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सागारधर्मामृत
वाद्यैर्नैष्ठिको वृत्तिं त्यजेद्वेधादिना विना । भोग्यान् वा तानुपेयात्तं योजयेद्वा न निर्दयं ॥१६॥
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अर्थ -- नैष्टिक श्रावकको गाय, बल, घोडे आदि पशुओंसे अपने जीविकाके व्यापार बिलकुल छोड देने चाहिये यह सबसे उत्तम पक्ष है । अथवा वह नैष्ठिक श्रावक गाय, घोडे आदि पशुओं को दूध अथवा सवारी आदिकेलिये रख सकता हे परंतु उन्हें विना बांधे और विना ताडना किये वा विना मारे ही रखना चाहिये अर्थात् उन्हें ताडना मारना वा बांधना नहीं चाहिये यह मध्यम पक्ष है । तथा कदाचित् उन्हें बांधना ही पडे तो उन्हें निर्दयतासे अर्थात् बहुत कठिनतासे नहीं बांधना चाहिये और न कठिनतासे बंधाना ही चाहिये यह: तीसरा अम ( जघन्य ) पक्ष है । यहांपर यह और समझलेना चाहिये कि ये सब नियम नैष्ठिक श्रावकके लिये हैं पाक्षिक के लिये नहीं है ।
यहां कदाचित कोई यह शंका करे कि अणुत्रतों में श्रावकने केवल हिंसाका ही त्याग किया है बांधने वा मारनेका त्याग नहीं किया है इसलिये किसीको बांधने वा मारने में भी व्रती श्रावकको कोई दोषं वा अतिचार नहीं है क्योंकि हिंसाका त्यागरूप व्रत किसीके मारने वा बांधने से खंडित नहीं होता अर्थात् बांधने वा छडी आदिसे मारनेमें किसीकी हिंसी नहीं होती अहिंसाणुव्रतका पूर्ण पालन होता है । कदाचित् यह कहो कि हिंसा के त्याग करते समय बांधने मारने आदिका