Book Title: Anusandhan 2020 02 SrNo 79
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 23
________________ १६ अनुसन्धान- ७९ वाचक श्रीसफलचन्द्रगणिरचितं गणधरप्रबोध-श्रीवर्धमानस्तवनम् ॥ सो सुत तिसलादेवि सतीनो, जस पद पूजइ रमणि सि ( स ) चीनो । जस तणु सुभगो विगत ज रीनो, राजहंस जो कृपा-दीन ॥१॥ जो महिमा क(कु) ल नृपति खजीनो, सोषक जो मिच्छत्तमतीनो । जिण परमाद कीओ न घटीनो, सोइ वीर मि ध्यानि कीनो ॥२॥ वर्धमान जिन त्रिजगधणीनो, ध्यान धरी करि पातक रीनो । जो समतारस - पानि पीनो, मनवंछित जस नामि सीनो ॥३॥ जो जिनमुनि ध्यानार्णवमीनो, जस गति वायु चरड़ सुख झीणो । जो प्रभु विचरिउ देशि अदीनो, जस नादिं जीतु सुरवीणो । अकलरूप हइ जो सामीनो, तस यानि सम पातिक खीणो ॥५॥ जस दंसणि जन ईतिविहीणो, सुगुरु भयो जो सम जोगीनो । 'साल' तरूतलि झाणि सीनो, तेणि ध्यानि प्रभु केवल लीनो ॥६॥ खिणु उपदेस तिहां प्रभु दीनो, अचरजु तिहां प्रभु लाभिहं छीनो । दस दो जोयण निशि चलि आए, पगडिइ माझिअपापापाए ||७|| समवसरणि बेइठ सुरि कीनो, राजति जइसो मुगटि नगीनो । धर्म सुणि भविजन जिन लीनो, जाण ति सवणि अमृत पीनो ॥८॥ दुंदही वाजइ मधुर उतीनो, अभविक मुगसेलु नही भीनो । वात चली आयु सब बेदी, भव अणंतका संसय छेदी ॥९॥ सुरविमाण अंबरिथी आवइ, यगनिवाड छोडी सब जावइ । गोतममुख माहण सबु खीजइ, सुरस्यूं कोप कीईं क्या लीजइ ॥१०॥ एणि जिनि जाणपणुं हम छीजइ, ऊठि चलउ ऊसपति पाडीजइ । चउ च्यालांशत माहण मिलीआ, उसमांथी धुरि गोतम चलीआ ॥ ११॥ छात्त विविधि बोलइ बरुदाली, जिनरिधि देखि चली पगि खाली । हा अविचार करी हुं आयु, अब क्युं जावति आप छपायु ॥१२॥ तब मधुरी झुणि साँइ बोलायु, इंदभूति गोयम ! सुखि आयु ? | चमकि क्युं मो नामिणिइ जाणिउ, बूझुं हुं छू तिजग - पिछाणिउ ॥१३॥

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