Book Title: Jain Aur Bauddh ka Bhed
Author(s): Hermann Jacobi, Raja Sivaprasad
Publisher: Navalkishor Munshi

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Page 136
________________ की सहलीसा कुछ बन पहले भी माना है। बा द्धिार्थ में बड़ी भक्ति रखती थी । वह दस स्त्रियों साप प्रावर सिद्धार्थको भोजन देवावा करती थी। सनी एक दासी वो उसका नाम पा रापा । वह हास ही में मर नई बीस बी अन्त्येष्टि क्रिया का एक सहा पुराना बस निवार्च को मिल गया । उसे सीकर उसने एकोपीन तम्यार किया । इस तरह वे बौद्ध साधु के लिये उदाहरण रुप हुए। जिस जगह उन्होंने वह वस्त्रा हवार पिया बा उसे पानकल-सीवन कहते थे। उनके जमुवायो साधुओं में यह नियम प्रचलित होगवा, कि जब समी बलको अत्यन्त प्रावश्यकता पड़े तोके हुए चि. पड़ों और कपड़ों से वे अपने हाथों तय्यार किये बाई किसी बीह साधु को यह कहने को जगह -बी, कि बखराब है, कि बौद्ध धर्म के स्वापक, पास एक मात्र प्रतिनिधि, एकबड़े राजा के उत्तराधिकारी, और स्वयं महापरिहत सिद्धाने वैशा किया तब दूसरे के लिये ऐसा करने में पापापत्ति इन दुःखदापी तपों का अन्त समय निषट मागवा । द्विवल एक पग जाने बहना बा । वे अपने नाबी बना वो जानते थे, और अपने पाप कोनी पहचानते थे, वे उन लोगों को मिलता है पानी और अपने बसानी समझते थे परन्तु उन की दूरदर्षिता ने धमी ठहरा रहा। वे अपने शाप वितररने लगे, कि मैं अभी मनुष्य जाति मोराद्वार बरसाने योग्य हो गया हूं या नहीं। मुकर्म संसार समनट करने की पूरी शचि मागई. या Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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