनिबोध इत्यनर्थान्तरम् ॥१३॥
६५.
ईहा अपोह वीमंसा मग्गणा य गवेसणा । सन्ना सई मई पन्ना सव्वं श्रभिणिबोहिश्रं ॥ नन्दि० ० प्र० मतिज्ञानगाथा ८०
तदिन्द्रियाऽनिन्द्रियनिमित्तम् ॥१४॥
से किं तं पच्चक्ख ? पच्चक्खं दुविहं पराणत्तं । तं जहा - इन्दियपच्चक्खं नोइन्दियपञ्चक्खं च । नन्दि० ३ अनु०१४४.
अवग्रहेहावायधारणाः ॥ १५॥
से किं तं सुनिस्सि ? चउव्विहं पराणत्तं । तं जहा - १ उग्गहे २ ईहा ३ अवाओ ४ धारणा ।
नन्दि० २७
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१६
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
बहुबहुविधक्षिप्रानिःसृतानुक्तध्रुवाणां सेतराणाम् ॥१६॥
छविहा उग्गहमती पराणत्ता। तं जहा-खिप्पमोगिरहइ बहुमोगिरहइ बहुविधमोगिरहइ धुवमोगिरहइ अणिस्लियमोगिरहइ असंदिद्धमोगिएहइ। छविहा ईहामती पराणत्ता । तं जहा-खिप्प. मीहति बहुमीहति जाव असंदिद्धमीहति । छविधा अवायमती पराणत्ता । तं जहा-खिप्पमवेति जाव असंदिद्ध अवेति । छविहा धारणा पराणत्ता । तं जहा-बहुधारेति पोराणं धारेति दुद्धरं धारेति अ. णिस्सियं धारेति असंदिद्धं धारेति ।
स्था० स्थान ६, रसू० ५१० जं बहु बहुविह खिप्पा अणिस्सिय निच्छिय धुवेयर विभिन्ना, पुणरोग्गहादो तो तं छत्तीस त्तिसयभेदं ।
इयि भासयारेण
रहा। छहमाहति जाल तं जहा-सा पणन्ता - अ. मीहातमती पाप छबिहा
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प्रथमोऽध्यायः ।
अर्थस्य ॥१७॥ से किं तं त् ? अत्युग्गहे छविहे परणत्ते । तं जहा- सोइन्दियत्युग्राहे, चक्खिदिय अत्युग्गहे, धारिणदित्युग्गहे जिम्मिदियअत्युग्गहे, फासिंदियत्थुरा, नोइन्द्रियत्थग्गहे ॥ नन्दि ० ३०
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व्यञ्जनस्यावग्रहः ॥ १८ ॥
न चतुरनिन्द्रियाभ्याम् ॥ १६ ॥ सुयनिस्सिए दुविहे पणन्ते । तं जहा - अन्धोगहे व वंजणोवग्गहे चैव ॥
स्था० स्थान २ उद्दे० १ ० ७१
से किं तं वंजरगुग्गहे ? बंजरगुग्गहे चउच्चिहे पण्णत्ते । नं जहा- सोइन्दियवंजरगुग्गहे, घाणिदियपंजरगुग्गहे, जिम्भिदियवंजरगुग्गहे, फासिंदियवंजगुग्गहे से तं वंजरगुग्गहे ॥ नन्दि० २६
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तत्त्वार्थ सूत्र जैनागमसमन्वये
श्रुतं मतिपूर्वंद्व चनेकद्वादशभेदम् ॥ २० मईपुध्वं जेण सुनं न मई
पवित्रा || नन्दि० सू० २४ तं जहा - अंगपवि
IS
सुयनाणे दुविहे परणत्ते । चेव अंगवाहिरे चैव ॥
स्था० स्थान २, उद्दे० १, सू०७१, से किं तं गपविद्धं ? दुवालसविहं पराणत्तं । तं जहा - १ आयारो २ सुयगडे ३ ठाणं ४ समवाओ ५. विवाहपत्ती ६ नायाधम्मकहाओ ७ उवासग दसाओ = अंतगडदसा श्रणुत्त रोववाइस ओ १० परहावागरण । ई ११ विवाग १२ दिन वायो ॥
नन्दि० सू० ४४
भवप्रत्ययो ऽवधिर्देवनारकाणाम् ||२१|
दोरहं भवच्च पराणन्ते । तं जहा- देवाणं के नेरइयाणं चैव ॥
स्था० स्थान २, उ० १ सू० ७१
3
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प्रथमोऽध्यायः।
से कि तं भवपञ्चइग्रं? दुगहं । तं जहा-देवाण य नेग्झ्याण य॥
नन्दि० सू० ७ क्षयोपशमनिमित्तः षड्विकल्पः शेषाणाम् ॥२२॥
से किं तं खाश्रोवसमिअं? खाअोवसमिश्र दुगडं । तंजहा-मणुसाण य पंचिंदियतिरिक्खजोणियाण य । को हेऊ खात्रोवसमिश्र ? खात्रोवसमियं तयावरणिजाणं कम्माणं उदिगणाणं खाणं अणुदिगणाणं उवसमेणं श्रोहिनाणं समुपज्जइ॥ नन्दि० सू० ८ प्रज्ञापनासूत्र-अवधिज्ञानस्याष्टो भेदाःप्रदर्शिताः। यथाश्राणुगामिते अगाणुगामिते, बढमागते दीयमाणए पडिवाई यापडिवाई अवटिए अगवटिए ।
पद ३३ मृ०३१६
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२०
तत्त्वार्थमूत्रजैनागमसमन्वये
दोगह खोवसमिए पराणत्ते । तं जहा-मणुः स्लाणं चेव पंचिंदियतिरिक्वजोणियाणं चेव ।।
स्था० स्थान २ उ० १ ० ७१ छविहे ओहिनाणे पगगत्ते । तं जहा-अणुगामिए, अणाणुगामिते, वढमाणते, हीयमाणते, पडिवाई, अपडिवाई॥
स्था० स्थान २ स ० ५२६ ऋजुविपुलमती मनः पर्ययः॥२३॥
मणपज वणाणे दुविहे पगणन्ते । तं जहा-उज्जुमति चेव विउलमति चेव ।।
स्था० स्थान २ 3० स० विशुद्धयप्रतिपाताभ्यां तद्विशेषः॥२४॥
तं सपासपोच उब्विहं पगणत्त । तं जहा-दव्व खित्तयो कालो भावो तत्थ व्वयोणं उज्जा ईणं अणंते अणंतपपलिए खधे जाणइ पासह
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प्रथमाऽध्यायः
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व विउलमई अमहियतराए विउलतराए विसुद्धतराए वितिमिरतराए जाणइ पासइ खेत्तोरणं उन्जमई अजहन्नेगा अंगलस्स असंखे जइभागं उक्कामेणं अहे जाव ईमीसेरययभाए पढ़वीए उबरिम हेद्विल्ले खुड्ग पयरेउड्ढंजाव जोइसस्स उपरिमतले तिरियं जाव अंतो मणुस्लखिते अड्ढाइजेसु दीवसमुद्देसु परागरस्सकम्मभूमीसु तीसाए अकम्मभूमीसु छप्पराणए अंतरदीवणेमु सगणीणं पंचिंदियाणं पजत्तयाणं मगोगए भावे जाणइ पासइ तंचेव विउलमा अढाइजहिं अंगलेहिं अभहियत विउलतरं विसुद्धतरं वितिमिरतगगं खेत्तं जाणइ पासइ कालोणं उज्जसद जहगोगं पलिअोवमस्स----
असंखिजइ भागं उक्कोसेणंवि पलिग्रोवमस्स असंखिजइ भागं अतीयमरणागय वा कालं जागइ पासइ त चेव विउलमइ अन्भहियतरागं विसुद्धतरागं वितिमिरतरागं जागाइ पासइ भावोगं
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तत्त्वार्थसूत्र जैनागमसमन्वये
उज्जुमइ ते भावे जाणइ पासइ सव्वभावा अतभागं जाणइ पासइ तं चैव विउलम इणं श्रब्भ हियतरागं विउलतरागं विसुद्धतरागं जाणइ पास मणपज्जव राणा रण पण जरण मण परिचिंतित्थ पागडणं माणुसखित्त निबद्धं गणा पच्चइयं चरितवओ सेत मणपञ्जवणाणं ॥
२२
नन्दि० सू०१८.
विशुद्धि क्षेत्रस्वामिविषयेभ्यो ऽवधि -
मनः पर्यययोः ॥ २५॥
भेद विसय संठाणे श्रभितर वाहिरेय देसोही । उहिस्सय खयबुड्ढी पडिवाई चेव पडिवाई | प्रज्ञापना सू० पद ३३ गा० १.
इड्ढीपत्त अपमत्तसंजय सम्मदिद्धि पज्जतग संखेज्जवासाउ कम्मभूमि गब्भवक्कंति
मरणु
स्वाणं मणपजवनाणं समुप्पज्जइ ॥
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प्रथमोऽध्यायः।
मतिश्रुतयोनिबन्धो द्रव्येष्वसर्वपयायेषु ॥२६॥
तत्थ व्वोणं आभिणिवाहियणाणी पाएसेणं सव्वाई दवाइं जागइ न पासइ, खेत्तयोणं आभिणि बोहियगाणी आएमेणं सव्वं खेत जाणइ न पासइ, कालोणं ग्राभिणिवोहियणाणी ग्राएसेणं सव्यकालं जाणइ न पासइ, भावोणं आभिणिवोहियणाणी पाएसेणं सव्वे भावे जाणइ न पासइ ।।
नन्दि ० सू० ३७. से समासो च उवि पराणत्त । त जहादव्यत्रो खित्तो कालो भावो । तत्थ दब्बोणं सुअणाणी उवउत्ते सव्वदव्वाइं जाणइ पासइ, खित्त प्रोणं सुअणाणी उवउत्ते सव्वं खेत्तं जाणइ पासइ कालोणं सुश्रणाणी उवउत्त सव्वं कालं जाणइ
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तत्त्वार्थसूत्रजनागमसमन्वये
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पासइ, भावप्रोणं सुप्रणाणी उवउत्ते सव्वे भावे जाणइ पासइ॥
नन्दि सू० ५८ रूपिष्ववधेः ॥२७॥
श्रोहिदसणं अोहिदंसणिस्स सम्वरूविदव्येसु न पुण सव्वपज्जवसु ।।
अन० स० १४४ तं समासयो चउन्विहं पगणत्त। तं जहा दव्यत्रो खेत्तो कालो भावो। तत्थ दबत्रो अोहि. नाणी जहन्नेणं अणंताई रूविदव्वाइ जाणइ पासइ उक्कोसेणं सवाई रूविदवाई जाणइ पासइ खेत्तओणं अोहिनाणी जहराणेणं अंगलस्स असखिजइ भाग जाणइ पासइ उक्कोसेणं असंखिज्जाइं अलोगलोगपमाणमित्ताई खंडाई जाणइ पासइ कालश्रोणं ओहिनाणी जहरणेणं श्रावलियाए असखि
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प्रथमोऽध्यायः ।
जाइ भागं जाणइ पासइ उक्कोसेणं असंखिजात्रो उसपिणीग्रो प्रोसम्पिगणीश्रो अईयं अणागयं च कालं जाणइ पासइ भावग्रोणं अोहिनाणी जहन्नेणं अगते भावे जाणइ पालइ उक्कोसेगां वि अणंतभावे जाणइ पासइ सयभावाणं अणंतभागं जाणइ पासइ ।। तदनन्तभागे मनः पर्ययस्य ॥२८॥
सधत्थोवा मरणपजवणाणपज्जवा । श्रोहिणाणपजवा अनन्तगुणा, सुयणाणपजवा अनन्तगुणा,
आभिणिवोहियनाणपज वा अनंतगणा, केवलनाणपज्जया अनंतगरणा ॥ भग० श० ८ उ० २ स० ३२३
सर्वद्रव्यपायेषु केवलस्य ॥२६॥
केवलदसणं केवलदंसणिस्स सव्वदब्बेसु अ, सवपज्जवेसु अ॥ अनु० दर्शनगुणप्रमाण ० १ ० १४४
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तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
तं समासो चउम्विहं पराणत्तं । तं जहा-दव्यो खित्तो कालो भावतो, तत्थ दबोणं केवलनाणी सव्व दव्वाइं जाणइ पासइ, खितप्रोणं केवलनाणी सब्वं खित्त जाणइ पासइ, कालोणं केवलनाणी सव्वं कालं जाणइ पासइ, भायोणं केवलनाणी सव्वे भावे जाणइ पासइ । अह सम्वदश्वपरिणामभावविएणत्तिकारणमणंतं । सासयमप्पडि. वाई एगविहं केवलं नाणं ॥
नं० स० २२ एकादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्नाचतुभ्यः ॥३०॥
प्राभिरिणबोहियनाणसाकारो व उत्ताणं भंते ! चत्तारि णाणाई भयणाए ।
व्या० प्र० श० ८ ० २ सू०३२०
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प्रथमोऽध्यायः।
जे णाणी ते अत्थेगतिया दुणाणी अत्थेगतिया तिणाणी अत्थेगतिया चउणाणी अत्थेगतिया एगणाणी । जे दुणाणी ते नियमा प्राभिणिबोहियणाणी सुयणाणी य, जे निणाणी ते श्राभिणिवोहियणाणी सुतणाणी योहिणाणी य, अहवा आभिणिवोहियणाणी सुयणाणी मणपजवणाणी य, जे चउणाणी ते नियमा प्राभिणिवोहियणाणी सुतणाणी अोहिणाणी मणपजवणाणी य, जे एगणाणी ते नियमा केवलणाणी ॥ जीवाभि० प्रतिपत्ति ० १ सू० ४१
मतिश्रुतावधयो विपर्ययश्च ॥३१॥
सदसतोरविशेषाद् यदृच्छोपलब्धेरुन्मत्तवत् ॥३२॥
५ व्याख्याप्रज्ञप्ती (८-२) राजप्रश्नीयसूत्र चापि एतादृश एव पाटः।
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तत्त्वार्थ सूत्र जैनागमसमन्वये
अन्ना गं भंते ! कतिविहे परणते ? गोयमा ! तिविहे पण्णत्ते । तं जहा - मइअन्नाणे सुयन्नाणे विभंगन्नाणे ||
व्याख्याप्रज्ञप्ति श०८ उ० २ ० ३४८ अणाणपरिणामेणं भंते ! कतिविहें पराणते ? गोयमा ! तिविहे पण्णत्ते । तं जहा - मरणाणपरिणामे, सुयश्रणाणपरिणामे, विभंगणाणपरिणामे || प्रज्ञापना पद १३ ज्ञानपरिणामविषय
स्था० स्थान ३ उ० ३ ० २८७
से किं तं मिच्छासुयं ? जं इमं श्ररणापिहि मिच्छादिट्ठिएहिं सच्छंदबुद्धिमर विगपित्र्यं इत्यादि । नन्दि० सू० ४२
विसेसिश्रा मई महनां च मनां
इत्यादि ॥
नन्दि० सू० २५
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प्रथमोऽध्यायः ।
२ह
नैगमसंग्रहव्यवहारर्जु सूत्रशब्दसम - भिरूढैवम्भूताः नयाः ॥३३॥
सत्त मूलण्या परणत्ता । तं जहा- रोगमे, संगहे, चवहारे, उज्जुसूप, सदे, समभिरूडे, एवंभूए ॥
अनु० १३६
स्था० स्थान ७ सू० ५५२ इति श्री जैनमनि- उपाध्याय - श्रीमदात्माराम महाराजसंगृहीतत्वार्थ जैनागमसमन्वय प्रथमोऽध्यायः समातः ।
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द्वितीयोऽध्यायः।
औपशमिकक्षायिको भावौ मिश्रश्च जीवस्य स्वतत्त्वमौदयिकपारिणामिको च ॥१॥
छविहे भावे पण्णत्ते। तं जहा-त्रोदइए उवसमिते खत्तिते खोवसमिते पारिणामिते सन्निवाइर॥
स्था० स्थान ६ सू०५३७ द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रिभेदा यथाक्रमम् ॥२॥
सम्यक्त्वचारित्रे ॥३॥
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द्वितीयोऽध्यायः ।
ज्ञानदर्शनदानलाभभोगोपभोगवी
३१
र्याणि च ॥ ४ ॥
ज्ञानाज्ञानदर्शनलब्धयश्चतुस्त्रित्रिप चभेदाः सम्यक्त्वचारित्रसंयमाऽसंय
माश्च ॥ ५॥
गतिकषायलिङ्गमिथ्यादर्शनाज्ञानासंयतासिद्ध लेश्याश्चतुश्चतुरूये कै कै कै . कषड्भेदाः ॥ ६ ॥ जीवभव्याभव्यत्वानि च ॥७॥
से किं तं उदइए ? दुबिहे पण्णत्ते । तं जहाउद उदय निम्फ । से किं तं उदइए ?
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तत्त्वार्थसूत्र जैनागमसमन्वये
अहं कम्मपयडीणं उदपणं, से तं उदइए । से किं तं उदयनिफन्ने ? दुविहे पण्णत्ते । तं जहा - जीवोदय निष्पन्ने अजीवोदयनिफन्ने श्र। से किं तं जीवोदय निष्कने ? श्रगविहे परागन्ते । तं जहा रइए तिरिक्खजोगिए मगुस्से देवे पुढविकाइए जाव तसकाइए कोहकसाई जाय लोहकसाई इत्थी वेदए पुरिसवेद पुंसगवेद कण्हलेसे जाव सुक्कलेसे मिच्छादिट्ठी अविरण असरणी गाणी श्र हारए छउमत्थे सजोगी संसारत्थे असिद्धे से तं जीवोदयनिफन्ने । से किं तं जीवोदय निफन्ने ?
गविहे पराणत्ते । तं जहा - उरालि वा सरीरं उरालि सरीरपोगपरिणामिश्रं वा दव्यं, वेउच्चि यं वा सरीरं वेडब्वियसरी रपयोगपरिणामिश्रं वादव्यं, एवं श्राहारगं सरीरं तेागं सरीरं कम्मगसरीरं च भाणिश्रव्वं पश्रोगपरिणामिए वर गंधे
३२
"
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________________
द्वितीयोऽध्यायः ।
३३
रसे फासे, से तं अजीवोदयनिष्फराणे । संतं उदयनिष्फराणे, से तं उदइए ।
से किं तं उवसमिए ? दुविहे परागतं, तं जहांउवसमे अउवसमनिप्फराणे अ। से किं तं उवसमे ? मोहणिजस्स कम्मस्स उवसमेणं, से तं उवसमे । से किं तं उवसमनिष्फराणे ? अणेगविहे पगणत्ते, तं जहा--उवसंतकोह जाव उवसंतलोभे उवसंतपेजे उवसंतदोसे उवसंतदंसणमोहणिजे उवसंतमोहणिजे उवसमिया सम्मत्तलद्धी उवसमिश्रा चरित्तलद्धी उवसंतकसायछउमत्थवीयरागे, से तं उवसमनिष्फरणे । से तं उवसमिए।
से किं तं खइए ? दुविह पएणत्ते । तं जहाखइए अखयनिष्फरणे अ। से किं तं खइए ? अटण्हं कम्मपयडीणं खए णं, से तं खइए । से कि तं खयनिष्फरणे ? अणेगविहे पराणत्ते, तं जहाउप्परगणाणदंसणधरे अरहा जिणे केवली खीण
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तत्त्वार्थ सूत्र जैनागमसमन्वये
खीसुणाणावर
आभिणिबोहियणाणावरणे स्त्रीणओहिणाणावरणे खीणमणपज्जवणाणावरसे खीणकेवलरणारणावर अणावर निरावरणे वीणावरणे गाणावर जि कम्मविप्यमुक्के केवलदसी सव्वदसी खीणनिद्दे खीणनिद्दानिदे खीणपयते खीणपयलापयले खीणथी गिद्धी खीणचक्खदंस गावरणे खीणचक्खुदंसणावरणे खीणहिदस गावरणे खीणकेवल सरणावर अणावरणे निरा वरणे खीणावरणे दरिसरणावर णिज कम्मविष्यमुक्के खीणसायावेणिजे खीणअसा यावेणिजे वे निव्वेणे खीणवेणे सुभासुभवेणिजकम्म विष्प मुके; खीणकोहे जाव खीणलोहे खीणपेज्जे खीण दोसे खीणदंसणमोहणिजे खीणचरित्त मोहणिजे अमोहे निम्मोहे खीणमोहे मोहणिजकम्मविष्पमुक्के खीणणेरइउए खीणतिरक्खजोखियाउए खी मगुस्साउए खीणदेवा उए अणाउए निराउए खीणा
३४
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द्वितीयोऽध्यायः।...
उए अाउकम्मविप्परकं, गइजाइसरीरंगोवंगवंधणसंघयण संठाणअणेगवोंदिविंदसंघायविष्पमुके खीणसुभनामे खीणअसुभगामे अणाम निराणामे खीण नामे सुभासुभरणामकम्मविप्पमुकः खीणउच्चागोए खीगणीअागोग अगाए निंग्गोए खीणगोए उच्चरणीयगोत्तकम्मविष्पमुक्केः खीणदाणंतराए खीणलाभंतराए खीणभोगतराए खीणउवभोगंतराए खीराविरियंतराग अणंतगर रिणरंतराए खीणंतराए अंतरायकम्मविप्पमुके; सिद्धे बद्धे मुत्ते परिणिव्वए अंतगडे सव्यदुक्खप्पहीणे, से तं खयनिष्फराणे, से तं खइए।
से किं तं खोवसमिए ? दुविह पराणत्ते, तं जहा-खोवसमिए य खग्रोवसमनिष्फराणे य । से किं तं खोवसम ? चउराहं घाइकम्माणं न प्रोव समेणं, तं जहा-णाणावरणिजस्स दंसणावरणि जस्स मोहणिजस्स अंतरायस्स खोवसमेणं, से
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तत्त्वार्थसूत्रजनागमसमन्वये
तं खोवसमे । से किं तं खोवसमनिष्फरणे ? अणेगविहे पराणत्ते, तं जहा-खोवसमिश्रा प्रा. भिणिबोहिअ-णाणलद्धी जाव खोवसमित्रा मणपजवणाणलद्धी खोवसमिश्रा मइअण्णाणलद्धा खोवसमिश्रा सुअ-अण्णाणलद्धी खोवसमिश्रा विभंगणाणलद्धी खोवसमिश्रा चक्खदंसणलद्धी अचक्खदसणलद्धी अोहिदंसणलद्धी एवं सम्मदसणलद्धी मिच्छादसणलद्धी सम्म मिच्छादसणलद्धी खोवसमिश्रा सामाइअचरित्तलद्धी एवं छेदोवद्वावणलद्धी परिहारविसुद्धिप्रलद्धी सुहमसं. परायचरित्तलद्धीएवं चरित्ताचरित्तलद्धी खोवसमिश्रा दाणलद्धी एवं लाभ० भोग० उवभोगलद्धी खोवसमित्र वीरिअलद्धी एवं पंडिअवीरिअलद्धी बालवीरिअलद्धी बालपंडिअवीरिअलद्धी खोव समिश्रा सोइन्दियलद्धी जाव खोवसमिश्रा फा सिंदियलद्धी खोवसमिए आयारंगधरे एवंस
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द्वितीयोऽध्यायः।
अगडंगधरे ठाणंगधरे समवायंगधरे विवाहपएणत्तिधरे नायाधम्मकहा० उवासगदसा० अंतगडदसा० अनुत्तरोक्वाइअ दसा० पगहावागरणधरे विवागसुअधरे खोवसमिए दिदिवायधरे खोवसमिए णवपुवी खोवसमिए जाव चउद्दसपुव्वी खोवसमिए गणी खोवसमिए वायए, सेतं खोवस. मनिष्फरणे । से तं खीवसमिए।
से किं तं पारिणामिए ? दुविहे पराणत्ते. तं जहा-साइपारिणामिए अ अणाइपारिणामिए । से किं तं साइपारिणामिए ? अणेगविहे पराणत्ते, तं जहाजुएणसुरा जुराणगुलो जुगणघयं जुगणतंदुला चेव । अभा य अब्भर कवा संझा गंधव्वणगरा य ॥२४॥
उक्कावाया दिसादाहा गजियं विज्ञणिग्घाया जूवया जक्खादित्ता धुमित्रा महिया रयुग्घाया चंदोव रागा सूरोवरागाचंदपरिवेसा सूरपरिवेसा पडिचंदा
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३८
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
पडिसूरा इन्दधण उदगमच्छाकविहसिया अमोहा वासा वासधरा गामा गगरा घरा पव्यता पायाला भवणा निरया रयणप्पहा सकरप्पहा वालुअप्पहा पंकप्पहा धूमप्पहा तमप्पहा तमतमप्पहा सोहम्मे जाव अच्चए गेजे अगुत्तरे ईसिप्पभाए परमाणुपोग्गले दुपएसिण जाव अणंतपएसिए, से तं साइपरिणामिए । से किं तं अणाइपरिणामिए ? धम्मत्थिकाए अधम्मस्थिकाए अागासत्थिकाए जीवत्थिकाए पुग्गलस्थिकाए अद्धासप्रण लो: अलोप भवसिद्धि या अभवसिद्धिया, से तं अणाइपरिणामिए । से तं परिणामिए।
अनु० पटभाषाधिकार उपयोगो लक्षणम् ॥८॥ ... उवोगलक्खणे जीवे ।
भ० स० श० २ उ० १०
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द्वितीयोऽध्यायः ।
जीवो वोगलक्खणो ।
३.६
उत्त० सू० ग्र० २८ गा० १०
सद्विविधो ऽष्टचतुर्भेदः ॥६॥
कतिचि णं भंते ! उवओगे पराणत्ते ? गोयमा ! दुविहे उद्योगे पगणत्ते, तं जहा - सागारोवोगे, अणागारोवोगे य ॥ १ ॥ सागारोवोगे भंते! कतिविहे पण्णत्ते ? गोयमा ! विहे पण्णत्ते ।
अणगारोवोगे गं भंते ! गोयमा ! उन्हे परागते ।
प्रजा० सू० पद २६ कतिविहे परणते ?
प्रजा० सू० पद २६
संसारिणो मुक्ताश्च ॥ १० ॥ दुविहा सव्वजीवा पगुणत्ता, तं जहा- सिद्धा
चैव सिद्धा चेव ।
स्था० स्थान २ ० १ सू० १०१
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४०
तत्त्वार्थ सूत्रजैनागमसमन्वये
संसारसमावन्नगा चेव श्रसंसारसमावन्नगा
स्था० स्थान २ ० १ सू० ५७
त्रेव ॥
समनस्काSमनस्काः ॥ ११॥ दुविहा नेरइया पण्णत्ता, तं जहा सन्नी देव सन्नी चेव, एवं पंचेंदिया सव्वे विगलिंदियवजा जाव वाणभंतरा वेमाणिया ।
स्था० स्थान २ उ० १ सू० ७६
संसारिणस्त्र सस्थावराः ॥ १२ ॥ संसारसमान्नगा तसे चेव थावरा चेव ।
स्था० स्थान २ उ० १ सू० ५७
पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतयः स्थाव
राः ॥१३॥
पंचथावरा काया पण्णत्ता, तं जहा - इंदे
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द्वितीयोऽध्यायः।
थावरकाए (पुढवीथावरकाए ) बंभेथावरकाए (आऊथावरकाए ) सिप्पे थावरकाए (तेऊथावर काए) संमती थावरकाए (वाऊथावरकाए) पजावञ्चथावरकाप (वरणस्सइथावरकाए)।
स्था० स्थान ५ उ० १ स० ३६४ द्वीन्द्रियादयस्त्रसाः ॥१४॥
मे किं तं अोराला तसा पाणा ? चउविहा पराणत्ता, तं जहा-बेइंदिया तेइंदिया चउरिदिया पंचेंदिया
जीवा० प्रतिपत्ति ० १ ० २७ पञ्चेन्द्रियाणि ॥१५॥
कति णं भंते ! इंदिया पराणत्ता ? गोयमा ! पंचेंदिया पएणत्ता।
प्रज्ञा० सू० १५ इन्द्रियपद० उ० १ सू० १६१
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४२
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
द्विविधानि ॥१६॥
कइविहाणं भंते ! इन्दिया पराणत्ता ? गोयमा! दुविहा पराणत्ता, तं जहा-दव्विंदिया य भाविदिया य ।
प्रज्ञा पद १५ उ० १ निर्वृत्युपकरणे द्रव्येन्द्रियम् ॥१७॥
कएविहे णं भंते ! इंदियउवचए पाणते ? गोयमा ! पचविहे इन्दियउवचए पराणत्ते । ___कइविहे णं भंते ! इन्दियणिवत्तणा पराणत्ता ? गोयमा ! पंचविहा इन्दियणिवत्तणा पगणत्ता ।
प्रज्ञा० उ०२ पद १५ लब्ध्युपयोगौ भावेन्द्रियम् ॥१८॥
कतिविहा णं भंते ! इन्दियलद्धी पराणता ? गोयमा ! पंचविहा इन्दियलद्धी पराणत्ता।
प्रज्ञा० उ० २ इन्द्रियपद० १५
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द्वितीयोऽध्यायः ।
कतिविहा णं भंते ! इन्दिय उवउगद्धा पराणत्ता ? गोयमा ! पंचविहा इन्दियउवउगद्धा पराणत्ता।
प्रज्ञा० उ० २ इन्द्रियपद० १५ स्पर्शनरसनघ्राणचक्षुःश्रोत्राणि ॥१६॥ स्पर्शरसगन्धवर्णशब्दास्तदर्थाः ॥२०॥ ___ सोइन्दिए चक्खिदिए घाणिदिए जिभिदिए फासिदिए।
प्रज्ञा इन्द्रियपद १५ ___पंच इन्दियत्था पराणत्ता, तं जहा-सोइन्दियत्थे जाव फासिंदियत्थे ।
_ स्था० स्थान ५ उ० ३ सू० ४४३ श्रुतमनिन्द्रियस्य ॥२१॥ सुणेइत्ति सुझं।
नन्दि सू० २४ वनस्पत्यन्तानामेकम् ॥२२॥ से किं तं एगिदियसंसारसमावन्नजीवपरण
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तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
वणा ? एगिदियसंसारसमावरणजीवपण्णवरणा पंचविहा पराणत्ता, तं जहा-पुढवीकाइया श्राउकाइया तेउकाइया वाउकाइया वणस्सइकाइया ।
प्रज्ञा प्रथम पद कृमिपिपीलिकाभ्रमरमनुष्यादीनामेकैकवृद्धानि ॥२३॥ किमिया-पिपीलिया-भमरा-मणुस्स इत्यादि ।
प्रज्ञा० प्रथम पद संज्ञिनः समनस्काः ॥२४॥
जस्ल णं अत्थि ईहा अवोहो मग्गणा गवेसगा चिंता वीमंसा से णं सरणीति लब्भइ । जस्स णं नत्थि ईहा अवोहो मग्गणा गवेसगा चिंता वीमंसा से णं प्रसन्नीति लब्भइ ।
नन्दिसू० ४०
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द्वितीयोऽध्यायः।
विग्रहगतौ कर्मयोगः ॥२५॥ कम्मासरीरकायप्पनोगे। प्रज्ञा० पद १६ अनुश्रेणिः गतिः ॥२६॥
परमाणुपोग्गलाणं भंते ! कि अणुसेढी गती पवत्तति विसेढिंगती पवत्तति ? गोयमा ! अणुसेढी गती पवत्तति नो विसेदि गती पवत्तति ? दुपएसियाणं भंते ! खंधाणं अणुसेढी गती पवत्तति विसेढी गती पवत्तति एवं चेव, एवं जाव अणंतपएसियाणं खंधाणं । नेरइयाणं भंते ! किं अणुसेढी गती पवत्तति एवं विसेढी गती पवत्तति एवं चेव, एवं जाव वेमाणियाणं ।
व्याख्याप्रज्ञप्ति शतक २५ उ० ३ सू० ७३० अविग्रहा जीवस्य ॥२७॥ उज्जसेढीपडिवन्ने अफुसमाणगई उडं एक
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૪૯
तत्त्वार्थसूत्र जैनागमसमन्वये
समएणं श्रविग्गहेणं गंता सागारोवउत्ते सिज्झि पपातिक सू० सिद्धाधिकार सू० ४३
हिइ |
विग्रहवती च संसारिणः प्राकू
चतुर्भ्यः ॥ २८ ॥
रइयाणं उक्कोसेणं तिसमतीतेणं विग्गहे उववजंति एगिंदिवज्जं जाव वेमाणियाणं ।
स्था० स्थान ३ उ० ४ सू० २२५
कइसमइराणं विग्गहेणं उववजंति ? गोयमा ! एगसमइएण वा दिसमइएण वा तिसमइएण वा चउसमइएण वा विग्गहें उववज्जन्ति ।
व्याख्याप्रज्ञप्ति श० ३४ उ० १ सू०८५१
एकसमया ऽविग्रहा ॥२६॥
एगसमइयो विग्गहो नत्थि ।
व्याख्याप्रज्ञप्ति श० ३४ सू० ८५१
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द्वितीयोऽध्यायः।
४७
एक द्वौ त्रीन्वाऽनाहारकः ॥३०॥
जीवे णं भंते ! के समयमणाहारए भवइ ? गोयमा ! पढमे समए सिय आहारए सिय अणाहारए वितए समए सिय आहारए सिय अणाहारए ततिए समए सिय आहारए सिय प्रणाहारएचउत्थे समए नियमा आहारए एवंदंडो, जीवा य एगिदियाय चउत्थे समए सेसा ततिए समए ।
व्याख्याप्रज्ञति श० ७ उ० १ सू० २६० सम्मूच्छेनगर्भोपपादाज्जन्म ॥३१॥
से बेमि संति मे तसापाणा। तं जहा-अंडया पोयया जराउया रसया संसेयया संमुच्छिमा उब्भिया उववाइया एस संसारेत्ति पवच्चई।
याचगरांग सू० अ० १ उ०६ सू० ४८ गम्भवकन्तिया........
