Book Title: Anand Pravachan Part 08
Author(s): Anand Rushi, Kamla Jain
Publisher: Ratna Jain Pustakalaya

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Page 321
________________ पाते नरक, लुब्ध लालची ३०७ अर्थ और वैभव की असीम तृष्णा में संलग्न व्यक्ति अनुचित उपायों से धन कमाकर उसका उपयोग विलासिता में, दुर्व्यसनों में, विविध प्रदर्शनों में, विवाहादि के प्रसंग पर फिजूलखर्ची में, कुरूढ़ियों के पोषण में करते हैं। इस प्रकार धन के अर्जन और दुर्व्यय से जनसाधारण में ईर्ष्या और असन्तोष पैदा होता है, गरीबों-अमीरों के बीच असमानता बढ़ती है, अपने बाल-बच्चों को उत्तराधिकार में बिना श्रम के मुफ्त का माल देकर उन्हें निकम्मे, आवारागर्द, दुर्व्यसनी एवं उड़ाऊ बनाये जाते हैं। वास्तव में इस प्रकार का धन सन्तान को देकर वे उन्हें परावलम्बी और अपाहिज तथा हीनवृत्ति का शिकार बनते हैं। इससे वे बालक परस्पर झगड़ते हैं, आलसी, अहंकारी और दुर्व्यसनी बनते हैं । ये सब बुराइयाँ वित्तषणा में संलग्न व्यक्ति पैदा करते हैं। यह तृष्णा उनके लिए ही नहीं, सारे समाज के लिए घातक सिद्ध होती है। इसलिए वित्त को नहीं, वित्तषणा को निन्द्य बताया गया है। ___मगध सम्राट कोणिक के पास किस बात की कमी थी? उसके पास राज्य था, धन था, सुख के सभी साधन थे, सभी प्रकार की सुविधाएँ थीं। परन्तु वित्तषणा से ग्रस्त होकर अपने हल और विहल कुमार नामक भाइयों को अपने हक में मिले हुए न्याययुक्त हार और सिंचानक हाथी को प्राप्त करने की महत्वाकाँक्षा उसके दिल में जगी। बात यह हुई कि कोणिक चम्पानगरी को अपनी राजधानी बनाकर राज्य कर रहा था। एक बार उसके छोटे भाई हल और विहल सिचानक हाथी पर बैठकर तथा हार आदि आभूषण पहनकर सैर करने जा रहे थे, तभी कोणिक की रानी पद्मावती की दृष्टि उन पर पड़ी । उसके मन में ईर्ष्या की आग भभक उठी। उसने कोणिक को उत्तेजित किया कि यह हार और हाथी तो आपके पास शोभा देते हैं, इनके पास किस काम के ? कोणिक ने पहले तो बहुत समझाया कि ये तो उनके हक के हैं, परन्तु पदमावती हठ ठानकर बैठ गई कि हार और हाथी किसी तरह से उनसे लेकर मुझे देंगे, तभी प्रसन्न रहूँगी।" इस पर कोणिक ने हल-विहल से हार और हाथी ला देना स्वीकार किया। दूसरे ही दिन कोणिक ने एक राजा के नाते अधिकारपूर्वक हल-विहल कुमार से हार और हाथी माँगें, तो उन्होंने अपनी स्थिति दुर्बल जानकर रातोरात ही अपना अन्तःपुर, हार-हाथी आदि सब वस्तुएँ लेकर चम्पानगरी से कूच किया और विशालानगरी में अपने मातामह महाराजा चेडा की शरण में पहुँच गये। उन्होंने शरणागत एवं दौहित्र के नाते उन्हें रख लिया । इधर कोणिक को पता चला तो उसने कोपायमान होकर चेडा महाराजा के पास यह सन्देश लेकर दूत भेजा कि हार, हाथी एवं हल-विहल कुमार को वापस सौंपे, अन्यथा आपका राज्य आदि भी छीन लिया जायेगा।" चेडा महाराजा ने इन्हें वापस भेजने से इन्कार करके दूत को लौटा दिया। इस पर कोणिक राजा अपार Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org

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