Book Title: Shrutsagar Ank 2013 12 035
Author(s): Mukeshbhai N Shah and Others
Publisher: Acharya Kailassagarsuri Gyanmandir Koba

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Page 15
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir १३ श्रुतसागर - ३५ [२] दान केम? दान-शील-तपो-भाव-भेदैर्धर्मश्चतुर्विधः । भव्याब्धियानपात्राभः, प्रोक्तोऽर्हद्भिः कृपापरैः ।।४।। [दानप्रकाश-१/४] तत्राऽपि प्रवरं दानं, सोभाग्याऽऽरोग्यकारकम् । कीर्तिनिर्बन्धनं सर्व-सम्पदां परमास्पदम् ।।५।। [दानप्रकाश १/५] हे शीलचन्द्र! करलीलभवाम्बुराशिनिस्तारणोडुपतमः! शृणु भावने! त्वम् । एकस्य मुक्तिरभवत् भवतां प्रसादाद्, दानात् तु दातुरपरस्य च मोक्षमार्गः ।।६।। [दानप्रकाश १/६] अर्थ : अनंतकृपाळु एवा अरिहंतपरमात्माए संसार रूपी समुद्रनो पार पामवा नौका समान दान-शील-तप अने भाव ए चार प्रकारनो धर्म कह्यो छे. ।।४।। ए चार प्रकारना धर्ममां पण दान ज श्रेष्ठ छे केमके ते सौभाग्य अने आरोग्यने आपनारुं छे. कीर्तिने फेलावनारुं छे अने सर्वप्रकारनी संपदाने रहेवाना आवास [घर] जेवू छे. [1५।। हे शील! हे तप! हे भाव! तमारा प्रभावथी तो एक ज व्यक्तिनी मुक्ति थाय छे. पण दानथी तो आपनारनी अने दान लेनारनी बंनेनी मुक्ति थाय छे. ।।६।। श्रीकनककुशलगणीए उपरना श्लोकमा 'दानधर्मनु भावनात्मक कारण कह्यु. ज्यारे प्रस्तुतकृतिकार 'श्रीरत्नमंदिरगणि ए दानधर्मनुं (Prectical) प्रेक्टिकल कारण आप्युं छे, नो शीलं परिपालयन्ति गृहिण-स्तप्तुं तपो न क्षमा, आर्त्तध्यानवशाद् गतोज्ज्वलधियस्तेषां क्व सदभावना? | इत्येवं निपुणेन हन्त मनसा सम्यग् मया निश्चितं, नोत्तारो भवकूपतोऽस्ति गृहिनां दानं विना कर्हिचित ।।६।। मेघ. नृप. कथा ६] गृहस्थो शीलधर्म पाळी शकता नथी, तप करवाने पण शक्तिमान नथी, वळी सतत घर परिवार-स्वजनादि विषयनी चिंताने कारणे आर्तध्यान करता होवाथी तेमनी पासे सारा [शुभ] भावो पण नथी, तेथी मने एम लागे छे के जो एमने संसारसमुद्र तरवो होय तो 'दान' एक ज मात्र सरळ-श्रेष्ठ उपाय छे. For Private and Personal Use Only

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