उत्तराध्ययन ३६ गाथा ११७
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तत्वार्थ सूत्र जैनागमसमन्वये
अंडया पोयया जराउया.... समुच्छिमा.... उवदशवै ० ० ० ४ त्रसाधिकार
वाइया ।
४८
सचित्तशीत संवृताः सेतरा मिश्रा - श्चैकशस्तद्योनयः ॥३२॥
कइविहा गं भंते ! जोणी पण्णत्ता ? गोयमा ! तिविहा जोणी पणत्ता, तं जहा-सीया जोणी उसिगा जोगी सीओ सिणा जोगी । तिविहा जोणी पण्णत्ता, तं जहा - सचित्ता जोणी, श्रचित्ता जोणी, मीसिया जोगी । तिविहा जोणी पण्णत्ता, तं जहा - संवुडा जोणी, वियडा जोणी, संवुडवियडा जोगी ।
प्रज्ञापना योनिपद
जरायुजाण्डजपोतानां गर्भः ॥ ३३ ॥
अंडया पोयया जराउया । दशवैकालिक प्र० ४ गब्भवक्कंतियाय | प्रज्ञापना १ पद
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द्वितीयोऽध्यायः ।
देवनारकारणामुपपादः ॥ ३४ ॥ दो वा पणते देवागं चेव नेरयाखं
चेव ।
स्था० स्थान २३० ३ ० ८५
शेषाणां सम्मूर्च्छनम् ॥३५॥
संमुच्छिमाय
४६
......
प्रजापना पद
सूत्रकृतांग श्रुत० २ ० ३
औदारिकवैक्रियिकाऽऽहारकतैजसकार्मणानि शरीराणि ॥ ३६ ॥
कति णं भंते ! सरीग्या पराणत्ता ? गोयमा ! पंच सरीरा परणत्ता, तं जहा - ओरालिने, वेडव्विए, श्राहारण, तेयए कम्मए ।
प्रजापना शरीरपद २१
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तत्त्वार्थसूत्रजैनागम समन्वये
परं परं सूक्ष्मम् ॥३७॥ प्रदेशतोऽसंख्येयगुणं प्राक्तैजसात् ॥ ३८ ॥ अनन्तगुणे परे ॥ ३६॥
सव्वत्थोवा आहारगसरीरा दव्वट्टयाए वेउब्वियसरीरा वट्टयाए श्रसंखेजगुणा ओरालिय सरीरा दग्वट्टयाए श्रसंखे जगुणा तेया कम्मगसरीरा दोवि तुल्ला दव्वट्टयाए श्रणंतगुणा, पदेसट्ठाए सव्वत्थोवा आहारगसरीरा पदेलद्वाए वेडव्वियसरीरा पदेस. द्वार असंखेजगुणा श्रोरा लियसरीरा पदेसद्वार असंखे जगुणा तेयगसरीरा पदेसद्वाए श्रणंतगुणा कम्मगसरीरा पदेसद्वार प्रणतगुणा इत्यादि । प्रज्ञापना शरीर पद २१
પૂ
प्रतीघाते ॥४०॥
पहिय गई ।
राजप्रश्नीयसूत्र, सू०६६
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द्वितीयोऽध्यायः ।
अनादिसम्बन्धे च ॥४१॥ सर्वस्य ॥४२॥
तेयासरीरप्पयोगबंधे णं भन्ते ! कालो केविविरं होई ? गोयमा ! दुविहे पण्णत्ते, तं जहाअणाइए वा अपज्जवसिए श्रणाइए वा सपजवसिए । व्याख्याप्रज्ञप्ति श० ८ ३०६ सू० ३५० कम्मासरीरप्पयोगबंधे... अणाइव सपज्जवसिए प्रणाइए यज्ञवसिर वा एवं जहा तेयगस्स । व्याख्याप्रज्ञप्ति श०८ उ० ६ मू० ३५१ तेयगसरीरी दुविहे - श्रणादीए वा अपजवलिए प्रणादीर वा पजवसिए एवं कम्मसरीरी विइत्यादि ।
५१
जीवाभिगमसूत्र-सर्वजीवाभिगम प्रतिपत्ति ६ ०४ सू० २६४
तदादीनि भाज्यानि युगपदेकस्या
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પુર
तत्त्वार्थ सूत्र जैनागम समन्वये
ऽऽचतुर्भ्यः ॥४३॥
जस्स गं भंते ! ओरालिय सरीरं ? गोयमा ! जस्स ओरालिय सरीरं तस्स वेउब्वियसरीरं सिय श्रत्थि सिय सत्थि, जस्स वेडव्वियसरीरं तस्त श्रोरालियसरीरं सिय श्रत्थि सिय गत्थि । जस्स णं भंते ! ओरालियसरीरं तस्स श्राहारगसरीरं जस्स आहारगसरीरं तस्स ओरालियसरीरं ! गोयमा ! जस्स ओरालियसरीरं तस्स आहारग सरीरं सिय श्रत्थि सिय सत्थि, जस्स आहारग सरीरं तस्स ओरालियसरीरं शियमा अत्थि । जस्स गं भंते ! ओरालि यसरीरं तस्स तेयगसरीरं, जस्स तेयगसरीरं तस्स श्रोरालिय सरीरं ? गोयमा ! जस्स श्ररालियसरीरं तस्स तेयगसरीरं शियमा श्रत्थि जस्ल पुरा तेयगसरीरं तस्स श्रोरालिय सरीरं सिय श्रत्थि सिय रात्थि । एवं कम्मरी
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द्वितीयोऽध्यायः।
५३
वि । जस्स णं भंते ! वेउव्वियसरीरं तस्स श्राहारंगसरीरं, जस्स आहारगसरीरं तस्स वेउब्वियसरीरं ? गोयमा ! जस्त वेउब्वियसरीरं तस्ल पाहारगसरीरं रात्थि. जस्स पुण आहारगसरीरं तस्स वेउब्वियसरीरं णस्थि । नेयाकम्माइं जहा ओरालिएणं सम्मं तहेव. आहारगसरीरेण वि सम्मं तेयाकम्माइं नहेव उच्चारियव्वा । जस्स णं भंते ! तयगसीरं तस्स कम्मगसरीरं जस्स कम्मगसरीरं तस्म तेयगसरीरं ? गोयमा ! जस्स तेयगसरीरं तम्स कम्मगसरीरं णियमा अस्थि, जस्स वि कम्मगसरीरं तम्म वि तेयगसरीरं णियमा अन्थि ।
प्रज्ञा०प० २१ निरुपभोगमन्त्यम् ॥४४॥ विग्गहगइसमावन्नगाणं नेरइयाण दोसरीरा
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५४
तत्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
पएणत्ता; तं जहा-तेयए चेव कम्मए चेव । निरंतर जाव वेमाणियाणं ।
स्था० स्थान उद्दे० १ सू० ७६ जीवे णं भंते ! गम्भं वक्कममाणे किं ससरीरी वकमइ, असरीरी वक्कमइ ? गोयमा ! सिय ससरीरी वक्कमइ सिय असरीरी वक्कमइ । सेकेणदेणं ? गोयमा ! ओरालियवेउब्विय-श्राहारयाई पडुच्च असरीरी वक्कमइ। तेयाकम्माई पडच्च ससरीरी वक्कमइ।
भगवती० श० १ उद्दे० ७ गभेसम्मूच्छेनजमाद्यम्॥४५॥
उरालिअसरीरे णं भंते ! कतिविहे पराणते ? गोयमा ! दुविहे पराणत्ते, तं जहा-समुच्छिम...... ....गब्भवतिय ।
प्रज्ञा० पद २५ औपपादिकं वैक्रियिकम् ॥४६॥ णेरइयाणं दो सरीरगा पएणत्ता, तं जहा
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.... द्वितीयोऽध्यायः। .
अभंतरगे चेव बाहिरगे चेव, अब्भंतरए कम्मए बाहिरए वेउविए, एवं देवाणं ।
स्था० स्थान २, उद्दे० १ सू० ७५ लब्धिप्रत्ययश्च ॥४७॥ वेउब्धियलद्धीए।
औप० सू० ४० तैजसमपि ॥४८॥
तिहिं ठाणेहिं समणे निग्गंथे संखित्तविउलतेउलेस्से भवति, तं जहा-पायावणताते १ खंति खमाते २ अपाणगेणं तवो कम्मेणं ३।।
स्था० स्थान ३ उद्दे० ३ सू० १८२ शुभं विशुद्धमव्याघाति चाहारकं प्रमत्तसंयतस्यैव ॥४६॥
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५६
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
-
areena.
.
.
.
.
..
श्राहारगसरीरे णं भंते ! कतिविहे पराणत्ते ? गोयमा ! एगागारे पण्णत्ते....."पमत्तसंजय समदिद्वि...... समचउरस मंठाण संटिए पराणत्ते।
प्रज्ञा पद २१ म० २७३ नारकसम्मछिनो नपुंसकानि॥५०॥
तिविहा नपुंसगा पण्णत्ता, तं जहा-णेरतियनसगा तिरिक्खजोणियनपुंसगा मणुस्तनपुंसगा।
स्था० स्थान ३ उद्दे० १ सू० १३१ न देवाः ॥५१॥ शेषास्त्रिवेदाः ॥५२॥
कइविहे एं भंते ! वेए पगणत्ते ? गोयमा : तिविहे वेए पएणत्ते, तं जहा-इत्थीवेए पुरिसवेए नपंसकवेए । नेरइयाण भंते ! किं इत्थीवेया पुरि
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द्वितीयोऽध्यायः।
सवेया णपंसगवेया पराणत्ता ? गोयमा ! णो इत्थी वेया णो पंवेए णपंसगवेया पराणत्ता । असुरकुमारा एं भंते ! किं इत्थीवेया पुरिसवेया णपुंसगवेया ? गोयमा ! इत्थीवेया पुरिसवेया जाव णो णपुंसगवेया थणियकुमारा । पुढवी आऊ तेऊ वाऊ वणस्सई वितिचरिंदियसमुच्छिमपंचिंदियतिरिक्खसंमुच्छिममगुस्सा णपंसगवेया । गम्भवतियमणुस्सा पंचिंदियतिरिया य तिवेया। जहा असुरकुमारा तहा वाणमंतरा जोइसियवेमाणियावि ।
सम० सू० १५६ औपपादिकचरमोत्तमदेहाऽसंख्येयवर्षायुषोऽनपवायुषः ॥५३॥ दोहाउयं पालति देवाणं चेव णेरइयाणं चेव ।
स्था० स्थानर उ० ३ सू० ८५
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५.
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये ...
देवा नेरइयावि य असंखवासाउया य तिरमणुत्रा। उत्तमपुरिसा य तहा चरमसरीरा य निरुवकम्मा ॥
इति ठाणांगवित्तीए इति जैनमुनि-उपाध्याय-श्रीमदात्माराम-महाराज
संगृहीते तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः।
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तृतीयोऽध्यायः
रत्नशर्कराबालुकापंक घूमतमोमहातमः प्रभाभूमयो प्रतिष्ठाः सप्ताधोऽधः ॥ १ ॥
घनाम्बुवताकाश
कहि गंभते ! नेरइया परिवसंति ? गोयमा ! साणे णं सत्तसु पुढविसु तं जहा - रय राज्यभाए, सक्करप्पभाए, बालुयप्पभाए, पंकप्पभाए, धूमप्प भाए, तमप्पभाए, तमतमप्पभाए ।
प्रज्ञा० नरका० पद २
अस्थि
भंते ! इमीसे रयणपभाए पुढवीए, हे घणोदधीति वा घणवातेति वा तणुवातेति
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६०
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
वा अोवासंतरेति वा । हंता अस्थि एवं जाव अहे सत्तमाए।
जीवाभि० प्रतिप०२ सू०७०-७१ तासु त्रिंशत्पञ्चविंशतिपञ्चदशदशत्रिपञ्चोनैकनरकशतसहस्राणि पंच चैव यथाक्रमम् ॥२॥
तीसा य पन्नवीसा पराणरस दसेव तिरिण य हवंति । पंचणसहसहस्सं पंचेव अणुत्तरा परगा।
जीवा प्रति० ३ सू० ६६ प्रज्ञा० पद० २ नरकाधिकार
व्या० प्र० श० १ उ० ५ सू० ४३ नारकाः नित्याऽशुभतरलेश्यापरिणामदेहवेदनाविक्रियाः ॥३॥
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ततीयोऽध्यायः ।
परस्परोदीरितदुःखाः ॥४॥
६१
रणमराणस्म कार्य अभिहणमाणा
वेयणं उदीरेति इत्यादि ।
N
जीवाभिगम प्रति ३ उ० २ ० ८६. इमेहिं विविहेहि आउहेहि किं ते मोग्गरभुसंढिकरकय सत्तिहलगय मुसल चक्क कुन्त तोमर मूल लउड भिडिमालि सञ्चल पट्टिस चम्मिटु दुहरा मुट्ठिय असिवेडग वग्ग नाव नाराय कण्गकपिणि वासि परसु टंक तिक्व निम्मल अरोह एवमादिहिं सुमेहिं उच्च एहि पहरणमत्तेहि श्रणुबन्धतिब्ववेरा परोपरं वेय उदीरन्ति ।
प्रश्न ० ० १ नरकाधिकार ते गंगरगा तोट्ठा वाहिं चउरंसा हे खरपसंठारणा संठिया पिच्चंधयारतमसा ववगयगहचंदसूर णक्खत्तजोइसप्पहा. मेदवसापूयपडलरु
-
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६२
तत्त्वार्थमूत्रजैनागमसमन्वये
हिरमंसविक्खललित्ताणुलेवणतला, असुईबीसा परमादुन्भिगंधा काऊग्गणिवण्णाभा कक्खडफासा दुरहियासा असुभा गरगा असुभानो णरगेसु वप्रणाअो इत्यादि । प्रज्ञा० पद २ नरकाधिकार
नेरइयाणं तो लेसानो पएणत्ता, तं जहाकराहलेस्सा नीललेस्सा काऊलेस्सा ।
स्था० स्थान ३ उ० १ सूत्र १३२ अतिसीतं, अतिउपह, अतितराहा, अतिखहा, अतिभयं वा, णिरएणेरइयाणं दुक्खसयाई अविस्सामं।
जीवा० प्रतिपत्ति ३ उ० १ सू० १३२ संक्लिष्टाऽसुरोदीरितदुःखाश्च प्राक्चतुभ्यः ॥५॥
प्रश्न-किं पत्तियं णं भंते ! असुरकुमारा देवा तच्चं पुढवं गया य गमिस्संति य ?
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नतीयोऽध्यायः।
उत्तर-गोयमा ! पुबवेरियस्स वा वेदणउदीरणयाए, पवसंगइस्स वा वेदणउवसामणयाए, एवं खलु असुरकुमारा देवा तन्वं पढधि गया य, गमिस्संति य ।
व्याख्या० श. ३ उ० २ सू० १४२ तेवेकत्रिसप्तदशसप्तदशद्वाविंशतित्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा सत्वानां परा स्थितिः ॥६॥
सागरोवममेगं तु, उक्कोसेण वियाहिया । पढमाए जहन्नेणं, दसवाससहस्तिया ॥ १६० ॥ तिरणेव सागरा ऊ, उक्कोसेण वियाहिया।
दोच्चाए जहन्नेणं, एगं तु सागरोवमं ॥ १६१ ॥ सत्तेव सागरा ऊ, उकोसेण वियाहिया । तइयाए जहन्नेणं, तिराणेव सागरोवमा ॥ १६२ ॥
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છ
तत्त्वार्थमूत्रजैनागमसमन्वये
इस सागरोवमा ऊ, उक्कोसेण वियाहिया । उत्थीए जहन्नेां, सत्तव सागरोवमा ॥ १६३ ॥ सत्तरस सागरा ऊ, उक्कोसेण वियाहिया । पंचमाए जहन्नेणं, दस चेव सागरोवमा ॥१६४॥ बावीस सागरा ऊ. उक्कोसेण वियाहिया । छुट्टीए जहनेणं, सत्तरस सागरोवमा ॥१६५॥ तेत्तीस सागरा ऊ. उक्कोसेण वियाहिया । सत्तमाए जहनेणं. बावीसं सागरोवमा ॥१६६॥ उत्तरा ० ० ३६
जम्बूद्वीपलवणोदादयः शुभनामानो द्वीप समुद्राः ॥७॥
श्रसंखेजा जंबुद्दीवा नामधेजेहिं पण्णत्ता, केवतिया णं भंते ! लवण समुद्दा पण्णत्ता ? गोयमा ! श्रसंखेजा लवणसमुद्दा नामधे जेहिं पराणत्ता, एवं धायतिसंडावि, एवं जाव असंखेजा मूरदीवा नामधे
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तृतीयोऽध्यायः ।
जेहि य । एगे देवे दीवे पराणत्ते, एगे देवोदे समुद्दे परणत्ते, एवं णागे जक्खे भते जाव एगे सयंभूरमणे दीवे एगे सयंभरमण समुद्दे णामधेजणं पण्णत्ते ।
जीवा० प्रति० ३ उ० २ सू० १८६ द्वीप० जावतिया लोगे सुभा णामा सुभा वरणा जाव सुभा फासा एवतिया दीव समुद्दा णामधेजेहिं परागत्ता।
जीवा प्रति० ३ उ० २ सू० १८६ द्विढिविष्कम्भाः पूर्वपूर्वपरिक्षेपिणो वलयाकृतयः॥८॥
जंबद्दीवं णाम दीवं लवणे णामं समुद्दे वट्टे वलयागारसंठाणसंठिते सव्वतो समंता संपरिक्खत्ता णं चिट्ठति । जीवा० प्रति० ३ उ० २ सू० १५४ ___ जंबुद्दीवाइया दीवा लवणादिया समुद्दा संठाणतो एकविहविधाणा वित्थारतो अणेगविधविधाणा
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६६
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
दुगुणादुगुणे पडुप्पाएमाणा पवित्थरमाणा अोभास. माणवीचीया। जीवा० प्रति० ३ उ० २ सू० १२३
तन्मध्ये मेरुनाभिवृत्तो योजनशतसहस्रविष्कम्भो जम्बूद्वीपः ॥६॥
जंबुद्दीवे सव्वद्दीवसमुदाणं सव्वब्भंतराए सव्वखड्डाए वट्टे... - 'एगं जोयणसयसहस्तं श्रआयामविक्खंभेणं इत्यादि।
जम्बू० सू० ३ जंबद्दीवस्त बहुमझदेसभाए एत्थणं जम्बुद्दीवे मन्दरे णाम्मं पचए पराणत्ते । णवणउतिजोअणसहस्लाई उद्धं उच्चतेणं एगं जोअणसहस्सं उव्वेहेणं ।
जम्बू, सू० १०३ भरतहैमवतहरिविदेहरम्यकहरण्यवतैरावतवर्षाः क्षेत्राणि ॥१०॥ जम्बुद्दीवे सत्त वासा परणत्ता, तं जहा-भरहे
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तृतीयोऽध्यायः
एरवते हेमवते हेरन्नवते हरिवासे रम्मगवासे महा
विदेहे |
६७
स्था० स्थान ७ सू० ५५५
तद्विभाजिनः पूर्वापरायता हिमवन्महाहिमवन्निषधनील रुक्मिशिखरि - यो वर्षधर पर्वताः ॥ ११॥
विभयमाणे ।
जम्बूद्वीप ० सू० १५
जम्बूद्वीप ० सू० ७२
पाईण पडणायण । जम्बुद्दीवे छ वासहरपव्वता पराणत्ता, तं जहाचुल्लहिमवंते महाहिमवंते निसढे नीलवंते रुप्पि सिहरी ।
स्था० स्थान ६ सू० ५२४
हेमार्जुन तपनीय वैडूर्यरजतहेममयाः
॥१२॥
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६८
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
मणिविचित्रपार्खा उपरि मूले च तुल्यविस्ताराः॥१३॥
चुल्लहिमवंते जंबुद्दीवे........सव्वकणगामए अच्छे सण्हे तहेव जाव पडिरूवे । इत्यादि ।
जम्बू० वक्षस्कार ४ सू० ७२ महाहिमवंते णामं......सव्वरयणामए ।
जम्बू ० सू० ७६ निसहे णाम........सव्वतवणिजमए ।
जम्बू० सू० ८३ णीलवंते णाम.......सव्ववेरूलिग्रामए ।
जम्बू० सू० ११० रूप्पिणाम.......सव्वरूप्पामए।
जम्पू० सू० १११ सिहरी णाम........सब्बरयणामए ।
जम्बू० सू० १११
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ततीयोऽध्यायः। .
६६
बहुसमतुल्ला अविसेसमणाणत्ता अन्नमन्नं णातिवटुंति अायामविक्खंभउब्वेहसंठाणपरिणाहेणं ।
स्था० स्थान २ उ० ३ सू० ८७ उभो पासिं दोहिं पउमवरवेइब्राहिं दोहि श्र वणसंडेहिं संपरिक्खित्ते। जम्बू० प्र० सू० ७२
पद्ममहापद्मतिगिंछकेसरीमहापुण्डरीकपुण्डरीकाहदास्तेषामुपरि ॥१४॥ जंबुद्दीवे छ महद्दहा पराणत्ता, तं जहा-पउमदहे महापउमद्दहे तिगिच्छद्दहे केसरीद्दहे पोंडरीयदृहे महापोंडरीयद्दहे। स्था० स्थान० ६ सू० ५२४
प्रथमो योजनसहस्रायामस्तदर्द्धविकम्भो हृदः ॥१५॥ दशयोजनावगाहः ॥१६॥
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७०
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
तस्स णं वहुसमरमणिजस्स भूमिभागस्स बहुमझदेसभाए इत्थ णं इके महे पउमद्दहे णामं दहे पण्णत्ते पाईणपडिणायए उदीणदाहिणविच्छिराणे इक्कं जोयणसहस्सं आयामेणं पंच जोअण. सयाई विक्खंभेणं दस जोअनाई उध्वेहेणं अच्छे ।
जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति पद्महदाधिकार तन्मध्ये योजनं पुष्करम् ॥१७॥
तस्स पउमद्दहस्स बहुमझदेसभाए एत्थ महं एगे पउमे परणत्ते, जोअणं आयामविक्खंभेणं श्रद्धजोत्रणं वाहल्लेणं दसजोप्रणाइं उब्बेहेणं दोकोसे ऊसिए जलंताओ साइरेगाई दसजोषणाई सम्वग्गेणं पराणत्ता । जम्बू० पद्महृदाधिकार सू० ७३
तद्विगुणद्विगुणाहदाः पुष्कराणि च ॥१८॥
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ततीयोऽध्यायः ।
महाहिमवंतर बहुमज्भदेसभाए एत्थ गं एगे महापउमद्दहे णामं दहे पण्णत्तेः दोजोण सहस्साइं श्रायामेणं एगं जोश्रणसहस्सं विक्खंभेणं दस जोणाई उब्वेहेणं अच्छे रययामयकूले एवं श्रायामचिक्वंभविहरणा जा चेव पउमद्दहस्स वत्तच्वया सा चैव श्रव्वा, परमप्पमाणं दो जोगाई अट्ठो जाव महापउमद्दहवण्णाभाई हिरी श्र इत्थ देबी जाव पविमद्विइया परिवसइ ।
७१
जम्बू० ० महा० सू० ८० तिगिछिद्दहे गामं दहे परणत्ते चत्तारि जोकणसहस्साइं श्रायामेणं दोजोणसहस्साई विक्खंभेणं दस जो रणरणाई उब्वेहेणं धिई अ इत्थ देवी पलिवमट्टिया परिवस |
.......
जम्बू० सू० ८३ से ११०. पदाधिकार
तन्निवासिन्यो देव्यः श्रीहीधृति
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७२
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
कीर्तिबुद्धिलक्ष्म्यः पल्योपमस्थितयः ससामानिकपरिषत्काः ॥१६॥ । तत्थ णं छ देवयानो महड्ढियायो जाव पलिअोवमद्वितीतातो परिवसंति । तं जहा-सिरि हिरि धिति कित्ति बुद्धि लच्छी। ...
__स्थानांग स्थान ६ सू० ५२४ __ गंगासिन्धुरोहिद्रोहितास्याहरिद्धरिकांतासीतासीतोदानारीनरकान्तासुवर्णरूप्यकूलारक्तारक्तोदाः सरितस्तन्मध्यगाः ॥२०॥ द्वयोर्द्वयोः पूर्वाः पर्वगाः ॥२१॥ शेषास्त्वपरगाः ॥२२॥
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ततीयोऽध्यायः ।
७३
जंबुद्दीवे सत्त महानदी ओ पुरत्थाभिमुही श्रो लवणसमुदं समुप्पैति तं जहा- गंगा रोहिता हिरी सीता परकंता सुवरणकूला रत्ता । जंबुद्दीवे सत्त महानदी पच्चत्थाभिमुहीश्रो लवणसमुदं सतुपति, तं जहा- सिंधू रोहितंसा हरिकंता सीतोदश गारीकंता रूप्पकला रत्तवती ।
स्थानांग स्थान ७ सू० ५५५
चतुर्दशनदीसहस्रपरिवृता गंगासिन्ध्वादयो नद्यः ॥ २३ ॥
जंबुद्दीवे भरहेंरवरसु वासेसु कइ महाराईओ पराणत्ता । गोमा ! चत्तारि महाराई पराणताओ, तं जहा- गंगा सिंधु रत्ता रत्तवई । तत्थ गं एगमेगा महाराई चउद्दसहिं सलिलास हस्सेहिं समग्गा पुरत्थिमपच्चत्थिमे गं लवणसमुद्द समुप्पेइ । जम्बू ० प्र० वक्षस्कार ६ सू० २२५
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७४ तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
भरतः षड्विंशतिपञ्चयोजनशतः विस्तारः षट् चैकोनविंशतिभागा योजनस्य ॥२४॥
जंबद्दीवे दीवे भरहे णाम वासे....जंबुद्दीवदीवणउयसयभागे पंचछव्वीसे जोश्रणसए छच्च एगणवीसइ भाए जोअणस्स विक्खंभेणं ।
जम्बू० सू० १२ तद्विगुणद्विगुणविस्तारा वर्षधरवर्षा विदेहान्ताः ॥२५॥
जंबुद्दीवे दीवे चुल्लहेमवन्त णामं वासहरपव्वए पएणत्ते पाईण पडीणायए उदीण दाहिण विच्छिण्णो दुहा लवणसमुद्दपुढे पुरथिमिलाए कोडीए परत्थिमिल्लं लवणसमुहं पट्टे पच्चथिमिलाएकोडीए पञ्च
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तृतीयोऽध्यायः।
७५
थिमिल्ललवणसमुदं पढे एगं जोयणसयं उड्ढं उच्चत्तेणं पणवीसं जोयणाइं उव्वेहणं-एगं जोयणसहस्सं वावन्नं जोयणाई दुवालसय एगण वीसई भाए. जोयणस्स विक्खंभेणं ।
जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति चूलवंताधिकार जंबद्दीवे दीवे हेमकए णामं वासे पराणत्ते-पाईण पडीणायए उदीणदाहिणविच्छिणे पलियंकसंठाणसंठिए दुहालवणसमुद्दपुढे पुरथिमिल्लाए कोडीए पुरथिमिल्लं लवणसमुद्द पढे-पच्चथिमिलाए कोडीए पच्चथिमिल्ल लवणसमुदं पुढे-दोरिण जोयणसहस्साई एगं च पंचत्तरं जोयणसयपंचयए गणवीसईभाए जोयणस्स विक्खंभेणं ।
जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति हेमवर्षाधिकार जम्बद्दीवे दीवे महाहिमवंते णामं वासहरपव्वए पएणत्ते-पाईण पडिणायए उदीणदाहिणविच्छिरणे
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७६
तत्त्वार्थ सूत्र जैनागमसमन्वये
दुहा लवणसमुद्द े पुट्ठे पुरथिमिल्लाए कोडीए पुर· त्थिमिल्लं लवणसमुद्द' पुट्ठे पञ्च्चत्थिमिल्लाए जाव पुट्ठे दोजोयणसयाई उड्ढं उच्च त्तेर्ण पणासं जोयण उव्वे हणं - चत्तारि जोयणसहस्साई दोरिणय दसुत्तरं जोयणसए दसयएगणवीसई भाए जोयणस्स विक्खंभेणं ।
जम्बूद्वीप प्रज्ञतिमहाहेमवंताधिकार जंबुद्दीवे दीवे हरिवासं णामं वासे पराणत्ते - एव ं जाव पच्चत्थिमिल्लं लवणसमुद्द पुट्ठे-अजोयणसहस्साइं चत्तारि एगवी से जोयणसए एगं च एगूणवीसहभागं जोयणस्स विक्खंभेणं ।
जम्बूद्वीप हरिवर्षाधिकारजंबुद्दीवे दीवे सिहणामं वासहरपव्वए परणत्ते पाईण पडणायए उदीरणदाहिणविच्छिरणे दुहालवणसमुद्द पुट्ठे पुरत्थिमिल्लाए जाव पुट्ठे चत्तारि जोयणसयाई उड्ढ उच्चत्तेणं चत्तारि गाउयसयाई
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तृतीयोऽध्यायः ।
वया
उब्वेहणं - - सोलस जोयणसहस्साई जोयस दोरिए य एगणवीसइ भाए जोयणस्स विक्खंभेणं ।
७७
जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति निषधाधिकार २ जंबुद्दीवे दीवे- महाविदेहवासे पराणत्ते--पाई पडणायप उदीरणदाहिणविच्छिरणे पलियंकसंठाण संठिए दुहा लवणसमुदं पुट्ठे पुरस्थ जाव पुट्ठे पच्चत्थिमिल्लाए कोडीए पच्चस्थित्था जाव पुट्ठे ।
तित्तीसं जोयणसहस्साइं छच्च चुलसीए-- जोयएसए चत्तारिय एगूणवीसइ भाए जोयणस्स विक्खंभेणं |
जम्बू ० महाविदेहाधिकार
उत्तरा दक्षिणतुल्याः ॥ २६ ॥ जंबुमंदरस्स पव्वयस्स य उत्तरदाहिणे णं दो बासह रपब्वया बहुसमतुल्ला श्रविसेस मरणाणत्ता अन्न
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तत्वार्थ सूत्रजैनागमसमन्वये
मनं णातिव ंत श्रयामविक वंभुश्च्चं तोग्वेह संठाणपरिणाहेणं, तं जहा - चुल्ल हिमवंते चेव सिहरिच्वेव, एवं महाहिमवंते चैव रुप्पिच्चेव, एवं निसडढे चेव शीलवंते चेव इत्यादि ।
स्था० स्थान २ उद्देश्य २ सूत्र ८७
७८
भरतैरावतयोर्वृद्धिहासौ षट्समयाभ्यामुत्सर्पिण्यवसर्पिणीभ्याम् ||२७|| ताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिताः ॥ २८ ॥ जंबुद्दीवे दीवे दोसु कुरासु मरणुत्रासया सुसमसुसममुत्तमड्ढि पत्ता पच्चरणुब्भवमाणा विहरांति, तं जहा - देवकुराए चेव, उत्तरकुराए चेव ॥
-
जंबुद्दीवे दीवे दोसु वासेसु मरणुयासया सुसममुत्तमिढि पत्ता पच्चरणुब्भवमाणा विहरंति, तं जहा- हरिवासे चेव रम्गवासे चेव ॥
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तृतीयोऽध्यायः।
जंबुद्दीवे दीवे दोसु वासेलु मणुयासया सुसमदुसममुत्तममिड्ढि पत्ता पच्चणुभवमाणा विहरंति, तं जहा-हेमवए चेव एरनवए चेव ॥
जंबुद्दीवे दीवे दोसु खित्तेसु मणुयासया दुसमसुसममुत्तममिड्ढि पत्ता पच्चणुब्भवमाणा विहरंति, तं जहा--पुव्वविदेहे चेव अवरविदेहे चेव ।।
जंबद्दीवे दीवे दोसु वासेसु मणुया छन्विहं पि कालं पच्चणुब्भवमाणा विहरंति, तं जहा -भरहे चेव एरवर चेव ॥
स्थानांग स्थान २ सूत्र ८६ जंबुद्दीवे मंदरस्त पञ्चस्स पुरच्छिमपच्चत्थिमे. णवि, णेवत्थि प्रोसप्पिणी णेवत्थि उस्लप्पिणी अवहिए णं तत्थ काले पराणत्ते ॥
व्या० प्र० श० ५ उद्देश्य १ सू० १७८ एकद्वित्रिपल्योपमस्थितयो हैमवत
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८०
तत्वार्थसूत्रजनागमसमन्वये
कहारिवर्षकदैवकुरवकाः ॥२६॥
तथोत्तराः ॥३०॥ जंबुद्दीवे दीवे मंदरस्त पव्वयस्स उत्तरदाहिणेण दो वासा पण्णत्ता........हिमवए चेव हेरन्नवते चेव हरिवासे चेव रम्मयवासे चेव........देवकुरा चेव उत्तरकुरा चेव........एगं पलिश्रोवमं ठिई पराणत्ता ........दो पलिग्रोवमाई ठिई पराणत्ता, तिरिण पलिप्रोवमाइं ठिई पराणत्ता।
जम्बूद्वीप० वक्षस्कार ४ विदेहेषु संख्येयकालाः ॥३१॥ महाविदेहे.......मणुाणं केविइयं कालं ठिई पएणत्ता ? गोयमा ! जहरणेण अंतोमुहुत्तं उकोसेण पूव्वकोडी आउअं पालेति ।
जम्बू० वक्षस्कार ४ सूत्र ८५
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तनीयोऽध्यायः ।
भरतस्य विष्कम्भो जम्बूद्वीपस्य
नत्रतिशतभागः ॥ ३२॥
जम्बुद्दीवे गं भंते ! दीवे भरहयमाणमेत्तेहि खंडेहि केवइयं खंडगणिए गं पराणत्ते ? गोयमा ! उग्रं खंडसयं खंडगणिएणं पराणत्ते ।
जम्बूखंड योजनाधिकार ० १२५
८१.
