Book Title: Vyakhyapragnaptisutram Part 03
Author(s): Divyakirtivijay
Publisher: Shripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust

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Page 456
________________ 25 शतके उद्देशक: 7 श्रीभगवत्यङ्गं श्रीअभय वृत्तियुतम् भाग-३ // 1534 // सूत्रम् 802 तपोभेदाः पडिसलीणया?, 2 पंचविहा पं०, तं० सोइंदियविसयप्पयारणिरोहो वा सोइंदियविसयप्पत्तेसु वा अत्थेसु रागदोस-विणिग्गहो चखिंदियविसय एवं जाव फासिंदियविसयपयारणिरोहो वा फासिंदियविसयप्पत्तेसु वा अत्थेसु रागदोसविणिग्गहो, सेत्तं इंदियपडिसं०, 120 से किंतं कसायपडिसं०?, कसायपडिसं० चउव्विहा पं०, तंजहा-कोहोदयनिरोहो वा उदयप्पत्तस्स वा कोहस्स विफलीकरणं एवं जाव लोभोदयनिरोहो वा उदयपत्तस्स वा लोभस्स विफलीकरणं, सेत्तं कसायपडिसं०, 121 से किं तं जोगपडिसं०?, जोगपडिसं० तिविहा प०, तंजहा- अकुसलमणनिरोहो वा कुसलमणउदीरणं वा मणस्स वा एगत्तीभावकरणं अकुसलवइनिरोहोवा कुसलवइउदीरणंवा वइएवा एगत्तीभावकरणं, 122 से किंतंकायपडिसं०?,२जन्नंसुसमाहियपसंतसाहरियपाणिपाए कुम्मो इव गुत्तिदिए अल्लीणे पल्लीणे चिट्ठति, सेत्तं कायपडिसलीणया, सेत्तं जोगपडिसंलीणया, 123 से किं तं विवित्तसयणासणसेवणया?, विवित्तसय०२ जनं आरामेसुवा उजाणेसुवा जहासोमिलुद्देसए जावसेज्जासंथारगं उवसंपजित्ताणं विहरइ, सेत्तं विवित्तसयणासणसेवणया, सेत्तं पडिसं०, सेत्तं बाहिरए तवे१॥१२४ से किंतं अभिंतरए तवे?, 2 छव्विहे पं०, तं० पायच्छित्तं विणओवेयावच्चंतहेव सज्झाओ।झाणं विउसग्गो। 125 से किंतं पायच्छित्ते?, पाय 2 दसविहे पं०, तं० आलोयणारिहे जाव पारंचियारिहे, सेत्तं पायच्छित्ते / 126 से किं तं विणए?, विणए सत्तविहे पन्नत्ते, तंजहा- नाणवि० दंसणवि० चरित्तवि० मणवि० वयवि० कायवि० लोगोवयारवि०, 127 से किंतं नाणविणए?, ना०२ पंचविहे प०, तं० आभिणिबोहियनाणवि० जाव केवलनाणवि०, सेत्तं नाणविणए, 128 से किं तंदसणविणए?, दंसणविणए दुविहे० प०, तं० सुस्सूसणावि० य अणच्चासादणावि० य, 129 से किं तं सुस्सूसणाविणए?,सु०२ अणेगविहे पं०, तं० सक्कारेइ वा सम्माणेइ वा जहा चोद्दसमसए ततिए उद्देसए जाव पडिसंसाहणया, सेत्तं सुस्सूसणाविणए, 130 से किं तं अणच्चासायणाविणए?, अ०२ पणयालीसइविहे पं०, तं० अरिहंताणं // 25 //

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