Book Title: Jivan ki Khushhali ka Raj
Author(s): Lalitprabhsagar
Publisher: Pustak Mahal

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Page 44
________________ एक भी मित्र नहीं है। बुरे वक्त में सारे मित्र यही सोचेंगे कि अगर हम काम नहीं आए तो क्या और भी मित्र तो हैं। जैसे जिंदगी में पति या पत्नी एक होती हैं, संतानें दो-चार होती हैं, माता-पिता एक होते हैं वैसे ही जीवन में मित्र भी दो-चार से ज्यादा नहीं होने चाहिए। मैत्री-भाव सबके साथ रखो, प्रेम की भावना भी सबसे रखो, लेकिन जिन्हें अपना मित्र मानते हैं, उनके प्रति बहुत सजग रहें । हम कहते हैं 'मित्ती मे सव्व भूएसु' यह प्राणीमात्र के प्रति मैत्रीभाव की सोच है, लेकिन निजी मित्र सावधानी से बनाएँ। व्यक्ति के जीवन में संगत का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है। व्यक्ति को जैसी सोहबत और निकटता मिलती है, वह धीरे-धीरे वैसा ही होता जाता है। अगर आप चरित्रवान लोगों के बीच जीते हैं तो आप चरित्रशील होंगे। अगर आप सेवाभावी लोगों के बीच रहते हैं तो आपके भीतर सेवा की भावना पैदा होगी। अगर आप सुसंस्कारित लोगों के बीच रह रहे हैं तो आपके भीतर सुसंस्कार आएंगे। अगर आप दूध की दुकान पर खड़े होकर शराब पिओगे तो लोग समझेंगे दूध पी रहे हो और शराब की दुकान पर खड़े होकर दूध भी पिओगे तो लोग यही समझेंगे कि शराब पी रहे हो। जिन लोगों के बीच, जिनके साथ तुम जी रहे हो। तुम वैसे ही बनोगे, लोगों का दृष्टिकोण भी तुम्हारे प्रति वैसा ही बनता जाएगा। संकट : मित्रता की कसौटी तुलसीदास जी ने कहा था 'धीरज, धर्म, मित्र अरु नारी, आपतकाल परखिए चारी।' हरेक व्यक्ति को लगता है कि उसमें बहुत धैर्य है, वह धर्मात्मा भी है, उसकी पत्नी सन्नारी है और मित्र का सहयोग भी अच्छा है, लेकिन इन चारों की परख किसी विपत्ति; आपदा या संकट के समय ही होती है। विपरीत वातावरण में भी जब तुम अपने धीरज को बरकरार रख सको, तभी तुम धैर्यवान कहला सकोगे। यूं तो हर कोई धार्मिक है लेकिन जब भी मन को प्रलोभन, वासना का निमित्त, स्वार्थ की पूर्ति का साधन मिलता है तो वह विचलित हो जाता है। इन विपरीत वेलाओं में भी जो अपने धर्म को स्थिर रखने में सफल होता है वही वास्तविक धार्मिक है। यूं तो हर व्यक्ति को अपनी पत्नी अच्छी लगती है लेकिन जब जीवन में राम की तरह चौदह वर्ष 43 Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org


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