द्विर्धातकीखण्डे ॥ ३३॥
धायखंडे दीवे पुरच्छिम गं मंदरम्स पव्वयस्स उत्तरदाहिणे गं दो वासा पराणत्ता, बहुसमतुल्ला जाव भरहे चेव एरावए चेव" धातकीखंडीवे पच्चच्छिमद्धे णं मंदरस्स पव्वयस्स उत्तरदाहिणे गं दो वासा पण्णत्ता बहुसमतुल्ला जाव भर वेव एव चैव । इच्चाइ ।
स्था० स्थान र उद्दे० ३ सू० ६२
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८२
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
पुष्कराद्धे च ॥३४॥ पुक्खरवरदीवड्डे पुरक्छिमद्धे णं मंदरस्स पव्वयस्स उत्तरदाहिणे णं दो वासा पराणत्ता, बहुसमतुल्ला जाव भरहे चेव एरावए चेव तहेव जाव दो। कुडाअो पराणत्ता।
स्था० स्थान २ उद्दे० ३ सृ०६३ प्राङ्मानुषोत्तरान्मनुष्याः ॥३५॥ माणुसुत्तरस्स णं पव्वयस्स अंतो मणुश्रा ।
जीवा० प्रति० ३ मानुषोत्तरा० उद्दे० २ सू० १७८ आर्या म्लेच्छाश्च ॥३६॥ ते समासो दुविहा पराणत्ता, तं जहा-- पारिश्रा य मिलक्ख य ।
प्रज्ञा० पद १ मनुष्याधिकार
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तृतीयोऽध्यायः ।
८३
भरतैरावतविदेहाः कर्मभूमयोऽन्यत्र देवकुरूत्तरकुरुभ्यः ॥३७॥
से किं तं कम्मभूमगा? कम्मभमगा पराणरसविहा पराणत्ता, तं जहा--पंचहि भरहेहिं पंचहिं एरावएहि पंचहिं महाविदेहेहिं ।
से किं तं अकम्मममगा? अकम्मममगा तीसइ विहा पराणत्ता, तं जहा--पंचहिं हेमवरहिं, पंचहि हरिवासेहिं, पंचहिं रम्मगवासेहिं, पंचहिं एरराणवरहि,पंचहिं देवकुहि, पंचहिं उत्तरकुरुहिं । सेतं अकम्मभूमगा।
प्रज्ञा० पद १ मनुष्याधि० सूत्र ३२ नस्थिती पराऽवरे त्रिपल्योपमान्तर्मुहूर्ते ॥३८॥
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८४
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
पलिअोवमाउ तिन्नि य, उक्कोसेण वियाहिया । पाउटिई मणुयाणं, अंतोमुहुत्तं जहनिया ॥
उत्तरा० अध्याय ३६ गाथा १६८ मणुस्लाणं भंते ! केवइयं कालटिई पराणत्ता? गोयमा ! जहन्नेणं अनोमुहुत्तं उकोमेणं तिगिरण पलिओवमाई।
प्रज्ञा० पद ४ मनुष्याधिकार तिर्यग्योनिजानाञ्च ॥३६॥
असंखिज्जवासाउय सन्निपंचिंदियतिरिक्ख. जोणियाणंउकोमेणं तिगिण पलिअोवमाइं पन्नत्ता।
समवा० स० समवाय ३ पलिअोवमाई तिरिण उ उक्कोमेण वियाहिया। आउट्टिई थलयराणां अंतोमुहुत्तं जहनिया ॥
उत्तग अध्याय ३६ गाथा १८३ गम्भवतिय चउप्पय थलयर पंचिंदिय ति
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ततोयोऽध्यायः ।
८५
रिक्ख जोणियाणं पच्छा ? जहरणेणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं तिरिण पलिअोवमाई।
प्रज्ञापना स्थितिपद ४ तिर्यगधिकार इति श्री जैनमुनि-उपाध्याय-श्रीमदात्माराम महाराज
संगृहीत तत्वार्थसूत्र जैनागमसमन्वये
तृतीयोऽध्यायः समासः ।
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चतुर्थोऽध्यायः
देवाश्चतुर्णिकायाः ॥१॥
चउब्विहा देवा पएणत्ता, तं जहा-भवणवई वाणमंतर जोइस वेमाणिया ।
व्याख्या० श०२ उ० ७ आदितस्त्रिषु पीतान्तलेश्या ॥२॥ भवणवइ वाणमंतर........चत्तारि लेस्साओ... ....जोतिसियाणं एगा तेउलेसा........वेमाणियाणं तिन्नि उवरिमलेसाप्रो। स्था० स्थान १ स ० ५१
दशाष्टपञ्चद्वादशविकल्पाः कल्पोपपन्न पर्यन्ताः ॥३॥
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चतुथोंऽध्यायः ।
दसहा उभवणवासी अहा वणचारिणो । पंचविहा जोइसिया दुविहा वेमाणिया तहा ॥२०३॥ मारिया उ जे देवा दुविहा ते वियाहिया । कप्पोवगायबोधव्वा कप्पाईया तहेव य ॥ २०७ ॥ कप्पोवगा वारसहा सोहम्मीसागा तहा । सकुमारमाहिंदा बम्भलोगा य लंतगा || २०८ ||
महासुक्का सहस्सारा आणया पाण्या तहा । श्रारणा श्रच्चया चेव इह कप्पोवगासुरा ॥ २०६ ॥ उत्तराध्ययन सूत्र ध्या० ३६
.....
भवइ दसविहा पण्णत्ता. .वारणमन्तरा टुविहा पण्णत्ता, जोइसिया पंचविहा पण्णत्ता ........ वेमाणिया दुविहा परणत्ता, तं जहा- कप्पोववरणगा य कप्पाइया य । से किं तं कप्पोववरणगा ? बारसविहा पण्णत्ता, तं जहा- सोहम्मा, ईसाणा, सरणकुमारा, माहिंदा, बंभलोगा, लंतया, महासुक्का,
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८८
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
सहस्सारा, आणया, पाणया, पारणा, अच्चत्ता।
प्रज्ञा प्रथमपद देवाधिकार इन्द्रसामानिकत्रायस्त्रिंशपारिषदात्मरक्षलोकपालानीकप्रकीर्णकाभियोग्यकिल्विषिकाश्चैकशः॥ ४ ॥
देविंदा........एवं सामाणिया.......तायत्तीसगा लोगपाला परिसोववन्नगा........अणियाहिवई... आयरक्खा । स्था० स्थान ३ उ० १ सू० १३४ देवकिग्विसिए........आभिजोगिए।
ग्रोपपा० जीवाप० सू० ४१ चउब्बिहा देवाणं ठिती पएणत्ता, तं जहा-देवे णाममेगे देवसिणाते णाममेगे देवपुरोहिते णाममेगे देवपजलणे णाममेगे।
स्था० स्थान ४ उ० १ सू० २४८
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चताऽध्यायः।
...अवसंसाय देवा देवीश्रो......
जम्ब० प्र० सू० ११७ (अागमोदय समिति) त्रायस्त्रिंशलोकपालवा व्यंतरज्योतिष्काः ॥५॥
कहि णं भंते ! वाणमंतराणं देवाणं पजत्ता पजत्ताणं ठाणा पराणत्ता ? कहिणं भंते ! वाणवंतरा देवा परिवसंति ?...........साणं. २ सामाणिय साहस्तीणं साणं २ अग्गमहिसीणं साणं २ सपरिसाणं साणं २ अणियाणं साणं २ अणि आहिवईणं साणं २ आयरक्ख देवसाहस्सीणं अराणेसिं च बहूणं वाणमंतराणं देवागण्य देवीणय आवच्चं पोरेवच्चं सामित्तं भट्टित्तं महत्तरगत्तं श्राणाइसरसेणावच्चं....
प्रज्ञापना सूत्र पद २ सू० ३७ जोसियाणं देवाणं............तत्थ साणं २ विमाण
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तत्त्वार्थ सूत्रजैनागमसमन्वये
वास सहस्साणं साणं २ सामाणिय साहस्ससीगं साणं २ अग्गमहिसणं सपरिवारागं साणं परिसागं साणं २ अणियाणं साणं २ अणियाहिवईणं साणं २ श्रायरक्ख देव साहस्सी राणे सिंचबहूणं जोइसियाणं देवारणं देवीण्य आहेवच्चं जाव विहरति ।
६०
प्रज्ञापना सूत्र पद २ ० ४२
पूर्वयोन्द्राः ॥ ६ ॥
दो असुरकुमारिंदा पण्णत्ता, तं जहा चमरे चेव बली चेव । दो गागकुमारिंदा पण्णत्ता, तं जहाधरणे चेव भूयाणंदे चेव । दो सुवन्नकुमारिंदा परणत्ता, तं जहा - वेणुदेवे चेव वेणुदाली चेव । दो वि ज्जुकुमारिंदा पण्णत्ता, तं जहा- हरिच्चैव हरिसहे चेव । दो श्रग्गिकुमारिंदा पण्णत्ता, तं जहा - श्रग्गिसिहे चेव अग्गिमाणवे चेव । दो दीवकुमारिंदा
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चतर्थोऽध्यायः ।
पणत्ता, तं जहा - पुने चेव विसिद्धे चेव दो उद हिकुमारिंदा परणत्ता, तं जहा- जलकंते चेव जलसभेचे । दो दिसाकुमारिंदा पण्णत्ता, तं जहाश्रमियगती चैव श्रमियवाहणे चैव । दो वातकुमा रिंदा पराणत्ता. तं जहा- वेलंबे चेव पभंजणे चेव । दो थयिकुमारिंदा पराणत्ता तं जहा घोसे चेव महाघोसे चैव । दो पिसाइंदा पण्णत्ता, तं जहा-काले वेव महाकाले चैव । दो भूइंदा पण्णत्ता, तं जहासुरुवे चैव एडिस्वे चेव । दो जक्खिदा पण्णत्ता, तं जहा - पुन्नभद्दे चेव माणिभद्दे चेव । दो रक्खसिंदा पणत्ता, तं जहा- भीमे चेव महाभीमे चेव । दो किन्नरिंदा पण्णत्ता, तं जहा - किन्नरे चेव किंपुरिसे चेव । दो किंपुरिसिंदा पण्णत्ता, तं जहा - सप्पुरिसे चेव महापुरिसे चेव । दो महोरगिंदा पराणत्ता, तं जहा अतिकार चेव महाकाए चेव । दो गंधविदा
1
६१
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तत्वार्थसूत्रजनागमसमन्वये
पएणत्ता, तं जहा--गीतरती चेव गीयजसे चेव ।
स्था० स्थान २ उ० ३ सू०६४ कायप्रवीचारा आ ऐशानात् ॥७॥ शेषाः स्पर्शरूपशब्दमनः प्रवीचाराः ॥८॥ परेऽप्रवीचाराः ॥४॥ कतिविहा णं भंते ! परियारणा परणत्ता ? गोय. मा! पञ्चविहा पराणत्ता, तं जहा-कायपरियारणा, फासपरियारणा, रूवपरियारणा, सहपरियारणा, मणपरियारणा........भवणवासि वाणमंतरजोतिसि सोहम्मीसाणेसु कप्पेसु देवा कायपरियारणा, सणं कुमारमाहिंदेसु कप्पेसु देवा फासपरियारणा, बंभलोयलंतगेसु कप्पेसु देवा रूवपरियारणा, महासुक्कसहस्सारेसु कप्पेसु देवा सहपरियारणा, प्राण
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चताऽध्यायः।
यपाणयारणअच्चुएसु देवा मणपरियारणा, गवेजग अणुत्तरोववाइया देवा अपरियारगा।
प्रज्ञापना पद ३४ प्रचारणा विषय
स्था० स्थान २ उ० ४ मू० ११६ भवनवासिनोऽसुरनागविद्युत्सुपर्णाग्निवातस्तनितोदधिद्वीपदिक्कुमाराः॥
भवणबई दसविहा पगणत्ता, नं जहा-असुर कुमारा, नागकुमाग, सुवगणकुमारा, विज्जुकुमाग अग्गीकुमाग, दीवकुमारा, उदहिकमाग, दिमाकुमारा, वाउकुमार, थणियकुमाग।
प्रज्ञापना प्रथम पद देवाधिकार व्यन्तराः किन्नरकिम्पुरुषमहोरगगन्धर्वयक्षराक्षसभूतपिशाचाः ॥११॥ वाणमंतग अदविहा पगणत्ता, तं जहा--किगण
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६४
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
रा, किम्पुरिसा, महोरगा, गंधवा, जक्खा, रक्खसा, भूया, पिसाया। प्रज्ञापना प्रथमपद देवाधिकार
ज्योतिष्काः सूर्याचन्द्रमसौ ग्रहनक्षत्रप्रकीर्णकतारकाश्च ॥१२॥
जोइसिया पंचविहा पराणत्ता, तं जहा-चंदा. सूरा, गहा, णक्खत्ता, तारा ।
प्रज्ञापना प्रथमपद देवाधिकार मेरुप्रदक्षिणा नित्यगतयो नृलोके ॥१३॥ ते मेरु परियडंता पयाहिणावत्तमंडला सव्वे । अणवढियजोगेहिं चंदा सरा गहगणा य ॥१०॥
जीवाभि० तृतीय प्रति० उद्दे० २ मू० १७७ तत्कृतः कालविभागः ॥१४॥
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चतुर्थोऽध्यायः
६५
से केणटेणं भंते ! एवं वच्चइ-"सूरे प्राइच्चे सरे", गोयमा ! सूरादिया णं समयाइ वा पावलयाइ वा जाव उस्सप्पिणीइ वा अवसप्पिणीइ वा से तेणटेणं जाव श्राइच्चे।
व्या० प्रज्ञप्ति शत० १२ उ० ६ से किं तं पमाणकाले ? दुविहे पराणत्ते, तं जहा-दिवसप्पमाणकाले राइप्पमाणकाले इच्चाइ ।
व्या० प्र० श० ११ उ० ११ सू० ४२४
जम्बू० प्र० सूर्यप्र० चन्द्रप्र० बहिरवस्थिताः ॥१५॥ अंतो मणुस्सखेते हबंति चारोवगा य उववरणा। पञ्चविहा जोइसिया चंदा सूरा गहगणा य ॥२१॥ तेण परं जे सेसा चंदाइच्चगहतारणक्खत्ता। नत्थि गई नवि चारो अवढिया ते मुणेयव्वा ॥२२॥
जीवाभिगम तृतीय प्रतिपत्ति उद्दे० २ सूत्र १७७
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१६
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
वैमानिका ॥१६॥ वेमाणिया।
व्याख्याप्रज्ञमि० शतक २० मूत्र ६७५-६८२ कल्पोपपन्नाः कल्पातीताश्च ॥१७॥ वेमाणिया दुविहा पराणत्ता, तं जहा--कप्पोववराणगा य कप्पाईया य ।
प्रजापना प्रथम पद सूत्र ५० उपर्युपरि ॥१८॥ ईसाणस्स कप्पस्स उप्पि सपक्खि इत्यादि ।
प्रज्ञापना पद२ वैमानिक देवाधिकार सौधर्मेशानसानत्कुमारमाहेन्द्र ब्रह्मबह्मोत्तरलान्तवकापिष्टशुक्रमहाशुक्रशतारसहस्रारेष्वानतप्राणतयोरारणाच्यु
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चतुर्थोऽध्यायः।
तयोर्नवसु ग्रैवेयकेषु विजयवैजयन्तजयन्तापराजितेषु सर्वार्थसिद्धौ च ॥१६॥
मोहम्म ईमाण सणंकुमार माहिंद बंभलोय लंतग महासुक्क सहस्सार प्राणय पाणय अारण अच्चय हेद्विमगेवेजग मज्झिमगेवेझग उवरिमगेवेभग विजय वेजयंत जयंत अपराजिय सम्वटसिद्धदेवा य ।
प्रज्ञा० पद ६ अनयोग० म० १०३ प्रौप० मिद्धाधिकार स्थितिप्रभावसुखद्युतिलेश्याविशुद्धीन्द्रियावधिविषयतोऽधिकाः ॥२०॥ गतिशरीरपरिग्रहाभिमानतो हीनाः॥ ........महिड्ढीया महज्जुइया जाव महाणुभागा
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६.
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
इड्ढीए परणत्ते, जाव अच्चुत्रो, गेवेजणुत्तराय सच्चे महिड्ढीया...। .
जीवाभिगम० प्रतिपत्ति ३ सूत्र २१७ वैमानिकाधिकार . सोहम्मीसाणेसु देवा केरिसए कामभोगे पञ्चगुभवमाणा विहरंति ? गोयमा! इटा सद्दा इट्टा रूवा जाव फासा एवं जाव गेवेज्जा अणुत्तरोववातियाणं अणुत्तरा सदा एवं जाव अणुत्तरा फासा। जीवाधिगम० प्रतिपन ३ उद्दे० २ सूत्र २१६
प्रज्ञापना पद २ देवाधिकार असुरकुमार भवणवासि देव० पंचिं० वेउब्धिय सरीरस्स णं भंते ! के महा० ? गो०? असुरकमाराणं देवाणं दुविहा सरीरोगाहणा पं०, २०-भव. धारणिजा य उत्तर वेउब्बिया य तत्थ णं जासा भवधारणिजा सा ज० अंगुल० असं० उको० सत्तरयणीओ, तत्थ णं जासा उत्तर वेउविता सा, जह० अंगुल० संख० उक्को० जोयणसतसहस्तं, एवं जाव
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चतुर्थोऽध्यायः ।
६६
थणिय कुमाराणं, एवं ओहियाणं वाणमंतगणं एवं जोइसियाणवि, मोहम्मीसाण देवाणं एवं चेव उत्तरावेउविता जाव अच्चो कप्पो, नवरं सणंकुमारे भवधारणिज्जा जह० अंगु० असं० उक्को० छरयणीओ, एवं माहिंदेवि, बंभलोयलंतगेसु पंचरयणीओ, महासुक्कसहस्लारेसु चत्तारि रयणीप्रो, प्राणय पाणयारणच्चएसु निरिण रयणीयो गेविजगकप्पातीत वेमाणिय देव पंचिंदिय वेउ० सरी० के महा० ? गो० ! गेवेजगदेवाणं एगा भवणिज्जा सरीरोगाहणा पं० मा जह० अंगल० असं० उक्को० दो० रयणी, एवं अणुत्तरोववाइयदेवाणवि णवरं एका रयणी ।
प्रजायना मृत्र शरीर पद २१ सूत्र २७२ नमो विसुद्धायो।
प्रजापना १७ लेश्यापद उद्देश ३ देवाणं पुच्छा--गो० ! छ एयानो चेव देवीणं
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१००
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये ।
पुच्छा, गो०! चत्तारि कण्ह० जाव तेउलेस्सा, भवणवासीणं भंते ! देवाणं पुच्छा, गोयमा! एवं चेव एवं भवणवासिणीणवि वाणमंतरा देवाणं पुच्छा, गो० ! एवं चेव, वाणमंतरीणवि जोइसियाए पुच्छा, गो० ! एगा तेउलेस्सा, एवं जोइसिपीणवि ।
वेमाणियाणं, पुच्छा, गो०? तिन्नि तं०--तेउ० पम्ह० सुक्कलेसा वेमाणिणीणं पुच्छा, गो० ? एगा. तेउलेस्सा।
प्रज्ञापना ६७ लेश्या पद उद्देश २ सूत्र २१६ असुरकुमाराणं पुच्छा, गो० ! पल्लगसंठिते, एवं जाव थणियकुमाराणं................, वाणमंतराणं पुच्छा, गो० ! पडहग सं० जोतिसियाणं पुच्छा ? गो०! झलरिसंठाण सं० पं० सोहम्मगदेवाणं पुच्छा! गो० ! उड्ढमुयंगागारसंठिए पं० एवं जाव अच्चुयदेवाणं गेवेजगदेवाणं पुच्छागो० पष्फचंगेरि संठिए पं० अणुत्तरोववाइयाणं पुच्छा ?
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चतुर्थोऽध्यायः
गो० ! जवनालिया संठिते ोही पं० ।
प्रज्ञपना सूत्र पद ३३ ( सूत्र ३१६ ) असरकमाराणं भंते ! ओहिणा केवज्य खेत्तं जा० पा० ? गोयमा ! जह० पणवीसं जोयणाई उक्को० असंखेजे दीवसमुद्दे अोहिणा जा० पा० नागकुमाराणं-जहः पणवोसं जोयणाई उ० संखेजे दीवसमुद्दे श्रोहिणा जा० पा० एवं जाव णियकुमारा।.......वाणमंतराणं जहा नाकुमारा, जोइसियाणं भंते ! केवतितं खेत्तं प्रो० जा० पा० ? गो० ! ज० संखेजे दीवसमुद्दे उक्कोसेण वि संखेजे दीवसमुद्दे, सोहम्मगदेवाणं भंते ! केव० खेत्तं प्रो० जा० पा० ? गो ! ज० अंगलस्स असंखेजति भागं उक्को० अहे जाव इमीसे रयणप्पभाए हिदिले चरमंते तिरियं जाव असंखिजे दीवसमुद्दे उड्ढं जाव सगाई विमणाई श्रीहिणा जाणंति पासंति, एवं ईसाणगदेवावि सणंकुमारदेवावि एवं चेव, नवरं
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१०२
तत्वार्थसूत्रजैनागसममन्वये
जाव अहे दोच्चाए सक्करप्पभाए पुढवीए हिडिल्ले चरमंते, एवं माहिंददेवावि, बंभलोयलंतगदेवा तश्चाए पुढवीय हिडिल्ले चरभंते महासुक्कसहस्सारगदेवा चउत्थीए पंकप्पभाए पुढवीए हेढिल्ले चरमंते प्राणय पाणय पाणच्चुयदेवा अहे जाव पंचमाए धूमप्पभाए हेढिल्ले चरमंते हेढिममज्झिमगे. वेजगदेवा श्रधे जाव छवाए तमाए पुढवीए हेढिल्ले जाव चरमंते उवरिमगेविजगदेवाणं भंते ! केवतियं खेत्तं ओहिणा जा० पा.? गो० ! ज. अंग. लस्स असंखेजतिभागे उ० अधे सत्तमाए है। च० तिरियं जाव असंखेजे दीवसमुद्दे उडढं जाव सयाई विमाणाई श्रो० जा० पा० अणुत्तरोववाइयदेवाणं भन्ते के० खेत्तं प्रो० जा० पा० ? गोर संभिनं लोगनालिं श्रो० जा० पा०
प्रज्ञापना अवधिपद ३३८ सू०३१८
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.... चतुर्थोऽध्यायः।
पीतपद्मशुक्ललेश्या द्वित्रिशेषेषु ॥२२॥
सोहम्मीसाणदेवाणं कति लेस्साश्रो पन्नताश्रो? गोयमा ! एगा तेऊलेस्सा पराणत्ता । सणंकमारमाहिंदेसु एगा पम्हलेस्सा एवं बंभलोगे वि पम्हा । सेसेसु एका सुक्कलेस्सा अणुत्तरोववातियाणं एका परमसुक्कलेस्सा।
जीवाभिगम० प्रतिप्रत्ति ३ उद्दे० १ सूत्र २१४
प्रज्ञापना पद १७ उद्दे० १ लेश्याधिकार प्राग्वेयकेभ्यः कल्पाः ॥२३॥ कप्पोपवगणगा बारसविहा पराणत्ता।
प्रज्ञापना प्रथम पद सूत्र ४६ ब्रह्मलोकालया लौकान्तिकाः ॥२४॥ वंभलोए कप्पे........लोगंतिता देवा पण्णत्ता।
स्थानांग स्थान ८ सूत्र ६२३
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१०४
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
सारस्वतादित्यवन्हयरुणगर्दतोयतुषि ताव्यावाधारिष्टाश्च ॥२५॥
सारस्सयमाइच्चा वण्हीवरुणा य गदत्तोया य । तुसिया अवावाहा अग्गिच्चा चेव रिद्वा च ॥
स्थानांग स्थान ६ सूत्र ६८४ एएसुणं अहसु लोगंतिय विमाणेसु अविहा लोगंतीया देवा परिवसंति, तं जहा-- सारस्सयमाइच्चा वण्हीवरुणा य गद्दतोया य। तुसिया अव्वावाहा अग्गिच्चा चेव रिद्वाए ॥२८॥
_भगवती सूत्र ६ शतक ५ उद्देश विजयादिषु द्विचरमाः ॥२६॥
विजय वेजयंत जयंत अपराजिय देवत्ते केवइया दविदिया अतीता पराणत्ता ? गोयमा ! कस्सइ अस्थि कस्सइ णत्थि, जस्सत्थि अट्ट वा सोलस वा इत्यादि।
प्रज्ञापना०पद १५ इन्द्रियपद
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चतुर्थोऽध्यायः ।
औपपादिकमनुष्येभ्यः शेषास्तिर्यग्योनयः ॥२७॥ उववाइया....मणुश्रा (संसा)तिरिक्खजोणिया ।
दशवैका० अध्याय घटकायाधिकार स्थितिरसुरनागसुपर्णद्वीपशेषाणां सागरोपमत्रिपल्योपमार्द्धहीनमिता ॥२८॥
असुरकुमाराणं भंते ! देवाणं केवइयं कालदिई पगणत्ता ? गोयमा ! उक्कोसेणं साइरेगं सागरो. वमं.......। ___ नागकुमाराणं देवाणं भंते ! केवइयं कालं ठिई पन्नता ? गोयमा ! उक्कोसेणं दोपलिश्रोवमाइं देसूणाई........सुवरणकुमाराणं भंते ! देवाणं केवइयं कालं ठिई पन्नता? गोयमा! उक्कोसेणं दोपलिअोव
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१०६
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
माई देसूणाई । एवं एएणं अभिलावण....."जाव थणियकुमाराणं जहा नागकुमाराणं ।
__ प्रज्ञापना० पद ४ भवनपत्यधिकार, स्थिति विषय सौधर्मेशानयोः सागरोपमेऽधिके ॥२६॥ सानत्कुमारमाहेन्द्रयोः सप्त ॥३०॥ त्रिसप्तनवैकादशत्रयोदशपञ्चदशभिरधिकानि तु ॥३१॥
आरणाच्युतादूर्ध्वमेकैकेन नवसु प्रैवेयकेषु विजयादिषु सर्वार्थसिद्धौ च ॥३२॥
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चतुर्थोऽध्यायः।
१०७
अपरा पल्योपमधिकम् ॥३३॥ परतःपरतःपूर्वा पूर्वाऽनन्तरा ॥३४॥ दो चेव सागराइं, उक्कोसेण वियाहित्रा। सोहम्मम्मि जहन्नेणं. एगं च पलिअोवमं ॥ २२० ॥ सागरा साहिया दुन्नि, उक्कोसेण वियाहिया । ईसाणम्मि जहन्नेणं, साहियं पलिश्रोवमं ॥ २२१ ॥ सागराणि य सत्तेव, उक्कोसेणं ठिई भवे । सणकुमारे जहन्नेणं, दुन्नि ऊ सागरोवमा ॥२२२॥ साहिया गागरा सत्त, उक्कोसेणं ठिई भवे । माहिन्दम्मि जहन्नणं,साहिया दुन्नि सागरा ॥२२३।। दस चेव सागराई, उक्कोसेणं ठिई भवे । बम्भलोए जहन्नेणं, सत्त ऊ सागरोवमा ॥ २२४ ॥ चउदस सागराई, उक्कोसेण ठिई भवे । लन्तगम्मि जहन्नणं, दस ऊ सागरोवमा ॥ २२५ ॥
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तत्वार्थ सूत्र जैनागम समन्वये
सत्तरस सागराई, उक्कोसेण ठिई भवे । महासुक्के जहन्नेणं, चोइस सागरोवमा ॥ २२६ ॥ अट्ठारस सागराई, उक्कोसेण ठिई भवे । सहस्सारम्मि जहन्नेणं, सत्तरस सागरोवमा ॥ २२७॥ सागरा उणवीसं तु, उक्कोसेणं ठिई भवे । श्राणयम्मि जहन्नेणं, अट्ठारस सागरोवमा ||२२|| वीसं तु सागराई उक्कोसेण ठिई भवे । पाणयम्मि जहन्नेणं, सागरा उणवीसई ॥ २२६ ॥ सागरा इक्कवीसं तु उक्कोसेण ठिई भवे ।
१०८
रणम्मि जहन्नेणं, वीसई सागरोवमा ॥ २३० ॥ बावीसं सागराई, उक्कोसेणं ठिईभवे । श्रच्यम्मि जहन्नेणं, सागरा इक्कवीसई ॥ २३९ ॥ तेवीस सागराई, उक्कोसेण ठिई भवे । पढमम्मि जहन्नेणं, बावीसं सागरोवमा ॥ २३२ ॥ चवीस सागराई, उक्कोसेरा ठिई भवे । बइयम्मि जहन्नेणं, तेवीसं सागरोवमा ॥ २३३ ॥
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चतुर्थोऽध्यायः ।
पणवीस सागराइं, उक्कोसेण ठिई भवे । तइयम्मि जहन्नेणं, चउवीसं सागरोवमा ॥ २३४ ।। छवीस सागराई, उक्कोसेण ठिई भवे। चउत्थम्मि जहन्नेणं, सागरा पणुवीसई ॥ २३५ ॥ सागर सत्तवीसं तु उक्कोसेए ठिई भवे । पञ्चमम्मि जहन्नेणं, सागरा उ छन्वीसइ ॥ २३६ ॥ सागरा अट्टवीस तु, उक्कोसेण ठिई भवे । छ?म्मि जहन्नेणं, सागरा सत्तवीसइ ।। २३७ ॥ सागरा अउणतीसं , उक्कोसेण ठिई भवे । सत्तमम्मि जहन्नेणं, सागरा अढवीसइ ॥ २३ ॥ तीसं तु सागराई, उक्कोसेण ठिई भवे । अट्टमम्मि जहन्नेणं, सागरा अउण तीसई ।। २३६ ।। सागरा इक्कतीतं तु, उक्कोसेण ठिई भवे । नवमम्मि जहन्नेणं, तीसई सागरोवमा ॥ २४० ॥ तेत्तीसा सागराइं, उक्कोसेण ठिई भवे । चउसुवि विजयाईसु, जहन्नेणेक्कत्तीसई ॥ २४१॥
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११० तत्वार्थमूत्रजैनागमसमन्वये अजहन्नमणुक्कोसा, तेत्तीसं सागरोवमा । महाविमाणे सव्वद्वे, ठिई एसा वियाहिया ॥२४२॥
उत्तराध्ययन मृत्र अध्या० ३६ नारकाणां च द्वितीयादिषु ॥३५॥ . दशवर्षसहस्राणि प्रथमायाम् ॥३६॥ लागरोवममेगं तु, उक्कोसेण वियाहिया।। पढमाए जहन्नेणं, दसवास सहस्सिया ॥१६०॥ तिरणेव सागरा ऊ, उक्कोसेण वियाहिया। दोश्चाए जहन्नेणं, एगं तु सागरोवमं ॥१६॥
उत्तराध्ययन सूत्र अध्य ० ३६ एवं जा जा पव्वस्त उकोसठिई अन्थि तानो ताप्रो परमो परो जहरणठिई अव्वा ।
( ममन्वयकार )
भवनेषु च ॥३७॥
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चताऽध्यायः।
भोमेज्जाणं जहराणेणं, दसवाससहस्सिया।
उनरा० अध्य० ३६ गाथा २१७ व्यन्तराणाञ्च ॥३८॥ परा पल्योपमधिकम् ॥३६॥
वाणमंतराणं भंते ! देवाणं केवइयं कालं ठिई पएणत्ता ? गोयमा ! जहन्नेणं दसवाससहस्लाई उक्कोसेणं पलिअोवमं । .
प्रजापना. स्थितिपद ४ ज्योतिष्काणाञ्च ॥४०॥ तदष्टभागोऽपरा ॥४१॥ पलिनोवममेगं तु, वासलक्खेण साहियं । पलिश्रीवमट्ठभागो, जोइसेसु जहनिया ॥ २१६ ।।
उत्तग० अध्य० ३६
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तत्त्वार्थसूत्र जैनागमसमन्वये
लौकान्तिकानामष्टौ सागरोपमाणि
सर्वेषाम् ॥४२॥
११२
लोगंतिकदेवाणं जहराणमणुको सेणं श्रद्धसागरो
वमाहं ठिती पण्णत्ता ।
स्था० स्थान ८ सू० ६२३
व्याख्या० श० ६ २०५
इति श्री - जैनमुनि - उपाध्याय - श्रीमदात्माराम महाराजसंगृहीते तत्त्वार्थ सूत्र जैनागमममन्त्रये चतुर्थोऽध्यायः समाप्तः ।
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पञ्चमोऽध्यायः
अजीवकाया धर्माधर्माकाशपुद्गलाः ॥१॥ । चत्तारि अस्थिकाया अजीवकाया परणत्ता, तं जहा--धम्मत्थिकाए, अधम्मत्थिकाए, भागासस्थिकाए पोग्गलत्थिकाए ।
स्थानांग स्थान ४ उद्दे० १ सूत्र २५१ व्याख्याप्रज्ञप्ति शतक ७ उद्दे० १० सूत्र ३०५ द्रव्याणि ॥२॥ जीवाश्च ॥३॥ कइविहाणं भंते ! दवा पराणत्ता ? गोयमा !
