Book Title: Vitragstav
Author(s): Hemchandracharya, Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 47
________________ शंका उठी मम हृदयमें इक 'देशना देते समय बनते चतुर्मुख आप क्यों हे नाथ ! परमानन्दमय !' सहसा उगा उत्तर कि 'युगपत् प्रभु ! प्रकाशे आपने' दानादि-चारों-धर्म, मानों इसलिए चउमुख बने !' ।। ४ ।। त्वयि दोषत्रयात् त्रातुं, प्रवृत्ते भुवनत्रयीम् । प्राकारत्रितयं चक्रुस्त्रयोऽपि त्रिदिवौकसः ॥५॥ तीनों भुवनके तीन दुःखों. क्षीण हो इसके लिये, हे जगतवत्सल देव ! दृढ जब आपने निश्चय किये । साकार करनेको उन्हें प्राकार तीन विरच दिये व्यंतर-असुर-सुर-देवताओंने, अहो! जिन! तू जिये ! ।। ५।। अधोमुखाः कण्टकाः स्युर्धात्र्यां विहरतस्तव । भवेयुः सम्मुखीनाः किं, तामसास्तिग्मरोचिषः ? ॥६॥ पदतल तुम्हारे विभु ! धरातल उपर चलते थे जभी कांटे उगे जो बाटमें बनते अधोमुख वे तभी । क्या सूर्यकी तीखी नजरके सामने आता कभी भयभीत सूरज-दीप्तिसे पक्षी निशाचर कोइ भी ? || ६ ।। केशरोमनखश्मश्रु, तवावस्थितमित्ययम्। बाह्योऽपि योगमहिमा, नाप्तस्तीर्थकरैः परैः ! ॥७॥ प्रभु ! केश, रूंवें, मूछ, दाढी, नख, कभी बढते नहीं यह आपका माहात्म्य परमान् ! अनूठा है सही। अफसोस इतना ही कि साहिब ! आपका यह बाह्य भी सामर्थ्य-यौगिक अन्य-देवों पा सके नहि रे कभी ! ।। ७ ।। शब्दरूपरसस्पर्शगन्धाख्याः पञ्च गोचराः । भजन्ति प्रातिकूल्यं न, त्वदग्रे तार्किका इव ॥ ८ ॥ १२ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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