Book Title: Bhagwati Sutra Part 09
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: A B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti

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Page 704
________________ भगवतीस्त्र समीपात् पौपधशालातः प्रतिनिष्क्रामति-निर्गच्छति, 'पडिनिक्खमित्ता सावधि नयरिं मझं यज्झेणं जेणेव ते समणोवासगा तेणेव उवागच्छइ' प्रतिनिष्क्रम्यनिर्गत्य, श्रावस्ती नगरीमाश्रित्य मध्यमध्येन-मध्यभागेन यत्रैव ते श्रमणोपासकाः आसन् तत्रैव उपागच्छति 'उवागच्छित्ता ते समणोवासए एवं क्यासी'-उपागत्य तान् श्रमणोपासकान् , एवं-वक्ष्यमाणपकारेण अवादीत्-‘एवं खलु देवाणुप्पिया! संखे समणोवासए पोसहसालाए पोसहिए नाव विहरइ' भो देवानुपियाः! एवं खलु शङ्ख श्रमणोपासकः पौषधशालायां पौषधिको यावत्-ब्रह्मचारी उन्मुक्तमणिसुवर्णः, व्यपगतमालावर्णकविलेपनः, निक्षिप्तशस्त्रमुशलः, एकोऽद्वितीयः, दर्भसंस्तारकोपगतः पाक्षिकं पौपधं प्रतिजाग्रत्-अनुपालयन् विहरति-तिष्ठति, 'तं छंदेणं देवाणुप्पिया! तुम्भे विउले अमणपाण खाइमसाइमे जाव विहरह' तत् भो पसे पौषधशालासे निकलना है 'पडिनिक्खमित्ता' निकलकर 'सावत्थि नयरिं मझ मज्झेणं' श्रावस्तिनगरीके बीचोंबीचसे होता हुआ 'जेणेव ते समणोवासगा' जहां पर वे राव श्रमणोपासक थे 'तेणेव उवागच्छई' - वहां आया 'उवागच्छित्ता ते समणोयासए एवं वयासी' आकर उन श्रमणोपासकों को ऐसा कहने लगा-'एवं खलु देवाणुपिया!' हे देवानुप्रियो ? 'संखे समणोवासए' वह शंख श्रमणोपासक तो 'पोसहसालाए' पौषधशाला में 'पोसहिए जाव विहरइ' पौषधिक-पोषव्रतधारी ब्रह्मचारी होकर यावत् मणिसुवर्णमाला गन्ध विलेपनका त्याग किया है, शस्त्रमुमल का त्याग किया है, और वह अकेलाही दर्भसंस्तार पर बैठ कर पाक्षिक पौषध की आराधना करतो है त छदेणं देवाणुप्पिया!' तुम्भे इसलिए हे देवानुप्रियो ? तुम सय अपनी इच्छानुसार 'विउले असणपाणखाइमसाइसे जाव विहशमश्रमापासनी पासपी अर्थात् पोषधशाथी मा२ ४न्या. “परिनिक्खमित्ता" मडा२ नीजीन “ सावस्थिं नयरि मज्झ मज्झेण" श्रावस्ति न शनी बन्यायमाथी नीजी "जेणेव ते समणोवासगा" न्यो ते. मा श्रभोपास। तो " तेणेव उपागन्छ।” त्यां ते माव्या. “उवागच्छिता ते समणोवासए एवं वयासी" मावान ते मा श्रमपासाने मा प्रभारी पहुं-" एव खलु देवाणुप्पिया" वानुप्रियो १ " संखे समणोवासए" ते 4 श्रमणास त “ पासहसालाए ' पौषधशालामा " पोसहिए जाब विहरइ" पौषधि-पोषधव्रतने धार ४शन ब्रह्माययान धारय ४शन થાવત્ મણિ, સુવર્ણ, માળા, ગંધ વિલેપનને ત્યાગ કરીને શાસ્ત્ર મુશલને ત્યાગ કરીને તે એકલાજ સંસ્મારક પર બેસીને પાક્ષિક પૌષધનું આરાધન કરે छ. 'त छंदेण देवाणुप्पिया तुल्भे" थी वानुप्रिया १ तभी या भारी

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