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तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
दुविहा पराणत्ता, तं जहा--"जीवदव्वा य अजीवदव्वा य ।"
अनुयोग० सूत्र १४१ नित्यावस्थितान्यरूपाणि ॥४॥ रूपिणः पुद्गलाः ॥५॥
पंचत्थिकाए न कयाइ नासी न कयाइ नत्थि, न कयाइ न भविस्सइ भविं च भवइ अ भविस्सइ अ धुवे नियए सासए अक्खए अव्वए अवहिए, निच्चे अरूवी।
नंदि सूत्र० सूत्र ५८ पोग्गलत्थिकायं रूविकायं ।
स्थानांगसूत्र स्थान ५ उद्दे० ३ सू०१
व्याख्याप्रज्ञप्ति शतक ७ उद्देश्य १० आ आकाशादेकद्रव्याणि ॥६॥ निष्क्रियाणि च ॥७॥
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पञ्चमोऽध्यायः ।
धम्मो अधम्मो श्रागासं दव्वं इक्किक्कमाहियं । अाणि यदव्याणि कालो पुग्गलजंतवो ॥
उत्तराध्ययन अध्य० २८ गाथा ८
अवट्टिए निच्चे |
११५
नन्दि० द्वादशाङ्गी अधिकार सूत्र ५८
असंख्येयाः प्रदेशा धर्माधर्मैकजी
वानाम् ॥ ८ ॥
चत्तारि पएसग्गेणं तुल्ला असंखेजा पराणत्ता, तं जहा - धम्मत्थिकाए, अधम्मस्थिकाए, लोगागासे, एगजीवे ।
स्थानांग० स्थान ४ उद्देश्य ३ सूत्र ३३४
आकाशस्याऽनन्ताः ॥ ६ ॥ श्रागासत्थिकाए परसाए तगुणे |
प्रज्ञापना पद ३ सूत्र १४
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११६
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
संख्येयाऽसंख्येयाश्च पुद्गलानाम् ॥ १० ॥ नाणोः ॥११॥
रूवी जीवदव्वाणं भंते ! कइविहा पण्णत्ता ? गोयमा ! चव्विहा पण्णत्ता, तं जहा - "खंधा, खंधदेसा, खंधप्पएसा, परमाणुपोग्गला,....अगंता परमाणुपुग्गला, अरांता दुप्परसिया खंधा जाव अता दसपएसिया खंधा अता संखिजपए सिया खंधा, अता संखिज पएसिया खंधा, अता तपसिया खंधा ।
प्रज्ञापना ५ वां पद
लोकाकाशेऽवगाहः ॥१२॥
कतिविणं भंते ! आगासे पण्णत्ते ? गोयमा ! दुविहे गासे प०, तं जहा - लोयागासे य अलोयागासे य । लोयागासे णं भंते ? किं जीवा जीवदेसा
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पञ्चमोऽध्यायः।
जीवपदेसा अजीवा अजीवदेसा अजीवपएसा? गोयमा ! जीवावि जीवदेसावि जीवपदेसावि अजीवावि अजीवदेसावि अजीवपदेसावि जे जीवा ते नियमा एगिदिया बेइंदिया तेइंदिया चरिंदिया पंचेदिया अणिदिया,जे जीवदेसाते नियमा एगिदियदेसा जाव अणिदिय देसा जे जीवपदेसा ते नियमा एगिदियपदेसा जाव अणिदियपदेसा,जे अजीवा ते दुविहा पन्नत्ता,तं जहा--रूवीय अरूची य जे रूवि ते चउब्विहा पराणत्ता, तं जहा--खंधा खंधदेसा खंधपदेसा परमाणुपोग्गला--जे अरूवी ते पंचविहा पण्णत्ता, तं जहा--धम्मत्थिकाए नोधम्मत्थिकाय स्सदेसे धम्नत्थिकायस्सपदेसा अधम्मत्थिकाएनोधम्मत्थिकायस्स देसे अधम्मत्थिकायस्स पदेसा अद्धा समए ।
- व्याख्या० श० २ उ० १० सूत्र १२१ अलोनागासे णं भंते ! कि जीवा ? पुच्छा तह
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११८
तत्त्वार्थ सूत्र जैनागम समन्वये
जीवप्पएसा एगं
चेव गोयमा ! नो जीवा जाव नो जीवदव्वदेसे गुरुय लहुए असंतेहिं गुरुलहुयगुणेहिं संजते सव्वागासे असंतभागूणे ।
•
व्याख्या० श० २ उ० १० सू० १२२
धम्मो अधम्मो श्रागासं कालो पुग्गलजं तवो । एस लोगोति पराणत्तो जिणेहिं वरदंसिहि ॥
उत्तराध्ययन ग्रध्य० २८ गाथा ७
धर्माधर्मयोः कृत्स्ने ॥ १३॥
धमाधम्मे य दो चेव, लोगमित्ता वियाहया । लोगालोगे य श्रागा से, समए समयखेत्तिए ॥
उत्तराध्ययन अध्ययन ३६ गाथा ७
एकप्रदेशादिषु भाज्य: पुद्गला
नाम् ॥१४॥
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पञ्चमोऽध्यायः।
११६
एगपएसो गाढा........संखिजपएसो गाढा.... असंखिजपएसो गाढा ।
प्रज्ञा० पञ्चम पर्यायपद अजीवपर्यवाधिकार असंख्येयभागादिषु जीवानाम् ॥१५॥ लोअस्स असंखेजइभागे।
प्रज्ञापना पद २ जीवस्थानाधिकार प्रदेशसंहारविसर्पाभ्यां प्रदीपवत् ॥१६॥
दीवं व.......जीवेवि जं जारिसयं पव्वकम्मनिबद्धं बोदिं णिवत्तेइ तं असंखेजेहिं जीवपदेसेहिं सचित्तं करेइ खड्डियं वा महालियं वा।
राजप्रश्नीयसूत्र सूत्र ७४ गतिस्थित्युपग्रहौ धर्माधर्मयोरुपकारः ॥१७॥
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तत्वार्थ सूत्र जैनागमसमन्वये
आकाशस्यावगाहः ॥ १८ ॥ शरीरवाङ्मनः प्राणापानाः पुद्गला
नाम् ॥ १६॥
१२०
सुखदुःखजीवितमरणोपग्रहाश्च ॥ २० ॥ परस्परोपग्रहो जीवानाम् ॥२१॥
धम्मत्थिकाएं जीवाणं श्रागमणगमणभासुम्मेसमणजोगा वइजोगा कायजोगा जे यावन्ने तहपगारा चला भावा सव्वे ते धम्मत्थिकाए पवतंति । गइलक्खणे णं धम्मत्थिकाए ।
श्रहम्मत्थिकाए णं जीवाणं किं पवत्तति ? गोयमा ! अहम्मत्थिकारणं जीवाणं ठाणनिसीय तुयट्टणमरणस्स य एगत्तीभावकरणता जे यावन्ने तहप्पगारा थिरा भावा सव्वे ते अहम्मत्थिकाये
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पञ्चमोऽध्यायः ।
पवत्तंति । ठाणलक्खणे णं अहम्मत्थिकाए । आगासत्थिकाए गं भंते ! जीवाणं जीवाण य किं पवत्तति ? गोयमा ! आगासत्थिकारणं जीवदव्वाणय जीवदव्वाण य भायणभूए एगेण वि से पुन्ने दोहिवि पुन्ने सयंपि माएजा । कोडिसएवि पुन्ने कोडिसहस्संवि माएजा ॥ १ ॥ अवगाहणालखणे गंगासत्थिकाए ।
१२१
जीवत्थिकारणं भंते! जीवाणं किं पवत्तति ? गोयमा ! जीवत्थिकापणं जीवे श्रताणं श्रभिणिवोहियनागपजवाणं श्रणंताणं सुयनाणपजवाणं, एवं जहा वितियसए अस्थिकायउद्देसए जाव उवश्रोगं गच्छति, उवओोगलक्खणे गं जीवे ।
व्या० प्र० शतक १३ उ० ४ सू० ४८१ जीवे णं श्रताणं श्रभिणिबोहियनागपजवाणं एवं सुयनाणपज्जवाणं ओहिनाणपज्जवाणं मणपज्जवनाणप० केवलनागप मइान्नागप० सुयराणा
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तत्त्वार्थ सूत्र जैनागमसमन्वये
णप० विभंगणाणप० चक्खुदंसणप० हिदंसणप० केवलदंसणपज्जवाणं उवयोगं
चक्खुस
प० गच्छइ० ।
१२२
व्या० प्र० शतक २ उ० १० सू० १२०
जीवो उवओोगलक्खणो | नाणेणं दंसणेणं च
सुहेय दुहेण य ।
उत्त० ग्रध्य० २८ गाथा १०
पोग्गलत्थिकाए णं पुच्छा ? गोयमा ! पोग्गल - थिका गं जीवाणं श्ररालियवेउच्चिय आहारए तेयाकम्मए सोइंदियच क्खि दियघाणिदियजिब्भिदिय फासिंदियमणजोगवय जोगकायजोग प्राणापाणणं च गहणं पवत्तति । गहणलक्खणे गं पोग्गलत्थिकाए । व्या० प्र० शतक १३ उ० ४ सृ० ४८१
वर्तनापरिणामक्रिया: परत्वापरत्वे
च कालस्य ॥२२॥
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पञ्चमोऽध्यायः।
वत्तना लक्खणो कालो०।
उत्तरा० अध्य० २८ गाथा १० स्पर्शरसगन्धवर्णवन्तः पुद्गलाः ॥२३॥
पोगले पंचवरणे पंचरसे दुगंधे अटफासे परणत्ते। व्या० प्र० शतक १२ उ० ५ सू० ४५०
शब्दबन्धसौक्ष्म्यस्थौल्यसंस्थानभेदतमश्छायाऽऽतपोद्योतवन्तश्च ॥२४॥ सहन्धयार-उज्जोरो पभा छाया तवो इ वा । वण्णरसगन्धफासा पुग्गलाण तु लक्खण ॥१२॥ एगत्तं च पुहत्तं च संखा संठाणमेव च । संजोगा य विभागा य पज्जवाण तु लक्खण॥१३॥
उत्तरा० अध्य० २८ अगवः स्कन्धाश्च ॥२५॥
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तत्त्वार्थ सूत्र जैनागमसमन्वये
दुविहा पोग्गला पराणत्ता, तं जहा - परमाणुपोग्गला नोपरमाणुपोग्गला चेव ।
स्था० स्थान २ उ० ३ सू० ८२
भेदसङ्घातेभ्यः उत्पद्यन्ते ॥ २६ ॥ भेदादः ॥ २७ ॥
दोहिं ठाहिं पोग्गला साहरणंति, तं जहा - सई वा पोग्गला साहन्नति परेण वा पोग्गला साहन्नति । सई वा पोग्गला भिज्जंति परेण वा पोग्गला भिज्जति । स्था० स्थान २३० ३ सू० ८२
एगत्तेण पुहत्तेण खंधाय परमाणु य ।
१२४
उत्तरा० अध्य० ३६ गा० ११
भेदसंघाताभ्यां चाक्षुषः ॥ २८ ॥
चक्खुदंसण चक्खुदंसणिस्स घड पड कड रहाइस दव्वे |
अनुयोग दर्शन गुणप्रमाण सू० १४४
3
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पञ्चमोऽध्यायः ।
सद्रव्यलक्षणम् ॥२६॥
सद्दव्वं वा ।
६.२५.
व्या० प्र० शत० ८ उ० ६ सत्पदद्वार
उत्पादव्ययधौव्ययुक्तं सत् ॥३०॥ माउयाओगे (उपन्ने वा विगए वा धुवे वा ) ।
स्थानांग स्थान १०
तद्भावाऽव्ययं नित्यम् ॥३१॥ परमाणुपोग्गलेण भंते! किं सासए असासए ? गोयमा ! दव्वट्टयाए सासए वन्नपज्जवेहिं जाव फास - पज्जवेहिं असासए ।
व्या० प्र० शतक १४ उ० ४ सू० ५१२ जीवा० प्र० ३ उ० १ सूत्र ७७
जीवा भंते! किं सासया असासया ? गोयमा !
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तत्त्वार्थसूत्र जैनागम समन्वये
जीवा सिसासया सिय सासया से केणद्वेगं भंते ! एवं बुच्चइ - जीवा सियसासया सिय सासया ? गोयमा ! दव्वद्वयाए सासया भावट्टयाए सासया से ते गोयमा ! एवं चुच्चर सियसासया सियासासया ! नेरइयाणं भंते! किं सासया असासया ? एवं जहा जीवा तहा नेरइयावि एवं जाव मारिया जाव सियसासया सिय सासया । से वं भंते ! से वं भंते ! व्या० श० ७ उ० २ ० २७४
अर्पिताऽनर्पित सिद्धेः ॥३२॥
पितणपिते । स्था० स्थान० १० सूत्र ७२७ स्निग्धरूक्षत्वाद्बन्धः॥३३॥
१२६
न जघन्यगुणानाम् ॥ ३४ ॥ गुणसाम्ये सदृशानाम् ॥ ३५ ॥
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पञ्चमोऽध्यायः।
१२७
द्वयधिकादिगुणानान्तु ॥३६॥ बन्धेऽधिको पारिणामिको च॥३७॥
बंधणपरिणामे गं भंते ! कतिविहे पण्णत्ते ? गोयमा ! दुविहे पण्णते, तं जहा-णिद्धबंधणपरिणामे लुक्खबंधणपरिणामे य-- समणिद्धयाए बंधो न होति समलक्खयाएवि ण होति वेमायणिद्धलुक्खत्तोण बंधो उ खंधाणं ॥२॥ गिद्धस्स णिद्धेण दुयाहिएणं,
लुक्खस्त लुक्खेण दुयाहिएणं । निद्धस्स लुक्खेण उवेइ बंधो,
जहएणवज्जो विसमो समो वा ॥२।।
. प्रज्ञा० परि० पद १३ सूत्र १८५ गुणपयायवद्रव्यम् ॥३८॥
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तत्त्वार्थसूत्र जैनागमसमन्वये
गुणाणमा सश्री दव्वं, एगदव्यस्सिया गुणा । लक्खणं पज्जवाणं तु, उभश्रो श्रस्सिया भवे ॥ उत्तरा० सूत्र ग्रव्य ० २८ गाथा ६
१२८
कालश्च ॥३६॥
छवि दवे परणत्ते, तं जहा -- धम्मत्थिकाए, अधम्मत्थिकाए, आगासत्थिकाए, जीवत्थिकाए, पुग्गलत्थिकाए, श्रद्धासमये अ, सेतं दव्वणामे । अनुयोग० द्रव्यगुण ० सू० १२४
सोऽनन्तसमयः ॥४०॥
अणंता समया ।
व्याख्या प्रज्ञप्ति शत २५ उ० ५ सू० ७४७
द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणाः॥४१॥ दव्वस्सिया गुणा ।
उत्तराध्ययन अध्ययन २८ गाथा ६
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पञ्चमोऽध्यायः।
तद्भावः परिणामः ॥४२॥
दुविहे परिणामे पराणत्ते, तं जहा-जीवपरिणामे य अजीवपरिणाय।
प्रज्ञापना परिणाम पद १३ सू० १८१ इति श्री-जैनमुनि-उपाध्याय-श्रीमदात्माराम महाराजसंगृहीते तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
पञ्चमोऽध्यायः समाप्तः।
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षष्ठोऽध्यायः
कायवाङ्मनःकर्मयोगः ॥१॥ तिविहे जोएपण्णत्ते, तंजहा-मणजोए, वइजोए कायजोए।
व्याख्या प्रज्ञप्ति शतक १६ उद्दे० १ सूत्र ५६४ सास्त्रवः ॥२॥ पंच पासवदारा परणत्ता, तं जहा-मिच्छत्तं, अविरई, पमाया, कसाया, जोगा।
समवायांग समवाय ५ शुभः पुण्यस्याऽशुभः पापस्य ॥३॥ पुराणं पावासबो तहा।
उत्तराध्ययन २८ गाथा १४
R
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षष्ठोऽध्यायः।
-
सकषायाऽकषाययोः साम्परायिकेर्यापथयोः ॥४॥
जस्ल णं कोहमाणमायालोमा वोच्छिन्नाभवन्ति तस्स णं ईरियावहिया किरिया कज्जइ, नो संपराइया किरिया कज्जइ, जस्स णं कोहमाणमायालोमा अवोच्छिन्ना भवन्ति तस्स णं संपरायकिरिया कज्जइ नो ईरियावहिया।
व्याख्या प्रज्ञप्ति शतक ७ उद्दे०१ सूत्र २६७ इन्द्रियकषायाव्रतक्रियाः पञ्चचतु:पञ्चपञ्चविंशतिसंख्याःपूर्वस्य भेदाः॥५॥
पंचिंदिया पण्णत्ता....चत्तारि कसाया पराणत्ता ........पंच अविरय पराणत्ता........पंचवीसा किरिया पएणत्ता........ स्थानांग स्थान २ उद्देश्य १ सूत्र ६०
इन्दिय १ कसाय २ अव्वय ३ जोगा ६ पंच १
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१३२
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
चऊ २ पंच ३ तिन्निकसाया किरियानो पर्णवीस इमाओ अणुक्कमसो। नव तत्व प्रकरण गा०१४
तीव्रमन्दज्ञाताज्ञातभावाधिकरणवीयविशेषेभ्यस्तद्विशेषः ॥६॥
जे केइ खद्दका पाणा अदु वा संति महालया। सरिसं तेहिं वेरंति असरिसं ती व णेवदे ॥६॥ एएहिं दोहिं ठाणेहिं ववहारो ण विजई । एएहिं दोहिं ठाणेहिं अणायारं तु जाणए* ॥७॥
सूत्रकृतांग श्रुतस्कन्ध २ अ० ५ गाथा ६-७ * व्याख्या-ये केचन क्षुद्रकाः सत्त्वाः प्राणिनः एकेन्द्रियद्वीन्द्रियादयोऽल्पकाया वा पञ्चेन्द्रिया अथवा महालया महाकायाः संति विद्यन्ते, तेषां च क्षुद्रकाणामल्पकायानां कुन्थ्वादीनां महानालयाः शरीरं येषां ते महालयाः हस्त्यादयस्तेषां च व्यापादने, सदृशं, वैरमिति, वज्रं कर्मविरोधलक्षणं वा वैरं तत्सदृशं समानम्, अल्पप्रदेशत्वात्सर्वजंतना
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षष्ठोऽध्यायः ।
अधिकरणं जीवाऽजीवाः ॥७॥
जीवे अधिकरणं ।
१३३
व्या० प्रज्ञ० श० १६ उ० १
एवं जीवमवि ।
स्थानांग स्थान २ उ० १ सू० ६० मित्येवमेकान्तेन नो वदेत् । तथा विसदृशम् ग्रसदृशं तद्व्यापत्ती वैरं कर्मबन्धो विरोधो वा इन्द्रियविज्ञानकायानां विसदृशत्वात् सत्यपि प्रदेश अल्पत्वेन सदृशं वैरमित्येवमपिं नो वदेत् । यदिहि वध्यापेक्ष एव कर्मबन्धः स्यात्तदा तत्तद्वशात्कर्मणोऽपि सादृश्यमसादृश्यं वा वक्तुं युज्यते । न च तद्वशादेव बंध:, पित्वध्यवसायवशादपि । ततश्च तीव्राध्यवसायिनोऽल्पकायसत्त्वव्यापादनेऽपि महद्वैरम् | कामस्य तु महाकाय सत्त्वव्यापादनेऽपि स्वल्पमिति ||६||
- एतदेव सूत्रेणैव दर्शयितुमाह श्राभ्यामनन्तरोक्ताभ्यां स्थानाभ्यामनयर्वा स्थानयोरल्पकायमहाकायव्यापादनापादित
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१३४ तत्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
आयं संरम्भसमारम्भारम्भयोगकृतकारिताऽनुमतकषायविशेषैस्त्रिस्त्रिस्त्रिश्चतुश्चैकशः ॥८॥ कर्मबन्धसदृशत्वयोर्व्यवहरण व्यवहारो नियक्तिकत्वान्नयुज्यते। तथाहि-न वध्यस्य सदृशत्वमसदृशत्वं चैकमेव । कर्मबन्धस्य कारणम् । अपि तु वधकस्य तीव्रभावो मन्दभावो ज्ञातभावोऽज्ञातभावो महावीर्यत्वमल्लवीर्यत्वं चेत्येतदपि । तदेवं वध्यवधकयोर्विशेषात्कर्मबन्धविशेष इत्येवं व्यवस्थिते वध्यमेवाश्रित्य, सदृशत्वासदृशत्वव्यवहारो न विद्यत इति । तथाऽनयोरेव स्थानयोः प्रवृत्तस्यानाचारं, विजानीयादिति । तथाहि-यजीवसाम्यात्कर्मबन्धसदृशत्वमुच्यते, तदयुक्तम् । यतो न हि जीवव्यापत्त्या हिंसाच्यते, तस्य शाश्वतत्वेन व्यापादयितुमशक्यत्वात् । अपि त्विंद्रियादिव्यापत्त्या तथाचोक्तम्-पञ्चन्द्रियाणि, त्रिविधं वलं च उच्छावासनिःश्वासमथान्यदायुः। प्राणाः
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षष्टोऽध्यायः ।
१३५
संरम्भसमारम्भे प्रारम्भे य तहेव य ।
उ० अध्य० २४ गाथा २१ तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कायणं न करेमि न कारवेमि करतं पि अन्नं न समणुजाणामि ।
दशवकालिक अ० ४ दशैते भगवद्भिरुक्तास्तेषां वियोजीकरणं तु हिंसा ॥१॥ इत्यादि । अपि च भावसव्यपेक्षस्यैव,कर्मबन्धोऽन्यपेतु युक्तः। तथाहि-वैद्यस्यागमसव्यपेक्षस्य, सम्यक् क्रियां कुर्वतो,यद्यप्यातुरविपत्तिर्भवति, तथापि न वैरानुषङ्गो भावदोषाभावाद् । अपरस्य तु सर्यबुद्धश्या रज्जुमपि घ्नतो भावदोषात्कर्मबन्धः । तद्रहितस्य तु न बन्ध इति । उक्त चागमे, उच्चालयमिपाए। इत्यादि तण्डुलमत्स्याख्यानकं तु सुप्रसिद्धमेव । तदेवंविधवध्यवधकभावापेक्षया स्यात् । सदृशं स्यादसदृशत्वमिति । अन्यथाऽनाचार इति ॥७॥
वृत्ति शीलाङ्काचार्य कृत
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तत्त्वार्थसूत्र जैनागमसमन्वये
जस्स णं कोहमाणमायालोभा श्रवोच्छिन्ना भवंति तस्स णं संपराइया किरिया ।
व्या० प्रज्ञप्ति श० ७ उ० १ सूत्र १८
निवर्तनानिक्षेपसंयोगनिसर्गाद्विचतुर्द्वित्रिभेदाः परम् ॥६॥
वित्तणाधिकरणया चेव संजोयरणाधिकर
१३६
शिया चेव ।
स्था० स्थान २ सू० ६०
आइये निक्खिवेजा । उत्तरा० ० २५ गाथा १४ पवत्तमाणं ।
उत्तरा० अ० २४ गाथा २१-२३
तत्प्रदोषनिह्नवमात्सर्यान्तरायासादनोपघाता ज्ञानदर्शनावरणयोः ॥ १० ॥
णाणावर णिज्जकम्मासरीरप्पओगबंधेगं भंते ! कस्स कम्मस्स उदए ? गोयमा ! नागपडिणीययाए गाणनिराहवण्याएणाणंतराएणं गाणप्पदोसेणं
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षष्टोऽध्यायः ।
गाराच्चासाय गाए गाराविसंवादणा जोगेणं, एवं जहा गाणावरणिजं नवरं दंसणनाम घेत्तव्वं । व्या० प्रज्ञति श० ८० ६ सू० ७५-७६
दुःखशोक तापाक्रन्दनवधपरिदेवनान्यात्मपरोभयस्थान्यसद्वेदस्य ॥ ११ ॥
परदुकखण्याए परसोयण्यार परजूरणयाए परतिष्पणयाए परपिट्टणयाए परपरियावण्याए बहूणं पाणाणं जाव सत्ताणं दुक्खण्यार सोयण्याए जाव परियावणयाए एवं खलु गोयमा ! जीवाणं अस्साया - वेयणिजा कम्मा किजन्ते ।
व्याख्या० श०७ उ० ६ सू० २८६
भूतवत्यनुकम्पादानसरागसंयमादि
योगः क्षान्तिः शौचमिति सदस्य ॥ १२ ॥
१३७
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तत्त्वार्थ सूत्रजैनागमसमन्वये
पाणाशुकंपाए भूयाणुकंपाए जीवाणुकंपाए सत्ताणुकंपा बहूणं पारणाणं जाव सत्ताणं दुक्खयाए सोयणयाए अरण्याए श्रतिप्पण्याए पिट्टणया परियावण्याप एवं खलु गोयमा ! जीवाणं सायावेयणिजा कम्प्रा किजंति ।
व्या० प्रज्ञप्ति शतक ७ उ० ६ सू० २८६
केवलिश्रुतसंघधर्मदेवावर्णवादो दर्शनमोहस्य ||१३||
पंचहि ठाणेहिं जीवा दुल्लभबोधियत्ताए कम्म पकरेंति, तं जहा - श्ररहंताणं श्रवनं वदमाणे १, अरहंतपन्नतस्स धम्मस्स अवन्नं वदमाणे २. आयरिय उवज्झायाणं अवन्नं वदमाणे ३, चउवरणस्स संघ. स्स श्रवणं वदमाणे ४, विवक्कतवंभचेराणं देवागं अवन्नं वदमाणे ।
१३८
स्था० स्थान ५ उ० २ सू० ४२६
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षष्ठोऽध्यायः ।
कषायोदयात्तीत्रपरिणामश्चारित्रमो
१३६
हस्य ॥ १४ ॥
मोहणिजकम्मासरीरप्पयोगपुच्छा, गोयमा ! तिब्वकोहयाए तिव्वमाख्याए तिब्वमायाए तिव्वलोभाए तिव्वदंसणमोहणिजयाए तिव्वचारित्त मोह. खिजाए । व्या० प्र० शतक ८ उ० सू० ३५१
बह्वारम्भपरिग्रहत्वं नारकस्यायुषः
॥१५॥
चउर्हि ठाणेहिं जीवा रतियत्ताए कम्मं पकरैति, तं जहा - महारम्भताते महापरिग्गहयाते पंचिदियवणं कुणिमाहारेणं ।
स्था० स्थान ४ उ० ४ सूत्र ३७३
माया तैर्यग्योनस्य ॥ १६॥
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तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये ..
-
. चउहिं ठाणेहिं जीवा तिरिक्खजोणियत्ताए कम्मं पगति, तं जहा-माइल्लताते णियडिल्लताते अलियवयणेणं कूडतुलकूडमाणेणं ।
स्था० स्थान ४ उ० ४ सू० ३७३ अल्पारम्भपरिग्रहत्वं मानुषस्य ॥१७॥ स्वभावमादेवञ्च ॥१८॥ अप्पारंभा अप्पपरिग्गहा धम्मिया धम्माणुया।
औपपातिक सूत्र संख्या १२४ चउहिं ठाणेहिं जीवामणुस्सत्ताते कम्मं पगरेंति; तं अहा-पगतिमद्दताते पगतिविणीययाए साणु-। कोसयाते श्रमच्छरिताते ।
स्था० स्थान ४ उ० ४ सू० ३७३ वेमायाहिं सिक्खाहिं जे नरा गिहिसुव्वया । उति माणुसं जोणिं कम्मसच्चाहु पाणणो॥
उत्तरा० सू० अध्य० ७ गाथा २०
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षष्ठोऽध्यायः ।
निःशीलव्रतत्वं च सर्वेषाम् ॥ १६ ॥
एतवाले गं मगुस्से नेरइयाउयंपि पकरेह तिरिया उयंपि पकरेइ मगुस्साउयंपि पकरेइ देवाउयंपि परे ।
१४१
व्याख्याप्रज्ञप्ति श० १३०८ सूत्र ६३ सरागसंयमसंयमाऽसंयमाऽकामनिर्जराबालतपांसि दैवस्य ॥२०॥
चउहिं ठाणेहिं जीवा देवाउयत्तार कम्मं पगति, तं जहा - सरागसंजमेणं संजमासंजमेणं, बालतवोकमेणं, श्रकामणिजराए ।
स्था० स्थान ४ उ० ४ सूत्र ३७३
सम्यक्त्वं च ॥ २१ ॥ वेमाणियाविजइ सम्मद्दिद्वीपजतसंखेजवा
साउयकम्मभूमिगगव्भवकंतियमगुस्सेहिंतो उवव
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तत्त्वार्थ सूत्र जैनागमसमन्वये
जंति किं संजतसम्मद्दिद्वीहिंतो संजयसम्मद्दिट्ठीपजत्त रहितो संजया संजय सम्मद्दिद्वीपजत्तसं खेज ० हिंतो उववज्जंति ? गोयमा ! तीहिंतोवि उव वज्रंति एवं जाव अगो कप्पो ।
९४२
प्रज्ञापना पद ६
योगवक्रता विसंवादनं चाशुभस्य
नाम्नः ॥२२॥
तद्विपरीतं शुभस्य ॥२३॥
सुभनामकम्म सरीरपुच्छा ? गोयमा ! काय उज्जययाए भावज्जुययाए भासुज्जुययाए अविसं वाद जोगेणं सुभनामकम्मा सरीरजावप्पयोगबन्धे सुभनामकम्मा सरीरपुच्छा ? गोयमा ! कायऋणु जवाए जाव विसंवायाजोगेणं असुभनामकम्म, जाव पयोगबन्धे । व्या० श०८ उ०६
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षष्ठोऽध्यायः ।
दर्शन विशुद्धिर्विनयसम्पन्नता शीलतेष्वनतिचारोऽभीक्ष्णज्ञानोपयोगसंवेगौ शक्तितस्त्यागतपसी साधुसमाधिर्वैयावृत्यकरणमर्हदाचार्यबहुश्रुतप्रवचनभक्तिरावश्यका परिहाणिर्मार्गप्रभावना प्रवचनवत्सलत्वमिति तीर्थकर -
त्वस्य ॥२४॥
१४३
अरहंत सिद्धपवय गुरुथेरबहुस्सुए तवस्सीसुं । वच्छलया य तेसिं अभिक्ख गाणोवोगे य ॥ १ ॥ दंसण विणए श्रवास्सए य सीलव्वए निरइयारं । खणलव तव चियाए वेयावच्चे समाहीय || २ ||
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१४४
तत्वार्थसूत्रजैनागसमन्वये .
