Book Title: Jago Mere Parth
Author(s): Chandraprabhsagar
Publisher: Jityasha Foundation

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Page 138
________________ उत्सुक हैं । नैया निश्चित तौर पर पार पहुँचेगी, मगर पहले मूर्छा के लंगर खुलें तब न ! तुम केवल लंगरों को खोलो, पतवारें अपने आप चलेंगी। ये हवाएँ तुम्हें एक नये किनारे की ओर, नये रास्ते पर अपने आप ले जायेंगी। बिना मझधारों तक पहुँचे कोई भी किनारों तक नहीं पहुँचा है। रजकण को बिना चूमे कंचन मिला है किसको, कांटों में बिना घूमे मधुबन मिला है किसको। तू देखके कुछ मुश्किलें क्यों हार रहा है हिम्मत, देहरी को बिना लांघे आंगन मिला है किसको। बिना रजकणों को चूमे कंचन नहीं मिलता, बिना कांटों में घूमे मधुबन तक पहुँचना नहीं होता। अगर कोई आदमी आंगन तक पहुँचना चाहता है, तो निश्चित तौर पर उसे देहरी को लांघना पड़ेगा। यह मझधार देहरी को लांघने की तरह ही है । मझधार में पहुँचकर ही श्रीकृष्ण से अर्जुन कहते हैं कि आपने मुझे इतनी ऊंची और महान् बातें बताईं अपने बारे में । जगत के बारे में । जड़ और चैतन्य, हर पहलू का स्पर्श करते हुए आपने मेरे सामने जीवन और जगत का सारा मनोविज्ञान, सारा खाका खींचकर खड़ा कर दिया है। जिस तरह से लगातार आप अपनी, भगवत् स्वरूप की महिमा गा रहे हैं, अपने स्वरूप का विश्लेषण कर रहे हैं, उसे सुनकर मेरी आत्मा तड़फ उठी है, एक प्यास, एक कसक जग पड़ी है। अब तो कुछ ऐसा चमत्कार करो कि स्वयं आपका परम विराट स्वरूप मुझ अर्जुन को देखने को मिले। आपने अब तक जितनी बातें, मझसे कही हैं, उसके प्रति मेरी कोई अनास्था नहीं है, पर आप मेरी अन्तर-आत्मा को सही तौर पर तृप्त करना चाहते हैं, मुझे सही-सही तौर पर आनंदित करना चाहते हैं तो दिखाइये अपने वैभव को, अपने विराट स्वरूप को। अर्जुन की बातें सुनकर भगवान मुस्कुरा पड़े। भगवान के सामने विवशता आ ही गई, उनके सामने कोई विकल्प नहीं बचा कि वे अपना रूप न दिखाएं। कोई और होता तो भगवान उसे छका ही देते, मगर जिस अर्जुन को निमित्त बनाकर समर्पण ही चाहिए | 129 Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org

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