Book Title: Vyakhyapragnaptisutram Part 03
Author(s): Divyakirtivijay
Publisher: Shripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust

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Page 486
________________ श्रीभगवत्यङ्गं श्रीअभयवृत्तियुतम् भाग-३ // 1564 // 28 शतके उद्देशकः१ सूत्रम् 819 पापस्यार्ज नाचारौ ॥अथ अष्टाविंशंशतकम्॥ ॥अष्टाविंशशतके प्रथमोद्देशकः॥ I व्याख्यातं कर्मवक्तव्यताऽनुगतं सप्तविंशंशतम्, अथ क्रमायातं तथाविधमेवाष्टाविंशं व्याख्यायते, तत्र चैकादशोद्देशका जीवाद्येकादशद्वारानुगतपापकर्मादिदण्डकनवकोपेता भवन्ति, तत्र चाद्योद्देशकस्येदमादिसूत्रं १जीवा णं भंते! पावं कम्मं कहिं समन्जिणिंसु कहिं समायरिंसु?, गोयमा! सव्वेवि ताव तिरिक्खजोणिएसु होज्जा 1 अहवा तिजोणिएसु य नेरइएसु य होज्जा 2 अहवा तिजोणिएसु य मणुस्सेसु य होज्जा 3 अहवा तिरिक्खजोणिएसु य देवेसु य होजा 4 अहवा तिजोणिएसुयमणु० देवेसुय होज्जा 5 अहवा तिजोणिएसुय ने० य देवेसुय होजा 6 अहवा तिजोणिएसुयमणु० देवेसु यहोजा 7 अहवा तिरिक्ख० ने० यमणुस्सेसुदेवेसुय होज्जा ८।२सलेस्सा णं भंते! जीवा पावं कम्मं कहं समजि० कहिंसमा०?, एवं चेव, एवं कण्हलेस्सा जाव अलेस्सा, कण्हपक्खिया सुक्कप० एवं जाव अणागारोवउत्ता। 3 नेरइया णं भंते! पावं कम्मंकहिं समजिणिंसुकहिं समायरिंसु?, गोयमा! सव्वेवि ताव तिजोणिएसु होज्जत्ति एवं चेव अट्ठभंगा भाणि०, एवं सव्वत्थ अट्ठभंगा, एवं जाव अणागारोवउत्तावि, एवं जाव वेमाणियाणं, एवं नाणावरिणजेणवि दंडओ, एवं जाव अंतराइएणं, एवं एए जीवादीया वेमाणियपज्जवसाणा नव दंडगा भवंति / सेवं भंते! 2 जाव विहरइ॥ सूत्रम् 819 // 28-1 // जीवाणं भंते! इत्यादि, कहिं समज्जिणेसु त्ति कस्यां गतौ वर्तमानाः 'समर्जितवन्तः'? गृहीतवन्तः कहिं समायरिंसु त्ति कस्यां समाचरितवन्तः? पापकर्महेतुसमाचरणेन, तद्विपाकानुभवनेनेति वृद्धाः, अथवा पर्यायशब्दावेताविति, सव्वेवि ताव तिरिक्खजोणिएसु होज्ज त्ति, इह तिर्यग्योनिः सर्वजीवानां मातृस्थानीया बहुत्वात्, ततश्च सर्वेऽपि तिर्यग्भ्योऽन्ये नारकादयस्तिर्यग्भ्य // 1564 //

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