अप्पुवणाणगहणे सुयभत्ती पवयणे पभावणया। एएहिं कारणेहिं तित्थयरत्तं लहइ जीवो ॥३॥
ज्ञाताधर्म कथांग अ० ८ सू० ६४ परात्मनिन्दाप्रशंसे सदसद्गुणोच्छादनोद्भावने च नीचैर्गोत्रस्य ॥२५॥
जातिमदेणं कुलमदेणं बलमदेणं जाव इस्सरि. यमदेणं णीयागोयकम्मासरीरजावपयोगबन्धे ।
व्या० शतक ८ उ०६ सूत्र ३५१ तद्विपर्ययो नीचैत्यनुत्सेको चोत्तरस्य ॥२६॥
जातिअमदेणं कुलश्रमदेणं बलश्रमदेणं रूवश्रमदेणं तवत्रमदेणं सुयअमदेणं लाभअमदेणं इस्सरियं अमदेणं उच्चागोयकम्मासरीरजावपयोगबंधे।
व्या० शतक ८ उ० ६ सू० ३५१
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सप्तमोऽध्यायः ।
१४५
विघ्नकरणमन्तरायस्य ॥२७॥ दाणंतराएणं लाभंतराएणं भोगंतराएणं उवभोगंतराएणं वीरियंतराएणं अंतराइयकम्मा सरीरप्पयोगबन्धे। व्या० प्र० श० ८ उ० ६ सू० ३५१ इति श्री-जैनमुनि-उपाध्याय-श्रीमदात्माराम महाराज
संगहीते तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
सप्तमोऽध्यायः समाप्तः ।
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सप्तमोध्यायः
हिंसा ऽनृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिर्व्रतम् ॥१॥ देशसर्वतोऽणुमहती ॥२॥
पंच महव्वया पराणत्ता, तं जहा-सव्वातो पाणातिवाया वेरमणं । जाव सव्वातो परिग्गहातो वेरमणं । पंचाणुव्वता पण्णत्ता, तं जहा - थूलातो पाणाइवायातो वेरमणं थूलातो मुसावायातो वेरमणं थूलातो श्रदिनादाणातो वेरमणं सदारसंतोसे इच्छापरिमाणे | स्था० स्थान ५ उ० १ सू० ३८६ तत्स्थैर्यार्थ भावनाः पञ्च पञ्च ॥ ३॥
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सप्तमोऽध्यायः ।
पंचजामस्स पणवीसं भावणाश्रो परंणत्ता।
समवायांग समवाय २५ (१) तस्स इमा पंच भावणातो पढमस्स वयस्स होति पाणातिवाय वेरमण परिरक्खणट्टयाए ।
प्रश्न व्या० १ संवर० सू० २३ (२) तस्स इमा पंच भावणा तो वितियस्स वयस्स अलिय वयणस्स वेरमण परिरक्खणढयाए ।
प्र० व्या० २ संवर० सू० २५ (३) तस्स इमा पंच भावणातो ततियस्स होति परदव्वहरण वेरमणपरिरक्खणद्वयाए ।
प्र० व्या० ३ संवर० सू० २६ (8) तस्स इमा पंच भावणाश्रो चउत्थयस्स होति अबंभचेर वेरमणपरिरक्खणट्टयाए ।
प्र० ध्या० ४ संवर० सू० २७ (५) तस्स इमा पंत्र भावणाश्रो चरिमस्त
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१४८ तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये वयस्स होति परिग्गह वेरमणपरिरक्खणट्टयाए ।
प्रश्न व्या० ५ संवरद्वार सू० २६ वाङ्मनोगुप्तीर्यादाननिक्षेपणसमित्यालोकितपानभोजनानि पञ्च ॥४॥
ईरिया समिई मणगुत्ती वयगत्ती आलीयभा. यणभोयणं आदाणभंडमत्तनिक्खेवणासमिई ।
समवायांग, समवाय २५ क्रोधलोभभीरुत्वहास्यप्रत्याख्याना. न्यनुवीचिभाषणं च पञ्च ॥५॥
अणुवीति भासणया कोहविवेगे लोभविवेगे भयविवेगे हासविवेगे। समवायांग, समवाय २५ शन्यागारविमोचितावासपरोपरोधाकरणभैक्ष्यशुद्धिसद्धर्माऽविसंवादाः पञ्च॥६॥
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सप्तमोऽध्यायः।
१४६
उग्गह अणुराणवणया उग्गहसीमजाणणया सयमेव उग्गहं अणुगिराहणया साहम्मियउग्गहं अणुराणविय परिभंजणया साहारणभत्तपाणं अणुराणविय पडिभंजणया।
सम० समय २५ स्त्रीरागकथाश्रवणतन्मनोहराङ्गनिरीक्षणपूर्वरतानुस्मरणवृष्येष्टरसस्वशरीरसंस्कारत्यागाः पञ्च ॥७॥
इत्थीपसुपंडगसंसत्तगसयणासणवजणया इत्थीकहवजणया इत्थीणं इंदियाणमालोयण्वजणया पुबरयपुब्वकीलिआणं अणणुसरणया पणीताहारवजणया।
___ सम० समवाय २५ ___ मनोज्ञामनोज्ञेन्द्रियविषयरागद्वेषवजनानि पञ्च ॥८॥
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तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
सोइन्दियरागोवरई चक्खिदियरा गोवरई घाणिदियरागोवरई जिब्भिदियरागोवरई फासिंदियरागो
वरई ।
१५०
सम० समवाय २५
हिंसादिष्विहामुत्रापायावद्यदर्शनम् ॥ ६ ॥ दुःखमेव वा ॥ १०॥
संवेगिणी कहा चउव्विहा पण्णत्ता, तं जहाइहलोग संवेगणी परलोगसंवेगणी तसरीरसंवेगणी परसरीरसंवेगणी । णिव्वेयणी कहा चउव्विहा पण्णत्ता, तं जहा - इहलोगे दुच्चिन्ना कम्मा इहलोगे दुहफलविवागसंजुत्ता भवति ॥ | १ || इहलोगे दुच्चिन्ना कम्मा परलोगे दुहफलविवागसंजुत्ता भवंति ॥ २ ॥ परलोगे दुश्चिन्ना कम्मा इहलोगे दुहफल विवागसंजुत्ता भवंति || ३ || परलोगे दुच्चिन्ना कम्मा परलोये दुहफलविवागसंजुत्ता भवति ॥४॥
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सप्तमोऽध्यायः
इहलोगे सुचिन्ना कम्मा इहलोगे सुहफलविवागसंजुत्ता भवति ॥ १ ॥ इहलोगे सुचिन्ना कम्मा परलोगे सुहफलविवागसंजुत्ता भवंति, एवं चउभंगो।
१५१
स्था० स्थान ४ उ० २ सूत्र २८२
मैत्रीप्रमोद कारुण्यमाध्यस्थानि च सत्त्वगुणाधिक क्लिश्यमानाऽविनयेषु ११
मिति भूपहिं कप्पए
सूत्र कृतांग ० प्रथम श्रुतस्कंध अध्या० १५ गाथा ३ प० ० सू० १ प्र० २०
सुप्पडियागंदा | साणुकोस्सयाए । मज्झत्थो निजरापेही समाहिमगुपालए ।
प० भगवदुपदेश
आचारांग प्र० श्रुतस्कंध ० ८ उ० ७ गाथा ५
जगत्कायस्वभावौ वा संवेगवैराग्या
ऽर्थम् ॥ १२ ॥
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१५२
तत्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
संवेगकारणत्था।
समवाय सू० विपाकसूत्राधिकार भावणाहिं य सुद्धाहिं, सम्म भावेत्तु अप्पयं ।
उत्तरा० अध्य० १६ गाथा० ६४ अणिच्चे जीवलोगम्मि। जीवियं चेव रूवं च, विज्जुसंपायचंचलम् ।
उत्तरा० अध्य० १८ गाथा ११, १३ प्रमत्तयोगात् प्राणव्यपरोपणं हिंसा ॥१३॥
तत्थ णं जेते पमत्तसंजया ते असुहं जोगं पडुच्च प्रायारंभा परारंभा जाव णो अणारंभा ।
व्या० प्र० शतक १ उ० १ सूत्र ४८ असदभिधानमनृतम् ॥१४॥
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सप्तमोऽध्यायः।
१५३
An
श्रलियं."असच्चं. "संधत्तणं 'असम्भाव... अलियं।
__ प्र० व्या० प्रास्रव० २ अदत्तादानं स्तेयम् ॥१५॥ अदत्तं"तेणिको। प्र० व्या० श्रास्त्रव० ३ मैथनमब्रह्म ॥१६॥
अबम्भ मेहुणं । प्र० व्या० अास्रवद्वार ४ मूर्छा परिग्रहः ॥१७॥ मुच्छा परिग्गहो वुत्तो।
दश० अध्ययन ६ गाथा २१ निश्शल्यो व्रती ॥१८॥
पडिकमामि तिहिं सल्लेहि-मायासल्लेणं नियाण सल्लेणं मिच्छादसणसल्लेणं ।
श्रावश्यक० चतु० श्रावश्यः सूत्र ७
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१५४
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
आगायेनगारश्च ॥१६॥ - चरित्तधम्ने दुविहे पन्नत्ते, तं जहा-श्रागारचरित्तधम्मे चेव, अणगारचरित्तधम्मे चेव ।
स्थानांग स्थान २ उ० १ अणुव्रतोऽगारी ॥२०॥ श्रागारधम्म''अणुब्वयाई इत्यादि ।
औपचातिक सूत्र श्रीवीरदेशना दिग्देशानर्थदण्डविरतिसामायिकप्रोषधोपवासोपभोगपरिभोगपरिमाणातिथिसंविभागवतसम्पन्नश्च ॥२१॥
श्रागारधम्म दुवालसविहं श्राइक्खइ, तं जहा. पंच अणुब्वयाई तिरिण गुणवयाइं चत्तारि सिक्खावयाई।
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सप्तमोऽध्यायः ।
तिरिण गुणव्वयाई, तं जहा - अणत्थदंडवेरमणं दिसिव्वयं, उपभोगपरिभोगपरिमाणं । चत्तारि सिक्खावयाइ, तं जहा - सामाइयं देसावगासियं पोसहवासे अतिहिसंविभागे ।
श्रपपातिक श्रीवीर देशना सूत्र ५७
मारणान्तिकों सल्लेखनां जोषिता
॥२२॥
પ
हणा ।
पच्छिमा मारणंतिश्रा संलेहणा असणारा
श्रपपा० सू० ५७
शङ्काकांक्षाविचिकित्सान्यदृष्टिप्रशंसासंस्तवाः सम्यग्दृष्टेरतिचाराः॥२३॥ सम्मत्तस्स पंच अइयारा पेयाला जाणियव्वा, न समायरियव्वा, तं जहा - संका कंखा वितिगिच्छा,
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१५६ तत्त्वार्थ सूत्रजैनागमसमन्वये
परपासंडपसंसा, परपासंडसंथवो ।
उपासक दशांग अध्याय
व्रतशीलेषु पञ्चपञ्च यथाक्रमम् ॥२४॥ बन्धवधच्छेदातिभारारोपणान्नपान
निरोधाः ॥ २५ ॥
थूलगस्स पारणाइवायवेरमणस्स समणेवास पंच इयारा पेयाला जाण्यव्वा, न समायरियव्वा । तं जहा- वहबंधच्छविछेए इभारे भत्तपाणवोच्छेए।
उ० प्र० १
मिथ्योपदेशर होभ्याख्यान कूटलेखक्रियान्यासापहार साकारमन्त्रभेदाः २६
थूलगमुसावायस्स पंच अइयारा जाणियव्वा । न समायरियव्वा । तं जहा - सहस्साभक्खाणे रहसा
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सप्तमोऽध्यायः।
१५७
य।
भक्खाणे, सदारमंतभेए मोसोवएसेए कूडलेहकरणे
उपा० अ० १ स्तेनप्रयोगतदाहृतादानविरुद्धराज्यातिक्रमहीनाधिकमानोन्मानप्रतिरूपकव्यवहाराः ॥२७॥
थलगअदिराणादाणस्स पंच अइयारा जाणियव्वा, न समायरियचा, तं जहा-नाहड़े, तक्करप्पउगेविरुद्धरजाइकम्मे, कूडतुल्लकूडमाणे, तप्पडिरूवगववहारे ।
परविवाहकरणेत्वरिकापरिगृहीताऽपरिगृहीतागमनाऽनङ्गक्रीडाकामतीवाभिनिवेशाः ॥२८॥
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तत्त्वार्थसूत्र जैनागमसमन्वये
सदार संतोसिए पंच श्रइयारा जाणियव्वा, न समायरियव्वा, तं जहा- इत्तरियपरिग्गहियागमणे, अपरिग्गहियागमणे, श्रणंगकीडा, परविवाहकरणे कामभोसु तिव्वाभिलासो । उपा० अध्या० १
क्षेत्रवास्तुहिरण्यसुवर्णधनधान्यदासीदासकुप्यप्रमाणातिक्रमाः ॥ २६ ॥
इच्छापरिमाणस्स समणोवासरणं पंच श्रइयारा जाणियव्वा, न समायरियव्वा । तं जहा - धणधन्नपमाणाइकमे खेत्तवत्थुष्पमाणाइक मे हिरराणसुवरणपरिमाणाइकमे दुप्पयच उप्पय परिमाणाइक्कमे कुवियपमाणइक्कमे |
उपा० अध्या ० १
१५८
ऊर्ध्वाधस्तिर्यग्व्यतिक्रमक्षेत्रवृद्धिस्मृत्यन्तराधानानि ॥३०॥
दिसिव्त्रयस्त पंच अइयारा जाणियव्वा । न
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सप्तमोध्यायः।
१५६
समायरियव्वा, तं जहा-उड्ढदिसिपरिमाणाइकमे, अहोदिसिपरिमाणाइक्कमे, तिरियदिसिपरिमाणाइक्कमे, खेत्तवुड्ढिस्स, सअंतरड्ढा ।
- उपा० अध्या० १ आनयनप्रेष्यप्रयोगशब्दरूपानुपातपुद्गलक्षेपाः ॥३१॥
देसावगासियस्स समणोवासएणं पंच अइयारा जाणियव्वा नसमायरियव्वा,तं जहा-पाणवणपयोगे पेसवणपोगे, सद्दाणुवाए, रूवाणुवाए, वहियापोगलपक्खिये।
उपा० अध्या० १ . कन्दर्पकौत्कुच्यमौखर्याऽसमीक्ष्याधिकरणोपभोगपरिभोगानर्थक्यानि ॥३२ .. अणट्ठादंडवेरमणस्स समणोवासएणं पंच अइ. यारा जाणियव्वा, न समायरियव्या, तं जहा-कन्दप्पे
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१६० तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये कुक्कुइए मोहरिए संजुत्ताहिगरणे उवभोगपरि भोगाइरित्ते।
उपा० अध्या० योगदुष्प्रणिधानानादरस्मृत्यनुपस्थानानि ॥३३॥
सामाइयस्स पंच अइयारा समणोवासएर जाणियव्वा । न समायरियव्वा,तं जहा-मणदुप्पणि हाणे, वएदुप्पणिहाणे, कायदुप्पणिहाणे, सामाइयस्स सति प्रकरणयार, सामाइयस अणवदि. यस्स करणया।
उपा० अध्या०१ अप्रत्यवेक्षिताऽप्रमार्जितोत्सर्गादान संस्तरोपक्रमणानादरस्मृत्यनुपस्थानानि ॥३४॥ पोसहाववासस्स समणोवासएणं पंच अइयारा
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सप्तमोऽध्यायः।
जाणियव्वा न समायरियव्वा,तं जहा-अप्पडिलेहिय दुप्पडिलेहिय सिजासंथारे, अप्पमजियदुप्पमजियसिजासंथारे,अप्पडिलेहियहियदुप्पडिलेहिय उच्चारपासवणभमी, अप्पमजियदुप्पमन्जिय उच्चारपासवणभूमी पोसहोववासस्स सम्म अणणुपालणया।
उपा० अध्या० १ सचित्तसम्बन्धसम्मिश्राभिषवदुःपक्वाहाराः ॥३५॥
भोयणतो समणोवासएणं पञ्च अइयारा जाणियव्वा, न समायरियव्वा, तं जहा-सचित्ताहारे सचित्तपडिबद्धाहारे उप्पउलिोसहिभक्खणया, दुप्पोलितोसहिभक्खणया, तुच्छोसहिभक्खणया ।
उपा० अध्या० १ सचित्तनिक्षेपापिधानपरव्यपदेशमात्सर्यकालातिक्रमाः ॥३६॥
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१६२
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
"अहासंविभागस्स पञ्च अइयारा जाणियव्या, न समायरियव्वा, तं जहा-सचित्तनिक्खेवणया, सचित्तपेहणया, कालाइक्कमदाणे परोवएसे मच्छ रिया।
उपा० अध्या०५ जीवितमरणाशंसामित्रानुरागसुखानुबन्धनिदानानि ॥३७॥
अपच्छिममारणंतियसंलेहणा झसणाराहणार पंच अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा,तं जहाइहलोगासंसप्पभोगे, परलोगासंसप्पोगे,जीवियासंसप्पभोगे, मरणासंसप्पभोगे, कामभोगासंसप्प श्रोगे।
उपा० अध्या० १ अनुग्रहार्थं स्वस्यातिसगों दानम् ॥३८॥
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-
सप्तमोऽध्यायः।
१६३
- समणोवासए णं तहारूवं समणं वा जाव पडिलामेमाणे तहारूवस्स समणस्स वा माहणस्स वा समाहिं उप्पाएति, समाहिकारएणं तमेव समाहिं पडिलभइ।
व्या० श० ७ उ० १ सूत्र २६३ समणो वासए णं भंते ! तहारूवं समणं वा जाव पडिलामेमाणे किं चयति ? गोयमा ! जीवियं चयति उच्चयं चयति दुक्करं करेति दुल्लह लहइ वोहिं बुज्झइ तो पच्छा सिझति जाव अंतं करेति।
व्या० प्र० शत० ७ उ० १ सू० ३६४ विधिद्रव्यदातृपात्रविशेषात्तद्विशेषः ॥३६॥ दव्वसुद्धणं दायगसुद्धणं तवस्सिविसुद्धण तिक
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तत्त्वार्थ सूत्र जैनागमसमन्वये
रणसुद्धेणं पडिगाहसुद्धेणं तिविहेणं तिकरणमुद्धेणं
दाणेणं ।
व्या० प्र० शत० १५ सू० ५४१
१६४
इति श्री - जैनमुनि - उपाध्याय - श्रीमदात्माराम - महाराज - संगृहीते तत्त्वार्थ सूत्रजैनागमसमन्वये सप्तमोऽध्यायः समाप्तः ।
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अष्टमोऽध्यायः
मिथ्यादर्शनाऽविरतिप्रमादकषाय
योगा बन्धहेतवः ॥ १॥
पंच श्रसवदारा पण्णत्ता, तं जहा - मिच्छत्तं विरई पमाया कसाया जोगा । समवा० समवाय ५
सकषायत्वाज्जीवः कर्मणो योग्यान् पुद्गलानादत्ते स बन्धः ॥ २ ॥
जोगबंधे कसायबंधे ।
समवा० समवाय ५
दोहिं ठाणेहिं पापकम्मा बंधंति, तं जहा - रागेण य दोसेण य । रागे दुविहे पण्णत्ते, तं जहा - माया
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१६६
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
य लोभे य । दोसे दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-कोहे य माणे य।
स्था० स्थान २ उ० २
प्रज्ञापना पद २३ सू०५ प्रकृतिस्थित्यनुभागप्रदेशास्तद्विधयः
चउबिहे बन्धे पराणत्ते, तं जहा-पगइबंधे ठिइबन्धे अणुभावबन्धे पएसबन्धे ।
समवायांग समवाय ४ आद्यो ज्ञानदर्शनावरणवेदनीयमोहनीयायुर्नामगोत्रान्तरायाः ॥४॥
अटु कम्मपगडीओ पण्णत्तानो,तं जहा-णाणावरणिजं, दसणावरणिज, वेदणिजं, मोहणिजं, आउयं, नाम, गोयं, अंतराइयं ।
प्रज्ञापना पद २१ उ० १ सू० २८८
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अष्टमोऽध्यायः । १६७ पञ्चनवद्वयष्टाविंशतिचतुर्द्विचत्वारिं शद्विपञ्चभेदा यथाक्रमम् ॥५॥
मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानाम् ॥६॥ पंचविहे गाणावरणिजे कम्मे पराणत्ते, तं जहाआभिणिबोहियणाणावरणिजे सुयणाणावरणिजे, ओहिणाणावरणिज्जे, मणपजवणाणावरणिज्जे केवलणाणावरणिज्जे ।
__ स्थानांग स्थान ५ उ० ३ सू० ४६४ चक्षुरचक्षुरवधिकेवलानां निद्रानिद्रानिद्राप्रचलाप्रचलाप्रचलास्त्यानगृद्धयश्च ॥७॥
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तत्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
... णवविधे दरिसणावरणिज्जे कम्मे पराणत्ते, तं जहा-निदा निद्दानिद्दा पयला पयलापयला थीणगिद्धी चक्खुदंसणावरणे अचक्खुदंसणावरणे, अव. धिदसणावरणे केवलदसणावरणे ।
स्थानांग स्थान ६ सू० ६६८ सदसद्वद्ये ॥८॥ सातावेदणिज्जे य असायावेदणिज्जे य ।
प्रज्ञापना पद २३ उ० २ सू० २६३ दर्शनचारित्रमोहनीयाकषायकषायवेदनीयाख्यास्त्रिद्विनवषोडशभेदाः सम्यक्त्वमिथ्यात्वतदुभयान्यकषायकषायौ हास्यरत्यरतिशोकभयजुगुप्सास्त्री
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अष्टमोऽध्यायः ।
पुन्नपुंसकवेदा अनन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानसंज्वलनविकल्पाश्चैकशः क्रोधमानमायालोभाः ॥६॥
मोहणिज्जे णं भंते ! कम्मे कतिविधे पराणते ? गोयमा ! दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-दसणमोहणिज्जे य चरित्तमोहणिज्जेय । दसणमोहणि ज्जे णं भंते ! कम्मे कतिविधे पराणत्ते ? गोयमा ! तिविहे पएणत्ते, तं जहा-सम्मत्तवेदणिज्जे, मिच्छत्तवेदणिज्जे, सम्मामिच्छत्तवेयणिज्जे । __ चरित्तमोहणिज्जे णं भंते ! कम्मे कतिविधे पएणत्ते ? गोयमा! दुविहे पराणत्ते, तं जहा-कसायवेदणिज्जे नोकसायवेदणिज्जे।
कसायवेदणिज्जे णं भंते ! कतिविधे पराणत्ते ? गोयमा ! सोलसविधे पएणत्ते, तं जहा-अणं
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१७०
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
ताणुबंधीकोहे अणंताणुबंधी माणे अ० माया श्रा लोभे, अपञ्चक्खाणे कोहे एवं माणे माया लोभे पच्चक्खणावरणे कोहे एवं माणे माया लोभे संजल णकोहे एवं माणे माया लोभे ।।
नोकसायवेयणिज्जे णं भंते ! कम्मे कतिविधे पएणते ? ___गोयमा ! णवविधे पराणत्ते, तं जहा-इत्थीवेय वेयणिज्जे, पुरिसवे० नपुसगवे हासे रती अरती भए सोगे दुगुंछा।
प्रज्ञा० कर्मबन्ध० २३ उ० २ नारकतैर्यग्योनमानुषदैवानि ॥१०॥
आउएणं भंते ! कम्मे कइविहे परणत्ते ? गोय मा! चउविहे पण्णत्ते, तं जहा--णेरइयाउए, तिरिय आउए, मणुस्साउए, देवाउए । :
प्रज्ञापना पद २३ उ०२
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अष्टमोऽध्यायः।
गतिजातिशरीराङ्गोपाङ्गनिर्माणबन्धनसंघातसंस्थानसंहननस्पर्शरसगन्धवर्णानुपूागुरुलघूपघातपरघातातपोद्योतोच्छ्वासविहायोगतयःप्रत्येकशरीरत्रससुभगसुस्वरशुभसूक्ष्मपर्याप्तिस्थिरादेययशःकीर्तिसेतराणि तीर्थकरत्वं च॥११ __णामेणं भंते ! कम्मे कतिविहे पराणत्ते ? गोयमा! वायालीसतिविहे पण्णत्ते, तं जहा-१ गतिणामे, २ जातिणामे, ३ सरीरणामे, ४ सरीरोवंगणामे, ५ सरीरबंधणणामे, सरीरसंघयणणामे, ७ संघायणणामे, ८ संठाणणामे, ६ वराणणामे, १० गंधणामे, ११ रसणामे, १२ फासणामे, १३ अगुरुलघुणामे,
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१७२
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
१४ उवघायणामे, १५ पराघायणामे, १६ आणुपुन्वी, णामे, १७ उस्सासणामे, १८ श्रायवणामे, १६ उज्जो. यणामे, २० विहायगतिणामे, २१ तसणामे, २२ थावरणामे, २३ सुहुमणामे, २४ बादरणामे, २५ पजत्तणामे, २६ अपजत्तणामे, २७ साहारणसरीरणाम, २८ पत्तेयसरीरणामे, २६ थिरणामे, ३० अथिरणामे, ३१ सुभणामे, ३२ असुभणाम; ३३ सुभगणामे, ३४ दुभगणामे, ३५ सूसरणामे, ३६ दूसरणामे, ३७ श्रादेजणामे, ३८ प्रणादेजणामे, ३६ जसोकित्तिणामे, ४० अजसोकित्तिणामे, ४१ णिम्माणणामे, ४२ तित्थगरणामे ।।
प्रज्ञापना उ० २ पद २३ सू० २६३
. समवायांग० स्थान ४२ उच्चैर्नीचैश्च ॥१२ गोए णं भंते ! कम्मे कइविहे पएणत्ते ? गोयमा !
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अष्टमोऽध्यायः।
दुविहे पएणत्ते, तं जहा-उच्चागोए य नीयागोए य ।
__प्रशापना पद २३ उ० २ सू० २६३ दानलाभभोगोपभोगवीर्याणाम्॥१३॥ अंतराए णं भंते ! कम्मे कतिविधे परणत्ते ? गोयमा ! पंचविधे पएणत्ते, तं जहा-दाणंतराइए, लाभंतराइए, भोगंतराइए, उवभोगंतराइए,वीरियंतराइए ।
प्रज्ञापना पद २३ उद्दे० २ सू० २६३ आदितस्तिसृणामन्तरायस्य च त्रिंशत्सागरोपमकोटीकोट्यः परा स्थितिः ॥१४॥ उदहीसरिसनामाण, तीसई कोडिकोडीअो । उकोसिया ठिई होइ, अन्तोमुहुत्तं जहनिया ॥१६॥
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१७४
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
श्रावरणिजाण दुण्हंपि, वेयाणिजे तहेव या अन्तराए य कम्मम्मि, ठिई एसा वियाहिया ॥२०॥
- उत्तमध्ययन अध्ययन ३३ सप्ततिर्मोहनीयस्य ॥१५॥ उदहीसरिसनामाण, सत्तरं कोडिकोडीश्रो। मोहणिजस्स उक्कोसा, अन्तोमुहुत्तं जहनिया ॥
उत्तराध्ययन अध्ययन ३३ गाथा २१ विंशतिर्नामगोत्रयोः ॥१६॥ उदहीसरिसनामाण, वीसई कोडिकोडीओ। नामगोत्ताणं उक्कोसा, अन्तोमुहुत्तं जहनिया ॥
. उत्तराध्ययन अध्य० ३३ गाथा २३ त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाण्यायुषः ॥१७॥ तेत्तीस सागरोवमा, उक्कोसेण वियाहिया। ठिइ उ अाउकम्मस्स, अन्तोमुहुत्तं जहन्निया ॥
उत्तराध्ययन अ० ३३ गाथा २३
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श्रष्टमोध्यायः ।
૭૫
अपरा द्वादशमुहूर्ता वेदनीयस्य ॥ १८ ॥ सातावेदणिज स्स..जहनें बारसमुहुत्ता ।
प्रज्ञापना पद २३ उ० २ सू० २६३
नामगोत्रयोरष्टौ ॥१६॥ नामगोयाणं जहराणेणं
मुहुत्ता ।
भगवतीसूत्र शतक ६ उ० ३ सू० २३६ जसोकित्तिनामाएणं पुच्छा ? गोयमा ! जहराणेअटुमुहुत्ता । उच्चगोयस्स पुच्छा ? गोयमा ! जहराणेणं श्रटुमुहुत्ता ।
•
प्रज्ञापना पद २३ उ० २ सूत्र २६४
शेषाणामन्तर्मुहूर्ताः ॥२०॥ अन्तोमुहुत्तं जहन्निया ।
उत्तराध्ययन ० २३ गाथा १६ -२२
विपाको ऽनुभवः ॥ २१ ॥
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तत्वार्थसूत्र जैनागमसमन्वये
स यथानाम ॥२२॥ अणुभागफल विवांगा । समवायांग विपाकश्रुत वर्णन सव्वेसि च कम्माणं ।
१७६
प्रज्ञापना पद २३ उ० २
उत्तराध्ययन ० २३ गाथा १७
ततश्च निर्जरा ॥ २३ ॥
उदीरिया वेश्या य निजिन्ना ।
व्याख्या प्रज्ञप्ति शत० १ उ० १ सू० ११
नामप्रत्ययाः सर्वतो योगविशेषात् सूक्ष्मैकक्षेत्रावगाहस्थिताः सर्वात्मप्रदे शेष्वनन्तानन्तप्रदेशाः ॥ २४ ॥
सव्वेसिं चेव कम्माणं परसग्गमणन्तगं । गण्ठियसत्ताईयं अन्तो सिद्धाण श्राउयं ॥
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अष्टमोऽध्यायः ।
सव्वजीवाण कम्मं तु संगहे छद्दिसागयं । सव्वेसु विपएसेसु, सव्वं सव्वेण बद्धगं ॥
उत्तराध्ययन ० ३३ गाथा १७-१८
सद्वेद्यशुभायुर्नामगोत्राणि पुण्यम्
॥२५॥
१७७
अतोऽन्यत्पापम् ॥२६॥
सायावेदणिज्ज...... तिरिश्राउए
मगुस्साउए
देवाउए, सुहणामस्सणं........ उच्चागोत्तस्स............ साया वेदणिज इत्यादि ।
प्रज्ञापना सूत्र पद २३ उ० १
एगे पुराणे पगे पावे ।
स्थानांग स्थान १ सूत्र १६
इति श्री - जैनमुनि - उपाध्याय - श्रीमदात्माराम महाराजसंगृहीतत्वार्थ सूत्र जैनागमसमन्वये
अष्टमोऽध्यायः समाप्तः ।
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नवमोऽध्यायः
आस्रवनिरोधः संवरः ॥ १ ॥
निरुद्धासवे ( संवरो ) ।
एगे संवरे ।
स्थाना० स्था० १ उत्तराध्ययन ० २६ सूत्र ११
स गुप्ति समितिधर्मानुप्रेक्षापरीषह
जयचारित्रैः ॥ २ ॥ तपसा निर्जरा च ॥ ३॥
* संवियते कर्मकारणं प्राणातिपातादि निरुध्यते येन परिणामेन स संवरः श्रवनिरोध इत्यर्थः । इति वृत्तिकारः ॥
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नवमोऽध्यायः।
समई गुत्ती धम्मो अणुपेह परीसहा चरित्तं च । सत्तावन्नं भेया पणतिगमेयाइं संवरणे ।।
स्थानांग वृत्ति स्थान १ एवं तु संजयस्सावि, पावकम्मनिरासवे । भवकोडीसंचियं कम्न, तवसा निजरिजइ ।
उत्तराध्ययन अ० ३० गाथा ६ सम्यग्योगनिग्रहो गुप्तिः ॥४॥ गुत्ती नियक्तणे वुत्ता, असुभत्थेसु सब्बसो।
__ उत्तराध्ययन अ० २४ गाथा २६ ईर्ष्याभाषेषणाऽऽदाननिक्षेपोत्सर्गाः समितयः ॥५॥ पंच समिईअो पराणत्ता, तं जहा-ईरियासमिई भासासमिई एसणासमिई आयाणभंडमत्तनिक्खे
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तत्त्वार्थ सूत्र जैनागमसमन्वये
वणासमिई उच्चारपासव राखेलसिंघाण जल्लपारिट्ठावणियासमिई |
समवायांग समवाय ५
उत्तमक्ष मामार्दवार्जवशौचसत्यसंयमतपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्याणि धर्मः
11&11
इसवि समधम्मे परणत्ते, तं जहा - १ खंती, २ मुत्ती, ३ अजवे, ४ मद्दवे, ५ लाघवे, ६ सच्चे, ७ संजमे, ८ तवे, ६ चियाए, १० वंभचेवासे ।
समवायांग समवाय १०
१८०
अनित्याशरणसंसारैकत्वान्यत्वाशुच्यास्त्रवसंवरनिर्जरालोकबोधिदुर्लभधर्मस्वाख्यातत्त्वानुचिन्तनमनुप्रेक्षाः ॥७
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नवमोऽध्यायः ।
१ णिच्चाणुप्पेहा, २ असरगुप्पेहा, ३ एगताणुपेहा, ४ संसारापहा ।
१८१
स्थानांग स्थान ४ उ० १ सू० २४७
अण्णत्ते [ अणुप्पेहा ] ५ - श्रन्ने खलु ातिसंजोगा अन्नो अहमंसि । श्रसुइणुपेहा ६ ।
सूत्रकृतांग श्रुतस्कंध २ ० १ सू० १३ इमं सरीरं अणिच्चं, असुइं असुइसंभवं । श्रसासयावासमिणं, दुक्खकेसारा भायणं ॥
उत्तराध्ययन ग्र १६ गाथा १२
वायागुप्पेहा ७।
स्थानांग स्थान ४३० १ सू० २४७
संवरे [ अह ] ---- जाउ अस्साविणी नावा, न सा पारस्स गामिणी । जा निस्साविणी नावा, सा उ पारस्स गामिणी ॥
उत्तराध्ययन अध्ययन २३ गाथा ७१
जिरे [ गुप्पेहा ] ह । स्थानांग स्थान १ सू०१६
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१८२
तत्त्वार्थ सूत्र जैनागमसमन्वये
लोगे [हा] १० ।
स्थानांग स्थान १ सू० ५
बोहिदुल्ल [ गुप्पेहा ] ११ । संबुज्झह किं न बुज्झह संबोहो खलु पेच्चदुल्लहा । णो ह्रवणमंति राइओ नो सुलभं पुणरावि जीवियं ॥ सूत्रकृतांग प्रथम श्रुतस्कन्ध गाथा १
धम्मे [ अणुष्पहा ] १२– उत्तमधम्मसुई हु दुल्लहा ।
उत्तराध्ययन ०१० गाथा १८
मार्गाच्यवननिर्जरार्थं परिषोढव्याः
परीषहाः ॥ ८ ॥ नो विनिहन्नेजा ।
उत्तराध्ययन ० २ प्रथम पाठ
सम्मं सहमाणस्स.... गिजरा कज्जति ।
स्थानांग स्थान ५ उ०
१ सू० ४०६
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नवमोऽध्यायः ।
१८३
क्षुत्पिपासाशीतोष्णदंशमशकनाग्न्यारतिस्त्रीचर्यानिषद्याशय्याक्रोशवधयाचनाऽलाभरोगतृणस्पर्शमलसत्का
"
रपुरस्कारप्रज्ञाऽज्ञानाऽदर्शनानि ॥ ॥
बावीस परिसहा पणत्ता, तं जहा - २ दिगिंछापरीस २ पिवासापरीसहे, ३ सीतपरीसहे, ४ उसि परीसह. ५ इंसमसगपरीसहे, ६ अचेल - परीस. ७ श्ररइपरीसह = इत्थीपरीस हे
,
चरिपरीसह १० निसीहियापरीसहे, ११ सिजापरीसहे, १२ अक्कोसपरीसहे, १३ वहपरीसहे, १४ जायगा परीसहे, १५ अलाभपरीसहे, १६ रोगपरीसह १७ तराकास परीसहे, १८ जल्लपरीसहे, १६. सक्कारपुरक्कारपरीसह २० परणापरीस हे, २१ राणा परीसहे. २२ दंसणपरीसहे ।
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१८४
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
-
सूक्ष्मसाम्परायछद्मस्थवीतरागयोश्चतुर्दश ॥१०॥
एकादश जिने ॥११॥ बादरसाम्पराये सर्वे ॥१२॥ ज्ञानावरणे प्रज्ञाज्ञाने ॥१३॥ ___दर्शनमोहान्तराययोरदर्शनालाभौ ॥१४॥
चारित्रमोहे नाग्न्यारतिस्त्रीनिषद्याक्रोशयाचनासत्कारपुरस्काराः ॥१५॥ वेदनीये शेषाः ॥१६॥
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नवमोऽध्यायः ।
१०५
एकादयो भाज्या युगपदेकस्मिन्नैकोनविंशतः ॥१७॥
नाणावरणिज्जे णं भंते ! कम्मे कति परीसहा समोयरंति ? गोयमा ! दो परीसहा समोयरंति, तं जहा--पन्नापरीसहे नाणपरीसहे य । वेयणिज्जे णं भंते ! कम्मे कति परीसहा समोयरंति ? गोयमा ! एकारसपरीसहा समोयरंति, तंजहापंचव आणुपुची, चरिया सेज्जा वहे य रोगे। तणफास जल्लमेव य, एक्कारस वेदणिज्जंमि ॥ १॥
दसणमोहणिज्जे णं भंते ! कम्मे कति परीसहा समोयरंति ? गोयमा ! एगे दंसणपरीसहे समोयरइ । चरित्तमोहणिजे णं भंते ! कम्मे कति परीसहा समोयरंति ? गोयमा ! सत्तपरीसहा समोयरंति, तं जहा--
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१८६
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
अरती अचेल इत्थी निसीहिया जायणा य अकोसे। सक्कार पुरकारे चरित्तमोहमि सत्ते ते ॥१॥
अंतराइए णं भंते ! कम्मे कति परीसहा समोर यरंति ? गोवमा! एगे अलाभपरीसहे समोयरइ । सत्तविहवंधगस्स णं भंते ! कति परीसहा पराणता! गोयमा ! वावीसं परीसहा पराणता, वीसं पुण वेदेइ, जं समयं सीयपरीसहं वेदेति णो तं समय उसिणपरीसहं वेदेइ, जं समयं उसिणपरीसहं वेदेइ यो त समयं सीयपरीसहं वेदेइ, जं समयं चरियापरीसहं वेदेति णो तं समयं निसीहियापरीसहं वेदेति जं समयं निसीहियापरीसहं वेदेइ णो तं समयं चरियापरीसहं वेदेह ।
अविहबंधगस्स णं भंते ! कतिपरीसहा पण्णत्ता ? गोयमा ! बावीसं परीसहा पराणत्ता, तं जहा. छहापरीसहे पिवासापरीसह सीयप० दंसप०
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नवमोऽध्यायः ।
१८७
मसगप० जाव अलाभप एवं अविहबंधगस्स वि सत्तविहबंधगसात वि ।।
छविहबधगस्स णं मंते ! सरागछउमत्थस्त कति परीसहा पराग,त्ता ? गोयमा ! चोद्दस परीसहा पराणत्ता । वारस पण वेदेइ । जं समयं सीयपरीसहं वदेइ णो तं समयं उसिणपरीसहं वेदेई । जं समयं उसिणपरीमहं वंदेइ नो तं समयं सीयपरीसहं वेदेइ । जं समयं चरिय परिसहं वेदेइ गो तं समयं सेजापरोसहं वेदेह । जं समयं सेजापरीसहं वेदेति यो त समयं चरियापरीसह वेदे । __ एकविहबंधगस्स णं भंते ! वीयरागछ उमत्थस्स कति परिसहा पराणता ? गोयमा ! एवं चेव जव छब्बिहबंधगस्त मं । पगविहवंधगस्स णं भंते ! सजोगिभवत्थकेवलिरस कति परिस्सहा पराणता ? गोयमा ! एकारसे परीसहा परणता, नव पुण वेदेइ, सेसं जहा छविहवंधगस्स ।
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१८८
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
प्रबंधगस्स णं भंते ! अजोगिभवत्थकेवलिस्स। कति परीसहा परणत्ता ? गोयमा ! एकारस्स परी । सहा पण्णत्ता, नव पुण वेदेइ । जं समयं सीय परीसहं वेदेति नो तं समयं उसिणपरीसहं वेदेइ। जं समयं उसिणपरीसहं वेदेति नो तं समय सीयपरीसहं वेदेइ । जं समयं चरियापरीसहं वेदेई नो तं समयं सेजापरीसहं वेदेति । जं समयं से. जापरीसहं वेदेइ नो तं समयं चरियापरीसहं वेदेइ । व्याख्याप्रज्ञप्ति श० ८ उ० ८ सू० ३४३
सामायिकच्छेदोपस्थापनापरिहारविशुद्धिसूक्ष्मसाम्पराययथाख्यातमिति चारित्रम् ॥१८॥ सामाइयत्थ पढमं, छेदोवढावणं भवे वीयं । परिहारविसुद्धीयं, सुहुम तह संपरायं च ॥ ३२ ॥
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नवमोऽध्यायः।
१८६
अकसायमहक्खायं, छउमत्थस्स जिणस्स वा । एवं चयरित्तकरं, चारित्तं होइ अाहियं ॥३३॥
उत्तराध्ययन अ० २८ गाथा ३२-३३ अनशनावमौदर्यवृत्तिपरिसंख्यानरसपरित्यागविक्तशय्यासनकायक्लेशा बाह्यं तपः ॥ ११ ॥
बाहिरए तवे छविहे पराणत्ते, तं जहा-अणसण ऊणोयरिया भिक्खायरिया य रसपरिच्चायो । काय. किलेसो पडिसलीणया वज्झो ( तवो होई)।
व्याख्याप्रज्ञति श° २५ उ० ७ सू० ८०२ प्रायश्चित्तविनयवैयावृत्यस्वाध्यायव्युत्सर्गध्यानान्युत्तरम् ॥ २० ॥
अभितरए तवे छबिहे पण्णत्ते, तं जहा
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१६०
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमलमन्वये
पायच्छित्तं विणो वेयावच्चं तव सभाओ, भार विउसग्गो।
___ व्याख्याप्रति श० २५ उ० ७ सू० ८० नवचतुर्दशपंचद्विभेदा यथाक्रमं प्राग्ध्यानात् ॥ २१ ॥
आलोचनाप्रतिक्रमणतदुभयविवेकव्युत्सगेतपश्छेदपरिहारोपस्थापनाः २२
णवविधे पायच्छिते पण्णत्ते, तं जहा-आलो. अणारिहे पडिकम्मणारिहे तदुभयारिहे विवेगारिहे विउसग्गारिहे तवारिहे छेदारिहे मूलारिहे अणवद्ध पारिहे।
स्थानांग स्थान ६ सू० ६८८ ज्ञानदर्शनचारित्रोपचाराः ॥२३॥ विणए सत्तविहे, पराणत्ते तं जहा-णाणविणए
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नवमोऽध्यायः ।
दंसणविणए चरितविणए मविए वइविराए कायविए लोगोवयारविणए ।
व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५ उ० ७ सू० ८०२
आचार्योपाध्यायतपस्विशैक्षग्लानगणकुलसंघसाधुमनोज्ञानाम् ॥ २४ ॥
वैयावच्चे दसवि पराणत्ते, तं जहा- ग्रायरियवे श्रवच्चे उवज्झायवेचावळचे सेहवेचावच्चे गिलाणवे श्रवच्चेतवस्सिवे यावच्चे थेरवेश्रवच्चे साहम्मिश्र वेश्रवच्चे कुलवेद्यावच्चे गणवे यावच्चे संघवेश्रा बच्चे |
१६?
