Book Title: Silopadesamala Balavbodh
Author(s): Merusundar Gani, H C Bhayani, R M Shah, Gitaben
Publisher: L D Indology Ahmedabad

View full book text
Previous | Next

Page 145
________________ १०४ मेरुसुन्दरगणि-विरचित ए कलंक ऊपनउं छइ । इम जु वचन-मात्रिइं प्राणी एवडां कष्ट पामइ छइ, तु जे कायाइ करी पाप करइ छइ, ते तउ भवने सए नही छूटइ ।' इम ज्ञानीनां वचन सांभली, वैराग्य-रंगि पुरित हुंती, ईहापोह करतां जाती-स्मरण-ज्ञान ऊपनउं । आपणउ भवांतर दीठउ। तिवारई ऋषिदत्ता कर्म-थकी बीहती ज्ञानीनइ वीनवइ जउ, 'मुझनइ हिवइ जिन-दीक्षा दिउ ।' गुरु कहइ, 'राजानइ मनावि, जिम तुझनइ दीक्षा दिउं।' पछइ ए वात सांभली राजा पणि संसारनउं असारपणउं देखतउ सिंहरथ पुत्रनइ राज देई, ऋषिदत्ता भार्या-सहित राजाइ दीक्षा लीधी। पछइ विहार करतां, खड्ग-धारा-समान चारित्र पालतां, भद्दिलपुरि आव्या । तिहां संपूर्ण कर्म उन्मूली, केवलज्ञान पामी, बेहु मोक्षि पहुतां । इति श्री-शीलोपदेशमाला-बालाविबोधे श्री-ऋषिदत्ता-महासती-कथा ॥२९|| हिवइ दवदंत नी कथा कहइ - [३०. दवदंतीनी कथा ईणइ जबद्वीपि भरतक्षेत्रि अष्टोपद-समीपि संगमपुर नगर । तिहां मम्मण राजा वीरमती भार्या-सहित सुखिई राज करइ । अन्यदा प्रिया-सहित राजा आहेडा-भणी नगर-बाहिरिनीकलिउ। तिसिई संधात-साथइ महात्मा एक मल-मलिन-गात्र आवतउ देखी मन-माहि अपशुकन मानतउ राजाई महात्मा खली राखिउ, संघात-हूंतउ चूकविउ । बार घडी-ताई संतापी पछइ दया-परिणाम ऊपनई, राजाई महात्मा पूछिउ, "किहां हूंतउ तूं आविउ ? किहां जाएसि ?" तिवारई मुनि कहइ, 'हुँ रोहीतकनगर-हूंतउ आविउ । पण अष्टापदि बिंब नमस्करिवा-भणी जाउं छ । ते हैं तुम्हे हिवडा संघात-हूंतउ विछोहिउ।' इम वात करतां राजाराणीए दुःस्वप्ननी परिइं कोप मूकिउ। पछइ ते महात्मा-नइ भातपाणीई करी संपूर्ण भक्ति कीधी । तिसिई महात्माई ज्ञानरूप धर्म-ऊषध कर्म-रोगनी चिकित्सा भणी आपिउं । पछइ महात्मा अष्टापदि पहुतउ । हिवइ ते बिहुइ महात्माना संसर्ग-लगइ श्रावकउं धर्म तिम पालिवा लागां; जिम रांक द्रव्यनइ पालइ । अन्यदा वीरमतीनइ जिनधर्मनी गाढी स्थिरता करिवा-भणी शासन-देवताई अष्टापद तीर्थ देखाडि । तिसिईतिहां वीरमतीइं, अष्टापद-ऊपरि शाश्वती प्रतिमाई जे देवता पूजई अचई छई ते देखी परम आनंद धरती चउवीस इ जिननी प्रतिमा नमस्करी, विद्याधरीनी परि? आप. णड नगरि पाछी आवी । पछइ जिन-जिन-प्रति वीस-वीस आंबिल करी रत्नमई चउवीस तिलक कराव्यां । पछइ सपरिवार अष्टापद-पर्वति जई स्नात्र-महोत्सप-पूर्वक चउवीस इ तीर्थकरनई चउवीस इ तिलक दीधां । भावपूर्वक वली चारण-श्रमण महात्मा तिहां आविआ हूंता, तेहनई दान देई, महा-भक्तिपूर्वक नाची, गीत गाई, घरि आवी । हिवइ बिहुँनइ डील इ जूजू पणि जीव एक जि । इम धर्म-कर्म करतां समाधि-मरण पामी, बेहूं देवलोकि देव-देवी हुआ। तिहां हूंतउ मम्मणनउ जीव चिवी, ईणइ जंबूद्वीपि, भरतक्षेत्रि, बहुली-देशि, पोतनपुरि नगरि, धम्मिल्ल नामिई आभारनी भार्या रेणुका, तेहनी कूखिई, धन एहवई नामिइ पुत्र हउ । अनइ वीरमतीनड जीव देवलोक-तु चिवी धूसरी एहवइ नामि धननी भार्या हुई । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

Loading...

Page Navigation
1 ... 143 144 145 146 147 148 149 150 151 152 153 154 155 156 157 158 159 160 161 162 163 164 165 166 167 168 169 170 171 172 173 174 175 176 177 178 179 180 181 182 183 184 185 186 187 188 189 190 191 192 193 194 195 196 197 198 199 200 201 202 203 204 205 206 207 208 209 210 211 212 213 214 215 216 217 218 219 220 221 222 223 224 225 226 227 228 229 230 231 232 233 234