Book Title: Agam Sutra Satik 39 Mahanishith ChhedSutra 6
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Agam Shrut Prakashan
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अध्ययनं : २, उद्देशक : ३
मू. (३३७).
मू. (३३८) सव्वेसिं चारित्तखंडण - विराधनेनं मू. (३३९)
मू. (३४०)
मू. (३४१)
मू. (३४२)
पू. (३४३)
मू. (३४४)
मू. (३४५)
मू. (३४६)
मू. (३४७)
सुक्कज्झाणं समारुहिय सेलेसि पडिवज्जए ॥
मू. (३४८) तया न बंधए किंचि चिरबद्धं असेसे पि निहुहियज्झाण- जोग-अग्गीए भसमी करे दर्द लहु पंचक्खरुग्गिरण मेत्तेणं कालेणं भवोवगाहियं ।
मू. (३४९)
मू. (३५०)
मू. (३५१)
एवं सजीव - विरिय - सामत्थ- पारंपरएण गोयमा । पविमुक्क-कम्म-मल- कवया समएणं जंति पाणिणो ॥ सासय- सोक्ख- अनाबाहं रोग जर मरण-विरहियं । अदिट्ठ- दुक्ख-दारिद्दं निचाणंदं सिवालयं ॥ अत्थेगे गोयमा पाणी जे एयं मन्नए विसं । आसव-दार-निरोहादी इयर- हेइ- सोक्खं चरे ।। ता जाव कसिण- कम्मामि धोर-तव-संजमेण उ । नो निद्दहे सुहं ताव नत्थि सिविणे वि पाणिणं ॥ दुक्खमेवमवीसामं सव्वेसिं जगजंतुणं । एकं समयं न सम-भावे जं सम्मं अहियासिउं तरे ॥
मू. (३५२)
पू. (३५३)
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१४७
सुहं सुहझवसाएणं असुहं दुट्ठज्झवसायओ । तिब्वयरेणं तु तिव्वयरं मंदं मंदेन संचिणे ॥ पावकम्माणं एगीभूयाणं जेत्तियं रासिं भवे तमसंखगुणं वय-तव-संजमउस्सुत्तुम्मग्ग-पन्नवण-पवत्तण- आयरणोवेक्खणेण य समजिणे अपरिमाणगुरूतुंगा महंता घन- निरंतरा । पाव-रासी खयं गच्छे जहा तं सव्वोवाएहिमायरे ॥ आसवदारे निरंभित्ता अप्पमादी भवे जया । बंधे सप्पं बहु वेदे जइ सम्मतं सुनिम्मलं ॥ आसवदारे निरुंभित्ता आणं नो खंडए जया । दंसण - नाण-चरितेसुं उत्तो जो दढं भवे ॥ तया वेए खणं बंधे पोराणं सव्वं खवे । अनुइन्नमवि उईरित्तो निजिय-घोर परीसहो । आसवदारे निरंभित्ता सव्वासायण-विरहिओ । सज्झाय - झाण- जोगेसुं धोर-वीर तवे रओ ॥ पालेज्जा संजमं कसिणं वाया मनसा उ कम्मुणा । जया तया न बंधेजा उक्कोसमनंतं च निजरे ॥ सव्वावस्सगमुजत्तो सव्वालंबणविरहिओ । विमुक्को सव्वसंगेहिं सबज्झष्मंतरेहिय ।। गय-राग-दोसमोहे य निन्त्रियाणे भवे जया । नियत्ते विसयतत्तीए भीए गब्भपरंपरा ॥ आसवदारे निरंभित्ता खंतादी धम्मे ठिते ।
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