व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५ उ० ७ सू० ८०२
वाचनापृच्छनानुप्रेक्षाम्नायधर्मोपदे
शाः ॥ २५ ॥
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१६२ तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
सज्झए पंचविहे पण्णत्ते, तं जहा-बायणा पडि पुच्छणा, परिअट्टणा अणुप्पेहा धम्मकहा।
___ व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५ उ० ७ सू० ८०२ बाह्याभ्यन्तरोपध्योः ॥२६॥ विउसग्गे दुविहे पण्णत्ते, तं जहा-दव्वविउसग्गे य भावविउसग्गे य।
व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५ उ० ७ सू० ८०२ उत्तमसंहननस्यैकाग्रचिन्तानिरोधो ध्यानमान्तर्मुहर्तात् ॥२७॥
केवतियं काल अवटियपारिणामे होजा? गो. यमा ! जहन्नेणं एक समयं उक्कोसेण अन्तमुहत्तं ।
__ व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५ उ० ६ सू० ७७० अंतोमुहुत्तमित्तं चित्तावत्थाणमेगवत्थुम्मि । छउमत्थाणं झाणं जोगनिरोहो जिणाणं तु ॥
स्थानांगवृत्ति० स्थान ४ उ० १ सू० २४७
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नवमोऽध्यायः ।
श्रार्त्तरौद्रधर्मशुक्लानि ॥२८॥
चत्तारि कारणा परणता, तं जहा श्रद्धे झाणे, रोद्दे झाणे, धम्मे झाणे, सुक्के झाणे ।
व्याख्याप्रज्ञमि श० २५ उ० ७ ० ८०३
-
१६३
परे मोक्ष हेतुः ॥ २६ ॥
धम्मसुकाई भारगाई झाणं तं तु बुहा वए ।
उत्तराध्ययन अ० ३० गाथा ३५
आर्त्तममनोज्ञस्य संप्रयोगे तद्विप्रयोगाय स्मृतिसमन्वाहारः ॥ ३० ॥
श्रट्टे भाणे चविहे परणते, तं जहा - श्रमरणुन्न संपयोगसंपत्ते तस्स विप्पयोग सति समन्नागए यावि भवइ ।
व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५ उ० ७ सू०८० ३
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१६४ तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये विपरीतं मनोज्ञस्य ॥३१॥ मणुन्नसंपयोगसंपउत्ते तस्स अविप्पभोग सति समण्णागते यावि भवति ।
व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५ उ० ७ सू० ८०३ वेदनायाश्च ॥३२॥ प्रायंकसंपयोगसंपउत्ते तस्ल विप्पयोग सति समरणागए यावि भवति ।
व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५ उ० ७ सू० ८०३ निदानश्च ॥३३॥ परिजसितकामभोगसंपोगसंपउत्ते तस्स अविप्पभोग सति समरणागए यावि भवइ ।
व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५ उ० ७सू० ८०३ तदविरतदेशविरतप्रमत्तसंयतानाम् ॥३४
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नवमोऽध्यायः। . . .
२६५
-
-
अट्टरुद्दाणि वज्जित्ता, भाएज्जा सुसमाहिये। धम्पसुकाई झाणाई झाणं तं तु वहावए ॥
__उत्तराध्ययन अध्ययन ३० गाथा ३५ हिंसानृतस्तेयविषयसंरक्षणेभ्यो रौद्रमविरतदेशविरतयोः ॥३५॥
रोदज्झाणे चउब्विह पराणत्ते, त जहा-हिंसाणुबंधी मोसाणुबंधी तेयाणुबंधी सारक्खणाणुबंधी।
व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५ उ० ७ सू० ८०३ आज्ञापायविपाकसंस्थानविचयाय धम्यम् ॥३६॥
धम्मे भाणे चउब्धिहे पणत्ते, तं जहा-आणाविजए, अबायविजए, विवागविजए, संठाणविजए ।
व्याख्याप्रज्ञप्तिश० २५ उ० ७ सू० ८०३
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१६६ तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
शुक्ने चाये पूर्वविदः ॥३७॥ सुहमसंपरायसरागचरित्तारिया य बायरसंपरायसरागवरित्तारिया य,.......उवसंतकसायवीय. रायवरित्तारिया य खीणकसाय वीयरायचरित्तारि. या च।
प्रज्ञापना सूत्र पद १ चारित्राय विषय परे केवलिनः ॥३८॥
सजोगिकेवलिखीणकसायवीयरायचरित्तारिया य अजोगिकेवलिखीणकसायवीयरायचरित्तारिया य ।
प्रज्ञा पनासूत्र पद १ चारित्रार्यविषय पृथक्त्वैकत्ववितर्कसूक्ष्मक्रियाप्रतिपातिव्यपरतक्रियानिवर्तीनि ॥३६॥
सुके झाणे चउबिहे पराणत्ते, तं जहा-१ पुहुत्तवितके सवियारी, २ एगत्तवितके अवियारी,
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नवमोऽध्यायः।
३ सुहुमकिरिते अणियट्ठी, ४ समुच्छिन्नकिरिए अप्पडियाती।
व्यारव्याप्रज्ञप्ति श० २५ उ० ७ सू० ८०३ त्र्येकयोगकाययोगायोगानाम् ॥४०॥ सुहमसंपरायसरागचरित्तारिया य बायरसंपरायसरागचरित्तारिया य,........उवसंतकसायवी. यरायचरित्तारिया य खीण कसायवीयरायचरित्तारिया य।
सजोगिकेवलिखीणकसायवीयरायचरित्तारिया य अजोगिके वलिखीणकसायवीयरायचरित्तारिया य।
प्रज्ञापना सूत्र पद १ चारित्रार्यविषय एकाश्रये सवितर्कविचारे पूर्वे ॥४१॥
अविचारंद्वितीयम् ॥ ४२ ॥ वितर्कः श्रुतम् ॥४३॥
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ass तत्त्वार्थसुत्रजैनागमसमन्वये
विचारोऽर्थव्यञ्जनयोगसंक्रान्तिः॥४४ उप्पायटितिभंगाई पजयाणं जमेगदव्वमि । नाणानयाणुसरणं पुवगयसुयाणुसारेणं ॥१॥ सवियारमत्थवंजणजोगंतरो तयं पढमसुकं । होति पहुत्तवियकं सवियारमरागभावस्स ॥२॥ जं पण सुनिप्पकंपं निवायसरणप्पईमिव चित्तं । उप्पायटिइभंगाइयाणमेगंमि पजाए ॥३॥ अवियारमत्थवंजणजोगंतरो तयं बिइयसुकं । पुव्वगयसुयालंबणमेगत्तवियकमवियारं ॥४॥
___ स्थानांग सूत्र वृत्ति स्था० ४ उ० १ सू० २४७ सम्यग्दृष्टि श्रावकविरतानन्तवियोजकदर्शनमोहक्षपकोपशमकोपशान्तमोहक्षपकक्षीणमोहजिनाः क्रमशोऽ
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नवमोऽध्यायः ।
१६६
संख्येयगुणनिर्जराः ॥४५॥
कम्मविसोहिमगणं पडुच्च च उदस जीवट्ठाणा पएणत्ता, तं जहा-....अविरयसम्मदिट्ठी विरयाविरए पमत्तसंजए अप्पमत्तसंजए निपट्टीबायरे अनिअट्टिबायरे सुहमसंपराए उवसामए वा खवए वा उवसंतमोहे खीणमोहे सजोगी केवली अजोगी केवली ।
समवायांग समवाय १४ पुलाकबकुशकुशील निर्ग्रन्थस्नातका निर्ग्रन्थाः ॥४६॥
पंच णियंठा पन्नत्ता, तं जहा-पुलाए बउसे कुसीले णियंठे सिणाए।
व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५ उ० ५ सू० ७५१
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२०० तत्त्वार्थसूत्र जैनागमसमन्वये
संयमश्रुतप्रति सेवनातीर्थलिङ्गलेश्यो - पपादस्थानविकल्पतः साध्याः ॥४७॥
पडिसेवणा गाणे तित्थे लिंग-खेत्ते काल गर संजम ....... लेसा ।
व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५ ३० ५ सू० ७५१
इति श्री - जैनमुनि - उपाध्याय - श्रीमदात्माराम महाराजसंगृहीते तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये नवमोऽध्यायः समाप्तः ।
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दशमोऽध्यायः
मोहदयाज्ज्ञानदर्शनावरणान्तराय
क्षयाच्च केवलम् ॥१॥
वीमोहस्स णं श्ररओ ततो कम्मंसा जगवं खिजंति, तं जहा - नारणावरणिजं दंसणावरणिजं अंतरातियं ।
स्थानांग स्थान ३ उ० ४ सू० २२६ तप्पढमयाए जहाणुपुञ्चीए वीसइविहं मोहणिजं कम्मं उग्वाएइ, पंचविहं नाणावर णिजं, नवविहं दंसणावरणिज्जं पंचविहं श्रन्तराइयं, एए तिनि विक्रम्मंसे जुगवं खवेइ ।
उत्तराध्ययन अध्ययन २६ सू० ७१
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२०२ तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये .
बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यां कृत्स्नकर्म विप्रमोक्षो मोक्षः ॥२॥
अणगारे समुच्छिन्नकिरियं अनियट्टिसुक्कज्माण झियायमाणे वेयणिजं अाउयं नामं गोत्तं च एए चत्तारि कम्मसे जुगवं खवेइ ।
उत्तराध्ययन अध्ययन २६ सू० ७२ औपशमिकादिभव्यत्वानाञ्च ॥३॥ नोभवसिद्धिए नोभवसिद्धिए।
___ प्रज्ञापना पद १८ अन्यत्र केवलसम्यक्त्वज्ञानदर्शन. सिद्धत्वेभ्यः ॥४॥
* खीणमोहे (केवलसम्मत्तं ) केवलणाणी,
* सिद्धा सम्मदिठी (सिद्धाः सम्यग्दृष्टिः) प्रज्ञापना १६ सम्यक्त्व पद ।
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दशमोऽध्यायः ।
सी सिद्धे ।
२०३
अनुयोगद्वारसूत्र परणामाधिकार सू० १२६
तदनन्तरमूर्ध्वं गच्छत्यालोकान्तात्
119.11
अणुपव्वेणं टु कम्म पगडिओ खवेत्ता गगणतलमुप्पइत्ता उप्पि लोयग्गपतिद्वारणा भवन्ति ।
ज्ञाताधर्मकथांग अध्ययन ६ सू० ६२
पूर्वप्रयोगादसंगत्वाद्वंधच्छेदात्तथा
गतिपरिणामाच्च ॥ ६॥ आविद्धकुलालचक्रवद्वयपगतलेपालबुवदेरण्डबीजावदग्निशिखावच्च ॥७॥
अस्थि
भंते! अकम्मस्स गती पन्नायति ? हंता त्थि, कन्नं भंते! कम्मस्स गती पन्नायति ?
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तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
गोयमा ! निस्संगयाए निरंगण्याए गति परिणामे बंधणछेयणयाप निरंधण्याए पुव्यपयोगेणं श्रक म्मस्स गती पन्नत्ता । कहन्नं भंते! निस्संगयाए निरंगण्याए गइपरिणामेणं बंधरणछेयणयाए निरंध गयाए पुग्वप्पोगेणं श्रकम्मस्स गती पन्नायति ? से जहानामए, केई पुरिसे सुक्कं तुंबं निच्छि निरुवहयं श्रणुपुच्चीए परिकम्मेमाणे २ दब्भेहि य कुसेहि य वेढेइ २ अहिं महियालेवेहिं लिंपइ २ उहे दलयति भूर्ति २ सुक्कं समागं श्रत्थाहमतारमपोरसियंसि उदगंसि पक्खिवेजा, से नूणं गोयमा ! से तुंबे तेसिं श्रहं मट्ठियालेवेणं गुरुयत्ताए भा रित्ताए गुरुसंभारियत्ताए सलिलतलमतिवइत्ता
हे धरणितलपइद्वाणे भवइ ? हंता भवइ, अहे गं से तुंबे राहं मट्ठियालेवेणं परिक्खएणं धरणितलमतिवइत्ता उपि सलिलतलपइट्ठाणे भवइ ? हंता भवइ, एवं खल गोयमा ! निस्संगयाए निरंगण्याए
२०४
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दशमोऽध्यायः ।
परिणामेणं श्रकम्मस्स गई पन्नायति । कद्दन्नं भंते! बंधणछेदण्याए कम्मस्स गई पन्नत्ता ? गोमा ! से जहानामए - कलसिंवलियाइ वा मुग्गसिंवलियाइ वा माससिंवलियाइ वा सिंबलिसिंबलियाह वा एरंडमिंजियाइ वा उरहे दिन्ना सुक्का समाणी फुडित्ताणं एगंतमंतं गच्छइ, एवं खलु गोयमा ! ० | कहन्नं भंते ! निरंधण्याए कम्मस्स गती ? गोयमा ! से जहानामए - धूमस्स इंधणविप्यमुक्कस्स उड़दं वीससाए निव्वाघापणं, गती पवत्तति, एवं खलु गोयमा ! ० | कहन्नं भंते ! पुत्रपोगेणं कम्मस्स गती पन्नता ? गोयमा ! से जहानामए - कंडस्स कोदंडविप्पमुकस्स लक्खाभिमुही निव्वावाएगं गती पवत्तइ, एवं खलु गोयमा ! नीसंगयाए निरंगण्याए जाव पुत्र्वपोगेणं श्रकम्मस्स गति व्याख्याप्रज्ञप्ति श० ७ उ० १ सू० २६५
पण्णत्ता ।
२०५
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२०६
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
धर्मास्तिकायाभावात् ॥८॥ चउहिं ठाणेहिं जीवाय पोग्गला य णो संचातेति बहिया लोगंता गमणताते, तं जहा--गतिभावेणं णिरुवग्गहताते लुक्खताते लोगाणुभावेणं ।
___ स्थानांगस्थान ४ उ० ३ सू० ३३७ क्षेत्रकालगतिलिंगतीर्थचारित्रप्रत्येकबुद्धबोधितज्ञानावगाहनान्तरसंख्याल्पबहत्वतः साध्याः ॥६॥ खेत्तकालगईलिङ्गतित्थे चरित्ते।
___ व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५ उ० ६ सू० ७५१ पत्तेयबुद्धसिद्धा बुद्धबोहियसिद्धा।
नन्दिसूत्र केवलज्ञानाधिकार नाणे खेत्त अन्तर अप्पाबहुयं ।
व्याख्याप्रज्ञप्ति श० २५ उ० ६ सू० ७५१
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दशमोऽध्यायः ।
२०७
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सिद्धाणोगाहणा संख्या ।
उत्तराध्ययन अध्ययन ३६ गाथा ५३ इति श्री-जैनमुनि-उपाध्याय-श्रीमदात्माराम-महाराज
संगृहीते तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
दशमोऽध्यायः समाप्तः ।
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गुरुप्पसत्थी
नायसुत्रो वद्धमाणो नायसुत्रो महामुणी । लोगे तित्थयरो अासी अपच्छिमो सिवंकरो ॥१॥ सतित्थे ठवित्रो तेण पढमो अणुसासगो । सुहम्मो गणहरो नाम तेअंसी समणञ्चिश्रो ॥२।। तत्तो पट्टिो गच्छो सोहम्मो नाम विस्सुनो। परंपराए तत्थासी सूरी चामरसिंघो ॥३॥ तस्स संतस्स दंतस्स मोतीरामाभिहो मुणी । होत्थ सीसो महापन्नो गणिपय विभसिश्रो ॥४॥ तस्स पट्टे महाथेरो गणावच्छेअगो गुणी । गणपतिसन्निश्रो साहू सामएणगुणसोहिरो ॥५॥ तस्स सीसो गुरुभत्तो सो जयरामदासभो। . गणावच्छेअगो अस्थिसमोमुत्तो व्व सासणे ॥६॥
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गुरुप्प सत्थी ।
तस्स सीसो सच्चसंधो पवट्टगपयंकि श्री । सालिग्गामो महाभिक्खू पावयणी धुरंधरो ॥७॥ तस्संतेवासिणा भिक्खु अप्पारामेण निम्मिश्रो । उवज्झायपयंकेणं तत्तत्थस्स समन्नश्रो ||८|| तत्तत्थमूलसुत्तस्स जं बीअं उवलब्भइ । जिणागमेसु तं सव्वं संखेवेणेत्थ दंसि ॥६॥ इगूणवीसानवइ विक्कमवासेसु निम्मिश्रो एस । दिल्ली नामयनयरे मुक्ख सत्थस्स य समन्नयो ॥ १०॥
२०६
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परिशिष्ट नं० १
तदिन्द्रियानिन्द्रियानिमित्तम् ॥१४॥
तत्र 'नोइंदियप्रत्थावग्गहो' ति नोइन्द्रियं मनः तच्च द्विधा द्रव्यरूपं भावरूपं च तत्र मनःपर्याप्तिनामकर्मोदयतो यत् मनःप्रायोग्यवर्गणादलिकमादाय मनस्त्वेन परिणमितं तद्रव्यरूपं मनः, तथा चाह चूरिणकृत् - "मणपजत्तिनामकम्मोदयश्रो तजोगे मणोदव्वे घेत्तुं मरणत्तेण परिणामिया दव्वा दव्वमणो भण्णइ ।” तथा द्रव्यमनोऽवष्टम्भेन जीवस्य यो मननपरिणामः स भावमनः, तथा चाह चूर्णि कार एव - " जीवो पुण मणणपरिणामगिरियापन्नो
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परिशिष्ट ।
२११
भावमनो, किं भणियं होइ ?-मणदव्वालंबणो जीवस्स मणणवावारो भावमणो भएणई" तोह भावमनसा प्रयोजनं, तद्ग्रहणे ह्यवश्यं द्रव्यमनसोऽपि ग्रहणं भवति, द्रव्यमनोऽन्तरेण भावमनसोऽसम्भवात्, भावमनो विनापि च द्रव्यमनो भवति, यथा भवस्थकेवलिनः, तत उच्यतेभावमनसेह प्रयोजनं, तत्र नोइन्द्रियेण-भावमनसाऽर्थावग्रहो द्रव्येन्द्रियव्यापारनिरपेक्षो घटाद्यथेस्वरूपपरिभावनाभिमुखः प्रथममेकसामयिको रूपाद्यर्थाकारादिविशेषचिन्ताविकलोऽनिदश्यसामान्यमात्रचिन्तात्मको बोधो नोइन्द्रियार्थावग्रहः।
नन्दिसूत्र वृत्ति मतिज्ञान वर्णन
श्रुतं मतिपूर्वं द्वथनेकद्वादशभेदम्
॥२०॥
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तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
,
"
अंगबाहिरं दुबिहं पराणत्तं तं जहा - श्रावस्सयं च श्रावस्सय वइरितं च । से किं तं श्रवस्सयं ? श्रावस्सयं छव्विहं पण्णत्तं तं जहा -- सामाइयं चडवीसत्थवो वंदणयं पडिक्कमणं काउस्सग्गो पच्चक्खाणं, सेत्तं श्रावस्सयं । से किं तं श्रवस्यवइरित्तं ? आवस्सयवइरित्तं दुविहं पराणत्तं तं जहा कालिश्रं च उक्कालिश्रं च ! से किं तं उक्कालिश्रं ? उक्कालिअं अणेगविहं पराणन्तं तं जहा-दसवेलियं कन्पिाकपित्र्यं चुल्लकप्पसुश्रं महाकप्पसूत्र कप्पा उववाइ रायपसेणिश्रं जीवाभिगमो
पराणवणा महापराणवरणा पमायप्पमायं नंदी अणुगदराई देविदत्थश्र तंदुलवेलिश्रं चंदाविज्भयं सूरपराणति पोरिसिमंडलं मंडलपवेसो वि जाचरणविणिच्छश्रो गणिविज्ञा भाणविभत्ती मरणविभत्ती आयविसोही वीयरागसुत्रं संलेहणासुत्रं विहारकप्पो चरणविही श्राउरपच्चक्खाणं महा
२१२
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परिशिष्ट ।
पञ्चक्खाणं एवमाइ, से तं उक्काल्लिअं । से किं तं कालिअं ? कालिअं अणेगविहं पराणत्तं, तं जहा-- उत्तरज्झयणाई दसाओ कप्पो ववहारो निसीहं महानिसीहं इसिभासिप्राइं जंबदीवपन्नती दीवसागरपन्नत्ती चंदपन्नत्ती खड्डिा विमाणपविभत्ती महल्लिा विमाणपविभत्ती अंगचलिआ वग्गचलिया विवाहचलिया अरुणोववाए वरुणोववाए गरुलोववाए धरणोववाए वेसमणोववाए वेलंधरोववाए देविंदोववाए उट्ठाणसुए समुट्ठाणसए नागपरिश्रावणिपात्रो निरयावलिआओ कप्पिात्रो कप्पडिसिश्राो पप्फिात्रो पुप्फचूलिपात्रो वरहीदसाओ, एवमाइयाई चउरासीइं पइन्नगसहस्साई भगवो अरहो उसहसामिस्स आइतित्थयरस्स तहा संखिज्जाइं पइन्नगसहस्साई मज्झिमगाणं जिणवगणं चोदसपइन्नगसहस्साणि भगवो वद्धमाणसामिस्स, अहवा जस्स जत्तिा सीसा
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२२४
तत्त्वार्थसूत्रजैनागमसमन्वये
उप्पत्तिाए वेणइआए कम्मियाए पारिणामिश्राए चउविहाए बुद्धिए उववेत्रा तस्स तत्तिश्राई पइराणगसहस्साइं, पत्तेप्रबुद्धावि तत्तिश्रा चेव, सेत्तं कालिअं, सेत्तं श्रावस्सयवइरितं, से तं अणंगपविढे ।
नन्दी सूत्र ४४ संज्ञिनः समनस्काः ॥२४॥ जीवा णं भंते ! किं सरणी असण्णी नोसराणीनोअसरणी ? गोयमो ! जीवा सराणीवि असराणीवि नोसरणीनोअसरणीवि । नेरइयाणं पुच्छा? गोयमा ! नेरइया सराणीवि असरणीवि नो नोसराणीनोअसरणी, एवं असुरकुमारा जाव थणियकुमारा। पुढविकाइयाणं पुच्छा ? गोयमा ! नो सगणी असरणी, नो नोसगणी नोअसरणी। एवं बेइंदि. यतेइंदियचरिंदियावि । मणुसा जहा जीवा,
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परिशिष्ट ।
२१५
पंचिदियतिरिक्खजोगिया वाणमंतरा य जहा नेरइया, जोतिसियवेमाणिया सराणी नो असरणी नो नोसरणीनोसरणी । सिद्धाणंपुच्छा ? गोयमा ! नो सरणी नो असरणी नोसरणीनोसरणी । नेरइयतिरियमरणुया य वणयरगसुरा इ सराणीऽसराणी य | विगलिंदिया असरणी जोतिसवेमाणिया सरणी । पण्णवणाए सरगीपयं समन्तं ।
प्रज्ञापना ३१ संज्ञापद सूत्र ३१५
·
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परिशिष्ट नं० १ ( शेषभाग)
निम्नलिखित पाठ पृष्ठ १७६ ० ८ सूत्र २४ के साथ सम्बन्ध रखता है
कतिणं भंते कम्म पगडीओो पण्णत्ताश्रो, गोयमा ! अटु कम्म पगडिओ पण्णत्ताओ जहा - नाणावरणिजं जाव अंतराइयं । नेरइयाणं, भंते ? कइ कम्म पगडीओ परन्ताश्र गोयमा श्रद्ध एवं सव्वजीवाणं अटु कम्म पगडीओ ठावेयव्वाश्र जाव वेमाणियाणं नाणावर णिजस्स गं भंते कम्मस्स केवतिया अविभागपलिच्छेदा पण्णत्ता गोयमा अरांता श्रविभागपरिच्छेदा परणत्ता नेरइयाणं भंते नाणावर णिज्जस्स कम्मस्स केवितया श्रविभाग पलिच्छेदा पण्णत्ता गोयमा अता श्रविभागपलिच्छेदा पण्णत्ता एवं सव्व जीवाणं जाव वेमाणियाणं पुच्छा गोयमा
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(
२१८ )
अणंता अविभागपलिच्छेदा पराणत्ता एवं जहा नाणा वरणिजस्स अविभाग पलिच्छेदा भणिया तहा अढण्हवि कम्म पगडीणं भाणियव्वा जाव वेमाणियाणं अंतराइयस्स एगमेगस्स णं भंते जीवस्स एगमेगे जीवपएसे णाणावरणिजस्स कम्मस्स केवइएहिं अविभाग पलिच्छेदेहिं आवेढिए परिवे. ढिए सिया गोयमा सिए आवेढिय परिवेढिए सिय नो आवेढिए परिवेढिए जइ आवेढिय परिवेढिए नियमा अणंतेहिं एगमेगस्सणं भंते नेरइयस्स एगमेगे जीवपएसे नाणावरणिजस्स कम्मस्स केवरएहिं अविभागपलिच्छेदेहिं आवेढिए परिवेढिते गोयमा नियमा अणंतेहिं जहा नेरइयस्स एवं जाप वेमाणियस्स नवरं मणसस्स जहा जीवस्स ! एग मेगस्स णं ! भंते जीवस्स ! एगमेगे! जीवपएसे दरिसणावरणिजिस्स ! कम्मस्स ! केवतिएहिं एवं ! जहेव ! नाणावरणिजस्स ! तहेव दंडगो!
