Book Title: Shrutsagar Ank 2013 12 035
Author(s): Mukeshbhai N Shah and Others
Publisher: Acharya Kailassagarsuri Gyanmandir Koba

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Page 14
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir १२ दिसम्बर - २०१३ पाछळथी आगम साहित्यनी जेम आगमेतर साहित्य-प्रकरणग्रंथोमां अने एनी टीकाओमां पण कथाओ समाविष्ट थई. धर्मदास मणि कृत 'उपदेशमाला', शांतिसूरिजी कृत - 'धर्मरत्नप्रकरण', 'उपदेशपद' 'पुष्पमाळा प्रकरण, शीलोपदेशमाळा' वगेरे ग्रंथोमा अनेक कथाओ आवेली छे. आम कथानी उपादेयता अने व्याप वध्यो तेम धर्मग्रंथोनी साथे स्वतंत्र कथाग्रंथो पण निर्माण पाम्या. जेमां भद्रेश्वरसूरि कृत 'कहावलि', शीलांकाचार्यजी कृत 'चउपन्नमहापुरिसचरिय', विमलसूरिजी- 'पउमचरिय', हेमहंसगणि कृत 'कथारत्नाकर', जिनेश्वरसूरि कृत 'कथाकोश', देवभद्रसूरि कृत 'कहारेयणकोस' वगेरे अनेक ग्रंथो गणावी शकाय. क्यारेक तो एक ज विषय-व्यक्ति उपर अनेक ग्रंथो रचाया होय एवू पण बन्युं छे. २४ तीर्थंकर प्रभुमांना १. आदिनाथ २. शांतिनाथ ३. नेमिनाथ ४. पार्श्वनाथ ५. महावीरस्वामि - ए पांच तीर्थंकरो, ६३ शलाकापुरुषो, जंबूस्वामी, स्थूलिभद्र, धन्ना-शालिभद्र जेवा प्रसिद्ध महापुरुषोना जीवन उपर अनेक ग्रंथो रचाया छे. ते ज रीते 'उत्तराध्ययनसूत्र, दशवैकालिकसूत्र, उपदेशमाळा' जेवा ग्रंथो उपर पण एकाधिक टीकाग्रंथो रचाया छे. प्राकृत-संस्कृत साहित्यनी ते कथाओ अनेक कविओ-साधु भगवंतो द्वारा मारुगुर्जर, गुर्जर भाषामा परिणमी तेथी चोपाई-रास-आख्यान वगेरे कथानिबद्ध रह्या. आम आ 'कथासाहित्य' हमेशा बधाने माटे लोकप्रिय रह्यु. प्रस्तुतकथा-दानकथा : प्रस्तुत (मेघवाहन नृपकथा) कथाने दानकथा के दानमहात्म्य संबंधि कथाना संग्रहमां लई अहिं आपणे आ दानकथा संबंधी केटलाक मुद्दा विचारशुं. [१] 'दान' शब्दनो अर्थ - 'दा' धातुथी 'ल्युट्' प्रत्यय भाव अर्थमां थाय त्यारे 'दान' शब्द थाय. 'दान' एटले 'आपq. प्रवचनसारोद्धारना छट्ठा द्वारमां, प्रश्नव्याकरणमा अने पंचाशकजीमां आ शब्द 'वितरणे' अर्थमां वपरायो छे. प्रश्नव्याकरणना त्रीजा द्वारमां- 'लब्धस्याऽन्नस्य ग्लानादिभ्यो वितरणे' - ए अर्थमां, आवश्यकमां 'अशनादिप्रदाने अर्थमां, सूत्रकृतांगपला श्रुतस्कंधे ११मां अध्ययनमां - ‘स्वपराऽनुग्रहार्थमर्थिने दीयत इति दानम्. ए अर्थमां, कल्पसूत्र-क्षण.५मां अने उत्तराध्ययनमा ‘याचकाभिप्सितार्थे धने' अर्थमां वपरायो छे, वस्तुतः उपरोक्त अर्थोमां 'आप ए भाव स्पष्टपणे देखाय छे. [अभिधान राजेन्द्र भाग-४मांथी] For Private and Personal Use Only

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