Book Title: Bruhad Dravya Sangraha
Author(s): Bramhadev
Publisher: Ganeshprasad Varni Digambar Jain Sansthan

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Page 201
________________ १८० ] वृहद्र्व्य संग्रहः [गाथा ४२ अथवा वृषभादिचतुर्विंशतितीर्थङ्करभरतादिद्वादशचक्रवर्तिविजयादिनववलदेव त्रिपृष्ठादिनववासुदेवसुग्रीवादिनवपूतिवासुदेवसम्बन्धित्रिषष्ठिपुरुषपुराणभेदभिन्नः प्रथमानुयोगो भएयते । उपासकाध्ययनादौ श्रावकधर्मम्, आचाराराधनादौ यतिधर्म च यत्र मुख्यत्वेन कथयति स चरणानुयोगो भएयते । त्रिलोकसारे जिनान्तरलोकविभागादिगून्थव्याख्यानं करणानुयोगो विज्ञेयः । पाभृततत्त्वार्थसिद्धान्तादौ यत्र शुद्धाशुद्धजीवादिषद्रव्यादीनो मुख्यवृत्या व्याख्यानं क्रियते स द्रव्यानुयोगो भएयते । इत्युक्तलक्षणानुयोगचतुष्टयरूपेण चतुर्विधं श्रुतज्ञानं ज्ञातव्यम् । अनुयोगोऽधिकारः परिच्छेदः प्रकरणमित्याद्य कोऽर्थः । अथवा षड्द्रव्यपश्चास्तिकायसप्ततवनवपदार्थेषु (मध्ये) निश्चयनयेन स्वकीय शुद्धात्मद्रव्यं, स्वशुद्धजीवास्तिकायो निजशुद्धात्मतत्वं निजशुद्धात्मपदार्थ उपादेयः। शेषं च हेयमिति संक्षेपेण हेयोपादेय भेदेन द्विधा व्यवहारज्ञानमिति । इदानीं तेनैव विकल्परूपन्यवहारज्ञानेन साध्यं निश्चयज्ञानं कथ्यते । तथाहि-रागात् परकलत्रादिवाञ्छारूपं, द्वषात् परबधबन्धच्छेदादिवाञ्छारूपं, कल्प-व्यवहार ६, कल्पाकल्प १०, महाकल्प ११, पुडरीक १२, महापुडरीक १३ और अशीतिक १४, इन प्रकीर्णकरूप भेदों से चौदह प्रकार का जानना चहिये । अथवा श्रीऋषभनाथ आदि चौबीस तीर्थंकरों, भरत आदि बारह चक्रवर्ती विजय आदि नौ बलदेव, त्रिपृष्ठ आदि नौ नारायण, और सुग्रीव आदि नौ प्रतिनारायण सम्बन्धी तिरेसठ शलाका पुरुषों का पुराण भिन्न-भिन्न प्रथमानुयोग कहलाता है । उपासकाध्ययन आदि में श्रावक का धर्म और आचार आराधना आदि में मुनि का धर्म मुख्यता से कहा गया है, वह दूसरा चरणानुयोग कहा जाता है । त्रिलोकसार में जिनान्तर ( तीर्थंकरों का अन्तरकाल) व लोकविभाग आदि का व्याख्यान है, ऐसे ग्रन्थ करणानुयोग जानना चाहिये। प्राभृत (पाहुड़) और तत्त्वार्थ सिद्धान्त आदि में मुख्यता से शुद्ध-अशुद्ध जीव आदि छः द्रव्यों आदि का वर्णन किया गया है, वह द्रव्यानुयोग कहलाता है। इस प्रकार उक्त लक्षण वाले चार अतुयोग रूप चार प्रकार का श्रुतज्ञान जानना चाहिये । अनुयोग, अधिकार, परिच्छेद और प्रकरण इत्यादि शब्दों का एक ही अर्थ है । अथवा छह द्रव्य, पंच अस्तिकाय, सात तत्त्व और नौ पदार्थों में निश्चयनय से मात्र अपना शुद्ध आत्मद्रव्य, अपना शुद्ध जीव अस्तिकाय, निज-शुद्ध-आत्मतत्त्व तथा निज-शुद्ध-आत्म पदार्थ उपादेय है। शेष हेय हैं। इस प्रकार संक्षेप से हेय-उपादेय भेद वाला व्यवहार-ज्ञान दो प्रकार का है । ___अब विकल्परूप व्यवहारज्ञान से साध्य निश्चयज्ञान का कथन करते हैं । तथा-राग के उदेय से परस्त्री आदि की वांछारूप, और द्वष से अन्य जीवों के मारने, बांधने अथवा Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org

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