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(
२२६
)
भाणियव्वो ! जाव ! वेमाणियस्स एवं! जाव! अंतराइयस्स ! भारिणयव्वं नवरं वेयणिजस्स ! आउयस्स! णामस्स गोयस्स! एएसिं ! चउराहवि! कम्माणं मणसस्स जहा ! नेरइयस्स ! तहा! भाणियव्वं ! सेसंतं ! चेव ।
___ व्याख्याप्रज्ञप्ति शतक ८ उद्देश १० सू० ३५९ निम्नलिखित पाठ पृष्ट २०० अध्याय ६ सूत्र ४७ के साथ
सम्बन्ध रखता है। १ पराणवण २ वेद ३ रागे४ कप्प ५ चरित्त ६ पडिसेवणा ७ णाणे - तित्थे 8 लिंग १० सरीरे १५ 'खेत्ते १२ काल १३ गइ १४ संजम १५ निगासे ॥१॥ १६ जोगु १७ वयोग १८ कसाए १६ लेसा २० परिणाम २१ बंध २२ वेदेय २३ कम्मोदीरण २४ उवसंपजहन्न २५ सन्नाय २६ आहारे ॥२॥ २७ भव १८ गरिसे २६ कालं ३० श्राहारे ३१ समुग्धाय
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२२० )
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३२ खेत्त ३३ फुसणाय ३४ भावे ३५ परिणामे ३६ विय अप्पाबहुअं (यं) ३७ नियंठाणं ॥३॥ निम्नलिखित पाठ पृष्ठ ५६ तृतीयोऽध्याय प्रथम सूत्र के साथ
सम्बन्ध रखता है। अहोलोगेणं सत्त पुढवीश्रो पण्णत्तानो । सत्तघणोदहीनो पएणत्तानो सत्त घणवायाश्रो प० । सत्त तणुवाया प० । सत्त उवासंतरा । प. एए सुणं सत्तसु उवासंतरेसु सत्ततणुवाया पइट्ठिया । एएसुणं . सत्तस तणुवाए सत्त घण वाया पइट्ठिया, सत्तसु घणवाएसु सत्त घणोदही पइट्ठिया, एएसुणं सत्तसु घणोदहीसु पिंडलग पिहुल संठाण संठियात्री सत्त पुढवीश्री पराणत्तानो तंजहा पढमा जाव सत्तमा। एयासिणं सत्तएहं पुढवीणं सत्तणाम धेजा पण्णत्ता तं जहा घम्मा वंसा सेला अंजणा रिद्वा मघा माघवई। एयासिणं सत्तरह पुढवीणं सत्त गोता पण्णता तं जहा रयणप्पभा
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२२१)
करप्पभा वालुयप्पभा पंकप्पभा धूमप्पभा तमा
मतमा ।
ठाणांग सूत्र, ठाणा ७
'निम्नलिखित पाठ पहिला अध्याय पृष्ठ २८ की अंतिम पंक्तियों के साथ सम्बन्ध रखता है ।
विसेसिया मइ मइ नाणंच । मइ अन्नाणं च ॥ विसेसिया सम्मद्दिस्सि मई । मइ नाणं । मिच्छादिट्ठिस्स | मइ मइ अन्नाणं अविसेसि सुयं सुयनाणं च सुय अन्नाणं च विसेसिश्रं सुयं सम्मद्दिद्विस्स सुयं नाणं मिच्छाहिद्विस्स सुयं सुय अन्नाणं ॥
नन्दिसूत्र सूत्र २५ ॥
निम्नलिखित पाठ अध्याय २ सूत्र ५३ पृ० ५७ से सम्बन्ध रखता है ।
नेरइयाणं भंते ! कइया भागावसेसाज्या परभविप्राउयं पकति ? गोयमा ! नियमा छम्मासा
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( २२२ )
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वसेसाउया परभवियाउयं पकरेंति ? एवं असर कुमारावि जाव थणियकुमारा ॥ पुढविकाइयाण भंते ! कइया भागा वसेसाउया परभवियाउयं पक. रेति ? गोयमा ! पुढविकाइया दुविहा पराणत्ता : तं जहा सोवकम्माउयाय निरुवकम्माउयाय, तत्थणं जेते निरुवक्कमाउया ते नियमा तिभागा वसेसाउया परभवियाउयं पकरेंति ॥ तत्थणं जेते सोवकमा उया तेणं सियं तिभाग बसेसाउया परभवियाउयं पकरेंति, सियतिभागतिभागावसेसाउय परभवियाउयं पकरेंति, सियतिभागतिभागतिभागावसेसाउया परभवियाउयं पकरेंति, भाउतेउवाउ वणस्सइ काइयाणं बेइंदिय तेइंदिय चउरिदियाणवि एवं चेव ॥
पंचेंदिय तिरिक्खजोणियाणं भंते ! कइभागा वसेसाउया परभवियाउयं पकरैति, ? गोयमा! पंचेंदिय तिरिक्खजोणिया दुविहा पराणत्ता तं जहा
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( २२३ )
संखिज वासाउयाय असंखिजवासाउयाय ॥ तत्थणं जेते असंखेजवासाउया ते नियमा छम्मासावसेसाउया परभवियाउयं पकरेति तत्थणं जेते संखिज वासाउयते दुविहा परणत्ता तं जहा सोवकमाउ प्राय निरुवकमाउआय तत्थणं जेते निरुवक्कमाउअयाय ते नियमा तिभागवसेसाउया परभवियाउयं पकरेंति ॥ तत्थणं तेते सोवकमाउया तेणं सियति भागावसेसाउया परभवियाउयं पकरेंति, सिय तिभागासियतिभागतिभागावसेसाउया परभवियाउयं पकरेंति, सियतिभागतिभागतिभागावसेसाउया परभवियाउयं पकरेंति ॥ एवं मणुस्सावि वाणमंतर जोइसिय वेमाणिया जहा नेरया ॥
पन्नवणा श्वासोश्वास पद६ सूत्र २४ ॥ ____ तो अहाउयं पालेति तं जहा अरहंता चक्कवट्टी वलदेव वासुदेवा ॥
ठाणांग ३ उ० १ सू० ३४
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( २२४ )
जीवाणं भंते ! किं सोवकमाउया णिरुवक्कमाउया ? गोयमा ! जीवा सोवक्कमाउयावि णिरुवकमाउयावि ॥१॥णेरइयाणं पुच्छा ? गोयमा ! णेरइया णो सोवक्कमाउया, णिरुवक्कमाउयावि । एवं जाव थणियकुमारा ॥ पुढवी काइया जहा जीवा । एवं जाव मणुस्सा । वाणमंतर जोइस वेमाणिया जहा णेरइया ॥२॥
भगवती सूत्र शतक २० उ० १०
000000000
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परिशिष्ट नं०२ त० अ० ६ सूत्र ७ से इस पाठ का संबंध है। जीवेणं भंते ! अधिगरणी अधिगरणं ? गोयमा ! जीवे अधिगरणी वि अधिगरणंपि । से केणटेणं भंते ! एवं वच्चइ जीवे अधिगरणीवि अधिगरणंपि? गोयमा ! अविरतिं पडच्च । से तेणटेणं जाव अधिगरणंपि । णेरइएणं भंते ! किं अधिगरणी अधिगरणं ? गोयमा ! अधिगरणीवि अधिगरणंपि ! एवं जहेव जीवे तहेव णेरइएवि । एवं णिरंतरं जाव वेमाणिए । जीवेणं भंते ! किं साहि गरणी णिरहिगरणी ? गोयमा ! साहिगरणी णो णिरहिगरणी । से केणटेणं पुच्छा ? गोयमा ! अविरतिं पडच्च । से तेणटेणं जाव णो णिरहिगरणी । एवं जाव वेमाणिए ! जीवेणं भंते ? किं
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( २२६ )
श्रायाहिगरणी पराहिगरणी तदुभयाहिगरणी ? गोयमा ! आयाहिगरणी वि पराहिगरणी वि तदुभया हिगरणीवि ! से केणद्वेगं भंते ! एवं वुच्चर जाव तदुभयाहिगरणीवि । गोयमा ! अविरतिं पडुच्च से तेणद्वेगं जाव तदुभयाहिगरणीवि । एवं जाव। मारिए | जीवाणं भंते । अधिगरणे किं श्रयप्पश्रगणिव्वत्तिए परम्पओ गणिव्वत्तिए तदुभयप्पश्रगणिव्वत्तिए ? गोयमा ! आयप्पयोग णिव्यत्तिए वि परप्पणि व्यत्तिए वि तदुभयप्प श्रगणि व्वत्तिए वि । से केणटुणं भंते ! एवं बुन्नइ ? गोयमा ! अविरति पडुच्च ! से तेणद्वेगं जाव तदु- ' भयपगणिव्वत्तिए वि एवं जाव वेमाणियाणं । कइणं भंते! सरीरगा पण्णत्ता ? गोयमा । पंच सरीरगा पण्णत्ता - तं जहा श्ररालिए जाव कम्मए । कइणं भंते! इंदिया पण्णत्ता ? गोयमा पंच इंदिया पराणत्ता - तं जहा सोइंदिय जाव *
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(
२२७ )
फासिदिए । कइणं भंते । जोए पगणत्ते ? गोयमा ! तिविहे जोए पराणत्ते-तं जहा मणजोए वयजोए कायजोए । जीवेणं भंते ! ओरालियसरीरं णिव्वत्तेमाणे किं-अधिगरणी अधिगरणं ? गोयमा ! अधिगरणी अधिगरणंपि । से केणद्वेणं भंते ! एवं घुच्चइ अधिगरणी वि अधिगरणंपि ? गोयमा ! अविरतिं पडुच्च । से तेणटेणं जाव अधिगरणंपि । पुढ़वी काइएणं भंते ! श्रोरलियसरीरं णिवत्ते माणे किं अधिगरणी अधिगरणं ? एवं चेव । एवं जाव मणुस्से । एवं वेउब्वियसरीरं पि णवरं जस्स अस्थि । जीवेणं भंते ! आहारगसरीरं णिव्वत्तेमाणे किं अधिगरणी पुच्छा ? गोयमा ! अधिगरणीवि अधिगरणंपि । से केणद्वेणं जाव अधिगरणंपि ? गोयमा ! पमादं पडुच्च ! से तेणटेणंजाव अधिगरणंपि । एवं मणुस्सेवि । तेया सरीरं जहा श्रोरालियं । णवरं सव्व जीवाणं भाणियव्वं । एवं
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(
२२८
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कम्मगसरीरंवि । “जीवेणं भंते" सोइंदियं खि व्वत्तेमाणे किं-अधिगरणी अधिगरणं ? एवं जहेव श्रोरालियसरीरं तहेव सोइंदियंपि भाणि यव्वं ! णवरं जस्स अत्थि सोइंदियं । एवं चक्खिदिय-घाणंदिय-जिम्भिदिय-फासिंदिया णवि नवरं जाणियव्वं जस्स जं अस्थि । जीवेणं भंते मणजोगं णिव्वत्तेमाणे किं अधिगरणी अधि. गरणं ? एवं जहेव सोइंदिय, तहेव गिरवसेस, वइजीगो एवं चेव । णवरं एगिदियवजाणं । एवं कायजोगो वि णवरं सव्वजीवाणं । जाव वेमा णिए । सेवं भंते भंतेत्ति ॥
व्याख्याप्रज्ञप्ति, शतक १६ उद्देश्य १ त० अ० ६ सूत्रह से इस पाट का सम्बन्ध है।
जेणं णिगंथी वा जाव पडिग्गहेत्ता गुणुप्पायर हेऊ अणादव्येणं सद्धिं संजोएत्ता आहारमाहरे एस णं गोयमा ! संजोयणा दोसदुद्वे पाणभोयणे
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( २२६ )
एएणं गोयमा ! सइंगालस्स सधूमस्स संजोयणा दोसदुद्धस्स पाणभोयणस्स अट्टे पण्णत्ते ! मह भंते ! वीइंगालस्स वीयधमस्स संजोयणा होसविप्पमुक्कस्स पाणभोयणस्स के अटे पण्णत्ते ! गोयमा । जेणं णिग्गंथे वा जाव पडिग्गहेत्ता असमुच्छिए जाव आहारइ ! एसणं गोयमा ! वीइंगाले पाणभोयणे ! जेणं निग्गंथे वा जाव पडिग्गहेत्ता नो महया अप्पत्तियं जाव आहारेइ, एसणं गोयमा ! वीयधमे पाणभायणे जेणं निग्गंथे वा जाव पडिग्गहेत्ता जहा लद्धं तहा आहारमाहारेइ एसण गोयमा ! संजोयण दोस विप्पमुक्के पाणभोयणे एसण गोयमा वीइंगालस्स वीयधमस्स संजोयणादोस विप्पमुक्कस्स पाणभोयणस्स अट्ठे पएणत्ते ॥
( व्याख्याप्रज्ञप्ति शतक ७ उद्देश्य १) न विता अहमेवं लप्पए लुप्पंति लोगंसि
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( २३० )
पाणिणो एवं सहि एहि पासए अनिह से पुढे हियासए ॥
-सूयग० अ० २ उ० १ गा० १३ त० सूत्र अ० ४ सूत्र ११ से इस पाठ का सम्बन्ध है पिसायभया जक्खाय रक्खसा किन्नरा किं पुरिसा। महोरगा य गंधव्वा, अट्ठ विहा वाणमंतरा ।।
उत्तराध्ययन, अध्य० ३६ । २०६ त० अ० ६ सू० ६ से इस पाठ का सम्बन्ध है ।
संजोयणाहिगरण किरिया य निव्वतणाहिगरण किरिया य।
-व्याख्या० प्र० शतक ३ उ० २ श्रोहोवहोवग्गहियं भंडगं दुविहं मुणी । गिराहतो निक्खिवंतो वा, पउंजेज इमं विहिं ॥
-उत्तराध्ययन अ० २४ सू० १३ संरम्भ समारम्भे, प्रारंभे य तहेव य । मणं पवत्तमाणं तु, नियत्तेज जयं जई ॥२१॥
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संरम्भ-समारम्भे, प्रारमै य तहेव या वयं पवत्तमाणं तु, नियत्तेज जयं जई ॥२३॥ संरम्भ-समारम्भे, आरंभे य तहेव य। कायं पवत्तमाणं तु, नियत्तेन्ज जयं जई ॥२५॥
--उत्तराध्ययन अध्य०२५ तत्त्वाथसूत्र अ० ७ सूत्र १४, १५ से इन पाठों का सम्बन्ध है बितियं च अलिय व यणं ।
___-प्रश्न व्या० द्वितीय अधर्मद्वार तइयं च अदत्ता दाणं ।
-प्रश्न व्या० तृतीय अधर्मद्वार तत्त्वार्थ सूत्र अ० ७ सूत्र १४-१५-१६ से इस पाठ का
सम्बन्ध है। तस्स य णामाणि गोण्णाणि होति तीसं तं जहा-अलियं १ सढं २ अणजं ३ मायामोसो ४ असंतकं ५ कूड कवडमवत्थुगं च ६ निरत्थयमवत्थयं च ७ विद्देस गरहरिणजं अणुजकंह
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( २३२ )
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कक्करणाय १० वंचणाय ११ मिच्छा पच्छा कडं च १२ सातीउ १३ उच्छन्नं १४ उक्कलं च १५ श्रहं १६ अब्भक्खाणं च १७ किब्बिसं १८ वलयं १६ गहणं च २० मम्मणं च २१ नमं २२ निययी २३ अपच ओ २४ असमो २५ असन्च संधत्तणं २६ विवक्खो २७ अवहीयं २८ उवहि असुद्ध २६ अवलोवोत्ति ३० अवियतस्स एयाणि एवमादीणि नामधेजाणि होंति तीसं सावजस्त लियस्स वह जोगस्स गाइं || प्रश्न व्याकरण सूत्र ०२ सू० ६ । तस्य णामाणि गोन्नाणि होंति तीसं तं जहा चोरिक्कं १ परहडं २ प्रदत्तं ३ कूरि कडं ४ पर लाभो ५ संजमो ६ परधरांमि गेही ७ लोलिक म तक्करत्तरांतिय । श्रवहारो १० हत्थलहुत्त १९ पावकम्मकरण १२ ते णिक्कं १३ हरणविप्पणासो १४ आदिया १५ लुंपणा धरणाण १६ अप्पच्चयो १७ अवीलो १८ अक्खेवो १६ खेवो २०
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( २३३ )
विक्खेवो २१ क्रूडया २२ कुलमसी २३ य कंखा २४ लालप्पणपत्थारण य २५ आससरणाय वसण २६ इच्छामुच्छा य २७ तरहागेहि २८ नियडिकम्मं २६ अपरच्छंति विय ३० तस्स एयाणि एवमादीणि नामधेज्जाणि होति तीसं अदिन्नादाणस्स पाव कलिकलुसकम्मबहुलस्स अरोगाई || प्रश्न० ० ३ सू० १० ॥ तस्स य णामाणि गोन्नाणि इमाणि होंति तीसं तं जहा अवंभं १ मेहुण २ चरतं ३ संसग्गि ४ सेवणाधिकारी ५ संकप्पो ६ वाहण पदाण ७ दप्पो = मोहोह मणसंखेवो १० अणिग्गहो ११ बुग्गहो १२ विघाओ १३ विभंगो १४ विब्भमो १५ अधम्मो १६ असीलया १७ गामधम्मतित्ती १८ रती १६ रागचिंता २० कामभोगमारो २१ वेरं २२ रहस्सं २३ गुज्भं २४ बहुमाणो २५ बंभचेरविग्घो २६ वावत्ति २७ विराहणा २८ पसंगो २६ गुणो ३० ति विय तस्स एयाणि एवमादीणि नाम
काम
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( २३४ )
धेजाणि होति तीसं ।
- प्रश्न व्याकरण सूत्र प्र० ४ सू० १४ त० ० ३ सू० २७-२८ से इस पाठ का सम्बन्ध है कइणं भंते | कम्म भूमीओ पण्णत्ताओ ? ! परणरस कम्मभूमि
गोयमा
पण्णत्ताओ,
तं जहा -- पंच भरहाई पंच परवयाइं पंच महाविदे हाई । कइणं भंते! अकस्म भूमि पण्णत्ताओ गोयमा ! तीसं कम्म भूमित्रो परणत्ताओ ! तं जहा - पंच हेमवयाई, पंच हेरणवयाई, पंच हरिवासाई, पंचरम्मग वासाई, पंच देवकुराई, पंच उत्तरकुराई । एयासु णं भंते ? तीसासु कम्म भूमिसु श्रत्थि उस्सप्पिणीति वा श्रसप्पिणीति वा ? णो इणट्ठे समट्ठे । एएसु गं भंते ! पंचसु भ रहेसु पंचसु एरवसु अत्थि उस्सप्पिणीति वा श्रसप्पिणीति वा हंता अत्थि । एएसुगं पंचसु महाविदेहेसु वत्थि उस्सप्पिणीति वा श्रसप्पि
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णीति वा अवटिएणं तत्थ काले पराणत्ते समणाउसो !
- व्याख्याप्रज्ञति सूत्र शतक २० उद्देश्य ८ न० अ०७ सूत्र १३ से इस पाठ का सम्बन्ध है
जीवाणं भंते । किं पायारंभा, परारंभा, तदु. भयारंभा, अणारंभा? गोयमा ! अत्थेगइया जीवा पायारंभावि, परारंभावि, तदुभयारंभावि, यो अणारंभा, अत्थे गइया जीवा णो आयारंभा, णो परारंभा, णो तदुभया रंभा, अणारंभा। से केणटेणं भंते ! एवं बच्च० ? अत्थेगइया जीवा आयारंभावि, एवं पडिउच्चारेयव्वं । गोयमा ! जीवा दुविहा पराणत्ता तं जहा-संसार समावएणगाय, असंसार समा परणगाय । तत्थणं जे ते असंसारसमावराणगाय तेणं सिद्धा। सिद्धा णं णो आयारंभा जाव अणारंभा। तत्थणं जे ते संसार समावण्णगा ते दुविहा पराणत्ता तं जहा-संजयाय असंजयाय
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२३६
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तत्थणं जे ते संजया ते दुविहा पराणत्ता तं जहापमत्त संजया य अपमत्तसंजयाय । तत्थणं जे ते अपमत्तसंजया तेणं णो आयारंभा, गो परारंभा जाव अणारंभा । तत्थणं जे ते पमत्तसंजया ते सुहं जोगं पडुच्च णो पायारंभा, णो परारंभा, जाव अणारंभा। असुहं जोग पडुच्च आयारंभावि जाव णो अणारंभा । तत्थणं जे ते असंजया ते अवि. रतिं पड़च्च श्रायारंभावि जाव णो अणारंभा । से तेणद्वेणं गोयमा ! एवं वञ्चइ अत्थेगइया जीवा जाव अणारंभा ।
त० अ०६ सू० ५ से इस पाठ का सम्बन्ध है--
दो किरियाप्रो पन्नताओ तं जहा--जीव किरिया चेव अजीवकिरिया चेव ! जीवकिरिया दुविहा पन्नत्ता तं जहा--सम्मत्तकिरिया चेव मिच्छत्त किरिया चेव २, अजीव किरिया दुविहा पन्नत्ता तं०-इरियवहिया चेव संपराइगा चेव ३,
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( २३७ )
दो किरियाअो पं० तं० काइया चेव अहिगरणिया चेव ४, काइया किरिया दुविहा पन्नत्ता तं० अणुवरय कायकिरिया चेव दुप्पउत्तकाय किरिया चेव ५, अहिकरणिया किरिया दुविहा पन्नत्ता तं० संयोजणाधिकरणिया चेव णिव्वत्तणाधिकरणिया चेव ६, दो किरिया श्री पं० तं० पाउ. सिया चेव पारियावणिया चेव ७, पाउसिया किरिया दुविहा पं० तं० जीवपाउसिया चेव अजीवपाउसिया चेव ८, पारियावणिया किरित्रा दुविहा पं० २० सहत्थ पारियावणिया चेव परहत्थ पारियावणिया चेव ६, दो किरियाो पं० तं० पाणातिवाय किरिया चेव अपञ्चक्खाण किरिया चेव १०, पाणातिवाय किरिया दुविहा पं० २० सहत्थ पाणातिवाय किरिया चेव परहत्थ पाणातिवाय किरिया चेव ११, अपच्चक्खाण किरिया दुविहा पं० २० जीव अपच्चक्खाण
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२३८
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किरिया चेव अजीवपच्चक्खाण किरियाचेव १२, दो किरियाअो पं० तं० प्रारंभिया चेव परिग्गहिया चेव १३, प्रारंभिया किरिया दुविहा पं० २० जीव प्रारंभिया चेव अजीवप्रारंभिया चेव १४, एवं परिग्गहियावि १५, दो किरियाप्रो पं० तं० माया वत्तिा चेव मिच्छादसणवत्तिया चेव १६, मायावत्तिया किरिया दुविहा पं० तं प्राय भाववंकणता चेव परभाववंकणता चेव १७, मिच्छा दसण वत्तिया किरिया दुविहा पं० तं• ऊणाइरित्त मिच्छादसणवत्तिया चव, तव्वइरित्तमिच्छा दसण वत्तिया चेव १८, दो किरिया ओ पं० त. दिट्टिया चेव पुद्धिया चेव २६, दिद्विया किरिया दुविहा पं० तं० जीव दिहिया चेव अजीव दिट्ठिया चेव २०, एवं पटियावि २१, दो किरियाप्रो पं० तं० पाडुच्चिया चेव सामंतोवणीवाइया चेव २२, पाडुच्चिया किरिया दुविहा पं० २० जीवपाडुच्चिया
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२३६ )
वेव जीवपाड़च्चिया चेव २३, एवं सामंतोवणि वाइयावि २४, दो किरिया श्री पं० तं ० साहत्थिया चैव सत्थिया चेव २५, साहत्थिया किरिया दुविहा पं० तं जीवसाहत्थिया चेव जीवसाहतिथया चेव २६, एवं सत्थियावि २७, दो किरिया श्री पं० तं० श्रणवरिया चेव वेयारणिया चेव २८, जहेव गोसत्थिया २६-३०, दो किरिया ओ पं० तं० अणाभोगवत्तिया चेव अण्वखव त्तिया चेव ३१, अणाभोगवत्तिया किरिया दुविहा पं० तं उत्तआइयणता चेव प्रणाउत्तपमज्जगता चेव ३२, अण्वकखवत्तिया किरिया दुविहा पं० नं० आयसरीरअणवकं खवत्तिया चेव परसरीर अणवकखवत्तिया चेव ३३, दो किरिया पं० तं० पिजवत्तिया चेव दोसवत्तिया चेव ३४, पेज वत्तिया किरिया दुविहा पं० तं मायावत्तिया चेव लोभवन्तिया चेव ३५, दोसवत्तिया किरिया
O
अणा
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(
२४०
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दुविहा पं० तं० कोहे चेव माणे चेव ३६ ( सू० ६०) स्थानांग सूत्र स्थान २ उद्देश्य १ ।
त० अ० १० सू० २-५ से इस पाठ का सम्बन्ध है ___ सव्वकामविरया, सव्वरागविरया, सव्वसंगा. तीता, सव्वसिणेहाइकंता, अकोहा, निकोहा, खीणकोहा, एवं माणमायालोहा अणुपुव्वेणं अट्ठ कम्मपयडीअो खवेत्ता, उदिप लोयग्गपइढाणा हवंति--ौपपातिक सूत्र प्रश्न २१ ।। सू० १३ ।। त० अ० १० सू० १-२ से इस पाठ का सम्बन्ध है
पिज्ज दोस मिच्छादसणविजएणं भंते जीवे किं जणइ ? पि० नाणदसणचरित्ताराहणयाए अब्भुटेइ । अढविहस्स कम्मस्स कम्मगण्ठि विमोयण याए तप्पढमयाए जहाणुपव्वीए अविसइविहं मोहणिज्जं कम्मं उग्घाएइ, पंचविहं नाणावरणिज्जं, नवविहं दंसणावरणिजं, पंचविहं अंतराइयं, एए तिन्नि वि कम्मं से जगवं खवेई । तत्रो
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( २४१ )
पच्छा अणुत्तरं कसिणं पडिपुराणं निरावरणं विति मिरं विसुद्धं लोगालोगप्पभावं केवलवरनाण इसणं समुप्पादेइ । जाव सजोगी भवइ ताव हरियावहियं कम्मं निबंधइ सुहफरिसं दुसमय'ठिइयं । तं पढमसमए बद्धं गिइयसमए वेइयं तय समयनिजिराणं तं बद्धं पुढे उदीरियं वेइयं निजिगणं सेयालेय अकम्मंचावि भवइ । उत्तराध्ययन सू० अ० २६ सू० ७१ अह अाउयं पालइत्ता अंतो मुहुत्तद्धावसेसाए जोगनिरोहं करमाणे सुहुमकिरियं अप्पडिवाइं सुकमाणं झायमाणे तप्पढमयाए मणजोगं निरुम्भइ, वयजोगं निरुम्भइ, कायजोगं निरुम्भइ, प्राणपाणुनिरोहं करेइ, ईसिपंचरहस्सक्खरुच्चारणट्टाए य णं अणगारे समुच्छिन्नकिरियं अनियढिसुक्कझाणं झियायमाणे वेयणिजं श्राउयं नाम गोत्तं च एए चत्तारि कम्मसे जुगवंखवेइ उत्तराध्ययन सू० अ० २६ प्र. ७५ तो श्रोरालिय
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( २४२ )
तेय कम्माई सव्वाहि विप्पजहणाहिं विप्पजहिता उजुसेढिपत्ते श्र फुसमाणगई उड्ढं एगसम: एणं अविग्गहेणं तत्थ गंता सागारोवउत्ते सिझई बुज्झइ जाव अंतं करेइ । उत्तराध्ययन अ० १६ प्र०७३।
त० सू० अ० ७ सू० १०।। . दुख मेव वा एसोलो पाणवहस्स फल विवागो इहलोइयो पारलोइयो अप्पसुहो बहुदुक्खो महः भयो बहुरयप्पगाढो दारुणो ककसो असाओ वाससहस्सेहिं मुच्चती, नय अवेदयित्ता--अत्थिहु मोक्खोति । प्रश्न व्याकरण सू० अ० ५-२-३-४-५ एसोसो अलियवयणस्स फलविवागो............ एसोसो अदिराणादाणस्स फलविवागो...... एसोसो अबंभस्स फलविवागो........ एसोसो परिग्गहस्स फलविवागो............
तत्वार्थसूत्र अ० ३ सू० ५ से इस पाठ का सम्बन्ध है।
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( २४३ )
पन्नरस परमाहम्मिया पण्णत्ता-तं जहाअंबे १ अंबरिसि २ चेव सामे ३ सबलेत्ति पावरे ४ रुद्दो ५ वरुद्द ६ काले अ७ महा कालेत्ति = आवरे ॥ १॥ असिपत्ते ६ धगु १० कंभे ११ वालुए १२ वेयरणत्ति अ १३ खरसरे. १४ महा घोसे १५ एते पन्नरसाहिबा ॥ २॥ समवायंग सू० समवाय १५ वां नरयवाला । व्याख्या प्रज्ञप्ति शतक ३ उद्देश ६ । आवश्यक सूत्र० श्रमण सूत्र० । ठाणांग सूत्र० स्थान ६ । उत्तराध्ययन सू० अ० ३१ । प्रश्न व्याकरण अ० १०॥
तत्वार्थसूत्र अ० १ सूत्र १ से इस पाठ का सम्बन्ध है । दंसण नाण-चरित्ते, तव विगए णच्च समिइ गुत्तीसु जो किरिया भावरुइ, सो खल किरिया रुई नाम ।
उत्तराध्ययन अ० २८ गा० २५ । तत्वार्थ सू० अ० ३ सू २० से इस पाठ का सम्बन्ध है ।
जंबूद्दीवेणं दीवे चउद्दस महानईअो पुवावरेण । लवणसमुदं समुप्पेति-तं जहा-गंगा सिंधू रोहित्रा
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२४४ )
रोहिअंसा हरी हरीकंता सीधा सीोदा नरमो. कंता नारिकांता सुवरणकूला रूप्पकूला रता रत्तवइ॥
___ समवायांग सूत्र, समवाय १४ वां तत्वार्थ सू० अ० ३ सू० १५ से इस पाठ का सम्बन्ध है।
पउमद्दहपुंडरी यह हाय दस दस जोयणसयाई आयामेणं पण्णत्ता ॥
___समवायांग सूत्र, सू० ११३ । तत्वार्थ सूत्र अ० ३ सू० १८ से इस पाठ का सम्बन्ध है ।
महापउममहापुंडरीयदहाणं दो दो जोयण सहस्साइं पाया मेणं पण्णत्ता-- समवायांग सूत्र-सू० ११५ । तिगिच्छि केसरी दहाणं चत्तारि चत्तारि जोयण सहस्साइं पायामेणं परणत्ताइं ॥ समवायांग सूत्र. सू० ११७ ॥ तत्वाथे सूत्र अ० ३ सू० २० से इस पाठ का सम्बन्ध है।
तस्स उणं पउमद्दहस्स परथिमिल्लेणं तोर
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२४५ )
णेणं गंगा महा नई पवूढा समाणी पुरत्थाभिमुही पंच जोयण सयाई पव्वणं गंता गंगा वत्तण कूडे श्रावत्ता समाणी पंच ते गीसे जोयण सए तिरिण अएगण वीसइ भाए जोयणस्स दाहिणाभिमुही पव्वणं गंता महया घडमुह पवत्तरणं मुत्तावलिहारसंठिएणं साइरेग जोयण सइएणं पवारणं पवडइ....................एवं सिंधु एवि णेयवं जाव तस्स णं पउमद्दहस्स पच्चथिमिल्लेणं तोरणेणं सिंध आवत्तण कूडे दाहिणाभि मुही सिंधुप्पवाय कुंड सिंधुद्दीवो अट्ठो सो चेव ।।............तस्सणं पउमद्दहस्स उत्तरिल्लेणं तोरणेणं रोहिअंसा महानई पवढा खमाणी दोरिण जावत्तरे जोयण सए जच्च एगण वीसइ भाए जोयणस्स उत्तराभिमुही पव्वएणं गंता महया घडमुह पवत्तिएणं मुत्तावलिहार संठिएणं साइरेग जोश्रण सइएणं पवाएणं पवडइ ॥ जंबुद्वीप प्रज्ञप्ति सूत्र ४ वक्षस्कार सूत्र ७४ तस्सणं महा
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( २४६ ) पउमदहस्स दक्खिणिल्लेणं तोरणं रोहिना महाणई पवढा समाणी सोलस पंचुत्तरे जोयण सए पंच य एगूण वीसइ भाए जोयणस्स दाहिणाभिमुही पव्व. एणंगंता महया घडमुहपवित्तिएणं मुत्तो वलिहार संठिराणं साइरेग दो जोयण सइएणं पवाएणं पवडा ........तस्सणं महा पउमद्दहस्स उत्तरिल्लेणं तोरणे णं हरिकंता महाणई पढा समाणी सोलस पंचुत्तरे जोयणसए पंच य एगण वीसइ भाए जोयणस्स उत्तराभिमही पव्वएणं गंता महया घडमुह पव. त्तिएणं मुत्तावलिहार संठिरण साइरेग दुजोयण सइराणं पवाएणं पवडइ ।। जंबू द्वीप० ४ वक्षस्कार सू०८०
तस्सणं तिगिछिद्दहस्स दक्खिणिल्लेणं तोरणेणं हरि महाणई पवढा समाणी सत्त जोत्रण सहस्साई चत्तारि अ एकवीसे जो अणसए एगं च एगण वीसइ भागं जो अणस्स दाहिणाभिमही पव्वएणं गंता महया घड मुह पवित्तिएणं जाव साइरेग चउ
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( २४७)
जोपण सइएणं पवाएणं पवडइ ।।............तस्सणं तिगिंछिद्दहस्स उत्तरिल्लेणं तोरणेणं सीपोत्रा महाणई पवूढा समाणी सत्तजोअणसहस्साई चत्तारि अ एगवीसे जोअणसएएगं च एगण वीसइ भागं जोअणस्स उत्तराभिमुही पव्वएणं गंता, महया घडमुहपवित्तिगणं जाव साइरेग चउजोपण सइएणं पवाएणं पवडइ...........जंबू द्वीप प्रज्ञप्ति सूत्र, ४ वक्षस्कार ( सू० ८४) जंबूद्दीवे २ णीलवंते नामं वासहर पव्वए, पराणत्ते, पाईण पडीणायए उदीणदाहिण विच्छिण्णे णिसह वत्तव्वया, णीलवंतस्स भाणियब्वा, णवरं जीवा दाहिणेणं धणु उत्तरेणं, एत्थणं केसरिद्दहो, दाहिणेणं सीधा महाणई पवढा............अवसिट्टं तं चेवत्ति । एवं णारिकतावि उत्तराभिमुही णेयव्वा । जंबूद्वीप० ४० वक्षस्कार (सू० ११० ) जंबुद्दीवे दीवे रुप्पीणामं वासहर पव्वए पएणत्ते । पाईणपडीणायए उदीण दाहिण
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२४८
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विच्छिण्णे एवं जा चेव महाहिमवतवत्तवया सा चेव रुप्पिस्सवि, णवरं दाहिणेणं जीवा, उत्तरेखें धणु, अवसेसं तं चेव । महापण्डरीए दहे गरक ताणदी दक्खिगोणं णेयव्वा जहा रोहिश्रा पुरत्थिमेणं गच्छइ रुप्पकूला उत्तरेणं णेयव्वा जहा हरिकता पच्चत्थिमेणं अवसेस त चेवत्ति............ जंबूद्दीवे दीवे सिहरी णामं वासहर पव्वए पराणत्ते ? ............अवसिटुं तं चेव । पुण्डरीए दहे सुवरण कूला महाणई दाहिणेणं णेयव्वा जहा रोहिअंसा पुरस्थिमेणं गच्छइ, एवं जह चेव गंगा सिंधूत्रो तह चेव रत्ता रत्ता वईशो णेयव्वाओ, पुरत्थिमेणं रत्ता पच्चत्थिमेणं रत्त वइअवसिटुं तं चेव ( अवसेसं भाणियव्वंति), जंबूद्वीप प्रज्ञप्ति सूत्र, वक्षस्कार ४ सू० १११
त० अ० ४ सू० २० से इस पाठ का सम्बन्ध है । काविहेणं भंते ! वेउब्वियसरीरे प० ? गोयमा
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२६ )
दुविहे प० त० एगिंदिय वेउब्विय सरीरे, पचिदियवेव्वियसरीरे श्र एवं जाव सणं कुमारे आढतं, जाव अणुत्तराणं, भवधारणिजा, जाव तेसिं रयणी tयणी परिहायइ ॥ समवायांग सूत्र शरीर द्वार ( सू० १५२ )
तत्वार्थ सूत्र ० ३ सूत्र ६ से इस पाठ का सम्बन्ध है ।
कहिणं भंते ! जंबुद्दीवे ? के महालएणं भंते ! जंबूद्दीवे ? २ किं संठिए गं भंते ! जंबूद्दीवे ३ ? किमायार भावपडोयारणं भंते ! जंबूद्दीवे ४ पण्णत्ते गोयमा ? अयरण जंबूद्दीवे २ सव्वदीव समुद्दाणं सव्वभंतराए १ सव्वखुडाए २ वट्टे तेल्लापूय संठाण संटिए वट्टेरह चक्कवाल संठाण संठिए बट्टे पुक्खर करिणया संठाण संठिए वट्ठे पडिपुराणचन्द संठाण संठिए ४ एवं जोयण सय सहस्सं आयाम विकखंभेणं तिरिण जोयण सयसहस्साइं सोलस सहस्साई । दरिण य सत्तावीसे जोयण सए तिरिण य कोसे
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( २५० )
अट्ठावीसं च धणु सयं तेरस अंगलाई श्रद्धंगलं च किंचि विसेसाहियं परिक्खेवेगं पण्णत्ते । जंबूद्वीप प्रज्ञप्ति वक्षस्कार १ सूत्र ( सृ० ३ )
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तत्त्वार्थसूत्र ० ३ सू० २० से इस पाठ का सम्बन्ध है । जंबू मंदर – उत्तर दाहिणेणं चुल्ल हिमवंत सिहरीसु वास हरपव्वसु दो महदहा पं० तं० बहुसमतुल्ला अविसेसमणाणत्ता अरणमराणं णातिव ंति श्रयामविक खंभउब्वेहसंठाणपरिणाहेणं तं० – पउमद्दहे चेव पुंडरीयदहे चेव ! तत्थं दो देवयाश्रो महड्डिया जाव पलिश्रोवमट्टि तीयाश्रो परिवसंति - तं० - सिरी चेव लच्छी चेव । एवं महाहिमवंत रूप्पीसु वासहरपव्वसु दो महद्दहा पं० तं० वहु सम० जाव तं० महा पउमद्दहे चेव महा पोंडरीयद्दहे चेव देवताओ हिरिच्चेव बुद्धिच्चेव एवं निसढ नीलवंतेसु तिर्गिछिद्दहे चेव केसरिद्दहे चेव देवताओ धिती चेव कित्ति
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च्चेव जंब मंदर० दाहिणेणं महा हिमवंताश्रो वासहरपव्वयाग्रो महापउमद्दहाश्रो दहाश्रो दो महा णइओ पवहति तं० रोहियच्चव हरिकंता वेव । एवं निसढाओ वासहर पव्वतारो तिगि च्छिद्दहाओ दो म० तं० हरिच्चेव सीओअच्चेव जंब मंदर उत्तरेणं नीलवंतानो वासहर पव्वतारो केसरि दहाओ दो महानईअो पवहति तं० सीता चेव नारिकता चेव एवं रूप्पीश्रो वासहर पव्वतात्रो महापोंडरीयद्दहाओ दो महानईओ पवहंति तं० णरकंता चेव रुप्पकूला चेव जंबूमंदर दाहिणेणं भरहे वासो दो पवायदहा पं० तं बहु सम तं० गंगप्पवातद्दहे चेव सिंधुप्पवायद्दहे चेव एवं हिमवएवासे दो पवायदहा पं० तं० वहु) तं. रोहियप्पवायद्दहे चेव रोहियंसपवातदहे चेवजंबमंदर दाहिणेणं हरिवासे वासे दो पवाय दहा पं० बहु० सम० तं० हरिपवातदहे चेव हरि
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२५२ )
कंत पवातद्दहे चेव जंब मंदर उत्तर दाहिणेणं महा विदेहवासे दो पवायदहा पं०बहु समजाव सीत्रण वातद्दहे चेव सीतोदप्पवायदहे चेव जंबूमंदरस्स उत्तरेणं रम्मएवासे दो पवायदहा--पं०तं बहु जाव नरकंतप्पवायदहे चेव णारीकंतप्पवायदहे चेष एवं हेरन्नवते वासे दो पवायदहा पं०तं-बहु सुवन्न कुलप्पवायदहे चेव रूप्पकूल प्पवायद्दहे चेव जंबमंदर उत्तरेणं एरवए वासे दो पवायदहा पं० बहु जाव रत्तप्पवायदहे चेव रत्तावइ प्पवायदहे चेव जंबमंदर दाहिणणं भरहे वासे दो महानई. श्रो पं० बहु० जाव गंगा चेव सिंधू चेव एवं जधा पवात दहा एवं गईश्रो भाणियव्वाअो जाव ए. रवए वासे दो महानई श्री पं० बहु सम तुल्लाश्रो जाव रत्ता चेव रत्तवती चेव ।। ठाणांग सूत्र, स्थान २ उ० ३ स० ८८।
त० अ०४त्र ११ से इस पाठ का सम्बन्ध है ।
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(
२५३ )
पिसाय भूय जक्ख रक्खस किंनर किंपुरिसमहोरग गंधव्वा ॥ प्रश्न व्याकरण अ०५ सूत्र १६ ।। मढ़ विधा वाणमंतरा देवा पं० तं० पिसाया भूता क्खिा रक्खसा किन्नरा किंपरिसा महोरगा मंधव्वा ॥ ठाणंग सूत्र स्थान ८ उद्देश ३ ( सू० ६५४ ) पिसायभूया जक्खा य रक्खसा किन्नराय किं परिसा महोरगा य गंधव्वा अदविहा वाणमंतरिया-देविंद थ० गा० ६७ । त० अ० ८ सू० १ से इस पाठ का सम्बन्ध है ।
अज्झत्थहेउं निययस्स बंधो संसारहेउं च षयंति बंधो--उत्तराध्ययन सू० अ० १४ काव्य १६ ॥
त० अ० ५ स८ ४ से इस पाठ का सम्बन्ध है।
कतिविहेणं भते बंधे पराणते ? गोयमा दुविहे बंधे पराणत्ते, तं जहा- इरियावहियबंधे य । सम्पराइय बंधेय । व्याख्या प्रज्ञप्ति शतक ८ उ०८॥
तत्त्वार्थ अ०६ सू० ३४ व ३५ से सम्बन्ध है।
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( २५४ )
आ रौद्रं भवेदत्र, मन्दं धर्म्यं तु मध्यमम् । षट्कर्म प्रतिमा श्राद्ध व्रत पालनसंभवम् ॥ २५ ॥ अस्तित्वात् नो कषायाणामत्रार्तस्येव मुख्यता । आज्ञाद्यालंवनोपेत-- धर्मध्यानस्य गौणता
-- गुण स्थान कमारोहण त० सूत्र अ० ५ सूत्र ३६ से इस पाठ का सम्बन्ध है. से किं तं बंधणपच्चइए २ जरण परमाणुपोग्गला दुपएसिया तिपएसिया जावदस पएसिया संखेज परसिया असंखेज पएसिया प्रांत पएसियाणं खंधाणं वेमाय निद्धयाए बेमाय लुक्खयाए वेमाय निद्ध लुक्खयाए एवं बंधण पच्चइएणं बंधे समुप्पज्जइ जहरणेणं एक्कंसमयं उक्कोसेणं असंखेजं कालं सेत्तं वंधण पच्चइए ॥ व्याख्याप्रज्ञप्ति
श०८ उ० ६
त० सूत्र अ० ३ सू० १०-११ से इस पाठ का सम्बन्ध है इहेव जंबूद्दीवे दीवे सत्त वासहर पव्वया पं०
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( २५५ )
तं० चलहिमवंते, महाहिमवंते, महाहिमवंते, निसढे, निसढे, नीलवंते, रुप्पि, सिहरी, मंदरे ।” जंबूद्दीवे दीवे सत्त वासा पं० तं भरहे, हेमवंते, हरिवासे, महा विदेहे, रम्मए, एरण्णव्वए, एरवए । समवायांग
पुत्र समवाय ७ ॥
त० सूत्र श्र० ५ सूत्र ११ ततो अच्छेजा पं० तं० समये, पदेसे, परमाणु, १ एवमभेजा २ डज्झा ३ गिज्मा ४ श्रणट्टा ५ श्रममा ६ अपएसा ७ । ततो अविभातिमा पं० समते, परसे, परमाण ू 1 स्थानांग सूत्र स्थान ३ उद्देश २ सू० ( १६५ )
तत्त्वा० अ० २ सू० २३ से इस पाठ का सम्बन्ध हैइंदिय - परिबुड्ढि - कायव्वा ।
-
- प्रज्ञापना, पद १५ उ० २ तः सूत्र ० ५ सूत्र ३६ से इस पाठ का सम्बन्ध है । कालश्च श्रद्धां समए - प्रज्ञापन सूत्र पद १ ( सू० ३ ) त० सू० ० ५ सूत्र २०-२१ ।
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( २५६ )
-
जीवेणं भंते ! सउवाणे सकम्मे सबले सवीरिए सपरिसकार परकमे श्रायभावेणं जीवभावं उवदंसेई ति वत्तव्वंसिया ? हंता गोयमा ! जीवेणं सउट्ठाणे जाव उवदंसेईति वत्तव्वंसिया से केणटेणं जाव वत्तव्वंसिया जीवेणं भाभि णिबोहियनाणपजवाणं, एवं सुयनाणपजवाणं
ओहिनाणपजवाणं मणनाणपजवाणं केवल नाणपज वाणं, मइअन्नाण पजवाणं, सुयअन्नाण पजवाणं, विभंगनाणपजवाणं, चक्खुदंसणपज. वाणं, अचक्खुदंसण पजवाणं, श्रोहि सण पजवाणं, केवलदसणपजवाणं, उवोगं गच्छइ उवभोग लक्खणेणं जीवे से, ए णटेणं एवं वच्चइ गोयम ! जीवे सउदाणे जाव वत्तव्यसिया। व्याख्या प्रज्ञप्ति शतक । २ उद्देश्य ॥१०॥
त० सू० अ० ३ सू० ३६ से इस पाठ का सम्बन्ध है। तिरिक्खजोणियाणं जहन्नेणं अंतोमुहुत्त, उक्को
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( २५.७ )
मेणं तिनि पलिश्रवमाइं । जीवाभिगम सू० प्रतिपत्ति ३ Bo २ सू० २२२ ।
तत्वा० अ० ५ सू० १५ से इस पाठ का सम्बन्ध है । दव्वणं पगे जीवे सअंते, खेत्तणं जीवे संखेज पर लिए, असंखेज परसोगाढे ।
- व्याख्या प्रज्ञप्ति शतक २ उ० १ सू० ६१
त० सू० प्र० ३ सू० १ एगमेगाणं पुढ़वीहि तिवलएहिं सव्वश्रोसमंता संपरिक्खित्ता तं० घणोदधि वलए गं घणवात वलएणं तणुवाय वलएणं । स्थानांग सू० स्थान ३
उ० ४ सू०
त० सू० प्र० ५ सूत्र ८
?
