Book Title: Vyakhyapragnaptisutram Part 03
Author(s): Divyakirtivijay
Publisher: Shripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust
View full book text ________________ 34 शतके श्रीभगवत्यङ्गं श्रीअभय वृत्तियुतम् भाग-३ / / 1594 / / उद्देशकः१ सूत्रम् 850 एकेन्द्रिय विग्रहादि ॥अथ चतुस्त्रिंशंशतकम्॥ ॥चतुस्त्रिंशशतके प्रथमोद्देशकः॥ त्रयस्त्रिंशशत एकेन्द्रियाः प्ररूपिताश्चतुस्त्रिंशच्छतेऽपि भङ्गयन्तरेण त एव प्ररूप्यन्त इत्येवंसंबन्धेनायातस्य च द्वादशशतोपेतस्यास्येदमादिसूत्रं - 1 कइविहा णं भंते! एगिंदिया प०?, गोयमा! पंचविहा एगि० प० तं पुढविक्काइया जाव वणस्सइकाइया, एवं एतेणं चेव चउक्कएणं भेदेणं भाणियव्वा जाव वणकाइया, 2 अपज्जत्तसुहुमपुढविकाइएणं भंते! इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए पुरच्छिमिल्ले चरिमंते समोहए २त्ता जे भविए इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए पञ्चच्छिमिल्ले चरिमंते अपज्जत्तसुहुमपु०काइयत्ताए उववज्जित्तए, से णं भंते! कइसमएणं विग्गहेणं उववजेजा?, गोयमा! एगसमइएण वा दुसमइएण वा तिसमइएण वा विग्ग० उव०, 3 से केणटेणं भंते! एवं वुचइ एगसमइएण वा दुसमइएण वा जाव उव०?, एवं खलु गोयमा! मए सत्त सेढीओप०, तं० उजुयायता सेढी एगयओवंका दुहओवंका एगयओखहा दुहओखहा चक्कवाला अद्धचक्कवाला 7, उजुआयताए सेढीए उववजमाणे एगसमइएणं विग्गहेणं उव०, एगओवंकाए सेढीए उववजमाणे दुसमइएणं विगहेणं उव०, दुहओवंकाए सेढीए उववजमाणे तिसमइएणं विग्ग० उव०, से तेणटेणं गोयमा! जाव उव०।४ अपज्जत्तसुहमपु०काइएणं भंते! इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए पुरच्छिमिल्ले चरिमंते समोहए समो०२ जे भविए इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए पञ्चच्छिमिल्ले चरिमंते पज्जत्तसुहुमपु०काइयत्ताए उववज्जित्तए सेणं भंते! कइसमइएणं विग्गहेणं उव०?, गोयमा! एगसमइएण वा सेसं तं चेव जाव से तेण० जाव विग्ग० उव०, एवं अपज्जत्तसुहमपुढविकाइओ पुरच्छिमिल्ले चरिमंते समोहणावेत्ता पच्चच्छिमिल्ले चरिमंते बादरपु०काइएसु अपनत्तएसु उववाएयव्वो, ताहे तेसु चेव पजत्तएसु 4, एवं आउक्काइएसु // 1594 //
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