केवतियां भंते ! लोयागासपएसा पन्नत्ता गोयमा ! असंखेजा लोयागासपएसा पन्नत्ता । एगमेगस्सणं भंते ! जीवस्स केवइया जीवपरसा पनता ? गोयमा ! जावतियालोगागासपरसा
1
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( २५८ )
एगमेगस्स गं जीवस्स एवतिया जीवपएसापन्नत्ता व्याख्या प्रज्ञप्ति शतक ८ उद्देश्य १० सू० ३५८
त० सू० ० २ सूत्र ११
जे इमे सन्नियो पाणा तं जहा पुढ़ विकाइया वस्सइ काइया छट्टावेगइया तसा पारणा जेसि नो तक्काइवा सन्नाइवा पन्नाइवा मणाइवा वइवा सूयगडांग सूत्र, द्वितीय श्रुतस्कंध ० ४ सूत्र ४
त० सू० ० ४ सूत्र १३
अत्थं पव्वय एयं पव्वइन्द्रे पदाहिणावन्तं मंडला यर मेरु श्रणु परियट्टंति ॥ २८ ॥ जीवाभिगम सू० तृतीय प्रतिपत्ति- मनुष्य क्षेत्र वर्णन ॥
त० सूत्र ०७ सूत्र ८
तत्थिमा पढमा भावणाः - सोतत्तेण जीवे मरपुराणामपुरणाई सद्दाई सुणेइ, मरगुण्णामपुराणेहिसहेहिं णो सज्जेजा, गो रजेज्जा, गो गिज्भेजा गो मुज्भेजा णो अज्झोवज्जेजा णो विणिग्धायमाव
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(
५
)
जेजा केवली बया णिग्गंथेणं मणुण्णामणुराणेहिंसद्देहिं सज्जमाणे जाव विणिग्यायमावज्जमाणे संति भेया संति विभंगा संति केवलि पण्णत्ताश्रो धम्माअो भंसेज्जा (१०६४) ण सका ण सोउं सद्दा सोयविसयमागता। रागदोसाउ जे तत्थ,तं भिक्खू परिवज्जए (१०६५)
सोयो जीवो मणुराणामणुराणाई सद्दाई सुणेति० पढमा । ( १०६६)
अहावरा दोच्चा भावणा, चक्खनो जीवो मरणरणामणुणुइं रूवाइं पासइ मणुराणामणुराणेहिं रूवेहिं णो सज्जेज्जा णो रज्जेज्जा जावणो वि. णिग्घाय मावज्जेजा केवली बूया मणुराणामणुराणेहिं रूवेहिं सज्जमाणे रज्जमाणे जाव विणिग्यायमावज्जमाणे संति भेया संति विभंगा जाव भं. सेज्जा (१०६७) ण सक्का रूवमदटुं चक्खुविसयमागयं ।
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________________
(
२६० )
राग दोसाउ जे तत्थ तं भिक्ख परिवज्जए (१०६८)
चक्खनो जीवो मणुराणा मणुण्णाई रूवाई पासति० दोच्चा भावणा (१०६६)
अहावरा तच्चा भावणा घाणतो जीवो मणुराणा मगुण्णाइं गंधाइं अग्घायइ मणुराणामणुरोहिं गंधेहिं णो सज्जेज्जा णो रज्जेज्जा जाव णो विणिग्घायमावज्जेज्जा केवली बूया मणुराणमणुराणेहिं गंधेहिं सजमाणे रजमाणे जाव विणिग्यायमावच्चमाणे संति भेदा संति विभंगा जाव भंसंजा (१०७०) णो सक्का गंधमग्घाउं णासाविसयमागयं । रागदोसाउ जे तत्थ तं भिक्खू परिवजए (१०७१)
घाणो जीवो मणुराणामणुगणाई गंधाई अग्यायति० तच्चा भावणा (१०७२) अहा वरा चउत्था भावणा जिम्भाओ जीवो मगुराणा मणुण्णाइं रसाइं अस्सादेति मणुराणामणुराणेहिं
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( २६१ )
रसेहिं णो
रजेजा जावणो
विणिग्धायमाव
जेज्जा केवली वूया णिग्गंथेणं मणुरणामरपुररोहिं सज्जमाणे जाव विणिघाय मावज्जमाणे
रसेहिं
संति भेदा जाव भंसेज्जा (१०७३ )
णो सक्कं रसमणासातुं जीहाविसयमागयं । रागदोसा उ जे तत्थ तंभिक्खू परिवज्जए (१०७४) जीहाओ जीवो मणुराणामसुरागाई रसाई अस्सा देति च उत्था भावणा (१०७५ )
श्रहावरा पंचमा भावणा मणुराणामसुराणाई फालाई पडिसंवेदेति मणुराणामरपुराणेहिं फासेहिं गो सज्जेज्जा, गो रज्जेजा णो गिज्भेजा गो मुज्भेजा गो श्रज्भोवजेजा हो विणिग्धायमावज्ज्जा केवली बूया णिग्गंथेणं मणुराणामसुराणेहिं फासेहिं सज्जमागे जाव विणिग्धायमावज्जमाणे संति भेदा संति विभंगा संति केवली पण्णत्ताओ धम्मा भंसेज्जा (१०७६ )
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( २६२ )
णो सक्का फासं ग वेदेतुं फासं विसयमागयं राग दोसा उ जे तत्थ ते भिक्खू परिवज्जए (२०७७) फासओ जीवो मणुराणामसुराणाई फासाइं पडिसंवेदेति० पंचमा भावणा (१०७ = ) एत्ता वयाव महव्वते सम्भं कारण फासिए पालिए तीरिए किट्टिए हिद्विते आणाएं राहिये यावि भवति । पंचमं भंते महव्वयं ( १०७६ ) इच्चे तेसिं महव्वतेसिं पणवीसाहिं य भावणाहिं संपरणे अणगारे हासुयं अहाकप्पं अहामग्गं सम्मं कारण फासित्ता पालिता तीरिता किट्टित्ता आणाए श्राराहियावि भवति ( १०८० )
निम्नलिखित पाठ तत्त्वार्थ सूत्र ० २ सूत्र ४२ के साथ सम्बन्ध रखता है ।
तेया सरीरं जहा ओरालियं गवरं ।
सव्व जीवाणं भाणियव्वं एवं कम्मग सरीरंपि ॥
व्या० श० १६ उ०१०
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( २६३ )
निम्नलिखित पाठ तत्त्वार्थसू० अ० ६ सू० ११ वें से गम्बन्ध रखता है। । पादोसियाणं भंते ! किरिया कतिविहा प० ? गोयमा ! तिविहा प० तं०-जेणं अप्पणो वा परस्स । तदुभयस्स वा असुभं मणं संपधारेति, सेत्तं पादोसिया किरिया, पारियाबणियाणं भंते ! किरिया कतिविहाप०? गोयमा! तिविहा प०२०-जेणंथप्पणो वा परस्स वा तदुभयस्स वा अस्सायं वेदणं उदीरेति सेत्तं पारियावणिया किरिया, पाणातिवाय किरियाणं भंते ! कतिविहा प० गोयमा! तिविहा प० तं०--जेणं अप्पारणं वा परं वा तदुभयं वा जीवियाश्र ववरोवेइ सेतं पाणाइवाय किरिया ।
प्रज्ञापना सू० पद २२ सू० २७६ निम्नलिखित पाठ तत्त्वार्थ स०अ० स० १० से सम्बन्ध खता है। , बहु दुक्खाहु जंतवो--
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आचाराङ्ग सू० प्रथम श्रुतस्कन्ध अ०६ उद्देश्य १ सू०३४३ अहो असुभाण कम्माणं निज्जाणं पावगं इमं।
उत्तराध्ययन सू० अ० २१ गा०६ निम्नलिखित पाठ-त० अ० १-स ० २ से सम्बन्ध रखता है।
नाणेण जाणई भावे दंसरोण य सद्दहे। चरित्तेण निगिरहाइ तवेण परिसुज्झई ॥
उत्त० अ० २८ गा० ३५
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परिशिष्ट नं० ३
दिगम्बर श्वेताम्बराम्नाय सूत्रपाठभेदः ।
प्रथमोऽध्यायः
सूत्राङ्का: दिगम्बराम्नायी सूत्रपाठ:
१५ अवग्रहेहावायधारणा:
X
X
२१ भवप्रत्ययोवधिर्देवनारकाणाम् २२ क्षयोपशमनिमित्त: षविकल्प:
X
शेषाणाम्
सूत्राङ्काः श्वेताम्बराम्नायी सूत्रपाठः
ग्रहापायधारणा:
१५
२१ द्विविधोऽवधिः
२२ भवप्रत्ययो नारकदेवानाम्
२३ यथोक्तनिमित्त.....
.
२३ ऋजुविपुलमती मनः पययः
२४
*पर्यायः
* भाष्य के सूत्रों में सर्वत्र मनः पर्यय के बदले मन: पर्याय पाठ है ।
...
....
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________________
२५ विशुद्धक्षेत्रस्वामिविषयेभ्योऽवधिमनःपर्यययोः २६ ... २६ ... ....
पर्याययोः २८ तदनन्तभागे मनःपर्ययस्य २६ .... .... पर्यायस्य ३३ नैगमसंग्रहव्यवहार सूत्रशब्द- |
समभिरूढेवम्भूता नयाः ३४ .... .... सूत्रशब्दा नया: xxx ३५ आद्यशब्दौ द्वित्रिभेदी
द्वितीयोऽध्यायः ५ ज्ञानाज्ञानदर्शनलब्धयश्चतुस्रित्रि- ५ ...........दर्शनदानादिलब्धयः पञ्चभेदाः । सम्यक्त्वचारित्रसंयमासंयमाश्च ७ जीवभव्याभव्यत्वानि च ७ भव्यत्वादीनि च १३ पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतयःस्था- १३ पृथिव्यब्वनस्पतयः स्थावराः .
वरा: ( २ )
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१४ द्वान्द्रियादयस्त्रसाः । १४ तेजावायूद्वान्द्रयादयश्च त्रसाः
१६ उपयोग: स्पर्शादिषु २० स्पर्शरसगन्धवर्णशब्दास्तदर्थाः २१ ........शब्दास्तेषामर्थाः २२ वनस्यत्यन्तानामेकम् २३ वाय्वन्तानामेकम् २६ एकसमयाऽविग्रहा ३० एकसमयोऽविग्रहः ३० एकं द्वौ त्रीन्वाऽनाहारकः ३१ एकं द्वौ वानाहारकः ३१ सम्मूर्च्छनगर्भोपपादा जन्म ३२ सम्मूळुनगर्भोपपाता जन्म ३३ जरायुजाण्डजपोतानां गर्भः ३४ जराय्यण्डपोतजानां गर्भः ३४ देवनारकाणामुपपादः ३५ नारकदेवानामुपपात: ३७ परं परं सूक्ष्मम्
३८ तेषां परं परं सूक्ष्मम् ४० अप्रतीपाते
४१ अप्रतिघाते ४३ तदादीनि भाज्यानि युगपदेक- ४४ .... .... कस्याऽऽचतुभ्यः
स्मिन्नाचतुर्यः ।
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४६ औपपादिकं वैक्रियिकम् । ४७ वैक्रियमोपपातिकम् ४८ तैजसमपि ४६ शुभं विशुद्धमव्याघाति चाहारकं ४६ .... .... .... चतुर्दशप्रमत्तसंयतस्यैव
पूर्वधरस्यैव ५२ शेषास्त्रिवेदाः ५३ औपपादिकचरमोत्तमदेहा:संख्ये- ५२ औपपातिकचरमदेहोत्तमपुरुषायवर्षायुषोऽनपवायुषः
. . संख्य.... ततीयोऽध्यायः १ रत्नशर्कराबालुकापङ्कधूमतमो- १ ......सप्ताधोऽधः पृथुतरा:
महातमःप्रभाभूमयो घनाम्बुवाताकाशप्रतिष्ठाः सप्ताधोऽधः २ तासु त्रिंशत्पञ्चविंशतिपञ्चदश
| २ तासु नरकाः दशत्रिपञ्चानेकनरकशतसहस्रा- ।
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णि पञ्च चैव यथाक्रमम्
३ नारका नित्याशुभतरलेश्यापरि २नित्याशुभतरलेश्या: णामदेहवेदनाविक्रियाः
७ जम्बूद्वीपलवणोदादय: शुभनामानो द्वीपसमुद्राः
१० भरत हैमवतहरिविदेहर म्यकहैरण्यवतैरावतवर्षाः क्षेत्राणि १२ हेमार्ज्जुनतपनीयवैडूर्यरजतहेम
मया:
१३ मणिविचित्र पार्वा उपरिमूले च
तुल्यविस्तारा:
१४ पद्ममहापद्मतिगिच्छकेस रिमहापुण्डरीकपुण्डरीका हृदास्तेषा
७ जम्बूद्वीपलवणादय: शुभनामानो
द्वीपसमुद्रा:
१० तत्र भरत
( ५ )
X
X
....
X
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________________
मुपरि
x
x
x
x
१५ प्रथमो योजनसहस्रायामस्तदर्ध
विष्कम्भो हृदः १६ दशयोजनावगाहः १७ तन्मध्ये योजनं पुष्करम् १८ तद्विगुणद्विगुणाहदाः पुष्क
राणि च १६ तन्निवासिन्यो देव्यः श्रीह्रीतिकीर्तिबुद्धिलक्ष्म्यः पल्योपमस्थितयः ससामानिकपरिषत्काः २० गङ्गासिन्धुरोहिद्रोहितास्याहरिद्धरिकान्तासीतासीतोदानारीनरकान्तासुवर्णरूप्यकुलारक्तारक्तो
x
x. .
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दाः सरितस्तन्मध्यगा: २१ द्वयोर्द्वयोः पूर्वाः पूर्वगाः २२ शेषास्त्वपरगाः
२३ चतुर्दशन दीसहस्र परिवृत्ता गङ्गासिन्ध्यादयो नद्यः
२४ भरतः षड्विंशतिपञ्चयोजनशत-| विस्तारः षट् चैकोनविंशति
भागा योजनस्य
२५ तदुद्विगुणद्विगुणविस्तारा वर्षे -
धरवर्षाविदेहान्ताः
२६ उत्तरा दक्षिणतुल्याः
२७ भरतैरावतयोर्वा द्विह्रासौ षट्समयाभ्यामुत्सर्पिण्यवसर्पिणीभ्याम्
( ७ )
x x
x
X
X X
X
x
xx
x
x
x x
X
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________________
Xxx xx
२८ ताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिताः । २६ एकद्वित्रिपल्योपमस्थितयो हैम
वतकहारिवर्षकदैवकुरुवकाः ३० तथोत्तराः ३१ विदेहेषु संख्येयकालाः ३२ भरतस्य विष्कम्भो जम्बूद्वीपस्य
नवतिशतभागः ३८ नृस्थिती परावर त्रिपल्योपमा
१७ .... परापरे
न्तर्मुहूर्ते ३६ तिर्यग्योनिजानाञ्च | १८ तिर्यग्योनीनाञ्च
चतुर्थोऽध्यायः २ आदितस्त्रिषु पीतान्तलेश्या ३ तृतीयः पीतलेश्यः
.... ७ पीतान्तलेश्याः
( ८ )
....
.
.
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________________
८ शेषाः स्पर्शरूपशब्दमनः प्रवी-।
चाराः | ६ ........प्रवीचाराद्वयोर्द्वयोः १२ ज्योतिष्काः सूर्याचन्द्रमसौ १३ ........सूर्याश्चन्द्रमसो.. ग्रहनक्षत्रप्रकीर्णकतारकाश्च
प्रकीर्णतारकाश्च १६ सौधर्मेशानसानत्कुमारमाहेन्द्र- | २० सौधर्मेशानसानत्कुमारमाहेन्द्र
ब्रह्मब्रह्मोत्तरलान्तवकापिष्टशुक्र- ब्रह्मलोकलान्तकमहाशुक्रसहस्रारे महाशुक्रशतारसहस्रारष्वानतप्राणतयोरारणाच्युतयोर्नवसु ग्रैवेयकेषु विजयवैजयन्तजयन्तापराजितेषु सर्वार्थसिद्धौ च
सर्वार्थसिद्धच २२ पीतपद्मशुक्ललेश्या द्वित्रिशेषेषु ___.... लेश्या हि विशेषेषु २४ ब्रह्मलोकालया लौकान्तिकाः
लोकान्तिकाः २५ सारस्वतादित्यवह्नयरुणगर्दतोय- २६
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________________
तुषिताव्यावाधारिष्टाश्च
व्याबाधमरुतः (अरिष्टाश्च ) ४
२८ स्थितिरसुरनाग सुपर्ण द्वीपशेषाणां | २६ स्थितिः सागरोपमत्रिपल्योपमाद्ध हीन- ३० भवनेषु दक्षिणार्धाधिपतीनां
पल्योपममध्यर्धम्
मिताः
xxx
× × ×
X
X
X
X
२६ सौधर्मेशानयोः सागरोपमेऽधिके
३० सानत्कुमारमा हेन्द्रयोः सप्त
३१ त्रिसप्तनवैकादशत्रयोदशपंचद
शभिरधिकानि तु
३१ शेषाणां पादोने
३२
३३ सौधर्मादिषु यथाक्रमम्
३४ सागरोपमे
सुरेन्द्रयोः सागरोपममधिकं च
३५ अधिके च
३६ सप्त सानत्कुमार
३७ विशेष स्त्रिसप्तदशैकादशत्रयोदशपंचदशभिरधिकानि च
( १० )
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________________
___३३ अपरा पल्योपमधिकम् .
३६ अपरा पल्योपममधिकं च ४० सागरोपमें
४१ अधिके च ३६ परा पल्योपमधिकम्
४७ परा पल्योपमम् ४० ज्योतिष्काणां च
४८ ज्योतिष्काणामधिकम् ४६ ग्रहाणामेकम् । ५० नक्षत्राणामद्धम्
५१ तारकाणां चतुर्भाग: ४१ तदष्टभागोऽपरा .
५२ जघन्या त्वष्टभागः x ५३ चतुर्भागः शेषाणाम् ४२ लौकान्तिकानामष्टौ सागरोप
xx माणि सर्वेषाम्
( ११ )
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________________
२ द्रव्याणि ३ जीवाश्च
म सङ्ख्येयाः प्रदेशा धर्माधर्मैक
जीवानाम्
X
X
पञ्चमोऽध्यायः २ द्रव्याणि जीवाश्च
X
X
७ सङ्ख्येयाः प्रदेशाधर्माधर्मयोः
१६ प्रदेशसंहारविसर्पाभ्यां प्रदीपवत् २६ भेदसङ्घातेभ्य उत्पद्यन्ते
X X X
२६ सद्रव्यलक्षणम्
३७ बन्धेऽधिको पारिणामिकौ च
३६ कालश्च
X X X
८ जीवस्य च
१६
विसर्गाभ्यां
२६ संघातभेदेभ्य उत्पद्यन्ते
....
X
X
३६ बन्धे समाधिकौ पारिणामिकौ
३८ कालश्चेत्येके
४२ अनादिरादिमांश्च
४३ रूपिष्वादिमान् ४४ योगोपयोगी जीवेषु ( १२ )
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________________
षष्ठोऽध्यायः
-३ शुभः पुण्यस्याशुभः पापस्य
५ इन्द्रियकषायावतक्रियाः पञ्चचतुः पञ्चपञ्चविंशतिसंख्या पूर्वस्य भेदाः ६ तीव्रमन्दज्ञाताज्ञातभावाधिकरणवीर्यविशेषेभ्यस्तद्विशेषः
१७ अल्पारम्भपरिग्रहत्व मानुषस्य
१८ स्वभावमार्दवं च
२१ सम्यक्त्वं च
२३ तद्विपरीतं शुभस्य २४ दर्शनविशुद्धिविनयसम्पन्नता शी
३ शुभः पुण्यस्य
४ अशुभः पापस्य
६ व्रतकषायेन्द्रियक्रियाः
७
X
X
X भाववीर्याधिकरण
विशेषे
१८ अल्पारम्भपरिग्रहत्वं स्वभावमा
देवं च मानुषस्य
x
X
२२ विपरीतं शुभस्य
( १३ )
....
X
X
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लव्रतेष्वनतिचारोऽभीक्ष्णज्ञानोप
ऽभीक्ष्णं.... योगसंवेगौ शक्तितस्त्यागतपसी | सङ्घसाधुसमाधियावृत्यकरण साधुसमाधियावृत्त्यकरणमर्हदाचार्यबहुश्रुतप्रवचनभक्तिरावश्यकापरिहाणिर्मार्गप्रभावना प्रवचन वत्सलत्वमितितीर्थकरत्वस्य
.... तीर्थकृत्यस्य सप्तमोऽध्यायः ४ वाङ्मनोगुप्तीर्यादाननिक्षेपणसमि
त्यालोकितपानभोजनानि पञ्च ५ क्रोधलोभभीरुत्वहास्यप्रत्याख्याना
न्यनुवीचिभाषणं च पञ्च ६ शून्यागारविमोचितावासपरोपरोधाकरणभैत्यशुद्धिसधाविसं- ।
( १४ )
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वादाः पञ्च
७ स्त्रीरागकथाश्रवणतन्मनोहराङ्गनिरीक्षणपूर्वरतानुस्मरणवृष्येष्टरसस्वशरीरसंस्कारत्यागाः पञ्च ८ मनोज्ञामनोज्ञन्द्रियविषयरागद्वेष
वर्जनानि पञ्च
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६ हिंसादिष्विहामुत्रापायावद्यदर्शनम् ४ हिंसादिष्विहामुत्र चापायावद्यदर्शन १२ जगत्कायस्वभावौ वा संवेगवैरा ७ जगत्कायस्वभावौ च संवेगवेरा
ग्यार्थम्
ग्यार्थम् २८ परिविवाह करणेत्वरिकापरिगृहीता २३ परविवाहकरणेत्वरपरिगृहीता
परिगृहीतागमनानङ्गक्रीडाकामतीव्राभिनिवेशा:
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३२ कन्दर्पकौत्कुच्यमौखर्य्यासमीक्ष्या - २७ कन्दर्प कौकुच्य
( १५ )
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धिकरणोपभोगपरिभोगानर्थक्या
नि
३४ प्रत्यवेक्षिता प्रमार्जितौत्सर्गादान - २६
संस्तरोपक्रमणानादरस्मृत्यनुप
२ सकषायत्वाजीवः कर्म्मणो योग्यान्युद्गलानादत्ते स बन्धः
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स्थानानि
३७ जीवितमरणाशंसा मित्रानुरागसुखानुबंध निदानानि अष्टमोऽध्यायः
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४ श्राद्यो ज्ञानदर्शनावरणवेदनीय
मोहनीयायुनोमगोत्रान्तराया:
३२
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३ स बन्धः
खोपभोगाधिकत्वानि
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संस्तारो
नुपस्थापनानि
निदानकारणानि
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पुद्गलानादत्ते
मोहनीयायुष्काम
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६ मतिश्रुतावधिमनः पर्ययकेवला- | ७ मत्यादिनाम्
नाम्
७ चक्षुरचक्षुरधिकेवलानां निद्रा
निद्रानिद्राप्रचलाप्रचलाप्रचला
स्त्यानगृद्धयश्च
६ दर्शनचारित्रमोहनीयाकषायाकषा- १० यवेदनीयाख्यास्त्रिद्विनवषोडशभेदाः सम्यक्त्वमिथ्यात्वतदुभयान्याऽकघायकषायौ हास्यरत्यरतिशोकभयजुगुप्सास्त्रीपुन्नपुंसकवेदा श्रनन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यान संज्वलनविकल्पाश्चैकशः क्रोधमानमायालोभाः
( १७ )
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वेदाः
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स्त्यानगृद्धिवेदनीयानि च मोहनीयकषायनोकषाय..... द्विषोडशनव
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तदुभयानि कषाय नोकषायाव
नन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानावरणसंज्वलनविकल्पाश्चैकशः क्रोधमानमाया लोभाः हास्यरत्यरतिशोकभयजुगुप्सास्त्रीपुन्नपुंसक
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१३ दानलाभभोगोपभोगवीर्याणाम् । १४ दानादीनाम् १६ विंशतिर्नामगोत्रयोः १७ नामगोत्रयोविंशतिः १७ त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाण्यायुषः १८....
युष्कस्य १६ शेषाणामन्तमुहूर्ता २१ .... २४ नामप्रत्ययाः सर्वतो योगविशे- | २५ ....
षात्सूक्ष्मैकक्षेत्रावगाहस्थिताः । क्षेत्रावगाहस्थिताः ....
सर्वात्मप्रदेशष्वनन्तानन्तप्रदेशा २५ सद्वेद्यशुभायुर्नामगोत्राणिपुण्यम् २६ सद्वेद्यसम्यक्त्वहास्यरतिपुरुष
वेदशुभायु २६ अतोऽन्यत्पापम्
नवमोऽध्यायः ६ उत्तमक्षमामार्दवार्जवशौचसत्य- | ६ उत्तमः क्षमा संयमतपस्त्यागाकिञ्चन्यब्रह्मचर्या
(१८)
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णि धर्म: १७ एकादयो भाज्या युगपदेक- १७
विशतेः स्मिन्नैकानविंशति १८ सामायिकच्छेदोपस्थापनापरि- | १८ .... छेदोपस्थाप्य
हारविशुद्धिसूक्ष्मसाम्पराययथा- .... यथाख्यातानि चारित्रम्
ख्यातमिति चारित्रम् २२ अालोचनप्रतिक्रमणतदुभयवि- | २२ .... वेकव्युत्सर्गतपश्छेदपरिहारोप
स्थापनानि स्थापना २७ उत्तमसंहननस्यैकाग्रचिन्तानिरो- २७ ..... निरोधो ध्यानम् धो ध्यानमान्तमुहूर्तात्
२८ श्रामुहूर्तात् ३० आर्तममनोज्ञस्य साम्प्रयोगेत ३१ आर्तममनोज्ञानां
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द्विप्रयोगाय स्मृतिसमन्वाहारः । ३१ विपरीतं मनोज्ञस्य | ३३ विपरीतं मनोज्ञानाम् ३६ आज्ञापायविपाकसंस्थानविचयाय ३७ .... धर्म्यम्
धर्ममप्रमत्तसंयतस्य
x ३८ उपशान्तक्षीणकषाययोश्च ३७ शुक्ले चाद्य पूर्वविदः | ३६ शुक्ले चाद्य १० व्येकयागकाययोगायोगानाम् ४२ तत्र्येककाययोगायोगानाम् ४१ एकाश्रय सवितर्कविचारे पूर्वे । ४३ .... सवितकें पूर्वे
दशमोऽध्यायः २ बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यां कृत्स्न- २ बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यां कर्मविप्रमोक्षो मोक्षः
x ३ कृत्स्नकर्मक्षयो मोक्षः ३ औपशमिकादिभव्यत्वानां च । ४ औपशमकादिभव्यत्वाभावाच्चा
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४ अन्यत्र केवल सम्यक्त्वज्ञानदर्शन
सिद्धत्वेभ्यः ६ पूर्वप्रयोगादसंगत्वादुबन्धच्छेदातथागतिपरिणामाच्च
७ श्राविद्धकुलालचक्रवव्यपगतलेपालाबुवदेरण्डबीजवदग्निशि
खावच्च
८ धर्मास्तिकायाभावात्
न्यत्र केवलसम्यक्त्वज्ञानदर्शन
सिद्धत्वेभ्यः
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( २१ )
परिणामाच्च तद्गति:
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तत्त्वार्थसूत्र जैनागमसमन्वय हिन्दी भाषानुवाद सहित
यह जो पुस्तक आपके हाथों में है इसका एक अलग संस्करण हिन्दी अनुवाद सहित भी छपा हुआ है। अनुवादक हैं-जैन संसार के धुरन्धर विद्वान्, साहित्यरत्न, जैनधर्मदिवाकर उपाध्याय श्री आत्माराम जी महाराज | भाषानुवाद बड़ा सरल और विस्तृत है । प्राकृत के साथ संस्कृत छाया भी दे दी गई है । टीका के सम्बन्ध में विशेष प्रशंसा की आवश्यकता नहीं। टीकाकार मुनिजी का नाममात्र ही पर्याप्त है । मूल्य २) डाकव्यय अलग छपाई बढ़िया बड़े मोटे टाइप में हुई है ।
प्राप्तिस्थान
लाला शादीराम गोकुलचन्द जैन जौहरी चाँदनी चौक, देहली
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जैना पब्लिशिंग हाउस,२१८ क्लौथ मार्केट देहली की मार्फत - सैन्ट्रल इण्डिया प्रेस, देहली में छपा।
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பாட HTERTEDCtitioninitioli